Saturday, 29 May 2021

Brahma Kumaris Murli 30 May 2021 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 30 May 2021

 30-05-21 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 10-01-88 मधुबन

BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


मनन करने की विधि तथा मनन शक्ति को बढ़ाने की युक्तियां

आज रत्नागर बाप अपने अमूल्य रत्नों से मिलने आये हैं कि हर एक श्रेष्ठ आत्मा ने कितने ज्ञान-रत्न जमा किये अर्थात् जीवन में धारण किये हैं? एक-एक ज्ञान रत्न पदमों से भी ज्यादा मूल्यवान है! तो सोचो, आदि से अब तक कितने ज्ञान रत्न मिले हैं! रत्नागर बाप ने हर एक बच्चे की बुद्धि रूपी झोली में अनेकानेक रत्न भर दिये हैं। सभी बच्चों को एक साथ एक जितने ही ज्ञान रत्न दिये हैं। लेकिन यह ज्ञान-रत्न जितना स्व प्रति व अन्य आत्माओं के प्रति कार्य में लगाते हैं, उतना यह रत्न बढ़ते जाते हैं। बापदादा देख रहे हैं-बाप ने तो सबको समान दिये लेकिन कोई बच्चों ने रत्नों को बढ़ाया है और कोई ने रत्नों को बढ़ाया नहीं। कोई भरपूर है; कोई अखुट मालामाल है; कोई समय प्रमाण कार्य में लगा रहे हैं, कोई सदा कार्य में लगाकर एक का पदमगुणा बढ़ा रहे हैं; कोई जितना कार्य में लगाना चाहिए उतना लगा नहीं सकते, इसलिए रत्नों की वैल्यू को जितना समझना चाहिए उतना समझ नहीं रहे हैं। जितना मिला है वह बुद्धि में धारण तो किया लेकिन कार्य में लाने से जो सुख, खुशी, शक्ति, शान्ति और निर्विघ्न स्थिति की प्राप्ति की अनुभूति होनी चाहिए वह नहीं कर पाते हैं। इसका कारण मनन शक्ति की कमी है क्योंकि मनन करना अर्थात् जीवन में समाना, धारण करना। मनन न करना अर्थात् सिर्फ बुद्धि तक धारण करना। वह जीवन के हर कार्य में, हर कर्म में लगाते हैं-चाहे अपने प्रति, चाहे अन्य आत्माओं के प्रति और दूसरे सिर्फ बुद्धि में याद रखते अर्थात् धारण करते हैं।

जैसे कोई भी स्थूल खजाने को सिर्फ तिजोरी में वा लाकर में रख लो और समय प्रमाण वा सदा काम में नहीं लगाओ तो वह खुशी की प्राप्ति नहीं होती है, सिर्फ दिल का दिलासा रहता है कि हमारे पास है। न बढ़ेगा, न अनुभूति होगी। ऐसे, ज्ञान रत्न अगर सिर्फ बुद्धि में धारण किया, याद रखा, मुख से वर्णन किया-पॉइन्ट बहुत अच्छी है, तो थोड़े समय के लिए अच्छी पॉइन्ट का अच्छा नशा रहता है लेकिन जीवन में, हर कर्म में उन ज्ञान रत्नों को लाना है क्योंकि ज्ञान रत्न भी हैं, ज्ञान रोशनी भी है, ज्ञान शक्ति भी है इसलिए अगर इसी विधि से कर्म में नहीं लाया तो बढ़ता नहीं है वा अनुभूति नहीं होती है। ज्ञान पढ़ाई भी है, ज्ञान लड़ाई के श्रेष्ठ शस्त्र भी हैं। यह है ज्ञान का मूल्य। मूल्य को जानना अर्थात् कार्य में लगाना और जितना-जितना कार्य में लगाते हैं उतना शक्ति का अनुभव करते जाते हैं। जैसे शस्त्र को समय प्रमाण यूज़ नहीं करो तो वह शस्त्र बेकार हो जाता है अर्थात् उसकी जो वैल्यू है, वह उतनी नहीं रहती है। ज्ञान भी शस्त्र है, अगर मायाजीत बनने के समय शस्त्र को कार्य में नहीं लगाया तो जो वैल्यू है, उसको कम कर दिया क्योंकि लाभ नहीं लिया। लाभ लेना अर्थात् वैल्यू रखना। ज्ञान रत्न सबके पास हैं क्योंकि अधिकारी हो। लेकिन भरपूर रहने में नम्बरवार हो। मूल कारण सुनाया-मनन शक्ति की कमी।

