Saturday, 1 June 2019

Brahma Kumaris Murli 02 June 2019 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 02 June 2019

02/06/2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 24/12/84 मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


ईश्वरीय स्नेह का महत्व
आज स्नेह के सागर अपने स्नेही चात्रक बच्चों से मिलने आये हैं। अनेक जन्मों से इस सच्चे अविनाशी ईश्वरीय स्नेह के प्यासे रहे। जन्म-जन्म की प्यासी चात्रक आत्माओं को अब सच्चे स्नेह, अविनाशी स्नेह का अनुभव हो रहा है। भक्त आत्मा होने के कारण आप सभी बच्चे स्नेह के भिखारी बन गये। अब बाप भिखारी से स्नेह के सागर के वर्से के अधिकारी बना रहे हैं। अनुभव के आधार से सबकी दिल से अब यह आवाज स्वत: ही निकलता है कि ईश्वरीय स्नेह हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। तो भिखारी से अधिकारी बन गये। विश्व में हर एक आत्मा को जीवन में आवश्यक चीज स्नेह ही है। जीवन में स्नेह नहीं तो जीवन नीरस अनुभव करते हैं। स्नेह इतनी ऊंची वस्तु है जो आज के साधारण लोग स्नेह को ही भगवान मानते हैं। प्यार ही परमात्मा है वा परमात्मा ही प्यार है। तो स्नेह इतना ऊंचा है जितना भगवान को ऊंचा मानते हैं इसलिए भगवान को स्नेह वा प्यार कहते हैं। यह क्यों कहा जाता, अनुभव नहीं है। 
Brahma Kumaris Murli 02 June 2019 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 02 June 2019 (HINDI) 
फिर भी परमात्म बाप जब इस सृष्टि पर आये हैं तो सभी बच्चों को प्रैक्टिकल जीवन में साकार स्वरूप से स्नेह दिया है, दे रहे हैं। तब अनुभव नहीं होते हुए भी यही समझते हैं कि स्नेह ही परमात्मा है। तो परमात्म बाप की पहली देन स्नेह है। स्नेह ने आप सबको ब्राह्मण जन्म दिया है। स्नेह की पालना ने आप सबको ईश्वरीय सेवा के योग्य बनाया है। स्नेह ने सहज योगी, कर्मयोगी, स्वत: योगी बनाया है। स्नेह ने हद के त्याग को भाग्य अनुभव कराया है। त्याग नहीं भाग्य है। यह अनुभव सच्चे स्नेह ने कराया ना। इसी स्नेह के आधार पर किसी भी प्रकार के तूफान ईश्वरीय तोफा अनुभव करते। स्नेह के आधार पर मुश्किल को अति सहज अनुभव करते हैं। इसी ईश्वरीय स्नेह ने अनेक सम्बन्धों में लगी हुई दिल को, अनेक टुकड़े हुई दिल को एक से जोड़ लिया है। अब एक दिल एक दिलराम है। दिल के टुकड़े नहीं हैं। स्नेह ने बाप समान बना दिया। स्नेह ने ही सदा साथ के अनुभव कारण सदा समर्थ बना दिया। स्नेह ने युग परिवर्तन कर लिया। कलियुगी से संगमयुगी बना दिया। स्नेह ने ही दुख दर्द की दुनिया से सुख के खुशी की दुनिया में परिवर्तन कर लिया। इतना महत्व है इस ईश्वरीय स्नेह का। जो महत्व को जानते हैं वही महान बन जाते हैं। ऐसे महान बने हो ना। सभी से सहज पुरुषार्थ भी यही है। स्नेह में सदा समाये रहो। लवलीन आत्मा को कभी स्वप्न मात्र भी माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता है क्योंकि लवलीन अवस्था माया प्रूफ अवस्था है। तो स्नेह में रहना सहज है ना। स्नेह ने सभी को मधुबन निवासी बनाया है। स्नेह के कारण पहुँचे हो ना। बापदादा भी सभी बच्चों को यही वरदान देते "सदा स्नेही भव''। स्नेह ऐसा जादू है जिससे जो मांगेंगे वह प्राप्त कर सकेंगे। सच्चे स्नेह से, दिल के स्नेह से, स्वार्थी स्नेह से नहीं। समय पर स्नेही बनने वाले नहीं। जब कोई आवश्यकता का समय आवे उस समय मीठा बाबा, प्यारा बाबा कहकर निभाने वाले नहीं। सदा ही इस स्नेह में समाये हुए हो। ऐसे के लिए बापदादा सदा छत्रछाया है। समय पर याद करने वाले वा मतलब से याद करने वाले, ऐसे को भी यथाशक्ति, यथा स्नेह रिटर्न में सहयोग मिलता है। लेकिन यथा शक्ति सम्पन्न सम्पूर्ण सफलता नहीं मिलती। तो सदा स्नेह द्वारा सर्व प्राप्ति स्वरूप अनुभव करने के लिए सच्ची दिल के स्नेही बनो। समझा।

