Saturday, 19 December 2020

Brahma Kumaris Murli 20 December 2020 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 20 December 2020

 20-12-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 20-03-87 मधुबन

BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website

स्नेह और सत्यता की अथॉरिटी का बैलेन्स

 आज सत् बाप, सत् शिक्षक, सतगुरू अपने सत्यता के शक्तिशाली सत् बच्चों से मिलने आये हैं। सबसे बड़े ते बड़ी शक्ति वा अथॉरिटी सत्यता की ही है। सत् दो अर्थ से कहा जाता है। एक - सत् अर्थात् सत्य। दूसरा - सत् अर्थात् अविनाशी। दोनों अर्थ से सत्यता की शक्ति सबसे बड़ी है। बाप को सत् बाप कहते हैं। बाप तो अनेक हैं लेकिन सत् बाप एक है। सत शिक्षक, सतगुरू एक ही है। सत्य को ही परमात्मा कहते हैं अर्थात् परम आत्मा की विशेषता सत्य अर्थात् सत् है आपका गीत भी है। सत्य ही शिव है...। दुनिया में भी कहते हैं - सत्यम् शिवम् सुन्दरम्। साथ-साथ बाप परमात्मा के लिए सत-चित-आनंद स्वरूप कहते हैं। आप आत्माओं को सत-चित-आनंद कहते हैं। तो ‘सत्' शब्द की महिमा बहुत गाई हुई है। और कभी भी कोई भी कार्य में अथॉरिटी से बोलते तो यही कहेंगे - मैं सच्चा हूँ, इसलिए अथॉरिटी से बोलता हूँ। सत्य के लिए गायन है - सत्य की नांव डोलेगी लेकिन डूबेगी नहीं। आप लोग भी कहते हो - सच तो बिठो नच। सच्चा अर्थात् सत्यता की शक्ति वाला सदा नाचता रहेगा, कभी मुरझायेगा नहीं, उलझेगा नहीं, घबरायेगा नहीं, कमजोर नहीं होगा। सत्यता की शक्ति वाला सदा खुशी में नाचता रहेगा। शक्तिशाली होगा, सामना करने की शक्ति होगी, इसलिए घबरायेगा नहीं। सत्यता को सोने के समान कहते हैं, असत्य को मिट्टी के समान कहते हैं। भक्ति में भी जो परमात्मा की तरफ लगन लगाते हैं, उन्हों को सत्संगी कहते हैं, सत् का संग करने वाले हैं। और लास्ट में जब आत्मा शरीर छोड़ती है तो भी क्या कहते हैं - सत् नाम संग है। तो सत् अविनाशी, सत् सत्य है। सत्यता की शक्ति महान् शक्ति है। वर्तमान समय मैजॉरिटी लोग आप सबको देखकर क्या कहते हैं - इन्हों में सत्यता की शक्ति है, तब इतना समय वृद्धि करते हुए चल रहे हैं। सत्यता कब हिलती नहीं है, अचल होती है। सत्यता वृद्धि को प्राप्त करने की विधि है। सत्यता की शक्ति से सतयुग बनाते हो, स्वयं भी सत्य नारायण, सत्य लक्ष्मी बनते हो। यह सत्य ज्ञान है, सत् बाप का ज्ञान है इसलिए दुनिया से न्यारा और प्यारा है। 

Brahma Kumaris Murli 20 December 2020 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 20 December 2020 (HINDI) 

