Friday, 29 January 2021

Brahma Kumaris Murli 30 January 2021 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 30 January 2021

 30-01-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


"मीठे बच्चे - तुम्हारी याद की यात्रा बिल्कुल ही गुप्त है, तुम बच्चे अभी मुक्तिधाम में जाने की यात्रा कर रहे हो''

प्रश्नः-

स्थूलवतन वासी से सूक्ष्मवतन वासी फरिश्ता बनने का पुरुषार्थ क्या है?

उत्तर:-

सूक्ष्मवतनवासी फरिश्ता बनना है तो रूहानी सर्विस में हड्डी-हड्डी स्वाहा करो। बिना हड्डी स्वाहा किये फरिश्ता नहीं बन सकते क्योंकि फरिश्ते बिगर हड्डी मास के होते हैं। इस बेहद की सेवा में दधीचि ऋषि की तरह हड्डी-हड्डी लगानी है, तभी व्यक्त से अव्यक्त बनेंगे।

गीत:-

धीरज धर मनुवा........

Brahma Kumaris Murli 30 January 2021 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 30 January 2021 (HINDI) 

ओम् शान्ति

बच्चों को इस गीत से इशारा मिला कि धीरज धरो। बच्चे जानते हैं हम श्रीमत पर पुरुषार्थ कर रहे हैं और जानते हैं कि हम इस गुप्त योग की यात्रा पर हैं। वह यात्रा अपने समय पर पूरी होनी है। मुख्य है ही यह यात्रा, जिसको तुम्हारे सिवाए और कोई भी नहीं जानते हैं। यात्रा पर जाना है जरूर और ले जाने वाला पण्डा भी चाहिए। इसका नाम ही रखा हुआ है पाण्डव सेना। अब यात्रा पर हैं। स्थूल लड़ाई की कोई बात नहीं है। हर एक बात गुप्त है। यात्रा भी बड़ी गुप्त है। शास्त्रों में भी है - बाप कहते हैं मुझे याद करो तो मेरे पास आकर पहुचेंगे। यह यात्रा तो हुई ना। बाप सब शास्त्रों का सार बताते हैं। प्रैक्टिकल में एक्ट में ले आते हैं। हम आत्माओं को यात्रा पर जाना है अपने निर्वाण-धाम। विचार करो तो समझ सकते हैं। यह है मुक्तिधाम की सच्ची यात्रा। सब चाहते हैं हम मुक्तिधाम में जायें। यह यात्रा करने के लिए कोई मुक्तिधाम का रास्ता बताये। परन्तु बाप तो अपने समय पर आपेही आते हैं, जिस समय को कोई नहीं जानते हैं। बाप आकर समझाते हैं तो बच्चों को निश्चय होता है। बरोबर यह सच्ची यात्रा है जो गाई हुई है। भगवान ने यह यात्रा सिखाई थी। मनमनाभव, मध्याजी भव। यह अक्षर भी तुम्हारे काम के बहुत हैं। सिर्फ किसने कहा? यह भूल कर दी है। कहते हैं देह सहित देह के सम्बन्धों को भूल जाओ। इनको (ब्रह्मा बाबा को) भी देह है। इनको भी समझाने वाला दूसरा है, जिसको अपनी देह नहीं है वह बाप है विचित्र, उनको कोई चित्र नहीं है, और तो सबके चित्र हैं। सारी दुनिया चित्रशाला है। विचित्र और चित्र अर्थात् जीव और आत्मा का यह मनुष्य स्वरूप बना हुआ है। तो वह बाप है विचित्र। समझाते हैं मुझे इस चित्र का आधार लेना पड़ता है। बरोबर शास्त्रों में है भगवान ने कहा था जबकि महाभारत लड़ाई भी लगी थी। राजयोग सिखाते थे, जरूर राजाई स्थापन हुई थी। अभी तो राजाई है नहीं। राजयोग भगवान ने सिखाया था, नई दुनिया के लिए क्योंकि विनाश सामने खड़ा था। समझाया जाता है ऐसा हुआ था जबकि स्वर्ग की