बापदादा सभी मधुबन घर के श्रृंगार बच्चों को विशेष स्नेह की बधाई दे रहे हैं। हर एक बच्चा बाप के घर का विशेष श्रृंगार है। इस मधुबन बेहद घर के बच्चे ही रौनक हैं। ऐसे अपने को समझते हो ना। दुनिया वाले क्रिसिमस मनाने के लिए कहाँ-कहाँ जाते हैं। और यह विशेष विदेशी वा भारत के बच्चे स्वीट होम में पहुँचे हैं। बड़ा दिन, बड़े ते बड़े बाप से बड़ी दिल से मनाने के लिए।

यह बड़ा दिन विशेष बाप और दादा दोनों के यादगार निशानी का दिन है। एक दाता रूप से शिवबाबा की निशानी और बुढ़ा स्वरूप ब्रह्मा बाप की निशानी। कभी भी युवा रूप नहीं दिखायेंगे। क्रिसिमस फादर बूढ़ा ही दिखाते हैं। और दो रंग भी जरूर दिखायेंगे। सफेद और लाल। तो बाप और दादा दोनों की यह निशानी है। बापदादा छोटे बच्चों को जो उन्हों की इच्छा है, उससे भरपूर कर देता है। छोटे-छोटे बच्चे बड़े स्नेह से इस विशेष दिन पर अपनी दिल पसन्द चीजें क्रिसिमस फादर से मांगते हैं वा संकल्प रखते हैं। और निश्चय रखते हैं कि वह जरूर पूर्ण करेगा। तो यह यादगार भी आप बच्चों का है। चाहे पुराने शूद्र जीवन के कितने भी बुजुर्ग हो लेकिन ब्राह्मण जीवन में छोटे बच्चे ही हैं। तो सभी छोटे बच्चे जो भी श्रेष्ठ कामना करते वह पूर्ण होती हैं ना इसलिए यह याद निशानी लास्ट धर्म वालों में भी चली आ रही है। आप सभी को इस संगमयुग के बड़े दिन की बहुत-बहुत सौगातें बापदादा द्वारा मिल गई हैं ना। विशेष यह बड़ा दिन सौगातों का दिन है। तो बापदादा सबसे बड़ी सौगात स्वराज्य और स्वर्ग का राज्य देता है। जिसमें अप्राप्त कोई वस्तु रह नहीं जाती। सर्व प्राप्ति स्वरूप बन जाते हो। तो बड़ा दिन मनाने वाले बड़ी दिल वाले हैं। विश्व को देने वाले तो बड़ी दिल वाले हुए ना। तो सभी को संगमयुगी बड़े दिन की बड़ी दिल से बड़े ते बड़े बापदादा बधाई दे रहे हैं। वो लोग 12 बजे के बाद मनायेंगे, आप सबसे नम्बर आगे हो ना। तो पहले आप मना रहे हो। पीछे दुनिया वाले मनायेंगे। विशेष रूप में डबल विदेशी आज बहुत उमंग उत्साह से याद सौगात बाप प्रति स्थूल सूक्ष्म रूप में दे रहे हैं। बापदादा भी सभी डबल विदेशी बच्चों को स्नेह के सौगात के रिटर्न में पदमगुणा, सदा स्नेही साथी रहेंगे, सदा स्नेह के सागर में समाये हुए लवलीन स्थिति का अनुभव करेंगे, ऐसे वरदान भरी याद और अमर प्यार की रिटर्न में सौगात दे रहे हैं। सदा गाते और खुशी में नाचते रहेंगे। सदा मुख मीठा रहेगा। ऐसे ही स्नेही भारत के बच्चों को भी विशेष सहज योगी, स्वत: योगी के वरदान की यादप्यार दे रहे हैं।

