Saturday, 5 September 2020

Brahma Kumaris Murli 06 September 2020 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 06 September 2020


06/09/20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 16/03/86 मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


रुहानी ड्रिल
बापदादा सभी बच्चों की स्वीट साइलेन्स की स्थिति को देख रहे हैं। एक सेकेण्ड में साइलेन्स की स्थिति में स्थित हो जाना यह प्रैक्टिस कहाँ तक की है? इस स्थिति में जब चाहें तब स्थित हो सकते हैं वा समय लगता है? क्योंकि अनादि स्वरूप स्वीट साइलेन्स है। आदि स्वरूप आवाज में आने का है। लेकिन अनादि अविनाशी संस्कार साइलेन्स है। तो अपने अनादि संस्कार, अनादि स्वरूप को, अनादि स्वभाव को जानते हुए जब चाहो तब उस स्वरूप में स्थित हो सकते हो? 84 जन्म आवाज में आने के हैं इसलिए सदा अभ्यास आवाज में आने का है। लेकिन अनादि स्वरूप और फिर इस समय चक्र पूरा होने के कारण वापिस साइलेन्स होम में जाना है। अब घर जाने का समय समीप है। अब आदि मध्य अन्त तीनों ही काल का पार्ट समाप्त कर अपने अनादि स्वरूप, अनादि स्थिति में स्थित होने का समय है इसलिए इस समय यही अभ्यास ज्यादा आवश्यक है। अपने आपको चेक करो कि कर्मेन्द्रिय-जीत बने हैं? आवाज में नहीं आने चाहें तो यह मुख का आवाज अपनी तरफ खींचता तो नहीं है। इसी को ही रूहानी ड्रिल कहा जाता है।
जैसे वर्तमान समय के प्रमाण शरीर के लिए सर्व बीमारियों का इलाज एक्सरसाइज सिखाते हैं, तो इस समय आत्मा को शक्तिशाली बनाने के लिए यह रूहानी एक्सरसाइज का अभ्यास चाहिए। चारों ओर कैसा भी वातावरण हो, हलचल हो लेकिन आवाज में रहते आवाज से परे स्थिति का अभ्यास अभी बहुत काल का चाहिए। शान्त वातावरण में शान्ति की स्थिति बनाना यह कोई बड़ी बात नहीं है। अशान्ति के बीच आप शान्त रहो यही अभ्यास चाहिए। ऐसा अभ्यास जानते हो? चाहे अपनी कमजोरियों की हलचल हो, संस्कारों के व्यर्थ संकल्पों की हलचल हो। ऐसी हलचल के समय स्वयं को अचल बना सकते हो वा टाइम लग जाता है? क्योंकि टाइम लगना यह कभी भी धोखा दे सकता है। समाप्ति के समय में ज्यादा समय नहीं मिलना है। फाइनल रिजल्ट का पेपर कुछ सेकण्ड और मिनटों का ही होना है। लेकिन चारों ओर की हलचल के वातावरण में अचल रहने पर ही नम्बर मिलना है। अगर बहुतकाल हलचल की स्थिति से अचल बनने में समय लगने का अभ्यास होगा तो समाप्ति के समय क्या रिजल्ट होगी? इसलिए यह रूहानी एक्सरसाइज का अभ्यास करो। मन को जहाँ और जितना समय स्थित करने चाहें उतना समय वहाँ स्थित कर सको। फाइनल पेपर है बहुत ही सहज। और पहले से ही बता देते हैं कि यह पेपर आना है। लेकिन नम्बर बहुत थोड़े समय में मिलना है। स्टेज भी पावरफुल हो।
Brahma Kumaris Murli 06 September 2020 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 06 September 2020 (HINDI) 
देह, देह के सम्बन्ध, देह संस्कार, व्यक्ति या वैभव, वायब्रेशन, वायुमण्डल सब होते हुए भी आकर्षित करे। इसी को ही कहते हैं नष्टोमोहा समर्थ स्वरूप। तो ऐसी प्रैक्टिस है? लोग चिल्लाते रहें और आप अचल रहो। प्रकृति भी, माया भी सब लास्ट दाँव लगाने लिए अपने तरफ कितना भी खींचे लेकिन आप न्यारे और बाप के प्यारे बनने की स्थिति में लवलीन रहो, इसको कहा जाता देखते हुए देखो, सुनते हुए सुनो... ऐसा अभ्यास हो। इसी को ही स्वीट साइलेन्स स्वरूप की स्थिति कहा जाता है। फिर भी बापदादा समय दे रहा है। अगर