स्थापना हुई थी। वह लक्ष्मी-नारायण का राज्य स्थापन हुआ था। अभी तुम्हारी बुद्धि में है - सतयुग था, अभी कलियुग है। फिर बाप वही बातें समझाते हैं। ऐसा तो कोई कह न सके कि मैं परमधाम से आया हूँ तुमको वापिस ले जाने। परमपिता परमात्मा ही कह सकते हैं ब्रह्मा द्वारा, और किसके द्वारा भी कह नहीं सकते। सूक्ष्मवतन में हैं ही ब्रह्मा-विष्णु-शंकर। ब्रह्मा के लिए भी समझाया है कि वह है अव्यक्त ब्रह्मा और यह है व्यक्त। तुम अभी फरिश्ता बनते हो। फरिश्ते स्थूल वतन में नहीं होते। फरिश्तों को हड्डी मास नहीं होता है। यहाँ इस रूहानी सर्विस में हड्डी आदि सब खलास कर देते हैं, फिर फरिश्ते बन जाते हैं। अभी तो हड्डी है ना। यह भी लिखा हुआ है - अपनी हड्डियां भी सर्विस में दे दी। गोया अपनी हड्डियां खलास करते हैं। स्थूलवतन से सूक्ष्मवतनवासी बनना है। यहाँ हम हड्डी देकर सूक्ष्म बन जाते हैं। इस सर्विस में सब स्वाहा करना है। याद में रहते-रहते हम फरिश्ते बन जायेंगे। यह भी गाया हुआ है - मिरूआ मौत मलूका शिकार, मलूक फरिश्ते को कहा जाता है। तुम मनुष्य से फरिश्ते बनते हो। तुमको देवता नहीं कह सकते। यहाँ तो तुमको शरीर है ना। सूक्ष्मवतन का वर्णन अभी होता है। योग में रह फिर फरिश्ते बन जाते हैं। पिछाड़ी में तुम फरिश्ते बन जायेंगे। तुमको सब साक्षात्कार होगा और खुशी होगी। मनुष्य तो सब काल का शिकार हो जायेंगे। तुम्हारे में जो महावीर हैं वह तो अडोल रहेंगे। बाकी क्या-क्या होता रहेगा! विनाश की सीन तो होनी है ना। अर्जुन को विनाश का साक्षात्कार हुआ। एक अर्जुन की बात नहीं है। तुम बच्चों को विनाश और स्थापना का साक्षात्कार होता है। पहले-पहले बाबा को भी विनाश का साक्षात्कार हुआ। उस समय ज्ञान तो कुछ था नहीं। देखा सृष्टि का विनाश हो रहा है। फिर चतुर्भुज का साक्षात्कार हुआ। समझने लगे यह तो अच्छा है। विनाश के बाद हम विश्व के मालिक बनते हैं, तो खुशी आ गई। अभी यह दुनिया नहीं जानती कि विनाश तो अच्छा है ना। पीस के लिए प्रयत्न करते हैं परन्तु आखरीन विनाश तो होना है। याद करते हैं पतित-पावन आओ, तो बाप आयेंगे जरूर आकर पावन दुनिया स्थापन करेंगे, जिसमें हम राजाई करेंगे। यह तो अच्छा है ना। पतित-पावन को क्यों याद करते हैं? क्योंकि दु:ख है। पावन दुनिया में देवतायें हैं, पतित दुनिया में तो देवताओं के पैर आ नहीं सकते। तो जरूर पतित दुनिया का विनाश होना चाहिए। गाया हुआ भी है महाविनाश हुआ। उसके बाद क्या होता है? एक धर्म की स्थापना सो तो ऐसे होगी ना। यहाँ से राजयोग सीखेंगे। विनाश होगा बाकी भारत में कौन बचेगा? जो राजयोग सीखते हैं, नॉलेज देते हैं वही बचेंगे। विनाश तो सबका होना है, इसमें डरने की बात नहीं। पतित-पावन को बुलाते हैं जबकि वह आते हैं तो खुशी होनी चाहिए ना। बाप कहते हैं विकारों में मत जाओ। इन विकारों पर जीत पाओ वा दान दे दो तो ग्रहण छूटे। भारत का ग्रहण छूटता जरूर है। काले से गोरा बनना है। सतयुग में पवित्र देवतायें थे, वह जरूर यहाँ बने होंगे।

