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Saturday, 27 April 2019

Brahma Kumaris Murli 28 April 2019 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 28 April 2019

28/04/2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 19/11/84 मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


बेहद की वैराग्य वृत्ति से सिद्धियों की प्राप्ति
आज विश्व रचयिता अपनी श्रेष्ठ रचना को वा रचना के पूर्वज आत्माओं को देख रहे हैं। चारों ओर की पूर्वज पूज्य आत्मायें बापदादा के सामने हैं। पूर्वज आत्माओं के आधार से विश्व की सर्व आत्माओं को शक्ति और शान्ति प्राप्त हो रही है और होनी है। अनेक आत्मायें पूर्वज पूज्य आत्माओं को शान्ति देवा, शक्ति देवा कह याद कर रही हैं। ऐसे समय पर शान्ति देवा आत्मायें मास्टर शान्ति के सागर, मास्टर शान्ति के सूर्य अपनी शान्ति की किरणें, शान्ति की लहरें दाता के बच्चे देवा बन सर्व को दे रहे हो! वह विशेष सेवा करने के अभ्यासी बने हो वा अन्य भिन्न-भिन्न प्रकार की सेवाओं में इतने बिज़ी हो जो इस विशेष सेवा के लिए फुर्सत और अभ्यास कम होता है? जैसा समय वैसे सेवा के स्वरूप को अपना सकते हो? अगर किसी को पानी की प्यास हो और आप बढ़िया भोजन दे दो तो वह सन्तुष्ट होगा? ऐसे वर्तमान समय शान्ति और शक्ति की आवश्यकता है। 

Brahma Kumaris Murli 28 April 2019 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 28 April 2019 (HINDI) 
मन्सा की शान्ति द्वारा आत्माओं को मन की शान्ति अनुभव करा सकते हो। वाणी द्वारा कानों तक आवाज़ पहुंचा सकते हो। लेकिन वाणी के साथ मन्सा शक्ति द्वारा मन तक पहुंचा सकते हो। मन का आवाज़ मन तक पहुंचता है। सिर्फ मुख का आवाज़ कानों और मुख तक रह जाता। सिर्फ वाणी से वर्णन शक्ति और मन से मनन शक्ति, मगन स्वरूप की शक्ति दोनों की प्राप्ति होती है। वह सुनने वाले और वह बनने वाले बन जाते, दोनों में अन्तर हो जाता है, तो सदा वाचा और मन्सा दोनों साथ-साथ सेवा में रहें।

वर्तमान समय विशेष भारतवासियों का क्या हालचाल देखा? अभी शमशानी वैराग्य की वृत्ति में हैं। ऐसे शमशानी वैराग्य वृत्ति वालों को बेहद की वैराग्य वृत्ति दिलाने के लिए स्वयं बेहद के वैराग्य वृत्ति वाले बनो। अपने आपको चेक करो - कभी राग कभी वैराग्य दोनों में चलते हैं वा सदा बेहद के वैरागी बने हो? बेहद के वैरागी अर्थात् देह रूपी घर से भी बेघर। देह भी बाप की है न कि मेरी, इतना देह के भान से परे। बेहद के वैरागी कभी भी संस्कार, स्वभाव, साधन किसी के भी वशीभूत नहीं होंगे। न्यारा बन, मालिक बन साधनों द्वारा सिद्धि स्वरूप बनेंगे। साधन को विधि बनायेंगे। विधि द्वारा स्व उन्नति की वृद्धि की सिद्धि पायेंगे। सेवा से वृद्धि की सिद्धि प्राप्त करेंगे। निमित्त आधार होगा लेकिन अधीन नहीं होंगे। आधार के अधीन होना अर्थात् वशीभूत होना। वशीभूत शब्द का अर्थ ही है, जैसे भूत आत्मा परवश और परेशान करती है, ऐसे किसी भी साधन वा संस्कार वा स्वभाव वा सम्पर्क के वशीभूत हो जाते तो भूत समान परेशान और परवश हो जाते हैं। बेहद के वैरागी, सदा करावनहार करा रहे हैं, इसी मस्ती में रमता योगी से भी ऊपर उड़ता योगी होगा। जैसे हद के वैरागी हठयोग की विधियों से धरनी, आग, पानी सबसे ऊंचा आसनधारी दिखाते हैं। उसको योग के सिद्धि स्वरूप मानते हैं। वह है अल्पकाल के हठयोग की विधि की सिद्धि। ऐसे बेहद के वैराग्य वृत्ति वाले इस विधि द्वारा देह भान की धरनी से ऊपर माया के भिन्न-भिन्न विकारों की अग्नि से ऊपर, भिन्न-भिन्न प्रकार के साधनों द्वारा संग के बहाव में आने से न्यारे बन जाते हैं। जैसे पानी का बहाव अपना बना देता है, अपनी तरफ खींच लेता है। ऐसे किसी भी प्रकार के अल्पकाल के बहाव अपनी तरफ आकर्षित न करें। ऐसे पानी के बहाव से भी ऊपर इसको कहा जाता है उड़ता योगी। यह सब सिद्धियाँ बेहद के वैराग्य की विधि से प्राप्त होती हैं।