 तो आज बापदादा सभी बच्चों को देख रहे हैं कि सत्य ज्ञान की सत्यता की अथॉरिटी कितनी धारण की है? सत्यता हर आत्मा को आकर्षित करती है। चाहे आज की दुनिया झूठ खण्ड है, सब झूठ है अर्थात् सबमें झूठ मिला हुआ है, फिर भी सत्यता की शक्ति वाले विजयी बनते हैं। सत्यता की प्राप्ति खुशी और निर्भयता है। सत्य बोलने वाला सदा निर्भय होगा। उनको कब भय नहीं होगा। जो सत्य नहीं होगा तो उनको भय जरूर होगा। तो आप सभी सत्यता के शक्तिशाली श्रेष्ठ आत्मायें हो। सत्य ज्ञान, सत्य बाप, सत्य प्राप्ति, सत्य याद, सत्य गुण, सत्य शक्तियां सर्व प्राप्ति हैं। तो इतनी अथॉरिटी का नशा रहता है? अथॉरिटी का अर्थ अभिमान नहीं है। जितना बड़े ते बड़ी अथॉरिटी, उतना उनकी वृत्ति में रूहानी अथॉरिटी रहती है। वाणी में स्नेह और नम्रता होगी - यही अथॉरिटी की निशानी है। जैसे आप लोग वृक्ष का दृष्टान्त देते हो। वृक्ष में जब सम्पूर्ण फल की अथॉरिटी आ जाती है तो वृक्ष झुकता है अर्थात् निर्मान बनने की सेवा करता है। ऐसे रूहानी अथॉरिटी वाले बच्चे जितनी बड़ी अथॉरिटी, उतने निर्मान और सर्व स्नेही होंगे। लेकिन सत्यता की अथॉरिटी वाले निर-अहंकारी होते हैं। तो अथॉरिटी भी हो, नशा भी हो और निर-अहंकारी भी हो - इसको कहते हैं सत्य ज्ञान का प्रत्यक्ष स्वरुप।

जैसे इस झूठ खण्ड के अन्दर ब्रह्मा बाप सत्यता की अथॉरिटी का प्रत्यक्ष साकार स्वरूप देखा ना। उनके अथॉरिटी के बोल कभी भी अहंकार की भासना नहीं देंगे। मुरली सुनते हो तो कितनी अथॉरिटी के बोल हैं! लेकिन अभिमान के नहीं। अथॉरिटी के बोल में स्नेह समाया हुआ है, निर्माणता है, निर-अहंकार है इसलिए अथॉरिटी के बोल प्यारे लगते हैं। सिर्फ प्यारे नहीं लेकिन प्रभावशाली होते हैं। फॉलो फादर है ना। सेवा में वा कर्म में फॉलो ब्रहमा बाप है क्योंकि साकारी दुनिया में साकार ‘एक्जैम्पल' है, सैम्पल है। तो जैसे ब्रह्मा बाप को कर्म में, सेवा में, सूरत से, हर चलन से चलता-फिरता अथॉरिटी स्वरूप देखा, ऐसे फॉलो फादर करने वाले में भी स्नेह और अथॉरिटी, निर्माणता और महानता - दोनों साथ-साथ दिखाई दें। ऐसे नहीं सिर्फ स्नेह दिखाई दे और अथॉरिटी गुम हो जाए या अथॉरिटी दिखाई दे और स्नेह गुम हो जाए। जैसे ब्रह्मा बाप को देखा वा अभी भी मुरली सुनते हो। प्रत्यक्ष प्रमाण है। तो बच्चे-बच्चे भी कहेगा लेकिन अथॉरिटी भी दिखायेगा। स्नेह से बच्चे भी कहेगा और अथॉरिटी से शिक्षा भी देगा। सत्य ज्ञान को प्रत्यक्ष भी करेंगे लेकिन बच्चे-बच्चे कहते नया ज्ञान सारा स्पष्ट कर देंगे। इसको कहते हैं स्नेह और सत्यता की अथॉरिटी का बैलेन्स। तो वर्तमान समय सेवा में इस बैलेन्स को अन्डरलाइन करो।