तुम जानते हो हम श्रीमत से निर्विकारी बनते हैं। भगवानुवाच, यह है गुप्त। श्रीमत पर चलकर तुम बादशाही पाते हो। बाप कहते हैं तुमको नर से नारायण बनना है। सेकेण्ड में राजाई मिल सकती है। शुरू में बच्चियां 4-5 दिन भी बैकुण्ठ में जाकर रहती थी। शिवबाबा आकर बच्चों को बैकुण्ठ का भी साक्षात्कार कराते थे। देवतायें आते थे - कितना मान-शान से। तो बच्चों को दिल अन्दर लगता है बरोबर गुप्त वेष में आने वाला बाप हमको समझा रहे हैं। ब्रह्मा तन में आते हैं। ब्रह्मा का तन तो यहाँ चाहिए ना। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा स्थापना। बाबा ने समझाया है - कोई भी आते हैं तो उनसे पूछो किसके पास आते हो? बी.के. पास। अच्छा ब्रह्मा का नाम कभी सुना है? प्रजापिता तो है ना। हम सब उनके आकर बने हैं। जरूर आगे भी बने थे। ब्रह्मा द्वारा स्थापना तो साथ में ब्राह्मण भी चाहिए। बाप ब्रह्मा द्वारा किसको समझाते हैं? शूद्रों को तो नहीं समझायेंगे। यह है ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण, शिवबाबा ने ब्रह्मा द्वारा हमको अपना बनाया है। ब्रह्माकुमार-कुमारियां कितने ढेर हैं, कितने सेन्टर्स हैं। सबमें ब्रह्माकुमारियां पढ़ाती हैं। यहाँ हमको दादे का वर्सा मिलता है। भगवानुवाच, तुमको राजयोग सिखाता हूँ। वह निराकार होने कारण इनके शरीर का आधार लेकर हमको नॉलेज सुनाते हैं। प्रजापिता के तो सब बच्चे होंगे ना! हम हैं प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारियां। शिवबाबा है दादा। उन्होंने एडाप्ट किया है। तुम जानते हो हम दादे से पढ़ रहे हैं ब्रह्मा द्वारा। यह लक्ष्मी-नारायण दोनों स्वर्ग के मालिक हैं ना। भगवान तो एक ऊंच ते ऊंच निराकार ही है। बच्चों को धारणा बड़ी अच्छी होनी चाहिए। पहले-पहले समझाओ दो बाप हैं भक्ति मार्ग में। स्वर्ग में है एक बाप। पारलौकिक बाप द्वारा बादशाही मिल गई फिर याद क्यों करेंगे। दु:ख है ही नहीं जो याद करना पड़े। गाते हैं दु:ख हर्ता सुख कर्ता। वह अभी की बात है। जो पास्ट हो जाता है उसका गायन होता है। महिमा है एक की। वह एक बाप ही आकर पतितों को पावन बनाते हैं। मनुष्य थोड़ेही समझते हैं। वह तो पास्ट की कथा बैठ लिखते हैं। तुम अभी समझते हो - बरोबर बाप ने राजयोग सिखाया, जिससे बादशाही मिली। 84 का चक्र लगाया। अभी फिर हम पढ़ रहे हैं, फिर 21 जन्म राज्य करेंगे। ऐसा देवता बनेंगे। ऐसे कल्प पहले बने थे। समझते हो हमने पूरा 84 जन्मों का चक्र लगाया। अब फिर सतयुग-त्रेता में जायेंगे तब तो बाप पूछते हैं आगे कितने बार मिले हो? यह प्रैक्टिकल बात है ना! नया भी कोई सुने तो समझेंगे 84 का चक्र तो जरूर है। जो पहले वाले होंगे उनका ही चक्र पूरा हुआ होगा। बुद्धि से काम लेना है। इस मकान में, इस ड्रेस में बाबा हम आपसे अनेक बार मिलते हैं और मिलते रहेंगे। पतित से पावन, पावन से पतित होते ही आये हैं। कोई चीज़ सदैव नई ही रहे, यह तो हो नहीं सकता। पुरानी जरूर बनती है। हर चीज़ सतो-रजो-तमो में आती है। अभी तुम बच्चे जानते हो नई दुनिया आ रही है। उसको स्वर्ग कहा जाता है। यह है नर्क। वह है पावन दुनिया। बहुत पुकारते हैं - हे पतित-पावन हमको आकर पावन बनाओ क्योंकि दु:ख जास्ती होता जाता है ना। परन्तु यह समझते नहीं कि हम ही पूज्य थे फिर पुजारी बने हैं। द्वापर में पुजारी बने। अनेक धर्म होते गये। बरोबर पतित से पावन, पावन से पतित होते आये हैं। भारत के ऊपर ही खेल है।