बेहद के वैरागी अर्थात् हर संकल्प, बोल और सेवा में बेहद की वृत्ति, स्मृति भावना और कामना हो। हर संकल्प बेहद की सेवा में समर्पित हो। हर बोल में नि:स्वार्थ भावना हो। हर कर्म में करावनहार करा रहे हैं - यह वायब्रेशन सर्व को अनुभव हो, इसको कहा जाता है बेहद के वैरागी। बेहद के वैरागी अर्थात् अपनापन मिट जाए। बाबा-पन आ जाए। जैसे अनहद जाप जपते हैं, ऐसे अनहद स्मृति स्वरूप हों। हर संकल्प में, हर श्वास में बेहद और बाबा समाया हुआ हो। तो हद के वैरागी, शमशानी वैरागी आत्माओं को वर्तमान समय शान्ति और शक्ति देवा बन बेहद के वैरागी बनाओ।

तो वर्तमान समय के प्रमाण बच्चों की रिजल्ट क्या रही - यह टी.वी. बापदादा ने देखी और बच्चों ने इन्दिरा गांधी की टी.वी. देखी। समय पर देखी, नॉलेज के लिए देखी, समाचार के लिए देखी इसमें कोई हर्जा नहीं। लेकिन क्या हुआ, क्या होगा, इस रूप से नहीं देखना। नॉलेजफुल बन हर दृश्य को कल्प पहले की स्मृति से देखो। तो बापदादा ने बच्चों का क्या देखा। बच्चों का दृश्य भी रमणीक था। तीन प्रकार की रिजल्ट देखी।

1- एक थे - चलते-चलते अलबेलेपन की नींद में सोई हुई आत्मायें। जैसे कोई ज़ोर से आवाज़ होता है वा कोई हिलाता है तो सोया हुआ जाग जाता है लेकिन क्या हुआ! इस संकल्प से कुछ समय जागे और फिर धीरे-धीरे वही अलबेलेपन की नींद। यह तो होता ही है, इस चादर को ओढ़ के सो गए। अभी तो रिहर्सल है, फाइनल तो आगे होना है। इससे और मुंह तक चादर ओढ़ ली।

2- दूसरे थे - आलस्य की नींद में सोये हुए। यह तो सब होना ही था, वह हुआ। पुरूषार्थ तो कर ही रहे हैं और आगे भी कर ही लेंगे। संगमयुग में तो पुरूषार्थ करना ही है। कुछ किया है, कुछ आगे कर लेंगे। दूसरों को जागकर देखते रहते। जैसे चादर से मुंह निकाल एक दो को (सोये हुए को) देखते हैं ना। जो नामीग्रामी हैं वह भी इतना ही रफ्तार से चल रहे हैं, हम भी चल रहे हैं। ऐसे दूसरों की कमजोरियों को देख फालो फादर के बजाए सिस्टर्स और ब्रदर्स को फालो कर लेते हैं और उन्हों की भी कमजोरियों को फालो करते हैं। ऐसे संकल्प करने वाले आलस्य की नींद में सोये हुए वह भी जागे जरूर। उमंग और उत्साह के आधार से आलस्य की नींद का कईयों ने त्याग भी किया। स्व उन्नति और सेवा की उन्नति में आगे कदम भी बढ़ाया। हलचल ने हिलाया और आगे बढ़े। लेकिन आलस्य के संस्कार बीच-बीच में फिर भी अपनी तरफ खींचते रहते हैं। फिर भी हलचल ने हिलाया, आगे बढ़ाया।

