Saturday, 8 June 2019

Brahma Kumaris Murli 09 June 2019 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 09 June 2019

09/06/2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 10/12/84 मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


पुराने खाते की समाप्ति की निशानी
आज बापदादा साकार तन का आधार ले साकार दुनिया में, साकार रूपधारी बच्चों से मिलने के लिए आये हैं। वर्तमान समय की हलचल की दुनिया अर्थात् दु:ख के वातावरण वाली दुनिया में बापदादा अपने अचल अडोल बच्चों को देख रहे हैं। हलचल में रहते न्यारे और बाप के प्यारे कमल पुष्पों को देख रहे हैं। भय के वातावरण में रहते निर्भय, शक्ति स्वरूप बच्चों को देख रहे हैं। इस विश्व के परिवर्तक बेफिकर बादशाहों को देख रहे हैं। ऐसे बेफिकर बादशाह हो जो चारों ओर के फिकरात के वायुमण्डल का प्रभाव अंश मात्र भी नहीं पड़ सकता है। वर्तमान समय विश्व में मैजारिटी आत्माओं में भय और चिन्ता यह दोनों ही विशेष सभी में प्रवेश हैं। 
Brahma Kumaris Murli 09 June 2019 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 09 June 2019 (HINDI)
लेकिन जितने ही वह फिकर में हैं, चिंता में हैं उतने ही आप शुभ चिन्तक हो। चिन्ता बदल शुभ चिन्तक के भावना स्वरूप बन गये हो। भयभीत के बजाए सुख के गीत गा रहे हो। इतना परिवर्तन अनुभव करते हो ना! सदा शुभ चिन्तक बन शुभ भावना, शुभ कामना की मानसिक सेवा से भी सभी को सुख-शान्ति की अंचली देने वाले हो ना! अकाले मृत्यु वाली आत्माओं को, अकाल मूर्त बन शान्ति और शक्ति का सहयोग देने वाले हो ना क्योंकि वर्तमान समय सीजन ही अकाले मृत्यु की है। जैसे वायु का, समुद्र का तूफान अचानक लगता है, ऐसे यह अकाले मृत्यु का भी तूफान अचानक और तेजी से एक साथ अनेकों को ले जाता है। यह अकाले मृत्यु का तूफान अभी तो शुरू हुआ है। विशेष भारत में सिविल वार और प्राकृतिक आपदायें ये ही हर कल्प परिवर्तन के निमित्त बनते हैं। विदेश की रूप-रेखा अलग प्रकार की है। लेकिन भारत में यही दोनों बातें विशेष निमित्त बनती हैं। और दोनों की रिहर्सल देख रहे हो। दोनों ही साथ-साथ अपना पार्ट बजा रहे हैं।

बच्चों ने पूछा कि एक ही समय इकट्ठा मृत्यु कैसे और क्यों होता? इसका कारण क्या है? यह तो जानते हो और अनुभव करते हो कि अब सम्पन्न होने का समय समीप आ रहा है। सभी आत्माओं का, द्वापरयुग वा कलियुग से किए हुए विकर्मों वा पापों का खाता जो भी रहा हुआ है वह अभी पूरा ही समाप्त होना है क्योंकि सभी को अब वापस घर जाना है। द्वापर से किये हुए कर्म वा विकर्म दोनों का फल अगर एक जन्म में समाप्त नहीं होता तो दूसरे जन्मों में भी चुक्तू का वा प्राप्ति का हिसाब चलता आता है। लेकिन अभी लास्ट समय है और पापों का हिसाब ज्यादा है इसलिए अब जल्दी-जल्दी जन्म और जल्दी-जल्दी मृत्यु - इस सजा द्वारा अनेक आत्माओं का पुराना खाता खत्म हो रहा है। तो वर्तमान समय मृत्यु भी दर्दनाक और जन्म भी मैजारिटी का बहुत दु:ख से हो रहा है। न सहज मृत्यु, न सहज जन्म है। तो दर्दनाक मृत्यु और दु:खमय जन्म यह जल्दी हिसाब-किताब चुक्तू करने का साधन है। जैसे इस पुरानी दुनिया में चीटियाँ, चीटें, मच्छर आदि को मारने के लिए साधन अपनाये हुए हैं। उन साधनों द्वारा एक ही साथ चीटियाँ वा मच्छर वा अनेक प्रकार के कीटाणु इकट्ठे हो विनाश हो जाते हैं ना। ऐसे आज के समय मानव भी मच्छरों, चीटियों सदृश्य अकाले मृत्यु के वश हो रहे हैं। मानव और चींटियों में अन्तर ही नहीं रहा है। यह सब हिसाब-किताब और सदा के लिए समाप्त होने के कारण इकट्ठा अकाले मृत्यु का तूफान समय प्रति समय आ रहा है।

