Sunday, 3 October 2021

Brahma Kumaris Murli 04 October 2021 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 04 October 2021

 04-10-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


मीठे बच्चे - “बाप को याद करने की भिन्न-भिन्न युक्तियाँ रचो, पुरुषार्थ कर चार्ट रखो, थको नहीं, तूफानों में अडोल रहो''

प्रश्नः-
बच्चों को अपना कौन सा अनुभव आपस में एक दो को सुनाना चाहिए?

उत्तर:-
हम बाप को कितना समय और कैसे याद करते हैं! भोजन के समय बाप की याद रहती है या अनेक प्रकार के विचार आ जाते हैं! बाबा कहते बच्चे ट्राई करके देखो। भोजन पर बाप के सिवाए दूसरा कुछ याद तो नहीं आता है! फिर आपस में एक दो को अनुभव सुनाओ। 2- कोई भी दर्दनाक सीन देखते हमारी स्थिति कैसी रही! इसका भी अनुभव सुनाना चाहिए।

गीत:-
लाख जमाने वाले....

Brahma Kumaris Murli 04 October 2021 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 04 October 2021 (HINDI)

ओम् शान्ति

मीठे-मीठे बच्चे अब बेहद बाप को कैसे भूलेंगे, जिससे बेहद का वर्सा मिलता है। जिसको आधाकल्प से याद करते थे। यह तो समझाया है कि मनुष्य को कभी भगवान नहीं कहा जाता। तो अब जबकि बेहद का बाप मिला है, उसकी याद में ही करामत है। जितना पतित-पावन बाप को याद करेंगे, उतना पावन बनते जायेंगे। तुम अपने को अब पावन कह नहीं सकते हो, जब तक अन्त हो। जब सम्पूर्ण पावन बन जायेंगे तो यह शरीर छोड़ जाए सम्पूर्ण पवित्र शरीर लेंगे। जब सतयुग में नया शरीर मिले तब सम्पूर्ण कहेंगे। फिर रावण का खात्मा हो जाता है। सतयुग में रावण की एफीजी नहीं बनाई जाती है। तो तुम बच्चे जब बैठते हो, चलते-फिरते हो तो बुद्धि में यह याद रहे। अब हमने 84 का चक्र पूरा किया है फिर नया चक्र शुरू होता है। वह है ही नई पवित्र दुनिया, नया भारत नई देहली। बच्चे जानते हैं पहले जमुना का कण्ठा है, जहाँ पर परिस्तान बनना है। बच्चों को बहुत अच्छी रीति समझाया जाता है, पहले-पहले तो बाप को याद करो। भगवान बाप पढ़ाते हैं। वही बाप टीचर गुरू है, यह भला याद रखो। बाबा ने यह भी समझाया था कि तुम बाजोली खेलते हो। वर्णो का चित्र भी बहुत जरूरी है। सबसे ऊपर है शिवबाबा फिर चोटी ब्राह्मण। यह समझाने के लिए बाबा कहते हैं। अच्छा यह बुद्धि में रखो कि हम 84 जन्मों की बाजोली खेलते हैं। अब संगम है, बाप जास्ती समय नहीं रहते हैं। फिर भी 100 वर्ष तो लगते हैं। उथल पाथल पूरी हो फिर राज्य शुरू हो जाता है। महाभारत लड़ाई तो वही है, जिसमें अनेक धर्म विनाश, एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना हो रही है। तुम्हारी कलाबाजी तो वन्डरफुल है। तुमको पता है फकीर लोग कलाबाजी खेलते, तीर्थों पर जाते हैं। मनुष्यों की श्रद्धा तो रहती है ना। तो उन्हों को कुछ न कुछ दे देते हैं। परवरिश उन्हों की होती रहती है क्योंकि ऐसे मनुष्य अपने साथ क्या उठायेंगे। बाबा तो इन सब बातों का अनुभवी है। बाबा ने अनुभवी रथ लिया है। गुरू भी किये। देखा भी बहुत कुछ। तीर्थ भी किये हैं। अब बाबा कहते हैं बाजोली तो याद कर सकते हो। हम अभी ब्राह्मण हैं फिर देवता, क्षत्रिय बनेंगे। यह है सारी भारत की बात। बाप ने ऐसे समझाया है और धर्म तो जैसे बाईप्लाट हैं। बाप ने तुमको ही तुम्हारे 84 जन्मों की कहानी बताई है। सेन्सीबुल जो हैं वह हिसाब से समझ सकते हैं। इस्लामी आयेंगे तो एवरेज कितने जन्म लेंगे। एक्यूरेट हिसाब की तो दरकार नहीं। इन बातों में तो कोई फिकरात की बात नहीं। सबसे जास्ती फिकर यह रहती है कि हम बाबा को याद करते रहें। बस एक ही फिकर है, एक को याद करने का। घड़ी-घड़ी माया और फिकरात में डाल देती है, इसमें माया फिकर में बहुत डालती है। बच्चों को याद करना ही चाहिए। अब हमको घर जाना है। स्वीट होम किसको याद नहीं आयेगा। मांगते भी हैं शान्ति देवा। भगवान को कहते हैं - हमको शान्ति दो।

