Tuesday, 9 April 2019

Brahma Kumaris Murli 10 April 2019 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 10 April 2019


10/04/2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


''मीठे बच्चे - यह वन्डरफुल पढ़ाई बेहद का बाप पढ़ाते हैं, बाप और उनकी पढ़ाई में कोई भी संशय नहीं आना चाहिए, पहला निश्चय चाहिए कि हमें पढ़ाने वाला कौन''
प्रश्नः-
तुम बच्चों को निरन्तर याद की यात्रा में रहने की श्रीमत क्यों मिली है?
उत्तर:-
क्योंकि माया दुश्मन अभी भी तुम्हारे पीछे है, जिसने तुमको गिराया है। अभी वह तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगा इसलिए ग़फलत नहीं करना। भल तुम संगमयुग पर हो परन्तु आधाकल्प उसके रहे हो इसलिए जल्दी नहीं छोड़ेगा। याद भूली और माया ने विकर्म कराया इसलिए ख़बरदार रहना है। आसुरी मत पर नहीं चलना है।

Brahma Kumaris Murli 10 April 2019 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 10 April 2019 (HINDI)
ओम् शान्ति।
अभी बच्चे भी हैं, बाबा भी है। बाबा अनेक बच्चों को कहेंगे ओ बेटे', सभी बच्चे फिर कहेंगे ओ बाबा'। बच्चे हैं बहुत। तुम समझते हो यह ज्ञान हम आत्माओं के लिए ही है। एक बाप के कितने ढेर बच्चे हैं। बच्चे जानते हैं बाप पढ़ाने आये हैं। वह पहले-पहले बाबा है, फिर टीचर है, फिर गुरू है। अब बाप तो बाप ही है। फिर पावन बनाने के लिए याद की यात्रा सिखलाते हैं। और यह भी बच्चे समझते हैं कि यह पढ़ाई वन्डरफुल है। ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त का राज़ बाप के सिवाए कोई बता न सके, इसलिए उनको बेहद का बाप कहा जाता है। यह निश्चय तो बच्चों को जरूर बैठता है, इसमें संशय की बात उठ न सके। इतनी बेहद की पढ़ाई, बेहद के बाप के सिवाए तो कोई पढ़ा न सके। बुलाते भी हैं कि बाबा आओ, हमको पावन दुनिया में ले चलो क्योंकि यह है पतित दुनिया। पावन दुनिया में ले जाते हैं बाप। वहाँ थोड़ेही कहेंगे बाबा आओ, पावन दुनिया में ले चलो। बच्चे जानते हैं हम आत्माओं का वह बाप है। तो देह का भान टूट जाता है। आत्मा कहती है वह हमारा बाप है। अब यह तो निश्चय रहना चाहिए बरोबर बाप के बिगर कोई इतनी नॉलेज दे नहीं सकता। पहले तो यह निश्चय बुद्धि चाहिए। निश्चय भी आत्मा को बुद्धि में होता है। आत्मा को यह ज्ञान मिलता है, हमारा यह बाबा है। यह बहुत पक्का निश्चय बच्चों को होना चाहिए। मुख से कहना कुछ भी नहीं है। हम आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती हैं। आत्मा में ही सब संस्कार हैं।

