Sunday, 5 April 2020

Brahma Kumaris Murli 06 April 2020 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 06 April 2020


06/04/2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


"मीठे बच्चे - अपने ऊपर रहम करो, बाप जो मत देते हैं उस पर चलो तो अपार खुशी रहेगी, माया के श्राप से बचे रहेंगे"
प्रश्नः-
माया का श्राप क्यों लगता है? श्रापित आत्मा की गति क्या होगी?
उत्तर:-
1. बाप और पढ़ाई का (ज्ञान रत्नों का) निरादर करने से, अपनी मत पर चलने से माया का श्राप लग जाता है, 2. आसुरी चलन है, दैवीगुण धारण नहीं करते तो अपने पर बेरहमी करते हैं। बुद्धि को ताला लग जाता है। वह बाप की दिल पर चढ़ नहीं सकते।
Brahma Kumaris Murli 06 April 2020 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 06 April 2020 (HINDI) 
ओम् शान्ति
रूहानी बच्चों को यह तो अब निश्चय है कि हमको आत्म-अभिमानी बनना है और बाप को याद करना है। माया रूपी रावण जो है वह श्रापित, दु:खी बना देता है। श्राप अक्षर ही दु:ख का है, वर्सा अक्षर सुख का है। जो बच्चे व़फादार, फरमानबरदार हैं, वह अच्छी रीति जानते हैं। जो नाफरमानबरदार है, वह बच्चा है नहीं। भल अपने को कुछ भी समझें परन्तु बाप की दिल पर चढ़ नहीं सकते, वर्सा पा नहीं सकते। जो माया के कहने पर चलते और बाप को याद भी नहीं करते, किसको समझा नहीं सकते। गोया अपने को आपेही श्रापित करते हैं। बच्चे जानते हैं माया बड़ी जबरदस्त है। अगर बेहद के बाप की भी नहीं मानते हैं तो गोया माया की मानते हैं। माया के वश हो जाते हैं। कहावत है ना - प्रभू की आज्ञा सिर माथे। तो बाप कहते हैं बच्चे, पुरुषार्थ कर बाप को याद करो तो माया की गोद से निकल प्रभू की गोद में आ जायेंगे। बाप तो बुद्धिवानों का बुद्धिवान है। बाप की नहीं मानेंगे तो बुद्धि को ताला लग जायेगा। ताला खोलने वाला एक ही बाप है। श्रीमत पर नहीं चलते तो उनका क्या हाल होगा। माया की मत पर कुछ भी पद पा नहीं सकेंगे। भल सुनते हैं परन्तु धारणा नहीं कर सकते हैं, न करा सकते तो उसका क्या हाल होगा! बाप तो गरीब निवाज़ हैं। मनुष्य गरीबों को दान करते हैं तो बाप भी आकर कितना बेहद का दान करते हैं। अगर श्रीमत पर नहीं चलते तो एकदम बुद्धि को ताला लग जाता है। फिर क्या प्राप्ति करेंगे! श्रीमत पर चलने वाले ही बाप के बच्चे ठहरे। बाप तो रहमदिल है। समझते हैं बाहर जाते ही माया एकदम खत्म कर देगी। कोई आपघात करते हैं तो भी अपनी सत्यानाश करते हैं। बाप तो समझाते रहते हैं - अपने पर रहम करो, श्रीमत पर चलो, अपनी मत पर नहीं चलो। श्रीमत पर चलने से खुशी का पारा चढ़ेगा। लक्ष्मी-नारायण की शक्ल देखो कैसी खुशनुम: है। तो पुरुषार्थ कर ऐसा ऊंच पद पाना चाहिए ना। बाप अविनाशी ज्ञान रत्न देते हैं तो उनका निरादर क्यों करना चाहिए! रत्नों से झोली भरनी चाहिए। सुनते तो हैं परन्तु झोली नहीं भरते क्योंकि बाप को याद नहीं करते। आसुरी चलन चलते हैं। बाप बार-बार समझाते रहते हैं - अपने पर रहम करो, दैवीगुण धारण करो। वह है ही आसुरी सम्प्रदाय। उनको बाप आकर परिस्तानी बनाते हैं। परिस्तान स्वर्ग को कहा जाता है। मनुष्य कितना धक्का खाते रहते हैं। संन्यासियों आदि के पास जाते हैं, समझते हैं मन को शान्ति मिलेगी। वास्तव में यह अक्षर ही रांग