धरनी बनाने के लिए स्थापना से लेकर अब तक 50 वर्ष पूरे हो गये। विदेश की धरनी भी अब काफी बन गई है। भल 50 वर्ष नहीं हुए हैं, लेकिन बने बनाये साधनों पर आये हो, इसलिए शुरू के 50 वर्ष और अब के 5 वर्ष बराबर हैं। डबल विदेशी सब कहते हैं - हम लास्ट सो फास्ट सो फर्स्ट हैं। तो समय में भी फास्ट सो फर्स्ट होंगे ना। निर्भय की अथॉरिटी जरूर रखो। एक ही बाप का नया ज्ञान सत्य ज्ञान है और नये ज्ञान से नई दुनिया स्थापन होती है - यह अथॉरिटी और नशा स्वरूप में इमर्ज हो। 50 वर्ष तो मर्ज रखा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि जो भी आवे उनको पहले से ही नये ज्ञान की नई बातें सुनाकर कनफ्यूज़ कर दो। यह भाव नहीं है। धरनी, नब्ज, समय यह सब देख करके ज्ञान देना - यही नॉलेजफुल की निशानी है। आत्मा की इच्छा देखो, नब्ज देखो, धरनी बनाओ लेकिन अन्दर सत्यता के निर्भयता की शक्ति जरूर हो। लोग क्या कहेंगे - यह भय न हो। निर्भय बन धरनी भल बनाओ। कई बच्चे समझते हैं - यह ज्ञान तो नया है, कई लोग समझ ही नहीं सकेंगे। लेकिन बेसमझ को ही तो समझाना है। यह जरूर है - जैसा व्यक्ति वैसी रूपरेखा बनानी पड़ती है, लेकिन व्यक्ति के प्रभाव में नहीं आ जाओ। अपने सत्य ज्ञान की अथॉरिटी से व्यक्ति को परिवर्तन करना ही है - यह लक्ष्य नहीं भूलो।

अब तक जो किया, वह ठीक था। करना ही था, आवश्यक था क्योंकि धरनी बनानी थी। लेकिन कब तक धरनी बनायेंगे? और कितना समय चाहिए? दवाई भी दी जाती है तो पहले ही ज्यादा ताकत की नहीं दी जाती, पहले हल्की दी जाती। लेकिन ताकत वाली दवाई दो ही नहीं, हल्की पर ही चलाते चलो - यह नहीं करो। किसी कमजोर को हाई पावर वाली दवाई दे दी तो यह भी रांग है। परखने की भी शक्ति चाहिए। लेकिन अपने सत्य नये ज्ञान की अथॉरिटी जरूर चाहिए। आपकी सूक्ष्म अथॉरिटी की वृत्ति ही उन्हों की वृत्तियों को चेन्ज करेगी। यही धरनी बनेगी। और विशेष जब सेवा कर मधुबन तक पहुँचते हो तो कम-से-कम उन्हों को यह जरूर मालूम पड़ना चाहिए। इस धरनी पर उन्हों की भी धरनी बन जाती है। कितनी भी कलराठी धरनी हो, किस भी धर्म वाला हो, किस भी पोजीशन वाला हो लेकिन इस धरनी पर वह भी नर्म हो जाते हैं और नर्म धरनी बनने के कारण उसमें जो भी बीज डालेंगे, उसका फल सहज निकलेगा। सिर्फ डरो नहीं, निर्भय जरूर बनो। युक्ति से दो, ऐसा न हो कि वह आप लोगों को यह उल्हना दें कि ऐसी धरनी पर भी मैं पहुँचा लेकिन यह मालूम नहीं पड़ा कि परमात्म-ज्ञान क्या है? परमात्म-भूमि पर आकर परम-आत्मा की प्रत्यक्षता का सन्देश जरूर ले जाएं। लक्ष्य अथॉरिटी का होना चाहिए।