अब तुम जानते हो बाबा आया हुआ है, हमको ऐसा पढ़ाते हैं, कर्म सिखलाते हैं जो हम इस दुनिया में अभी आयेंगे नहीं। वह मनुष्य तो समझते हैं इस दुनिया में आना है। तुम ऐसे नहीं समझते हो। तुम यह अमरकथा सुन अमरपुरी में जाते हो। अमरपुरी अर्थात् जहाँ सदा अमर रहें। सतयुग-त्रेता है अमरपुरी। बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। यह पढ़ाई सिवाए बाप के और कोई पढ़ा न सके। बाप हमको पढ़ाते हैं और जो टीचर्स हैं वह ऑर्डनरी मनुष्य हैं। यहाँ तुम जिसको पतित-पावन, दु:ख हर्ता सुख कर्ता कहते हो, वह बाप अब सम्मुख पढ़ा रहे हैं। सम्मुख होने बिगर राजयोग की पढ़ाई कैसे पढ़ायें? बाप कहते हैं तुम स्वीट बच्चों को यहाँ पढ़ाने आता हूँ। पढ़ाने लिए इनमें प्रवेश करता हूँ। बरोबर भगवानुवाच भी है, तो जरूर उनको शरीर चाहिए। न सिर्फ मुख परन्तु सारा शरीर चाहिए। खुद कहते हैं - मीठे-मीठे रूहानी बच्चों, मैं कल्प-कल्प पुरूषोत्तम संगमयुगे साधारण तन में आता हूँ। बहुत गरीब भी नहीं, तो बहुत साहूकार भी नहीं, साधारण है। यह तो तुम बच्चों को निश्चय होना चाहिए - वह हमारा बाबा है, हम आत्मा हैं। हम आत्माओं का बाबा है। सारी दुनिया के जो भी मनुष्यमात्र की आत्मायें हैं, उन सबका बाबा है इसलिए उनको बेहद का बाबा कहा जाता है। शिव जयन्ती मनाते हैं, उसका भी किसको पता नहीं है। कोई से भी पूछो शिव जयन्ती कब से मनाई जा रही है? तो कहेंगे परमपरा से। वह भी कब से? कोई डेट तो चाहिए ना। ड्रामा तो अनादि है। परन्तु एक्टिविटी जो ड्रामा में होती है, उनकी तिथि-तारीख तो चाहिए ना। यह तो कोई भी जानते नहीं। हमारा शिवबाबा आते हैं, उस लव से जयन्ती नहीं मनाते। नेहरू की जयन्ती उस लव से मनायेंगे। आंसू भी आ जायेंगे। शिव जयन्ती का किसको भी पता नहीं है। अभी तुम बच्चे अनुभवी हो। अनेक मनुष्य हैं, जिनको कुछ भी पता नहीं है। कितने मेले लगते हैं। वहाँ जो जाते हैं वह बता सकते हैं कि सच-सच क्या है। जैसे बाबा ने अमरनाथ का भी मिसाल बताया था, वहाँ जाकर देखा - सच-सच क्या होता है। दूसरे तो जो औरों द्वारा सुनते हैं, वह बतलाते हैं। कोई ने कहा बर्फ का लिंग होता है, कहेंगे सत। अभी तुम बच्चों को अनुभव मिला है - राइट क्या है, रांग क्या है। अब तक जो कुछ सुनते-पढ़ते आये हैं, वह सब था अनराइटियस। गायन भी है ना झूठी काया..... यह है झूठ खण्ड, वह है सच खण्ड। सतयुग, त्रेता, द्वापर पास्ट हो गया, अब कलियुग चल रहा है। यह भी बहुत थोड़े जानते हैं। तुम्हारी बुद्धि में सब ख्यालात रहते हैं। बाप के पास सारी नॉलेज है, उनको कहते हैं ज्ञान का सागर। उनके पास जो नॉलेज है वह इस तन द्वारा दे हमको आपसमान बना रहे हैं। जैसे टीचर भी आप समान बनाते हैं। तो बेहद का बाप भी कोशिश कर आपसमान बनाते हैं। लौकिक बाप आपसमान नहीं बनाते। तुम अब आये हो बेहद के बाप के पास। वह जानते हैं मुझे बच्चों को आपसमान बनाना है। जैसे टीचर आपसमान बनायेंगे, नम्बरवार होंगे। यह बाप भी ऐसे कहते हैं, नम्बरवार बनेंगे। मैं जो पढ़ाता हूँ यह है अविनाशी पढ़ाई। जो जितना पढ़ेंगे वह व्यर्थ नहीं जायेगा। आगे चल खुद कहेंगे हमने 4 वर्ष पहले, 8 वर्ष पहले कोई से ज्ञान सुना था, अब फिर आया हूँ। फिर कोई चटक पड़ते हैं। शमा तो है फिर उस पर कोई तो परवाने एकदम फिदा हो जाते हैं। कोई फेरी पहन चले जाते हैं। शुरू में शमा पर बहुत परवाने आशिक हो पड़े। ड्रामा प्लैन अनुसार भट्ठी बननी थी। कल्प-कल्प ऐसा होता आया है। जो कुछ पास्ट हुआ, कल्प पहले भी ऐसे हुआ था। आगे फिर भी वही होगा। बाकी यह पक्का निश्चय रखो कि हम आत्मा हैं। बाप हमको पढ़ाते हैं। इस निश्चय में पक्के रहो, भूल न जाओ। ऐसा कोई मनुष्य नहीं होगा जो बाप को बाप न समझे। भल फ़ारकती दे देगा तो भी समझेगा हमने बाप को फ़ारकती दी। यह तो बेहद का बाप है, उनको तो हम कभी भी नहीं छोड़ेंगे। अन्त तक साथ रहेंगे। यह बाप तो सबकी सद्गति करने वाला है। 5 हज़ार वर्ष के बाद आते हैं। यह भी समझते हो, सतयुग में बहुत थोड़े मनुष्य होते हैं। बाकी सब शान्तिधाम में रहते हैं। यह नॉलेज भी बाप ही सुनाते हैं और कोई सुना न सके। किसकी बुद्धि में बैठ न सके। तुम आत्माओं का वह बाप है। वह चैतन्य बीजरूप है। क्या नॉलेज देंगे? सृष्टि रूपी झाड़ की। रचता जरूर रचना की नॉलेज देंगे। तुमको पता था क्या कि सतयुग कब था फिर कहाँ गया!