है, इनका कोई अर्थ नहीं। शान्ति तो आत्मा को चाहिए ना। आत्मा स्वयं शान्त स्वरूप है। ऐसे भी नहीं कहते कि आत्मा को कैसे शान्ति मिले? कहते हैं मन को शान्ति कैसे मिले? अब मन क्या है, बुद्धि क्या है, आत्मा क्या है, कुछ भी जानते नहीं। जो कुछ कहते अथवा करते हैं वह सब है भक्ति मार्ग। भक्ति मार्ग वाले सीढ़ी नीचे उतरते-उतरते तमोप्रधान बनते जाते हैं। भल किसको बहुत धन, प्रापर्टी आदि है परन्तु हैं तो फिर भी रावण राज्य में ना।
तुम बच्चों को चित्रों पर समझाने की भी बहुत अच्छी प्रैक्टिस करनी है। बाप सब सेन्टर्स के बच्चों को समझाते रहते हैं, नम्बरवार तो हैं ना। कई बच्चे राजाई पद पाने का पुरुषार्थ नहीं करते तो प्रजा में क्या जाकर बनेंगे! सर्विस नहीं करते, अपने पर तरस नहीं आता है कि हम क्या बनेंगे फिर समझा जाता है ड्रामा में इनका पार्ट इतना है। अपना कल्याण करने के लिए ज्ञान के साथ-साथ योग भी हो। योग में नहीं रहते तो कुछ भी कल्याण नहीं होता। योग बिगर पावन बन नहीं सकते। ज्ञान तो बहुत सहज है परन्तु अपना कल्याण भी करना है। योग में न रहने से कुछ भी कल्याण होता नहीं। योग बिगर पावन कैसे बनेंगे? ज्ञान अलग चीज़ है, योग अलग चीज़ है। योग में बहुत कच्चे हैं। याद करने का अक्ल ही नहीं आता। तो याद बिगर विकर्म कैसे विनाश हों। फिर सजा बहुत खानी पड़ती है, बहुत पछताना पड़ता है। वह स्थूल कमाई नहीं करते तो कोई सजा नहीं खाते हैं, इसमें तो पापों का बोझा सिर पर है, उसकी बहुत सजा खानी पड़े। बच्चे बनकर और बेअदब होते हैं तो बहुत सजा मिल जाती है। बाप तो कहते हैं - अपने पर रहम करो, योग में रहो। नहीं तो मुफ्त अपना घात करते हैं। जैसे कोई ऊपर से गिरता है, मरा नहीं तो हॉस्पिटल में पड़ा रहेगा, चिल्लाता रहेगा। नाहेक अपने को धक्का दिया, मरा नहीं, बाकी क्या काम का रहा। यहाँ भी ऐसे है। चढ़ना है बहुत ऊंचा। श्रीमत पर नहीं चलते हैं तो गिर पड़ते हैं। आगे चल हर एक अपने पद को देख लेंगे कि हम क्या बनते हैं? जो सर्विसएबुल, आज्ञाकारी होंगे, वही ऊंच पद पायेंगे। नहीं तो दास-दासी आदि जाकर बनेंगे। फिर सजा भी बहुत कड़ी मिलेगी। उस समय दोनों जैसे धर्मराज का रूप बन जाते हैं। परन्तु बच्चे समझते नहीं हैं, भूलें करते रहते हैं। सजा तो यहाँ खानी पड़ेगी ना। जितना जो सर्विस करेंगे, शोभेंगे। नहीं तो कोई काम के नहीं रहेंगे। बाप कहते हैं दूसरों का कल्याण नहीं कर सकते हो तो अपना कल्याण तो करो। बांधेलियाँ भी अपना कल्याण करती रहती हैं। बाप फिर भी बच्चों को कहते हैं खबरदार रहो। नाम-रूप में फँसने से माया बहुत धोखा देती है। कहते हैं बाबा फलानी को देखने से हमको खराब संकल्प चलते हैं। बाप समझाते हैं - कर्मेन्द्रियों से कभी भी खराब काम नहीं करना है। कोई भी गंदा आदमी जिसकी चलन ठीक न हो तो सेन्टर पर उनको आने नहीं देना है। स्कूल में कोई बदचलन चलते हैं तो बहुत मार खाते हैं। टीचर सबके आगे बतलाते हैं, इसने ऐसे बदचलन की है, इसलिए इनको स्कूल से निकाला जाता है। तुम्हारे सेन्टर्स पर भी ऐसी गन्दी दृष्टि वाले आते हैं, तो उनको भगा देना चाहिए। बाप कहते हैं कभी कुदृष्टि नहीं रहनी चाहिए। सर्विस नही करते, बाप को याद नहीं करते तो जरूर कुछ न कुछ गन्दगी है। जो अच्छी सर्विस करते हैं, उनका नाम भी बाला होता है। थोड़ा