कोई भी कमी है तो अब भी भर सकते हो क्योंकि बहुतकाल का हिसाब सुनाया। तो अभी थोड़ा चांस है, इसलिए इस प्रैक्टिस की तरफ फुल अटेन्शन रखो। पास विद आनर बनना या पास होना यह आधार इसी अभ्यास पर है। ऐसा अभ्यास है? समय की घण्टी बजे तो तैयार होंगे या अभी सोचते हो तैयार होना है? इसी अभ्यास के कारण अष्ट रत्नों की माला विशेष छोटी बनी है। बहुत थोड़े टाइम की है। जैसे आप लोग कहते हो ना सेकण्ड में मुक्ति वा जीवनमुक्ति का वर्सा लेना सभी का अधिकार है। तो समाप्ति के समय भी नम्बर मिलना थोड़े समय की बात है। लेकिन जरा भी हलचल हो। बस बिन्दी कहा और बिन्दी में टिक जायें। बिन्दी हिले नहीं। ऐसे नहीं कि उस समय अभ्यास करना शुरू करो - मैं आत्मा हूँ...मैं आत्मा हूँ.. यह नहीं चलेगा क्योंकि सुनाया वार भी चारों ओर का होगा। लास्ट ट्रायल सब करेंगे। प्रकृति में भी जितनी शक्ति होगी, माया में भी जितनी शक्ति होगी, ट्रायल करेगी। उनकी भी लास्ट ट्रायल और आपकी लास्ट कर्मातीत, कर्मबन्धन मुक्त स्थिति होगी। दोनों तरफ की बहुत पावरफुल सीन होगी। वह भी फुलफोर्स, यह भी फुल-फोर्स। लेकिन सेकण्ड की विजय, विजय के नगाड़े बजायेगी। समझा लास्ट पेपर क्या है। सब शुभ संकल्प तो यही रखते भी हैं और रखना भी है कि नम्बरवन आना ही है। तो जब चारों ओर की बातों में विन होंगे तभी वन आयेंगे। अगर एक बात में जरा भी व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ समय लग गया तो नम्बर पीछे हो जायेगा इसलिए सब चेक करो। चारों ही तरफ चेक करो। डबल विदेशी सबमें तीव्र जाने चाहते हैं ना इसलिए तीव्र पुरूषार्थ वा फुल अटेन्शन इस अभ्यास में अभी से देते रहो। समझा! क्वेश्चन को भी जानते हो और टाइम को भी जानते हो। फिर तो सब पास होने चाहिए। अगर पहले से क्वेश्चन का पता होता है तो तैयारी कर लेते हैं। फिर पास हो जाते हैं। आप सभी तो पास होने वाले हो ना! अच्छा।
यह सीजन बापदादा ने हरेक से मिलने का खुला भण्डारा खोला है। आगे क्या होना है, वह फिर बतायेंगे। अभी खुले भण्डार से जो भी लेने आये हैं वह तो ले ही लेंगे। ड्रामा का दृश्य सदा बदलता ही है लेकिन इस सीजन में चाहे भारतवासियों को, चाहे डबल विदेशियों को सभी को विशेष वरदान तो मिला ही है। बापदादा ने जो वायदा किया है वह तो निभायेंगे। इस सीजन का फल खाओ। फल है मिलन, वरदान। सभी सीजन का फल खाने आये हो ना। बापदादा को भी बच्चों को देख खुशी होती है। फिर भी साकारी सृष्टि में तो सब देखना होता है। अभी तो मौज मना लो। फिर सीजन की लास्ट में सुनायेंगे।
सेवा के स्थान भले अलग-अलग हैं लेकिन सेवा का लक्ष्य तो एक ही है। उमंग-उल्हास एक ही है इसलिए बापदादा सभी स्थानों को विशेष महत्व देते हैं। ऐसे नहीं एक स्थान महत्व वाला है, दूसरा कम है। नहीं। जिस भी धरनी पर बच्चे पहुँचे हैं उससे कोई कोई विशेष रिजल्ट अवश्य निकलनी है। फिर चाहे कोई की जल्दी दिखाई देती, कोई की समय पर दिखाई देगी। लेकिन विशेषता सब तरफ की है। कितने अच्छे-अच्छे रत्न निकले हैं। ऐसे नहीं समझना कि हम तो साधारण हैं। सब विशेष हो। अगर कोई विशेष होता तो बाप के पास नहीं पहुँचता। विशेषता है लेकिन कोई विशेषता को सेवा में लगाते हैं कोई सेवा में लगाने के लिए अभी तैयार हो रहे हैं, बाकी हैं सब विशेष आत्मायें। सब महारथी, महावीर हो। एक-एक की महिमा शुरू करें तो लम्बी-चौड़ी माला बन जायेगी। शक्तियों को देखो तो हर एक शक्ति महान आत्मा, विश्व कल्याणकारी आत्मा दिखाई देगी। ऐसे हो ना या सिर्फ अपने-अपने स्थान के कल्याणकारी हो? अच्छा।