सभी बच्चों को दाता और विधाता बापदादा अविनाशी स्नेह सम्पन्न सदा समर्थ स्वरूप से सहज अनुभव करने की यादप्यार दे रहे हैं सभी को यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों से - 1. सदा अपने को इस पुरानी दुनिया की आकर्षण से न्यारे और बाप के प्यारे, ऐसे अनुभव करते हो? जितना न्यारे होंगे उतना स्वत: ही प्यारे होंगे। न्यारे नहीं तो प्यारे नहीं। तो न्यारे हैं और प्यारे हैं या कहाँ न कहाँ लगाव है? जब किसी से लगाव नहीं तो बुद्धि एक बाप तरफ स्वत: जायेगी। दूसरी जगह जा नहीं सकती। सहज और निरन्तर योगी की स्थिति अनुभव होगी। अभी नहीं सहजयोगी बनेंगे तो कब बनेंगे? इतनी सहज प्राप्ति है, सतयुग में भी अभी की प्राप्ति का फल है। तो अभी सहजयोगी और सदा के राज्य भाग्य के अधिकारी सहजयोगी बच्चे सदा बाप के समान समीप हैं। तो अपने को बाप के समीप साथ रहने वाले अनुभव करते हो? जो साथ हैं उनको सहारा सदा है। साथ नहीं रहते तो सहारा भी नहीं मिलता। जब बाप का सहारा मिल गया तो कोई भी विघ्न आ नहीं सकता। जहाँ सर्व शक्तिवान बाप का सहारा है तो माया स्वयं ही किनारा कर लेती है। ताकत वाले के आगे निर्बल क्या करेगा? किनारा करेगा ना। ऐसे माया भी किनारा कर लेगी, सामना नहीं करेगी। तो सभी मायाजीत हो? भिन्न-भिन्न प्रकार से, नये-नये रूप से माया आती है लेकिन नॉलेजफुल आत्मायें माया से घबराती नहीं। वह माया के सभी रूप को जान लेती हैं और जानने के बाद किनारा कर लेती। जब मायाजीत बन गये तो कभी कोई हिला नहीं सकता। कितनी भी कोई कोशिश करे लेकिन आप न हिलो।

अमृतवेले से रात तक बाप और सेवा इसके सिवाए और कोई लगन न रहे। बाप मिला और सेवाधारी बने क्योंकि जो मिला है उसको जितना बाँटेंगे उतना बढ़ेगा। एक दो और पदम पाओ। यही याद रखो - कि हम सर्व भण्डारों के मालिक हैं, भरपूर भण्डारे हैं। जिसको दुनिया ढूंढ रही है उसके बच्चे बने हैं। दु:ख की दुनिया से किनारा कर लिया। सुख के संसार में पहुँच गये। तो सदा सुख के सागर में लहराते, सबको सुख के खजाने से भरपूर करो। अच्छा !

चुने हुए अव्यक्त महावाक्य

ब्राह्मण जीवन में सभ्यता रूपी क्लचर को अपनाओ।

ब्राह्मण परिवार में फर्स्ट नम्बर का क्लचर है - "सभ्यता''। तो हर एक के चेहरे और चलन में यह ब्राह्मण क्लचर प्रत्यक्ष हो। हर ब्राह्मण मुस्कराता हुआ हर एक से सम्पर्क में आये। कोई कैसा भी हो आप अपना यह क्लचर कभी नहीं छोड़ो। अब अपने जीवन में नये सभ्यता के संस्कार दिखाओ। कम बोलो, धीरे बोलो और मीठा बोलो। यदि न चाहते हुए भी कभी क्रोध या चिड़चिड़ापन आ जाए तो दिल से कहो "मीठा बाबा'', तो एकस्ट्रा मदद मिल जायेगी। अन्दर से शुभ भाव और प्रेम भाव इमर्ज करो तो क्रोध महाशत्रु पर विजय प्राप्त कर लेंगे।

कई बच्चे आजकल एक विशेष भाषा यूज़ करते हैं कि हमसे असत्य देखा नहीं जाता, असत्य सुना नहीं जाता, इसलिए असत्य को देख झूठ को सुन करके अन्दर में जोश आ जाता है। लेकिन यदि वह असत्य है और आपको असत्य देखकर जोश आता है तो वह जोश भी असत्य है ना! असत्यता को खत्म करने के लिए स्वयं में सत्यता की शक्ति धारण करो। सत्यता की निशानी है सभ्यता। अगर आप सच्चे हो, सत्यता की शक्ति आपमें है तो सभ्यता को कभी नहीं छोड़ो, सत्यता को सिद्ध करो लेकिन सभ्यतापूर्वक। अगर सभ्यता को छोड़कर असभ्यता में आकरके सत्य को सिद्ध करना चाहते हो तो वह सत्य सिद्ध नहीं होगा। असभ्यता की निशानी है जिद और सभ्यता की निशानी है निर्माण। सत्यता को सिद्ध करने वाला सदैव स्वयं निर्माण होकर सभ्यतापूर्वक व्यवहार करेगा। जोश में आकर यदि कोई सत्य को सिद्ध करता है तो जरूर उसमें कुछ न कुछ असत्यता समाई हुई है। कई बच्चों की भाषा हो गई है - मैं बिल्कुल सच बोलता हूँ, 100 परसेन्ट सत्य बोलता हूँ। लेकिन सत्य को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। सत्य ऐसा सूर्य है जो छिप नहीं सकता। चाहे कितनी भी दीवारें कोई आगे लाये लेकिन सत्यता का प्रकाश कभी छिप नहीं सकता। सभ्यता पूर्वक बोल, सभ्यता पूर्वक चलन, इसमें ही सफलता होती है।