अब तुम बच्चे यह तो जानते हो यह पुरानी दुनिया खत्म हो जानी है। यह भी तुम्हारी बुद्धि में है और मनुष्य तो घोर अन्धियारे में हैं। शान्ति सतयुग में ही होती है। एक धर्म, एक भाषा, रसम-रिवाज भी एक ही है। वहाँ है ही शान्ति का राज्य। अद्वैत की बात ही नहीं। वहाँ तो एक ही राजाई होती है और सतोप्रधान हैं। रावणराज्य है नहीं जो लड़ाई हो। तो तुम बच्चों को खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। शास्त्रों में जो गायन है अतीन्द्रिय सुख गोप-गोपियों से पूछो। गोप-गोपियाँ तो तुम हो ना। तुम सम्मुख में बैठे हो। तुम्हारे पास भी नम्बरवार हैं जिनको याद रहता है कि बाबा हमारा बाबा भी है, टीचर भी है, गुरू भी है। यह तो वन्डर है ना। लाइफ तक साथ देते हैं। गोद में लिया और पढ़ाई शुरू कर देते। तो यह याद रहने से भी खुशी बहुत रहेगी। परन्तु माया फिर यह भी भुला देती है। मनुष्यों को यह भी समझाना होता है, मनुष्य पूछते हैं बाकी थोड़ा समय कहते हो, क्या प्रूफ है? बोलो, देखो इसमें लिखा हुआ है भगवानुवाच। यज्ञ भी रचा हुआ है। यह है ज्ञान यज्ञ। अब कृष्ण तो यज्ञ रच न सकें।