वैसे धर्मराज पुरी में भी सजाओं का पार्ट अन्त में नूंधा हुआ है। लेकिन वह सजायें सिर्फ आत्मा अपने आप भोगती और हिसाब किताब चुक्तू करती है। लेकिन कर्मों के हिसाब अनेक प्रकार में भी विशेष तीन प्रकार के हैं - एक हैं आत्मा को अपने आप भोगने वाले हिसाब, जैसे बीमारियाँ। अपने आप ही आत्मा तन के रोग द्वारा हिसाब चुक्तू करती है। ऐसे और भी दिमाग कमजोर होना वा किसी भी प्रकार की भूत प्रवेशता। ऐसे ऐसे प्रकार की सजाओं द्वारा आत्मा स्वयं हिसाब-किताब भोगती है। दूसरा हिसाब है सम्बन्ध सम्पर्क द्वारा दु:ख की प्राप्ति। यह तो समझ सकते हो ना कि कैसे है! और तीसरा है प्राकृतिक आपदाओं द्वारा हिसाब-किताब चुक्तू होना। तीनों प्रकार के आधार से हिसाब-किताब चुक्तू हो रहे हैं। तो धर्मराजपुरी में सम्बन्ध और सम्पर्क द्वारा वा प्राकृतिक आपदाओं द्वारा हिसाब-किताब चुक्तू नहीं होगा। वह यहाँ साकार सृष्टि में होगा। सारे पुराने खाते सभी के खत्म होने ही हैं इसलिए यह हिसाब-किताब चुक्तू की मशीनरी अब तीव्रगति से चलनी ही है। विश्व में यह सब होना ही है। समझा। यह है कर्मों की गति का हिसाब-किताब। अब अपने आप को चेक करो - कि मुझ ब्राह्मण आत्मा का तीव्रगति के तीव्र पुरुषार्थ द्वारा सब पुराने हिसाब-किताब चुक्तू हुए हैं वा अभी भी कुछ बोझ रहा हुआ है? पुराना खाता अभी कुछ रहा हुआ है वा समाप्त हो गया है, इसकी विशेष निशानी जानते हो? श्रेष्ठ परिवर्तन में वा श्रेष्ठ कर्म करने में कोई भी अपना स्वभाव-संस्कार विघ्न डालता है वा जितना चाहते हैं, जितना सोचते हैं उतना नहीं कर पाते हैं, और यही बोल निकलते वा संकल्प मन में चलते कि न चाहते भी पता नहीं क्यों हो जाता है। पता नहीं क्या हो जाता है वा स्वयं की चाहना श्रेष्ठ होते, हिम्मत हुल्लास होते भी परवश अनुभव करते हैं, कहते हैं ऐसा करना तो नहीं था, सोचा नहीं था लेकिन हो गया। इसको कहा जाता है स्वयं के पुराने स्वभाव संस्कार के परवश वा किसी संगदोष के परवश वा किसी वायुमण्डल वायब्रेशन के परवश। यह तीनों प्रकार के परवश स्थितियाँ होती हैं तो न चाहते हुए होना, सोचते हुए न होना वा परवश बन सफलता को प्राप्त न करना - यह निशानी है पिछले पुराने खाते के बोझ की। इन निशानियों द्वारा अपने आपको चेक करो - किसी भी प्रकार का बोझ उड़ती कला के अनुभव से नीचे तो नहीं ले आता। हिसाब चुक्तू अर्थात् हर प्राप्ति के अनुभवों में उड़ती कला। कब कब प्राप्ति है, कब है तो अब रहा हुआ है। तो इसी विधि से अपने आपको चेक करो। दु:खमय दुनिया में तो दु:ख की घटनाओं के पहाड़ फटने ही हैं। ऐसे समय पर सेफ्टी का साधन है ही "बाप की छत्रछाया''। छत्रछाया तो है ही ना। अच्छा !

मिलन मेला मनाने सब आये हैं। यही मिलन मेला कितनी भी दर्दनाक सीन हो लेकिन मेला है तो यह खेल लगेगा। भयभीत नहीं होंगे। मिलन के गीत गाते रहेंगे। खुशी में नाचेंगे। औरों को भी साहस का सहयोग देंगे। स्थूल नाचना नहीं, यह खुशी का नाचना है। मेला सदा मनाते रहते हो ना! रहते ही मिलन मेले में हो। फिर भी मधुबन के मेले में आये हो, बापदादा भी ऐसे मेला मनाने वाले बच्चों को देख हर्षित होते हैं। मधुबन के श्रृंगार मधुबन में पहुँच गये हैं। अच्छा !