भी संकल्प आये, कुदृष्टि जाये तो समझना चाहिए माया का वार होता है। एकदम छोड़ देना चाहिए। नहीं तो वृद्धि को पाए नुकसान कर देंगे। बाप को याद करेंगे तो बचते रहेंगे। बाबा सब बच्चों को सावधान करते हैं - खबरदार रहो, कहाँ अपने कुल का नाम बदनाम नहीं करो। कोई गन्धर्वी विवाह कर इकट्ठे रहते हैं तो कितना नाम बाला करते हैं, कोई फिर गन्दे बन पड़ते हैं। यहाँ तुम आये हो अपनी सद्गति करने, न कि बुरी गति करने। बुरे ते बुरा है काम, फिर क्रोध। आते हैं बाप से वर्सा लेने लिए परन्तु माया वार कर श्राप दे देती है तो एकदम गिर पड़ते हैं। गोया अपने को श्राप दे देते हैं। तो बाप समझाते हैं बड़ी सम्भाल रखनी है, कोई ऐसा आये तो उनको एकदम रवाना कर देना चाहिए। दिखाते भी हैं ना - अमृत पीने आये फिर बाहर जाकर असुर बन गन्द किया। वह फिर यह ज्ञान सुना न सकें। ताला बंद हो जाता है। बाप कहते हैं अपनी सर्विस पर ही तत्पर रहना चाहिए। बाप की याद में रहते-रहते पिछाड़ी को चले जाना है घर। गीत भी है ना - रात के राही थक मत जाना....... आत्मा को घर जाना है। आत्मा ही राही है। आत्मा को रोज़ समझाया जाता है अब तुम शान्तिधाम जाने के राही हो। तो अब बाप को, घर को और वर्से को याद करते रहो। अपने को देखना है माया कहाँ धोखा तो नहीं देती है? मैं अपने बाप को याद करता हूँ?
ऊंच ते ऊंच बाप की तरफ ही दृष्टि रहे - यह है बहुत ऊंच पुरुषार्थ। बाप कहते हैं - बच्चे, कुदृष्टि छोड़ दो। देह-अभिमान माना कुदृष्टि, देही-अभिमानी माना शुद्ध दृष्टि। तो बच्चों की दृष्टि बाप की तरफ रहनी चाहिए। वर्सा बहुत ऊंच है - विश्व की बादशाही, कम बात है! स्वप्न में भी किसको नहीं होगा कि पढ़ाई से, योग से विश्व की बादशाही मिल सकती है। पढ़कर ऊंच पद पायेंगे तो बाप भी खुश होगा, टीचर भी खुश होगा, सतगुरू भी खुश होगा। याद करते रहेंगे तो बाप भी पुचकार देते रहेंगे। बाप कहते हैं - बच्चे, यह खामियां निकाल दो। नहीं तो मुफ्त नाम बदनाम करेंगे। बाप तो विश्व का मालिक बनाते, सौभाग्य खोलते हैं। भारतवासी ही 100 प्रतिशत सौभाग्यशाली थे सो फिर 100 प्रतिशत दुर्भाग्यशाली बने हैं फिर तुमको सौभाग्यशाली बनाने के लिए पढ़ाया जाता है।
बाबा ने समझाया है धर्म के जो बड़े-बड़े हैं, वह भी तुम्हारे पास आयेंगे। योग सीखकर जायेंगे। म्युज़ियम में जो टूरिस्ट आते हैं, उनको भी तुम समझा सकते हो - अब स्वर्ग के गेट्स खुलने हैं। झाड़ पर समझाओ, देखो तुम फलाने समय पर आते हो। भारतवासियों का पार्ट फलाने समय पर है। तुम यह नॉलेज सुनते हो फिर अपने देश में जाकर बताओ कि बाप को याद करो तो तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे। योग के लिए तो वह चाहना रखते हैं। हठयोगी, संन्यासी तो उन्हों को योग सिखला न सकें। तुम्हारी मिशन भी बाहर जायेगी। समझाने की बड़ी युक्ति चाहिए। धर्म के जो बड़े-बड़े हैं उन्हों को आना तो है। तुमसे कोई एक भी अच्छी रीति यह नॉलेज ले जाये तो एक से कितने ढेर समझ जायेंगे। एक की बुद्धि में आ गया तो फिर अखबारों आदि में भी डालेंगे। यह भी ड्रामा में नूँध है। नहीं तो बाप को याद करना कैसे सीखे। बाप का परिचय तो सबको मिलना है। कोई न कोई निकलेंगे। म्युज़ियम में बहुत पुरानी चीजें देखने जाते हैं। यहाँ फिर तुम्हारी पुरानी नॉलेज सुनेंगे। ढेर