आजकल के जमाने के हिसाब से भी नवीनता का महत्व है। फिर भल कोई उल्टा भी नया फैशन निकालते हैं, तो भी फॉलो करते हैं। पहले आर्ट देखो कितना बढ़िया था! आजकल का आर्ट तो उनके आगे जैसे लकीरें लगेंगी। लेकिन मॉडर्न आर्ट पसन्द करते हैं। मानव की पसन्दी हर बात में नवीनता है और नवीनता स्वत: ही अपने तरफ आकर्षित करती है इसलिए नवीनता, सत्यता, महानता - इसका नशा जरूर रखो। फिर समय और व्यक्ति देख सेवा करो। यह लक्ष्य जरूर रखो कि नई दुनिया का नया ज्ञान प्रत्यक्ष जरूर करना है। अभी स्नेह और शान्ति प्रत्यक्ष हुई है। बाप का प्यार के सागर का स्वरूप, शान्ति के सागर का स्वरूप प्रत्यक्ष किया है लेकिन ज्ञान स्वरूप आत्मा और ज्ञानसागर बाप है, इस नये ज्ञान को किस ढंग से देवें, उसके प्लैन्स अभी कम बनाये हैं। वह भी समय आयेगा जो सभी के मुख से यह आवाज निकलेगा कि नई दुनिया का नया ज्ञान यह है। अभी सिर्फ अच्छा कहते हैं, नया नहीं कहते। याद की सब्जेक्ट को अच्छा प्रत्यक्ष किया है, इसलिए धरनी अच्छी बन गई है और धरनी बनाना - पहला आवश्यक कार्य भी जरूरी है। जो किया है, वह बहुत अच्छा और बहुत किया है, तन-मन-धन लगाकर किया है। इसके लिए आफरीन भी देते हैं।

पहले जब विदेश में गये थे तो यही त्रिमूर्ति के चित्र पर समझाना कितना मुश्किल समझते थे! अभी त्रिमूर्ति के चित्र पर ही आकर्षित होते हैं। यह सीढ़ी का चित्र भारत की कहानी समझते थे। लेकिन विदेश में इस चित्र पर आकर्षित होते। तो जैसे वह प्लैन बनाये कि यह नई बात किस ढंग से सुनावें, तो अब भी इन्वेन्शन करो। यह नहीं सोचो कि यह तो करना ही पड़ेगा। नहीं। बापदादा का लक्ष्य सिर्फ यह है कि नवीनता के महानता की शक्ति धारण करो, इसको भूलो नहीं। दुनिया को समझाना है, दुनिया की बातों से घबराओ नहीं। अपना तरीका इन्वेन्ट करो क्योंकि इन्वेन्टर आप बच्चे ही हो ना। सेवा के प्लैन बच्चे ही जानते हैं। जैसा लक्ष्य रखेंगे, वैसा प्लैन बहुत अच्छे से अच्छा बन जायेगा और सफलता तो जन्म-सिद्ध-अधिकार है ही है इसलिए नवीनता को प्रत्यक्ष करो। जो भी ज्ञान की गुह्य बातें हैं, उसको स्पष्ट करने की विधि आपके पास बहुत अच्छी है और स्पष्टीकरण है। एक एक प्वाइंट को लॉजिकल स्पष्ट कर सकते हो। अपनी अथॉरिटी वाले हो। कोई मनोमय वा कल्पना की बातें तो हैं नहीं। यथार्थ हैं। अनुभव है। अनुभव की अथॉरिटी, नॉलेज की अथॉरिटी, सत्यता की अथॉरिटी... कितनी अथॉरिटीज़ हैं! तो अथॉरिटी और स्नेह - दोनों को साथ-साथ कार्य में लगाओ।