अभी तुम सामने बैठे हो, बाबा बात कर रहे हैं। पक्का निश्चय करते हो - यह हम सभी आत्माओं का बाप है, हमको पढ़ा रहे हैं। यह कोई जिस्मानी टीचर नहीं। इस शरीर में पढ़ाने वाला वह निराकार शिवबाबा विराजमान है। वह निराकार होते भी ज्ञान का सागर है। मनुष्य तो कह देते उनका कोई आकार नहीं। महिमा भी गाते हैं - ज्ञान का सागर, सुख का सागर...। परन्तु समझते नहीं हैं। ड्रामा अनुसार बहुत दूर चले गये हैं। बाबा बहुत नज़दीक ले आते हैं। यह तो 5 हज़ार वर्ष की बात है। तुम समझते हो हर 5 हज़ार वर्ष बाद हमको पढ़ाने आते हैं। यह नॉलेज और कोई से मिल न सके। यह नॉलेज है ही नई दुनिया के लिए। कोई मनुष्य दे न सके क्योंकि तमोप्रधान हैं। वह किसको सतोप्रधान बना न सकें। वह तो तमोप्रधान बनते ही जाते हैं।

तुम अभी जानते हो - बाबा हमको इनमें प्रवेश करके बता रहे हैं और फिर बाप कहते हैं - बच्चे, ग़फलत नहीं करना। दुश्मन अभी भी तुम्हारे पीछे है, जिसने ही तुमको गिराया है। वह अभी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेंगे। भल तुम संगमयुग पर हो परन्तु आधाकल्प तुम उनके रहे हो तो वह जल्दी नहीं छोड़ेंगे। खबरदार नहीं रहेंगे, याद नहीं करेंगे तो फिर और ही विकर्म करा देंगे। फिर कुछ न कुछ चमाट लगती रहेगी। अभी तो देखो मनुष्यों ने अपने को आपेही चमाट मारी है। क्या-क्या कह देते हैं! शिव-शंकर इकट्ठा कह देते हैं। उनका आक्यूपेशन क्या है, उनका क्या? कितना फ़र्क है। शिव तो है ऊंच ते ऊंच भगवान्, शंकर देवता। फिर शिव-शंकर इकट्ठा कैसे कह देते! पार्ट ही दोनों का अलग-अलग है। यहाँ भी बहुतों के ऐसे-ऐसे नाम हैं - राधेकृष्ण, लक्ष्मीनारायण, शिवशंकर.... दोनों नाम स्वयं पर रख दिये हैं। तो बच्चे समझते हैं इस समय तक जो बाप ने समझाया है वह फिर रिपीट होगा। बाकी थोड़े रोज़ हैं। बाप बैठ थोड़ेही जायेंगे। बच्चे नम्बरवार पढ़कर पूरे कर्मातीत बन जायेंगे। ड्रामा अनुसार माला भी बन जायेगी। कौनसी माला? सब आत्माओं की माला बन जायेगी, तब फिर वापिस जायेंगे। माला नम्बरवन तो तुम्हारी है। शिवबाबा की माला तो बड़ी लम्बी है। वहाँ से नम्बरवार आयेंगे पार्ट बजाने। तुम सब बाबा-बाबा कहते हो। सब एक माला के दाने हो। सबको विष्णु की माला का दाना नहीं कहेंगे। यह बाप बैठ पढ़ाते हैं। सूर्यवंशी बनना ही है। सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी जो पास्ट हो गये वह