आयेंगे। उनसे कोई अच्छी रीति समझेंगे। यहाँ से ही दृष्टि मिलेगी या तो मिशन बाहर जायेगी। तुम कहेंगे बाप को याद करो तो अपने धर्म में ऊंच पद पायेंगे। पुनर्जन्म लेते-लेते सब नीचे आ गये हैं। नीचे उतरना माना तमोप्रधान बनना। पोप आदि ऐसे कह न सके कि बाप को याद करो। बाप को जानते ही नहीं। तुम्हारे पास बहुत अच्छी नॉलेज है। चित्र भी सुन्दर बनते रहते हैं। सुन्दर चीज़ होगी तो म्युजियम और ही सुन्दर होगा। बहुत आयेंगे देखने के लिए। जितने बड़े चित्र होंगे उतना अच्छी रीति समझा सकेंगे। शौक रहना चाहिए हम ऐसे समझायें। सदा तुम्हारी बुद्धि में रहे कि हम ब्राह्मण बने हैं तो जितनी सर्विस करेंगे उतना बहुत मान होगा। यहाँ भी मान तो वहाँ भी मान होगा। तुम पूज्य बनेंगे। यह ईश्वरीय नॉलेज धारण करनी है। बाप तो कहते हैं सर्विस पर दौड़ते रहो। बाप कहाँ भी सर्विस पर भेजे, इसमें कल्याण है। सारा दिन बुद्धि में सर्विस के ख्याल चलने चाहिए। फॉरेनर्स को भी बाप का परिचय देना है। मोस्ट बिलवेड बाप को याद करो, कोई भी देहधारी को गुरू नहीं बनाओ। सबका सद्गति दाता वह एक बाप है। अभी होलसेल मौत सामने खड़ा है, होलसेल और रीटेल व्यापार होता है ना। बाप है होलसेल, वर्सा भी होलसेल देते हैं। 21 जन्म के लिए विश्व की राजाई लो। मुख्य चित्र हैं ही त्रिमूर्ति, गोला, झाड़, सीढ़ी, विराट रूप का चित्र और गीता का भगवान कौन?..... यह चित्र तो फर्स्ट क्लास है, इसमें बाप की महिमा पूरी है। बाप ने ही कृष्ण को ऐसा बनाया है, यह वर्सा गॉड फादर ने दिया। कलियुग में इतने ढेर मनुष्य हैं, सतयुग में थोड़े हैं। यह फेरघेर (अदली-बदली) किसने की? ज़रा भी कोई नहीं जानते हैं। तो टूरिस्ट बहुत करके बड़े-बड़े शहरों में जाते हैं। वह भी आकर बाप का परिचय पायेंगे। प्वाइंट्स तो सर्विस की बहुत मिलती रहती हैं। विलायत में भी जाना है। एक तरफ तुम बाप का परिचय देते रहेंगे, दूसरे तरफ मारामारी चलती रहेगी। सतयुग में थोड़े मनुष्य होंगे तो जरूर बाकी का विनाश होगा ना। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती है। जो हो गया वो फिर रिपीट होगा। परन्तु किसको समझाने का भी अक्ल चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सदा एक बाप की तरफ ही दृष्टि रखनी है। देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ कर माया के धोखे से बचना है। कभी कुदृष्टि रख अपने कुल का नाम बदनाम नहीं करना है।
2) सर्विस के लिए भाग दौड़ करते रहना है। सर्विसएबुल और आज्ञाकारी बनना है। अपना और दूसरों का कल्याण करना है। कोई भी बदचलन नहीं चलनी है।
वरदान:-
एकता और सन्तुष्टता के सर्टीफिकेट द्वारा सेवाओं में सदा सफलतामूर्त भव
सेवाओं में सफलतामूर्त बनने के लिए दो बातें ध्यान में रखनी है एक - संस्कारों को मिलाने की युनिटी और दूसरा स्वयं भी सदा सन्तुष्ट रहो तथा दूसरों को भी सन्तुष्ट करो। सदा एक दो में स्नेह की भावना से, श्रेष्ठता की भावना से सम्पर्क में आओ तो यह दोनों सर्टीफिकेट मिल जायेंगे। फिर आपकी प्रैक्टिकल जीवन बाप के सूरत का दर्पण बन जायेगी और उस दर्पण में बाप जो है जैसा है वैसा दिखाई देगा।
स्लोगन:-
आत्म स्थिति में स्थित होकर अनेक आत्माओं को जीयदान दो तो दुआयें मिलेंगी।


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