ऐसे सदा स्वयं के सर्व हिसाब किताब चुक्तू कर औरों के भी हिसाब किताब चुक्तू कराने की शक्ति स्वरूप आत्माओं को, सदा दु:ख दर्दनाक वायुमण्डल में रहते हुए न्यारे और बाप के प्यारे रहने वाले रूहानी कमल पुष्पों को, सर्व आत्माओं प्रति शुभ चिन्तक रहने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

टीचर्स बहनों से :- सेवाधारी हैं, टीचर्स नहीं। सेवा में त्याग, तपस्या समाई हुई है। सेवाधारी बनना माना खान के अधिकारी बनना। सेवा ऐसी चीज़ है जिससे हर सेकण्ड में भरपूर ही भरपूर। इतने भरपूर हो जाते जो आधाकल्प खाते ही रहेंगे। मेहनत की जरूरत नहीं - ऐसे सेवाधारी। वह भी रूहानी सेवाधारी रूह की स्थिति में स्थित हो रूह की सेवा करने वाले, इसको कहते हैं रूहानी सेवाधारी। ऐसे रूहानी सेवाधारियों को बापदादा सदा रूहानी गुलाब का टाइटल देते हैं। तो सभी रूहानी गुलाब हो जो कभी भी मुरझाने वाले नहीं। सदा अपनी रूहानियत की खुशबू से सभी को रिफ्रेश करने वाले।

2. सेवाधारी बनना भी बहुत श्रेष्ठ भाग्य है। सेवाधारी अर्थात् बाप समान। जैसे बाप सेवाधारी है वैसे आप भी निमित्त सेवाधारी हैं। बाप बेहद का शिक्षक है आप भी निमित्त शिक्षक हो। तो बाप समान बनने का भाग्य प्राप्त है। सदा इसी श्रेष्ठ भाग्य द्वारा औरों को भी अविनाशी भाग्य का वरदान दिलाते रहो। सारे विश्व में ऐसा श्रेष्ठ भाग्य बहुत थोड़ी आत्माओं का है। इस विशेष भाग्य को स्मृति में रखते समर्थ बन समर्थ बनाते रहो। उड़ाते रहो। सदा स्व को आगे बढ़ाते औरों को भी आगे बढ़ाओ। अच्छा !

चुने हुए अव्यक्त महावाक्य - मायाजीत के साथ प्रकृतिजीत बनो

आप बच्चे मायाजीत तो बन ही रहे हो लेकिन प्रकृतिजीत भी बनो क्योंकि अभी प्रकृति की हलचल बहुत होनी है। कभी समुद्र का जल अपना प्रभाव दिखायेगा तो कभी धरनी अपना प्रभाव दिखायेगी। अगर प्रकृतिजीत होंगे तो प्रकृति की कोई भी हलचल आपको हिला नहीं सकेगी। सदा साक्षी होकर सब खेल देखते रहेंगे। जितना आप अपने फरिश्ते स्वरूप में अर्थात ऊंची स्टेज पर होंगे, उतना हलचल से स्वत: परे रहेंगे। प्रकृतिजीत बनने के पहले कर्मेन्द्रिय जीत बनो तब फिर प्रकृतिजीत सो कर्मातीत स्थिति के आसनधारी सो विश्व राज्य अधिकारी बन सकेंगे। तो अपने से पूछो - हर कर्मेन्द्रिय "जी हजूर'' "जी हाज़िर'' करती हुई चलती है? आपके मंत्री, उपमंत्री कहाँ धोखा तो नहीं देते हैं?

आप बच्चों के पास पवित्रता की बहुत महान शक्ति है जो अपनी पवित्र मंसा अर्थात् शुद्ध वृत्ति द्वारा प्रकृति को भी परिवर्तन कर सकते हो। मन्सा पवित्रता की शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है - प्रकृति का भी परिवर्तन। तो स्व परिवर्तन से प्रकृति और व्यक्ति का परिवर्तन कर सकते हो। तमोगुणी मनुष्य आत्माओं और तमोगुणी प्रकृति के वायुमण्डल, वायब्रेशन से बचने का सहज साधन यह ईश्वरीय मर्यादायें हैं। मर्यादाओं के अन्दर रहो तो मेहनत से बचे रहेंगे। मेहनत तब करनी पड़ती है जब मर्यादाओं की लकीर से संकल्प, बोल वा कर्म से बाहर निकल आते हैं।