बच्चों को यह भी बुद्धि में रहना चाहिए कि हम ब्राह्मण इस बेहद यज्ञ के हैं। बाबा ने हमको निमित्त बनाया है। जब तुम अच्छी रीति ज्ञान और योग की धारणा करते हो, आत्मा सम्पूर्ण बन जाती है तब इस भंभोर को आग लगेगी। मनुष्यों को ही पता होता है ना कि यह बेहद का कर्मक्षेत्र है, जहाँ सभी आकर खेल करते हैं। बनी बनाई बन रही... बाप कहते हैं बच्चे चिंता उनकी की जाए जो अनहोनी हो। हो गया सो ड्रामा में था फिर उनका चिंतन काहे का करें। हम ड्रामा को देखते हैं। ड्रामा में जब कोई ऐसा दर्दनाक सीन होता है तो मनुष्य देखकर रोते हैं। अब वह तो हुआ झूठा ड्रामा। यह तो सच्चा ड्रामा है। सच-सच करते हैं। परन्तु तुमको कोई दु:ख के आंसू नहीं आने चाहिए। साक्षी होकर तुमको देखना है। जानते हो यह ड्रामा है, इसमें रोने की क्या दरकार है। पास्ट इज़ पास्ट। कब विचार भी नहीं करना चाहिए। तुम आगे बढ़ते बाप को याद करते रहो और सबको रास्ता बताते रहो। बाबा तो राय देते रहते हैं। त्रिमूर्ति के चित्र तुम्हारे पास बहुत हैं। क्लीयर लिखा हुआ है वह शिवबाबा यह वर्सा। तुम बच्चों को यह चित्र देखने से बहुत खुशी होनी चाहिए। बाबा से हमको विष्णुपुरी का वर्सा मिलता है। पुरानी दुनिया तो खत्म होनी है। बस यह चित्र सामने रख दो, इसमें खर्चा तो कुछ भी नहीं है। झाड़ भी बहुत अच्छा है। रोज़ सवेरे उठकर विचार सागर मंथन करो। अपना टीचर आपेही बनकर पढ़ो। बुद्धि तो सबको है। चित्र अपने घर में रख दो। हर एक चित्र में फर्स्टक्लास ज्ञान है। कहते हैं विनाश होगा तो तुम्हारी बाप के साथ प्रीत है ना। कहते भी हैं सतगुरू मिला दलाल के रूप में... तो तुम्हें कितनी अच्छी-अच्छी बातें समझने-समझाने के लिए मिली हैं। फिर भी माया का पाम्प बहुत है। 100 वर्ष पहले यह बिजली, गैस आदि थोड़ेही थी। आगे वाइसराय आदि 4 घोड़े की, 8 घोड़े की गाड़ी में आते थे। आगे साहूकार लोग गाड़ी में चढ़ते थे। अब तो विमान आदि निकल पड़े हैं। आगे यह कुछ नहीं था। 100 वर्ष के अन्दर यह क्या हो गया है। मनुष्य समझते हैं कि यही स्वर्ग है। अब तुम बच्चे जानते हो स्वर्ग तो स्वर्ग है। यह सब पाई पैसे की चीजें हैं, इनको आर्टीफिशल पाम्प कहा जाता है। अब तुम बच्चों को यही एक फुरना चाहिए कि हम बाप को याद करें, जिसमें ही माया विघ्न डालती है। बाबा अपना मिसाल भी बतलाते हैं। भोजन खाता हूँ, बहुत कोशिश करता हूँ - याद में रह खाऊं फिर भी भूल जाता हूँ। तो समझता हूँ बच्चों को तो मेहनत बहुत होती होगी। अच्छा बच्चे तुम ट्राई करके देखो। बाबा की याद में रहकर दिखाओ। देखो सारा समय याद ठहर सकती है। अनुभव सुनाना चाहिए। बाबा सारा समय याद ठहर नहीं सकती है। बहुत किसम-किसम की बातें याद आ जाती हैं। बाबा खुद अपना अनुभव बताते हैं। बाबा ने जिसमें प्रवेश किया यह भी पुरुषार्थी है, इन पर तो बड़े झंझट हैं। बड़ा कहलाना, बड़ा दु:ख पाना। कितने समाचार आते हैं। विकारों के कारण कितना मारते हैं। घर से निकाल देते हैं। बच्चियाँ कहती हैं मैं ईश्वर की शरण में आई हूँ। कितने विघ्न पड़ते हैं। कोई के पास शान्ति नहीं है। तुम बच्चों को खातिरी है। अभी पुरुषार्थ कर श्रीमत पर चल शान्ति में रहते हो। इस बाबा ने यहाँ भी कई ऐसे घर देखे हैं जहाँ आपस में मेल-मिलाप में बहुत रहते हैं। सभी बड़ों की आज्ञा में चलते हैं। कहते हैं हमारे पास तो जैसे स्वर्ग लगा पड़ा है।

अभी बाबा तुमको ऐसे स्वर्ग में ले जाते हैं। जहाँ सब प्रकार के सुख हैं। देवताओं का 36 प्रकार का भोजन गाया हुआ है। अब तुम स्वर्ग का वर्सा बाप से लेते हो। वहाँ तो कितने स्वादिष्ट वैभव खाते रहेंगे और पवित्र होंगे। अब तुम उस दुनिया के मालिक बनते हो। राजा-रानी, प्रजा में फ़र्क होगा ना। आगे राजायें लोग बहुत भभके में रहते थे। यह तो ठहरे पतित और रावण के राज्य में, तो विचार करो सतयुग में क्या होगा। सामने चित्र लक्ष्मी-नारायण के रखे हैं। कृष्ण के लिए झूठी बातें लिख बदनामी कर दी है। झूठ माना झूठ, सच की रत्ती नहीं। अब तुम समझते हो हम स्वर्ग के मालिक थे फिर 84 जन्म ले बिल्कुल शूद्र बुद्धि बन गये हैं। क्या हाल हो गया है। अब फिर पुरूषार्थ कर क्या बनते हो! बाबा पूछते भी हैं ना कि तुम क्या बनेंगे? तो सब हाथ उठाते हैं सूर्यवंशी बनेंगे। हम तो मात-पिता को पूरा फालो करेंगे। कम पुरूषार्थ थोड़ेही करेंगे। सारी मेहनत याद और आप समान बनाने पर है इसलिए बाप कहते हैं जितना हो सके सर्विस करना सीखो। है बहुत सहज। यह शिवबाबा, यह विष्णुपुरी, लक्ष्मी-नारायण का राज्य होगा। यह तो बहुत अनुभवी है। सीढ़ी पर तुम समझा सकते हो।