Brahma Kumaris Murli 30 May 2021 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 30 May 2021 (HINDI) 

मनन शक्ति बाप के खजाने को अपना खजाना अनुभव कराने का आधार है। जैसे स्थूल भोजन हजम होने से खून बन जाता है क्योंकि भोजन अलग है, उसको जब हज़म कर लेते हो तो वह खून के रूप में अपना बन जाता है। ऐसे मनन शक्ति से बाप का खजाना सो मेरा खजाना-यह अपना अधिकार, अपना खजाना अनुभव होता है। बापदादा पहले भी सुनाते रहे हैं - अपनी घोट तो नशा चढ़े अर्थात् बाप के खजाने को मनन शक्ति से कार्य में लगाकर प्राप्तियों की अनुभूति करो तो नशा चढ़े। सुनने के समय नशा रहता है लेकिन सदा क्यों नहीं रहता? इसका कारण है कि सदा मनन शक्ति से अपना नहीं बनाया है। मनन शक्ति अर्थात् सागर के तले में जाकर अन्तर्मुखी बन हर ज्ञान-रत्न की गुह्यता में जाना। सिर्फ रिपीट नहीं करना है लेकिन हर एक पॉइन्ट का राज़ क्या है और हर पॉइन्ट को किस समय, किस विधि से कार्य में लागाना है और हर पॉइन्ट को अन्य आत्माओं के प्रति सेवा में किस विधि से कार्य में लगाना है - यह चारों ही बातें हर एक पॉइन्ट को सुनकर मनन करो। साथ-साथ मनन करते प्रैक्टिकल में उस राज़ के रस में चले जाओ, नशे की अनुभूति में आओ। माया के भिन्न-भिन्न विघ्नों के समय वा प्रकृति के भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के समय काम में लगाकर देखो कि जो मैंने मनन किया कि इस परिस्थिति के प्रमाण वा विघ्न के प्रमाण यह ज्ञान रत्न मायाजीत बना सकते वा बनाने वाला है, वह प्रैक्टिकल हुआ अर्थात् मायाजीत बने? वा सोचा था मायाजीत बनेंगे लेकिन मेहनत करनी पड़ी वा समय व्यर्थ गया? इससे सिद्ध है कि विधि यथार्थ नहीं थी, तब सिद्धि नहीं मिली। यूज़ करने का तरीका भी चाहिये, अभ्यास चाहिए। जैसे साइन्स वाले भी बहुत पावरफुल बॉम्बस (शक्तिशाली गोले) ले जाते हैं। समझते हैं-बस इससे अब तो जीत लेंगे। लेकिन यूज़ करने वाले को यूज़ करने का ढंग नहीं आता तो पावरफुल बॉम्ब होते भी यहाँ-वहाँ ऐसे स्थान पर जाकर गिरता जो व्यर्थ चला जाता। कारण क्या हुआ? यूज़ करने की विधि ठीक नहीं। ऐसे, एक-एक ज्ञान-रत्न अति अमूल्य है। ज्ञान रत्न वा ज्ञान की शक्ति के आगे परिस्थिति वा विघ्न ठहर नहीं सकते। लेकिन अगर विजय नहीं होती है तो समझो यूज़ करने की विधि नहीं आती है। दूसरी बात-मनन शक्ति का अभ्यास सदा न करने से समय पर बिना अभ्यास के अचानक काम में लगाने का प्रयत्न करते हो, इसलिए धोखा खा लेते हो। यह अलबेलापन आ जाता है-ज्ञान तो बुद्धि में है ही, समय पर काम में लगा लेंगे। लेकिन सदा का अभ्यास, बहुतकाल का अभ्यास चाहिए। नहीं तो उस समय सोचने वाले को क्या टाइटल देंगे? कुम्भकरण। उसने क्या अलबेलापन किया? यही सोचा ना कि आने दो, आयेंगे तो जीत लेंगे। तो ऐसा सोचना कि समय पर हो जायेगा-यह अलबेलापन धोखा दे देता, इसलिए हर रोज़ मनन शक्ति को बढ़ाते जाओ।