06-09-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति"अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज 19-03-86 मधुबन
अमृतवेला - श्रेष्ठ प्राप्तियों की वेला
आज रूहानी बागवान अपने रूहानी रोज़ फ्लावर्स का बगीचा देख रहे हैं। ऐसा रूहानी गुलाब का बगीचा अब इस संगमयुग पर ही बापदादा द्वारा ही बनता है। बापदादा हर एक रूहानी गुलाब के फूल की रूहानियत की खुशबू और रूहानियत के खिले हुए पुष्पों की रौनक देख रहे हैं। खुशबूदार सभी हैं लेकिन किसकी खुशबू सदाकाल रहने वाली है और किसकी खुशबू थोड़े समय के लिए रहती है। कोई गुलाब सदा खिला हुआ है और कोई कब खिला हुआ कब थोड़ा-सा धूप वा मौसम के हिसाब से मुरझा भी जाते हैं। लेकिन हैं फिर भी रूहानी बागवान के बगीचे के रूहानी गुलाब। कोई-कोई रूहानी गुलाब में ज्ञान की खुशबू विशेष है। कोई में याद की खुशबू विशेष है। तो कोई में धारणा की खुशबू, कोई में सेवा की खुशबू विशेष है। कोई-कोई ऐसे भी हैं जो सर्व खुशबू से सम्पन्न हैं। तो बगीचे में सबसे पहले नज़र किसके ऊपर जायेगी? जिसकी दूर से ही खुशबू आकर्षित करेगी। उस तरफ ही सबकी नज़र पहले जाती है। तो रूहानी बागवान सदैव सभी रूहानी गुलाब के पुष्पों को देखते हैं। लेकिन नम्बरवार। प्यार भी सभी से है क्योंकि हर एक गुलाब पुष्प के अन्दर बागवान प्रति अति प्यार है। मालिक से पुष्पों का प्यार है। और मालिक का पुष्पों से प्यार है। फिर भी शोकेस में सदा रखने वाले रूहानी गुलाब वही होते जो सदा सर्व खुशबू से सम्पन्न हैं और सदा खिले हुए हैं। मुरझायें हुए कभी नहीं। रोज़ अमृतवेले बापदादा स्नेह और शक्ति की विशेष पालना से सभी रूहानी गुलाब के पुष्पों से मिलन मनाते हैं।
अमृतवेला विशेष प्रभू पालना की वेला है। अमृतवेले विशेष परमात्म मिलन की वेला है। रूहानी रूह-रूहान करने की वेला है। अमृतवेले भोले भण्डारी के वरदानों के खजाने से सहज वरदान प्राप्त होने की वेला है। जो गायन है मन इच्छित फल प्राप्त करना, यह इस समय अमृतवेले के समय का गायन है। बिना मेहनत के खुले खजाने प्राप्त करने की वेला है। ऐसे सुहावने समय को अनुभव से जानते हो ना। अनुभवी ही जानें इस श्रेष्ठ सुख को, श्रेष्ठ प्राप्तियों को। तो बापदादा सभी रूहानी गुलाब को देख-देख हर्षित हो रहे हैं। बापदादा भी कहते हैं वाह मेरे रूहानी गुलाब। आप वाह-वाह के गीत गाते तो बापदादा भी यही गीत गाते। समझा!
मुरलियाँ तो बहुत सुनी हैं। सुन-सुनकर सम्पन्न बन गये हो। अभी महादानी बन बांटने के प्लैन बना रहे हो। यह उमंग बहुत अच्छा है। आज यू.के. अर्थात् .के. रहने वालों का टर्न है। डबल विदेशियों का एक शब्द सुन करके बापदादा सदा मुस्कराते रहते हैं। कौन-सा? थैंक यू। थैंक यू करते हुए भी बाप को भी याद करते रहते हैं क्योंकि सबसे पहले शुक्रिया दिल से बाप का ही मानते हैं। तो जब किसी को भी थैंक यू करते तो पहले बाप याद आयेगा ना! ब्राह्मण जीवन में पहला शुक्रिया स्वत: ही बाप के प्रति निकलता है। उठते-बैठते अनेक बार थैंक यू कहते हो। यह भी एक विधि है बाप को याद करने की। यू.के.वाले सर्व भिन्न-भिन्न हद की शक्तियों वालों को मिलाने के निमित्त बने हुए हो ना। अनेक प्रकार के नॉलेज की शक्तियाँ हैं। भिन्न-भिन्न शक्ति वाले, भिन्न-भिन्न वर्ग वाले, भिन्न-भिन्न धर्म वाले, भाषा वाले सभी को मिलाकर एक ही ब्राह्मण वर्ग में लाना, ब्राह्मण धर्म में, ब्राह्मण भाषा में आना। ब्राह्मणों की भाषा भी अपनी है। जो नये समझ भी नहीं सकते कि यह क्या बोलते हैं। तो ब्राह्मणों की भाषा, ब्राह्मणों की डिक्शनरी ही अपनी है। तो यू.