आप सदा अपने पूर्वजपन की पोजीशन पर रहकर संकल्प द्वारा आर्डर करो कि पांच विकार तुम आधा-कल्प के लिए विदाई ले जाओ, प्रकृति सतोप्रधान सुखदाई बन सबको सुख पहुंचाओ। तो वह आपके आर्डर प्रमाण कार्य करेंगे। फिर यह प्रकृति धोखा दे नहीं सकती। परन्तु पहले स्वयं के अधिकारी बनो, स्वभाव-संस्कार के भी अधीन नहीं, जब अधिकारी होंगे तब सब आर्डर प्रमाण कार्य करेंगे। जैसे साइन्स की शक्ति से प्रकृति अर्थात् तत्वों को आज भी अपने कन्ट्रोल में रख रहे हैं, तो क्या आप ईश्वरीय सन्तान मास्टर रचता, मास्टर सर्वशक्तिमान के आगे यह प्रकृति और परिस्थिति दासी नहीं बन सकती! जब साइन्स की अणु शक्ति महान कर्तव्य कर सकती है तो आत्मिक शक्ति, परमात्म-शक्ति क्या नहीं कर सकती है, सहज ही प्रकृति और परिस्थिति का रुप और गुण परिवर्तन कर सकती है। सर्व विघ्नों से, सर्व प्रकार की परिस्थितियों से या तमोगुणी प्रकृति की आपदाओं से सेकण्ड़ में विजयी बनने के लिए सिर्फ एक बात निश्चय और नशे में रहे - कि "वाह रे मैं'', मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा हूँ, इस स्मृति में रहो तो समर्थी स्वरूप बन जायेंगे।

जब भी प्रकृति द्वारा कोई पेपर आता है तो यह क्यों, यह क्या ...इस हलचल में नहीं आओ। हलचल में आना अर्थात् फेल होना। कुछ भी हो, लेकिन अन्दर से सदा यह आवाज़ निकले वाह मीठा ड्रामा। 'हाय क्या हुआ' यह संकल्प में भी न आये, ड्रामा के ज्ञान से स्वयं को ऐसा मज़बूत बनाओ। मायाजीत व प्रकृति जीत बनने के लिए समेटने की शक्ति को धारण करो, इसके लिए देखते हुए न देखो, सुनते हुए न सुनो। अभ्यास करो - अभी-अभी साकारी, अभी-अभी आकारी और अभी-अभी निराकारी, प्रकृति की हलचल देख प्रकृतिपति बन, अपने फुल स्टाप की स्टेज से प्रकृति की हलचल को स्टाप करो। तमोगुणी से सतोगुणी स्टेज में परिवर्तन करो - यह अभ्यास बढ़ाओ।

संगम पर ही प्रकृति सहयोगी बनने का अपना पार्ट आरम्भ कर देगी। सब तरफ से प्रकृतिपति का और मास्टर प्रकृतिपति का आजयान करेगी। सब तरफ से आफरीन और आफर होगी इसलिए प्रकृति के हर तत्व को देवता के रूप में दिखाया है। देवता अर्थात् देने वाला। तो अन्त में यह सब प्रकृति के तत्व आप सबको सहयोग देने वाले दाता बन जायेंगे। चारों ओर कितनी भी किसी तत्व द्वारा हलचल हो लेकिन जहाँ आप प्रकृति के मालिक होंगे वहाँ प्रकृति दासी बन सेवा करेगी। सिर्फ आप प्रकतिजीत बन जाओ। फिर यह प्रकृति अपने मालिकों को सहयोग की माला पहनायेगी। जहाँ आप प्रकृतिजीत ब्राह्मणों का पाँव होगा, स्थान होगा वहाँ कोई भी नुकसान हो नहीं सकता। फिर सब आपके तरफ स्थूल-सूक्ष्म सहारा लेने के लिए भागेंगे। आपका स्थान एसलम बन जायेगा। और सबके मुख से,"अहो प्रभू, आपकी लीला अपरमपार है'' यह बोल निकलेंगे। "धन्य हो, धन्य हो, आप लोगों ने पाया, हमने नहीं जाना, गंवाया।'' यह आवाज़ चारों ओर से आयेगा। अच्छा - ओम् शान्ति।
वरदान:-
एक बाप को अपना संसार बनाकर सदा एक की आकर्षण में रहने वाले कर्मबन्धन मुक्त भव
सदा इसी अनुभव में रहो कि एक बाप दूसरा न कोई। बस एक बाबा ही संसार है और कोई आकर्षण नहीं, कोई कर्मबंधन नहीं। अपने किसी कमजोर संस्कार का भी बंधन न हो। जो किसी पर मेरे पन का अधिकार रखते हैं उन्हें क्रोध या अभिमान आता है - यह भी कर्मबन्धन है। लेकिन जब बाबा ही मेरा संसार है, यह स्मृति रहती है तो सब मेरा-मेरा एक मेरे बाबा में समा जाता है और कर्मबन्धनों से सहज ही मुक्त हो जाते हैं।
स्लोगन:-
महान आत्मा वह है जिसकी दृष्टि और वृत्ति बेहद की है।

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