रिवाइज कोर्स में वा अव्यक्त, जो रोज़ सुनते हो, तो मनन शक्ति को बढ़ाने के लिए रोज़ कोई न कोई एक विशेष पॉइन्ट बुद्धि में धारण करो और जो 4 बातें सुनाई, उस विधि से अभ्यास करो। चलते-फिरते, हर कर्म करते-चाहे स्थूल कर्म करते हो, चाहे सेवा का कर्म करते हो लेकिन सारा दिन मनन चलता रहे। चाहे बिजनेस करते हो वा दफ्तर का काम करते हो, चाहे सेवाकेन्द्र में सेवा करते हो लेकिन जिस समय भी बुद्धि थोड़ा फ्री हो तो अपने मनन शक्ति के अभ्यास को बार-बार दौड़ाओ। कई काम ऐसे होते हैं जो कर्म कर रहे हैं, उसके साथ-साथ और भी सोच सकते हैं। बहुत थोड़ा समय होता है जो ऐसा कार्य होता है जिसमें बुद्धि का फुल अटेन्शन देना होता है, नहीं तो डबल तरफ बुद्धि चलती रहती है। ऐसा समय अगर अपनी दिनचर्या में नोट करो तो बीच-बीच में बहुत समय मिलता है। मनन शक्ति के लिए विशेष समय मिले तब अभ्यास करेंगे-ऐसी कोई बात नहीं है। चलते-फिरते भी कर सकते हो। अगर एकान्त का समय मिलता है तो बहुत अच्छा है। और महीनता में जाए हर पॉइन्ट के स्पष्टीकरण में जाओ, विस्तार में लाओ तो बहुत मजा आयेगा। लेकिन पहले पॉइन्ट के नशे की स्थिति में स्थित हो के करना, फिर बोर नहीं होंगे। नहीं तो सिर्फ रिपीट कर लेते हैं, फिर कहते-यह तो हो गया, अब क्या करें?

जैसे कई स्वदर्शन चक्र चलाने में हंसाते हैं ना - चक्र क्या चलायें, 5 मिनट में चक्र पूरा हो जाता है! स्थिति का अनुभव करने नहीं आता है तो सिर्फ रिपीट कर लेते हैं - सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग, इतने जन्म, इतनी आयु, इतना समय है...बस, पूरा हो गया। लेकिन स्वदर्शन चक्रधारी बनना अर्थात् नॉलेजफुल, पावरफुल स्थिति का अनुभव करना। पॉइन्ट के नशे में स्थित रहना, राज़ में राजयुक्त बनना-ऐसा अभ्यास हर पॉइन्ट में करो। यह तो एक स्वदर्शन चक्र की बात सुनाई। ऐसे, हर ज्ञान की पॉइन्ट को मनन करो और बीच-बीच में अभ्यास करो। ऐसे नहीं सिर्फ आधा घण्टा मनन किया। समय मिले और बुद्धि मनन के अभ्यास में चली जाए। मनन शक्ति से बुद्धि बिजी रहेगी तो स्वत: ही सहज मायाजीत बन जायेंगे। बिजी देख माया आपे ही किनारा कर लेगी। माया आये और युद्ध करो, भगाओ; फिर कभी हार, कभी जीत हो - यह चींटी मार्ग का पुरूषार्थ है। अब तो तीव्र पुरूषार्थ करने का समय है, उड़ने का समय है इसलिए मनन शक्ति से बुद्धि को बिजी रखो। इसी मनन शक्ति से याद की शक्ति में मग्न रहना - यह अनुभव सहज हो जायेगा। मनन मायाजीत और व्यर्थ संकल्पों से भी मुक्त कर देता है। जहाँ व्यर्थ नहीं, विघ्न नहीं तो समर्थ स्थिति वा लगन में मग्न रहने की स्थिति स्वत: ही हो जाती है।