के. वाले सभी को एक बनाने में बिजी रहते हो ना। संख्या भी अच्छी है और स्नेह भी अच्छा है हर एक स्थान की अपनी-अपनी विशेषता तो है ही है लेकिन आज यू.के.का सुना रहे हैं। यज्ञ स्नेही, यज्ञ सहयोगी यह विशेषता अच्छी दिखाई देती है। हर कदम पर पहले यज्ञ अर्थात् मधुबन का हिस्सा निकालने में अच्छे नम्बर में जा रहे हैं। डायरेक्ट मधुबन की याद एक स्पेशल लिफ्ट बन जाती है। हर कार्य में, हर कदम में मधुबन अर्थात् बाप की याद है या बाप की पढ़ाई है या बाप का ब्रह्मा भोजन है या बाप से मिलन है। मधुबन स्वत: ही बाप की याद दिलाने वाला है। कहाँ भी रहते मधुबन की याद आना अर्थात् विशेष स्नेह, लिफ्ट बन जाता है। चढ़ने की मेहनत से छूट जाते। सेकण्ड में स्विच ऑन किया और पहुँचे।
बापदादा को और कोई हीरे मोती तो चाहिए नहीं। बाप को स्नेह की छोटी वस्तु ही हीरे रत्न हैं इसलिए सुदामा के कच्चे चावल गाये हुए हैं। इसका भाव अर्थ यही है कि स्नेह की छोटी-सी सुई में भी मधुबन याद आता है। तो वह भी बहुत बड़ा अमूल्य रत्न है क्योंकि स्नेह का दाम है। वैल्यु स्नेह की है। चीज़ की नहीं। अगर कोई वैसे ही भल कितना भी दे देवे लेकिन स्नेह नहीं तो उसका जमा नहीं होता और स्नेह से थोड़ा भी जमा करे तो उनका पदम जमा हो जाता है। तो बाप को स्नेह पसन्द है। तो यू.के. वालों की विशेषता यज्ञ स्नेही, यज्ञ सहयोगी आदि से रहे हैं। यही सहज योग भी है। सहयोग, सहज योग है। सहयोग का संकल्प आने से भी याद तो बाप की रहेगी ना। तो सहयोगी, सहज योगी स्वत: ही बन जाते हैं। योग बाप से होता, मधुबन अर्थात् बापदादा से। तो सहयोगी बनने वाले भी सहजयोग की सबजेक्ट में अच्छे नम्बर ले लेते हैं। दिल का सहयोग बाप को प्रिय है, इसलिए यहाँ यादगार भी दिलवाला मन्दिर बनाया है। तो दिलवाला बाप को दिल का स्नेह, दिल का सहयोग ही प्रिय है। छोटी दिल वाले छोटा सौदा कर खुश हो जाते और बड़ी दिल वाले बेहद का सौदा करते हैं। फाउन्डेशन बड़ी दिल है तो विस्तार भी बड़ा हो रहा है। जैसे कई जगह पर वृक्ष देखे होंगे तो वृक्ष की शाखायें भी तना बन जाती हैं। तो यू.के.के फाउन्डेशन से तना निकला, शाखायें निकलीं। अब वह शाखायें भी तना बन गई। उस तना से भी शाखायें निकल रही हैं। जैसे आस्ट्रेलिया निकला, अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका निकले। सब तना बन गये। और हर एक तना की शाखायें भी अच्छी तरह से वृद्धि को पा रही हैं क्योंकि फाउन्डेशन स्नेह और सहयोग के पानी से मजबूत है, इसलिए विस्तार भी अच्छा है और फल भी अच्छे हैं। अच्छा -
वरदान:-
देह भान का त्याग कर निक्रोधी बनने वाले निर्मानचित्त भव
जो बच्चे देह भान का त्याग करते हैं उन्हें कभी भी क्रोध नहीं सकता क्योंकि क्रोध आने के दो कारण होते हैं। एक - जब कोई झूठी बात कहता है और दूसरा जब कोई ग्लानी करता है। यही दो बातें क्रोध को जन्म देती हैं। ऐसी परिस्थिति में निर्मानचित्त के वरदान द्वारा अपकारी पर भी उपकार करो, गाली देने वाले को गले लगाओ, निंदा करने वाले को सच्चा मित्र मानो - तब कहेंगे कमाल। जब ऐसा परिवर्तन दिखाओ तब विश्व के आगे प्रसिद्ध होंगे
स्लोगन:-
मौज़ का अनुभव करने के लिए माया की अधीनता को छोड़ स्वतंत्र बनो।



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