तुम बच्चों को अब स्मृति आई है, अब तुम शिव जयन्ती मनाते हो। बाकी और कोई शिव को तो जानते ही नहीं हैं। हम जानते हैं। बरोबर हमको राजयोग सिखलाते हैं। ब्रह्मा द्वारा स्वर्ग की स्थापना हो रही है। जरूर जो योग सीखेंगे, स्थापना करेंगे वही फिर राज्य-भाग्य पायेंगे। हम कहते हैं बरोबर हम कल्प-कल्प बाप से यह राजयोग सीखे हैं। बाबा ने समझाया है - अभी यह 84 जन्मों का चक्र पूरा होता है। फिर नया चक्र लगाना है। चक्र को तो जानना चाहिए ना। भल यह चित्र न हो तो भी तुम समझा सकते हो। यह तो बिल्कुल सहज बात है। बरोबर भारत स्वर्ग था, अब नर्क है। सिर्फ वह लोग समझते हैं कलियुग अजुन बच्चा है। तुम कहते हो - यह तो कलियुग का अन्त है। चक्र पूरा होता है। बाप समझाते हैं मैं आता हूँ पतित दुनिया को पावन बनाने। तुम जानते हो हमको पावन दुनिया में जाना है। तुम मुक्ति, जीवन मुक्तिधाम, शान्तिधाम, सुखधाम और दु:खधाम को भी समझते हो। परन्तु तकदीर में नहीं है तो फिर यह ख्याल नहीं करते कि क्यों न हम सुखधाम में जायें। बरोबर हम आत्माओं का घर वह शान्तिधाम है। वहाँ आत्मा को आरगन्स न होने कारण कुछ बोलती नहीं है। शान्ति वहाँ सबको मिलती है। सतयुग में है एक धर्म। यह अनादि, अविनाशी वर्ल्ड ड्रामा है जो चक्र लगाता ही रहता है। आत्मा कभी विनाश नहीं होती है। शान्तिधाम में भी थोड़ा समय ठहरना ही पड़े। यह बहुत समझ की बातें हैं। कलियुग है दु:खधाम। कितने अनेक धर्म हैं, कितना हंगामा है। जब बिल्कुल दु:खधाम होता है तब ही बाप आते हैं। दु:खधाम के बाद है फुल सुखधाम। शान्तिधाम से हम आते हैं सुख-धाम में, फिर दु:खधाम बनता है। सतयुग में सम्पूर्ण निर्विकारी, यहाँ हैं सम्पूर्ण विकारी। यह समझाना तो बहुत सहज है ना। हिम्मत चाहिए। कहाँ भी जाकर समझाओ। यह भी लिखा हुआ है - हनूमान सतसंग में पीछे जुत्तियों में जाकर बैठता था। तो महावीर जो होंगे वह कहाँ भी जाकर युक्ति से सुनेंगे, देखें क्या बोलते हैं। तुम ड्रेस बदलकर कहाँ भी जा सकते हो, उनका कल्याण करने। बाबा भी गुप्त वेष में तुम्हारा कल्याण कर रहे हैं ना। मन्दिरों में कहाँ भी निमंत्रण मिलता है तो जाकर समझाना है। दिन-प्रतिदिन तुम होशियार होते जाते हो। सबको बाप का परिचय तो देना ही है, ट्रायल करनी होती है। यह तो गाया हुआ है, पिछाड़ी में संन्यासी, राजायें आदि आये। राजा जनक को सेकेण्ड में जीवनमुक्ति मिली। वह फिर जाकर त्रेता में अनुजनक बना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अन्तिम विनाश की सीन देखने के लिए अपनी स्थिति महावीर जैसी निर्भय, अडोल बनानी है। गुप्त याद की यात्रा में रहना है।

2) अव्यक्त वतनवासी फरिश्ता बनने के लिए बेहद सेवा में दधीचि ऋषि की तरह अपनी हड्डी-हड्डी स्वाहा करनी है।

वरदान:-

एकान्त और अन्तर्मुखता के अभ्यास द्वारा स्वयं को अनुभवों से सम्पन्न बनाने वाले मायाजीत भव

नॉलेजफुल के साथ पावरफुल अर्थात् अनुभवी मूर्त बनने के लिए एकान्तवासी और अन्तर्मुखी बनो। डग-मग होने का कारण है अनुभव की कमी इसलिए सिर्फ समझने, समझाने वाले या मननमूर्त नहीं बनो, एकान्तवासी बन हर प्वाइंट के अनुभवी बनो तो किसी भी प्रकार के धोखे से, दु:ख वा दुविधा से बच जायेंगे। किसका बच्चा हूँ, क्या प्राप्ति है - इस पहले पाठ का अनुभव कर लिया तो मायाजीत सहज ही हो जायेंगे।

स्लोगन:-

जिम्मेवारी सम्भालते हुए डबल लाइट रहने वाले ही बाप के समीप रत्न हैं।


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3 comments:

Anupama Patel said...

Om Shanti meethe meethe meethe pyare pyare pyare baba

Amita Tiwari said...

Om shanti meethe Baba

Satish varma said...

" Good Morning Mithe-Mithe Shiv Baba,,

Om Shanti,,

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