कई सोचते हैं - बीजरूप स्थिति या शक्तिशाली याद की स्थिति कम रहती है या बहुत अटेन्शन देने के बाद अनुभव होता है। इसका कारण अगले बार भी सुनाया कि लीकेज है, बुद्धि की शक्ति व्यर्थ के तरफ बंट जाती है। कभी व्यर्थ संकल्प चलेंगे, कभी साधारण संकल्प चलेंगे। जो काम कर रहे हैं उसी के संकल्प में बुद्धि का बिजी रहना - इसको कहते हैं साधारण संकल्प। याद की शक्ति या मनन शक्ति जो होनी चाहिए वह नहीं होती और अपने को खुश कर लेते कि आज कोई पाप कर्म नहीं हुआ, व्यर्थ नहीं चला, किसको दु:ख नहीं दिया। लेकिन समर्थ संकल्प, समर्थ स्थिति, शक्तिशाली याद रही? अगर वह नहीं रही तो इसको कहेंगे साधारण संकल्प। कर्म किया लेकिन कर्म और योग साथ-साथ नहीं रहा। कर्म कर्ता बने लेकिन कर्मयोगी नहीं बने इसलिए कर्म करते भी, या मनन शक्ति या मग्न स्थिति की शक्ति, दोनों में से एक अनुभूति सदा रहनी चाहिए। यह दोनों स्थितियां शक्तिशाली सेवा कराने के आधार हैं। मनन करने वाले अभ्यास होने के कारण जिस समय जो स्थिति बनाने चाहें वह बना सकेंगे। लिंक रहने से लीकेज खत्म हो जायेगी और जिस समय जो अनुभूति-चाहे बीजरूप स्थिति की, चाहे फरिश्ते रूप की, जो करना चाहो वह सहज कर सकेंगे क्योंकि जब ज्ञान की स्मृति है तो ज्ञान के सिमरण से ज्ञानदाता स्वत: ही याद रहता। तो समझा, मनन कैसे करना है? कहा था ना कि मनन का फिर सुनायेंगे। तो आज मनन करने की विधि सुनाई। माया के विघ्नों से सदा विजयी बनना वा सदा सेवा में सफलता का अनुभव करना, इसका आधार मनन शक्ति है। समझा? अच्छा!