बापदादा खुश हैं कि मेहनत से सेवा करते-करते इतनी वृद्धि को प्राप्त किया है और करते ही रहेंगे। चाहे देश है, चाहे विदेश है। देश में भी व्यक्ति और नब्ज देख सेवा करने में सफलता है। विदेश में भी इसी विधि से सफलता है। पहले सम्पर्क में लाते हो - यह धरनी बनती है। सम्पर्क के बाद फिर सम्बन्ध में लाओ, सिर्फ सम्पर्क तक छोड़ नहीं दो। सम्बन्ध में लाकर फिर उन्हों को बुद्धि से समर्पित कराओ - यह है लास्ट स्टेज। सम्पर्क में लाना भी आवश्यक है, फिर सम्बन्ध में लाना है। सम्बन्ध में आते-आते समर्पण बुद्धि हो जाए कि ‘जो बाप ने कहा, वही सत्य है।' फिर क्वेश्चन नहीं उठते। जो बाबा कहता, वही सही है क्योंकि अनुभव हो जाता तो फिर क्वेश्चन समाप्त हो जाता। इसको कहते समर्पण बुद्धि जिसमें सब स्पष्ट अनुभव होता। लक्ष्य यह रखो कि समर्पण बुद्धि तक लाना अवश्य है। तब कहेंगे माइक तैयार हुए हैं। माइक क्या आवाज करेगा? सिर्फ अच्छा ज्ञान है इन्हों का, नहीं। यह नया ज्ञान है, यही नई दुनिया लायेगा - यह आवाज हो, तब तो कुम्भकरण जागेंगे ना। नहीं तो सिर्फ आंख खोलते हैं - बहुत अच्छा, बहुत अच्छा कह फिर नींद आ जाती है इसलिए जैसे स्वयं बालक सो मालिक बन गये ना, ऐसे बनाओ। बेचारों को सिर्फ साधारण प्रजा तक नहीं लाओ, लेकिन राज्य अधिकारी बनाओ। उसके लिए प्लैन बनाओ - किस विधि से करो जो कनफ्यूज़ भी न हों और समर्पण बुद्धि भी हो जाएं। नवीनता भी लगे, उलझन भी अनुभव नहीं करें। स्नेह और नवीनता की अथॉरिटी लगे।

अब तक जो रिजल्ट रही, सेवा की विधि, ब्राह्मणों की वृद्धि रही, वह बहुत अच्छा है क्योंकि पहले बीज को गुप्त रखा, वह भी आवश्यक है। बीज को गुप्त रखना होता है, बाहर रखने से फल नहीं देता। धरनी के अन्दर बीज को रखना होता है लेकिन अन्दर धरनी में ही न रह जाए। बाहर प्रत्यक्ष हो, फल स्वरूप बनें - यह आगे की स्टेज है। समझा? लक्ष्य रखो - नया करना है। ऐसे नहीं कि इस वर्ष ही हो जायेगा। लेकिन लक्ष्य बीज को भी बाहर प्रत्यक्ष करेगा। ऐसे भी नहीं सीधा जाकर भाषण करना शुरू कर दो। पहले सत्यता के शक्ति की भासना दिलाने के भाषण करने पड़ेंगे। ‘आखिर वह दिन आये' - यह सबके मुख से निकले। जैसे ड्रामा में दिखाते हो ना, सब धर्म वाले मिलकर कहते हैं - हम एक हैं, एक के हैं। वह ड्रामा दिखाते हो, यह प्रैक्टिकल में स्टेज पर सब धर्म वाले मिलकर एक ही आवाज में बोलें। एक बाप है, एक ही ज्ञान है, एक ही लक्ष्य है, एक ही घर है, यही है - अब यह आवाज चाहिए। ऐसा दृश्य जब बेहद की स्टेज पर आये, तब प्रत्यक्षता का झण्डा लहरायेगा और इस झण्डे के नीचे सब यही गीत गायेंगे। सबके मुख से एक शब्द निकलेगा - ‘बाबा हमारा' तब कहेंगे प्रत्यक्ष रूप में शिवरात्रि मनाई। अंधकार खत्म हो गोल्डन मार्निंग के नज़ारे दिखाई देंगे। इसको कहते हैं आज और कल का खेल। आज अंधकार, कल गोल्डन मार्निंग। यह है लास्ट पर्दा। समझा?