जब भी कोई असत्य बात देखते हो, सुनते भी हो तो असत्य वायुमण्डल नहीं फैलाओ। कई कहते हैं यह पाप कर्म है ना, पाप कर्म देखा नहीं जाता लेकिन वायुमण्डल में असत्यता की बातें फैलाना यह भी तो पाप है। लौकिक परिवार में भी अगर कोई ऐसी बात देखी वा सुनी जाती हैं तो उसे फैलाया नहीं जाता। कान में सुना और दिल में छिपाया। यदि कोई व्यर्थ बातों का फैलाव करता है तो यह भी पाप का अंश है। ऐसे छोटे-छोटे पाप उड़ती कला के अनुभव को समाप्त कर देते हैं इसलिए इस कर्मो की गहन गति को समझकर सभ्यतापूर्वक व्यवहार करो। आप ब्राह्मण बच्चे बहुत-बहुत रॉयल हो। आपका चेहरा और चलन दोनों ही सत्यता की सभ्यता अनुभव करायें। वैसे भी रॉयल आत्माओं को सभ्यता की देवी कहा जाता है। उनका बोलना, देखना, चलना, खाना-पीना, उठना-बैठना, हर कर्म में सभ्यता सत्यता स्वत: ही दिखाई देती है। ऐसे नहीं कि मैं तो सत्य को सिद्ध कर रहा हूँ और सभ्यता हो ही नहीं। तो यह राइट नहीं है। कई बच्चे कहते हैं वैसे क्रोध नहीं आता है, लेकिन कोई झूठ बोलता है तो क्रोध आ जाता है। उसने झूठ बोला, आपने क्रोध से बोला तो दोनों में राइट कौन? कई चतुराई से कहते हैं कि हम क्रोध नहीं करते हैं, हमारा आवाज ही बड़ा है, आवाज ही ऐसा तेज है। लेकिन जब साइन्स के साधनों से आवाज को कम और ज्यादा कर सकते हैं तो क्या साइलेन्स की पावर से अपने आवाज की गति को धीमी या तेज नहीं कर सकते हो? जैसे क्रोध अज्ञान की शक्ति है ऐसे ज्ञान की शक्ति शान्ति है, सहन शक्ति है। तो अज्ञान की शक्ति क्रोध को बहुत अच्छी तरह से संस्कार बना लिया है और यूज़ भी करते रहते हो फिर माफी भी लेते रहते हो। ऐसे अब हर गुण को, हर ज्ञान की बात को संस्कार रूप में बनाओ। तो सभ्यता आती जायेगी।

कोई-कोई समझते हैं शायद क्रोध कोई विकार नहीं है, यह शस्त्र है, विकार नहीं है। लेकिन क्रोध ज्ञानी तू आत्मा के लिए महाशत्रु है क्योंकि क्रोध अनेक आत्माओं के संबंध, सम्पर्क में आने से प्रसिद्ध हो जाता है और क्रोध को देख करके बाप के नाम की बहुत ग्लानी होती है। कहने वाले यही कहते हैं, देख लिया ज्ञानी तू आत्मा बच्चों को, इसलिए इसके अंशमात्र को भी समाप्त करो। बहुत-बहुत सभ्यता पूर्वक व्यवहार करो।
वरदान:-
डायरेक्ट परमात्म लाइट के कनेक्शन द्वारा अंधकार को भगाने वाले लाइट हाउस भव
आप बच्चों के पास डायरेक्ट परमात्म लाइट का कनेक्शन है। सिर्फ स्वमान की स्मृति का स्विच डायरेक्ट लाइन से आन करो तो लाइट आ जायेगी और कितना भी गहरा सूर्य की रोशनी को भी छिपाने वाला काला बादल हो, वह भी भाग जायेगा। इससे स्वयं तो लाइट में रहेंगे ही लेकिन औरों के लिए भी लाइट हाउस बन जायेंगे।
स्लोगन:-
स्व पुरुषार्थ में तीव्र बनो तो आपके वायब्रेशन से दूसरों की माया सहज भाग जायेगी।

                                         All Murli Hindi & English

No comments:

Post a Comment