सर्व ज्ञान-सागर के ज्ञानी तू आत्मा बच्चों को, सदा मनन शक्ति द्वारा सहज मायाजीत बनने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा मनन शक्ति के अभ्यास को आगे बढ़ाने वाले, मनन से मग्न स्थिति का अनुभव करने वाले, सदा ज्ञान के रत्नों का मूल्य जानने वाले, सदा हर कर्म में ज्ञान की शक्ति को कार्य में लाने वाले, ऐसे सदा श्रेष्ठ स्थिति में रहने वाले विशेष वा अमूल्य रत्नों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:- स्वयं को तीव्र पुरूषार्थी आत्मायें अनुभव करते हो? क्योंकि समय बहुत तीव्रगति से आगे बढ़ रहा है। जैसे समय आगे बढ़ रहा है, तो समय पर मंजिल पर पहुँचने वाले को किस गति से चलना पड़े? समय कम है और प्राप्ति ज्यादा करनी है। तो थोड़े समय में अगर ज्यादा प्राप्ति करनी हो तो तीव्र करना पड़ेगा ना। समय को देख रहे हो और अपने पुरूषार्थ की गति को भी जानते हो। तो समय अगर तेज है और अपनी गति तेज नहीं है तो समय अर्थात् रचना आप रचता से भी तेज हुई। रचता से रचना तेज चली जाए तो उसे अच्छी बात कहेंगे? रचना से रचता आगे होना चाहिए। सदा तीव्र पुरूषार्थी आत्मायें बन आगे बढ़ने का समय है। अगर आगे बढ़ते कोई भी साइडसीन्स को देख रुकते हो, तो रुकने वाले ठीक समय पर पहुँच नहीं सकेंगे। कोई भी माया की आकर्षण साइड-सीन है। साइडसीन पर रूकने वाला मंजिल पर कैसे पहुँचेगा? इसलिए सदैव तीव्र पुरूषार्थी बन आगे बढ़ते चलो। ऐसे नहीं समय पर पहुँच ही जायेंगे, अभी तो समय पड़ा है। ऐसे सोचकर अगर धीमी गति से चलेंगे तो समय पर धोखा मिल जायेगा। बहुत काल का तीव्र पुरूषार्थ का संस्कार, अन्त में भी तीव्र पुरूषार्थ का अनुभव करायेगा। तो सदा तीव्र पुरूषार्थी। कभी तीव्र, कभी कमजोर-नहीं। ऐसे नहीं थोड़ी-सी बात हुई कमजोर बन जाओ। इसको तीव्र पुरूषार्थी नहीं कहेंगे। तीव्र पुरूषार्थी कभी रूकते नहीं, उड़ते हैं। तो उड़ते पंछी बन उड़ती कला का अनुभव करते चलो। एक दो को भी सहयोग दे तीव्र पुरूषार्थी बनाते चलो। जितनी औरों की सेवा करेंगे उतना स्वयं का उमंग-उत्साह बढ़ता रहेगा।

विदाई के समय (दादी जानकी जी विदेश में जाने की छुट्टी बापदादा से ले रही हैं)

देश-विदेश में सेवा का उमंग-उत्साह अच्छा है। जहाँ उमंग-उत्साह है, वहाँ सफलता भी होती है। सदा यह अटेन्शन रखना है कि पहले अपना उमंग-उत्साह हो, संगठन की शक्ति हो। स्नेह की शक्ति, सहयोग की शक्ति हो तो सफलता उसी अनुसार होती है। यह है धरनी। जैसे धरनी ठीक होती है तो फल भी ऐसा ही निकलता है और अगर टेप्रेरी (अस्थायी) धरनी को ठीक करके बीज डाल दो तो फल भी थोड़े समय के लिए मिलेगा, सदाकाल के लिए फल नहीं मिलेगा। तो सफलता के फल के पहले सदा धरनी को चेक करो। बाकी जो करते हैं उनका जमा तो हो ही जाता है। अभी भी खुशी मिलती है और भविष्य तो है ही। अच्छा!

वरदान:-

तोड़ना, मोड़ना और जोड़ना - इन तीन शब्दों की स्मृति द्वारा सदा विजयी भव

सारी पढ़ाई और शिक्षाओं का सार यह तीन शब्द हैं:- 1-कर्मबन्धन तोड़ने हैं। 2-अपने संस्कार-स्वभाव को मोड़ना है और 3- एक बाप से सर्व सम्बन्ध जोड़ने हैं - यही तीन शब्द सम्पूर्ण विजयी बना देंगे, इसके लिए सदा यही स्मृति रहे कि जो भी इन नयनों से विनाशी चीज़े देखते हैं वह सब विनाश हुई पड़ी हैं। उन्हें देखते भी अपने नये सम्बन्ध, नई सृष्टि को देखते रहो तो कभी हार हो नहीं सकती।

स्लोगन:-

योगी की निशानी है - सदा क्लीन और क्लीयर।



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