बाकी जो प्लैन बनाये हैं, वह अच्छे हैं। हर एक स्थान की धरनी प्रमाण प्लैन बनाना ही पड़ता है। धरनी के प्रमाण विधि में कोई अन्तर भी अगर करना पड़ता है तो ऐसी कोई बात नहीं है। लास्ट में सभी को तैयार कर मधुबन धरनी पर छाप जरूर लगानी है। भिन्न-भिन्न वर्ग को तैयार कर स्टैम्प (छाप) जरूर लगानी है। पासपोर्ट पर भी स्टैम्प लगाने सिवाए जाने नहीं देते हैं ना। तो स्टैम्प यहाँ मधुबन में ही लगेगी।

यह सब तो हैं ही सरेन्डर (समर्पित) अगर यह सरेन्डर नहीं होते तो सेवा के निमित्त कैसे बनते। सरेन्डर हैं तब ब्रह्मा-कुमार/ब्रह्माकुमारी बन सेवा के निमित्त बने हो। देश चाहे विदेश में कोई क्रिश्चियन-कुमारी वा बौद्ध-कुमारी बनकर तो सेवा नहीं करते हो? बी.के. बनकर ही सेवा करते हो ना। तो सरेन्डर ब्राह्मणों की लिस्ट में सभी हैं। अब औरों को कराना है। मरजीवा बन गये। ब्राह्मण बन गये। बच्चे कहते - ‘मेरा बाबा', तो बाबा कहते - तेरा हो गया। तो सरेन्डर हुए ना। चाहे प्रवृत्ति में हो, चाहे सेन्टर पर हो लेकिन जिसने दिल से कहा - ‘मेरा बाबा' तो बाप ने अपना बनाया। यह तो दिल का सौदा है। मुख का स्थूल सौदा नहीं है, यह दिल का है। सरेन्डर माना श्रीमत के अण्डर रहने वाले। सारी सभा सरेन्डर है ना इसलिए फोटो भी निकाला है ना। अब चित्र में आ गये तो बदल नहीं सकते। परमात्म-घर में चित्र हो जाए, यह कम भाग्य नहीं है। यह स्थूल फोटो नहीं लेकिन बाप के दिल में फोटो निकल गया। अच्छा।

सर्व सत्यता की अथॉरिटी वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सर्व नवीनता और महानता को प्रत्यक्ष करने वाले सच्चे सेवाधारी बच्चों को, सर्व स्नेह और अथॉरिटी के बैलेन्स रखने वाले, हर कदम में बाप द्वारा ब्लैसिंग (आशीर्वाद) लेने के अधिकारी श्रेष्ठ आत्माओं को, सर्व सत् अर्थात् अविनाशी रत्नों को, अविनाशी पार्ट बजाने वालों को, अविनाशी खजाने के बालक सो मालिकों को विश्व-रचता सत् बाप, सत् शिक्षक, सतगुरू का यादप्यार और नमस्ते।

वरदान:-

मन के मौन से सेवा की नई इन्वेन्शन निकालने वाले सिद्धि स्वरूप भव

जैसे पहले-पहले मौन व्रत रखा था तो सब फ्री हो गये थे, टाइम बच गया था ऐसे अब मन का मौन रखो जिससे व्यर्थ संकल्प आवे ही नहीं। जैसे मुख से आवाज न निकले वैसे व्यर्थ संकल्प न आये - यह है मन का मौन। तो समय बच जायेगा। इस मन के मौन से सेवा की ऐसी नई इन्वेन्शन निकलेगी जो साधना कम और सिद्धि ज्यादा होगी। जैसे साइंस के साधन सेकण्ड में विधि को प्राप्त कराते हैं वैसे इस साइलेन्स के साधन द्वारा सेकण्ड में विधि प्राप्त होगी।

स्लोगन:-

जो स्वयं समर्पित स्थिति में रहते हैं-सर्व का सहयोग भी उनके आगे समर्पित होता है।

 

सूचनाः- आज मास का तीसरा रविवार है, सभी राजयोगी तपस्वी भाई बहिनें सायं 6.30 से 7.30 बजे तक, विशेष योग अभ्यास के समय अपने लाइट माइट स्वरूप में स्थित हो, भ्रकुटी के मध्य बापदादा का आह्वान करते हुए, कम्बाइन्ड स्वरूप का अनुभव करें और चारों ओर लाइट माइट की किरणें फैलाने की सेवा करें। 


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