फिर बनेंगे। वह मर्तबा मिलता ही है पढ़ाई से। बाप की पढ़ाई बिगर यह मर्तबा मिल न सके। चित्र भी हैं, लेकिन कोई भी ऐसी एक्टिविटी नहीं करते हैं कि हम यह बन सकते हैं। कथा भी सत्यनारायण की सुनते हैं। गरुड़ पुराण में सब ऐसी बातें हैं जो मनुष्यों को सुनाते हैं। बाप कहते हैं यह विषय वैतरणी नदी रौरव नर्क है। ख़ास भारत को कहेंगे। बृहस्पति की दशा भी भारत पर बैठी है। वृक्षपति भी भारतवासियों को ही पढ़ाते हैं। बेहद का बाप बैठ बेहद की बातें समझाते हैं। दशा बैठती है। राहू की भी दशा है इसलिए कहते हैं दे दान तो छूटे ग्रहण। बाप भी कहते हैं इस कलियुग अन्त में राहू की दशा सब पर बैठी है। अब मैं वृक्षपति आया हूँ भारत पर बृहस्पति की दशा बिठाने। सतयुग में बृहस्पति की दशा भारत पर थी। अब है राहू की दशा। यह बेहद की बात है। यह कोई शास्त्रों आदि में नहीं है। यह मैगज़ीन आदि भी उन्हें समझ में आयेगी जो पहले कुछ न कुछ समझे हुए होंगे। मैगज़ीन पढ़ने से वह फिर जास्ती समझने के लिए भागेंगे। बाकी तो कुछ नहीं समझेंगे। जो थोड़ा पढ़कर फिर छोड़ देते हैं तो थोड़ा भी उनमें ज्ञान घृत डालने से फिर सुजाग हो पड़ते हैं। ज्ञान को घृत भी कहा जाता है। उझाये हुए दीपक में बाप आकर ज्ञान घृत डाल रहे हैं। कहते हैं - बच्चे, माया के त़ूफान आयेंगे, दीवे को बुझा देंगे। शमा पर परवाने कोई तो जल मरते हैं, कोई फेरी पहन चले जाते हैं। वही बात अभी प्रैक्टिकल में चल रही है। नम्बरवार सब परवाने हैं। पहले-पहले एकदम घरबार छोड़ आये, परवाने बनें। जैसे एकदम लॉटरी मिल गई। जो कुछ पास्ट हुआ तुम फिर ऐसे ही करेंगे। भले चले गये, ऐसे मत समझना स्वर्ग में नहीं आयेंगे, परवाने बने, आशिक हुए फिर माया ने हरा दिया, तो पद भी कम पायेंगे। नम्बरवार तो होते ही हैं। और सतसंगों में कोई की भी बुद्धि में नहीं होगा। तुम्हारी बुद्धि में है। बाप से नई दुनिया के लिए नम्बरवार हम सब अपने पुरूषार्थ अनुसार पढ़ रहे हैं। हम बेहद के बाप के सम्मुख बैठे हैं। यह भी जानते हो वह आत्मा देखने में नहीं आती। वह तो अव्यक्त चीज़ है। उनको दिव्य दृष्टि द्वारा ही देखा जाता है। हम आत्मा भी छोटी बिन्दी हैं। परन्तु देह-अभिमान छोड़ अपने को आत्मा समझना - यह है ऊंची पढ़ाई। उस पढ़ाई में भी जो सबजेक्ट डिफीकल्ट होती है, उसमें फेल होते हैं। यह सब्जेक्ट तो बहुत सहज है, परन्तु कइयों को डिफीकल्ट फील होती है।