3- तीसरे थे - हलचल को देख अचल रहने वाले। सेवा के श्रेष्ठ संकल्प में सेवा के भिन्न-भिन्न प्लैन सोचना और करना। सारी विश्व को शान्ति और शक्ति की सहायता देने वाले, साहस रखने वाले। औरों को भी हिम्मत दिलाने वाले। ऐसे भी बच्चे देखे। लेकिन शमशानी उमंग-उत्साह वा शमशानी तीव्र पुरूषार्थ वा कमजोरियों से वैराग्य वृत्ति, इसी लहर में नहीं चलना। सदा परिस्थिति को स्व-स्थिति की शक्ति से परिवर्तन करने वाले, विश्व परिवर्तक की स्मृति में रहो। परिस्थिति स्थिति को आगे बढ़ावे वा वायुमण्डल मास्टर सर्वशक्तिवान को चलावे। मनुष्य आत्माओं का शमशानी वैराग्य, अल्पकाल के लिए बेहद का वैरागी बनावे यह पूर्वज आत्माओं का कर्म नहीं। समय रचना, मास्टर रचता को आगे बढ़ावे - यह मास्टर रचता की कमज़ोरी है। आपके श्रेष्ठ संकल्प समय को परिवर्तन करने वाले हैं। समय आप विश्व परिवर्तक आत्माओं का सहयोगी है। समझा। समय को देखकर, समय के हिलाने से आगे बढ़ने वाले नहीं। लेकिन स्वयं आगे बढ़ समय को समीप लाओ। क्वेश्चन भी बहुतों का उठा कि अब क्या होगा? लेकिन क्वेश्चन को फुलस्टाप के रूप में परिवर्तन करो अर्थात् अपने को सभी सब्जेक्ट में फुल करो। यह है फुलस्टाप। ऐसे समय पर क्या होगा? यह क्वेश्चन नहीं उठता लेकिन क्या करना है, मेरा कर्तव्य ऐसे समय पर क्या है, उस सेवा में लग जाओ। जैसे आग बुझाने वाले आग को बुझाने में लग गए। क्वेश्चन नहीं किया कि यह क्या हुआ। अपनी सेवा में लग गये ना। ऐसे रूहानी सेवाधारी का कर्तव्य है अपनी रूहानी सेवा में लग जाना। दुनिया वालों को भी न्यारापन अनुभव हो। समझा। फिर भी समय प्रमाण पहुंच तो गये हो ना। परिस्थिति क्या भी हो लेकिन ड्रामा ने फिर भी मिलन मेला मना लिया और ही लक्की हो गये ना जो पहुंच तो गये हो ना। खुश हो रहे हो ना कि हमारा भाग्य है जो पहुंच गये। भले आये। मधुबन की रौनक आप सब बच्चे हैं। मधुबन का श्रृंगार मधुबन में पहुंचा। सिर्फ मधुबन वाले बाबा नहीं, मधुबन वाले बच्चे भी हैं। अच्छा -

चारों ओर के संकल्प द्वारा, स्नेह द्वारा, आकारी रूप द्वारा पहुंचे हुए सर्व बच्चों को बापदादा सदा अचल भव, सदा बेहद के वैरागी, सदा उड़ते योगी भव का वर्सा और वरदान दे रहे हैं। सदा अनहद स्मृति स्वरूप, अलबेले और आलस्य के निद्राजीत, सदा बेहद के स्मृति स्वरूप ऐसे पूर्वज और पूज्य आत्माओं को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते।