तुम बच्चों को यह झाड़, चक्र देखने से ही बुद्धि में सारा ज्ञान आ जाना चाहिए। यह जो लक्ष्मी-नारायण हैं इन्हों की राजधानी कहाँ चली गई! किसने लड़ाई की! जिससे हराया। अब तो वह राज्य है नहीं। इन ईश्वरीय बातों को कुछ नहीं जानते हैं। तुम बच्चों को यह भी साक्षात्कार हुआ है। कैसे गुफाओं, खानियों से जाकर सोने, हीरे आदि ले आते हैं। यह साइंस तुम्हारे सुख के लिए होगी। यहाँ है दु:ख के लिए, वहाँ एरोप्लेन भी फुलप्रूफ होंगे। बच्चों ने शुरू-शुरू में यह सब कुछ साक्षात्कार किया हुआ है। पिछाड़ी में भी तुम बहुत साक्षात्कार करेंगे। यह भी तुमने साक्षात्कार किया है। चोर लूटने आते हैं, फिर तुम्हारी शक्ति का रूप देख भाग जाते हैं। वह सब बातें पिछाड़ी की हैं। चोर लूटने तो आयेंगे, तुम बाप की याद में खड़े होंगे तो वह एकदम भाग जायेंगे।

अब बाप कहते हैं बच्चे खूब पुरुषार्थ करो। मुख्य बात है पवित्रता की। एक जन्म पवित्र बनना है। मौत तो सामने खड़ा है। कुदरती आपदायें बहुत कड़ी आयेंगी, जिसमें सब खत्म हो जाएं। शिवबाबा इन द्वारा समझाते हैं, इनकी आत्मा भी सुनती है। यह बाबा सब बतलाते हैं। शिवबाबा को तो अनुभव नहीं है। बच्चों को अनुभव होता है। माया के तूफान कैसे आते हैं। पहले नम्बर में यह है, तो इनको सब अनुभव होगा। तो इसमें डरना नहीं है, अडोल रहना है। बाप की याद में रहने से ही शक्ति मिलती है। कोई बच्चे चार्ट लिखते हैं फिर चलते-चलते बन्द कर देते हैं। बाबा समझ जाते है थक गया है। पारलौकिक बाप जिससे इतना बड़ा वर्सा मिलता है ऐसे बाप को कभी पत्र भी नहीं लिखते हैं। याद ही नहीं करते! ऐसे बाप को तो कितना याद करना चाहिए। शिवबाबा हम आपको बहुत याद करते हैं। बाबा आपकी याद बिगर हम भला कैसे रह सकते हैं! जिस बाप से विश्व की बादशाही मिलती है, ऐसे बाप को कैसे भूलेंगे। एक कार्ड लिखा वह भी तो याद किया ना। लौकिक बाप भी बच्चों को चिट्ठी लिखते हैं - नूरे रत्न.... स्त्री, पति को कैसे चिट्ठी लिखती है! यहाँ तो दोनों सम्बन्ध हैं। यह भी याद करने की युक्ति है। कितना मीठा बाबा है! हमसे क्या मांगते हैं? कुछ भी नहीं। वह तो दाता है, देने वाला है ना। यह लेने वाला नहीं। कहते हैं स्वीट चिल्ड्रेन मैं आया हूँ, भारत को खुशबूदार बगीचा बनाकर जाता हूँ। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सूर्यवंशी बनने के लिए मात-पिता को पूरा-पूरा फालो करना है। याद में रहने की और आप समान बनाने की मेहनत करनी है।

2) पुरूषार्थ कर श्रीमत पर चल शान्त रहना है। बड़ों की आज्ञा माननी है।

वरदान:-
स्वयं को सेवाधारी समझकर झुकने और सर्व को झुकाने वाले निमित्त और नम्रचित भव

निमित्त उसे कहा जाता - जो अपने हर संकल्प वा हर कर्म को बाप के आगे अर्पण कर देता है। निमित्त बनना अर्थात् अर्पण होना और नम्रचित वह है जो झुकता है, जितना संस्कारों में, संकल्पों में झुकेंगे उतना विश्व आपके आगे झुकेगी। झुकना अर्थात् झुकाना। यह संकल्प भी न हो कि दूसरे भी हमारे आगे कुछ तो झुकें। जो सच्चे सेवाधारी होते हैं - वह सदैव झुकते हैं। कभी अपना रोब नहीं दिखाते।

स्लोगन:-
अब समस्या स्वरूप नहीं, समाधान स्वरूप बनो।


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