अब तुम समझते हो शिवबाबा सामने बैठे हैं। तुम भी निराकार आत्मायें हो परन्तु शरीर के साथ हो। यह सब बातें बेहद का बाप ही सुनाते हैं, और कोई सुना न सके। फिर क्या करेंगे? उनको थैंक्स देंगे। नहीं। बाबा कहते हैं यह अनादि ड्रामा बना हुआ है। मैं कोई नई बात नहीं करता हूँ। ड्रामा अनुसार तुमको पढ़ाता हूँ। थैंक्स तो भक्ति मार्ग में देते हैं। टीचर कहेंगे स्टूडेन्ट अच्छी रीति पढ़ते हैं तो हमारा नाम बाला होगा। स्टूडेन्ट को थैंक्स दी जाती है। जो अच्छी रीति पढ़ते हैं, पढ़ाते हैं, उनको थैंक्स दी जाती है। स्टूडेन्ट फिर टीचर को थैंक्स देंगे। बाप कहते हैं - मीठे बच्चे, जीते रहो। ऐसी-ऐसी सर्विस करते रहो। कल्प पहले भी की थी। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1. सदा नशा और निश्चय रहे कि हमें पढ़ाने वाला कोई जिस्मानी टीचर नहीं। स्वयं ज्ञान सागर निराकार बाप टीचर बन हमें पढ़ा रहे हैं। इस पढ़ाई से ही हमें सतोप्रधान बनना है।
2. आत्मा रूपी दीपक में रोज़ ज्ञान का घृत डालना है। ज्ञान घृत से सदा ऐसा प्रज्जवलित रहना है जो माया का कोई भी त़ूफान हिला न सके। पूरा परवाना बन शमा पर फिदा होना है।
वरदान:-
मन-बुद्धि को झमेलों से किनारे कर मिलन मेला मनाने वाले झमेलामुक्त भव
कई बच्चे सोचते हैं यह झमेला पूरा होगा तो हमारी अवस्था वा सेवा अच्छी हो जायेगी लेकिन झमेले पहाड़ के समान हैं। पहाड़ नहीं हटेगा, लेकिन जहाँ झमेला हो वहाँ अपने मन-बुद्धि को किनारे कर लो या उड़ती कला से झमेले के पहाड़ के भी ऊपर चले जाओ तो पहाड़ भी आपको सहज अनुभव होगा। झमेलों की दुनिया में झमेले तो आयेंगे ही, आप मुक्त रहो तो मिलन मेला मना सकेंगे।
स्लोगन:-
इस बेहद नाटक में हीरो पार्ट बजाने वाले ही हीरो पार्टधारी हैं।

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