दादी जी तथा जगदीश भाई ने विदेश यात्रा का समाचार सुनाया तथा याद प्यार दी

सभी को सन्देश दे अनुभव कराया। स्नेह और सम्बन्ध बढ़ाया। अभी अधिकार लेने के लिए आगे आयेंगे। हर कदम में अनेक आत्माओं के कल्याण का पार्ट नूंधा हुआ है। इसी नूंध से सभी के दिल में उमंग-उत्साह दिलाया। बहुत अच्छा सेवा और स्नेह का पार्ट बजाया। बापदादा करावनहार भी हैं और साक्षी हो देखने वाले भी हैं। कराया भी और देखा भी। बच्चों के उमंग-उत्साह और हिम्मत पर बापदादा को नाज़ है। आगे भी और आवाज बुलन्द होगा। ऐसा आवाज बुलन्द होगा जो सभी कुम्भकरण आंख खोलकर देखेंगे कि यह क्या हुआ। कईयों के भाग्य परिवर्तन होंगे। धरनी बनाकर आये, बीज डालकर आये। अभी जल्दी बीज का फल भी निकलेगा। प्रत्यक्षता का फल निकलने वाला ही है। समय समीप आ रहा है। अभी तो आप लोग गये लेकिन जो सेवा करके आये। उस सेवा के फल स्वरूप वह स्वयं भागते हुए आयेंगे। ऐसे अनुभव करेंगे जैसे चुम्बक दूर से खींचता है ना। ऐसे कोई खींच रहा है। जैसे आदि में अनेक आत्माओं को यह रूहानी खींच हुई कि कोई खींच रहा है, कहाँ जायें। ऐसे यह भी खींचे हुए आयेंगे। ऐसा अनुभव किया ना कि रूहानी खींच बढ़ रही है। बढ़ते-बढ़ते खींचे हुए उड़कर पहुंच जायेंगे, वह भी अभी दृश्य होने वाला ही है। अभी यही रहा हुआ है। सन्देश वाहक जाते हैं लेकिन वह स्वयं सत्य तीर्थ पर पहुंचें, यह है लास्ट सीन। इसके लिए अभी धरनी तैयार हो गई है, बीज भी पड़ गया है, अब फल निकला कि निकला। अच्छा - दोनों तरफ गये। बापदादा के पास सभी के हिम्मत उल्हास उमंग का पहुंचता है। मैजारटी सेवा के उमंग-उत्साह होने के कारण मायाजीत बनने में भी सहज ही आगे बढ़ रहे हैं। फुर्सत होती है तो माया का वार भी होता है लेकिन बिजी रहते हैं दिल से, ड्यूटी से नहीं। जो दिल से सेवा में बिजी रहते हैं, वह सहज ही मायाजीत हो जाते हैं। तो बापदादा बच्चों के उमंग-उत्साह को देख खुश हैं। वहाँ साधन भी सहज है और इन्हों को प्राप्त भी हो जाते हैं। लक्ष्य है, मेहनत है और साधन भी सहज प्राप्त हैं, तीनों बातों के कारण अच्छी रेस में आगे नम्बर ले रहे हैं। अच्छा है। लेकिन देश में भी कोई कम नहीं। सभी अपने-अपने उमंग-उत्साह के आधार पर बढ़ रहे हैं। नाम तो देश से ही निकलना है। विदेशों की सफलता भी देश से ही निकलनी है। यह अच्छी स्मृति उन्हों को रहती है और अपनी ड्यूटी समझते हैं कि हमको नाम बाला करना है। विदेश के आवाज़ से भारत को जगाना है। यह लक्ष्य पक्का है और निभा भी रहे हैं। तैयार कर रहे हैं लेकिन अभी विदेश तक आवाज़ है। विदेश का देश तक पहुंचे, वह उड़ते-उड़ते आ रहा है। अभी उड़ रहा है। अभी सफर कर रहा है आवाज। उड़ते-उड़ते यहाँ पहुंच जायेगा। अभी विदेश में अच्छा फैल रहा है लेकिन विदेश का देश में पहुंचे, यह भी होना ही है। अच्छा-जो भी पार्ट बजाया, अच्छा बजाया। सदा आगे बढ़ने का सहयोग और वरदान है। हर आत्मा का अपना-अपना पार्ट है। जितना अनुभवी बनते जाते हैं उतना और भी अनुभवों के आधार से आगे बढ़ते रहेंगे। करावनहार ने जो जिससे कराया वह ड्रामा अनुसार अच्छे से अच्छा कराया। निमित्त भाव सेवा करा ही लेता है। तो सेवा कराई, निमित्त बने, जमा हुआ और आगे भी जमा होता रहेगा। अच्छा।

पार्टियों से:- सदा मिलन मेले में रहने वाले हो ना? यह मिलन का मेला अविनाशी मिलन मेले का अनुभव करा देता है। कहाँ भी रहते लेकिन मेले में रहते हो। मेले से दूर नहीं होते। मेला अर्थात् मिलन। तो सदा मिलन मेला है ही। तो ऐसा भाग्यवान कौन होगा जो सदा मेले में रहे। वैसे तो मेला लगता और खत्म हो जाता है लेकिन सदा मेले में कोई नहीं रहता। आप भाग्यवान आत्मायें सदा मेले में रहती हो। सदा मिलन मेला। मेले में क्या होता? मिलना और झूलना। झूलना भी होता है ना! तो सदा प्राप्तियों के झूले में झूलने वाले। एक झूला नहीं है अनेक प्राप्तियों के अनेक झूले हैं। कभी किस झूले में झूलते, कभी किस झूले में। लेकिन हैं मेले में। ऐसा झूला है जो सदा ही सुख और सर्व प्राप्तियों का अनुभव कराने वाला है। ऐसी कोटों में कोई भाग्यवान आत्मायें हो। पहले महिमा सुनते थे, अभी महान बन गये। अच्छा।
वरदान:-
शान्ति की शक्ति द्वारा असम्भव को सम्भव करने वाले सहजयोगी भव
शान्ति की शक्ति सर्वश्रेष्ठ शक्ति है। शान्ति की शक्ति से ही और सब शक्तियां निकली हैं। साइन्स की शक्ति का भी जो प्रभाव है वह साइंस भी साइलेन्स से निकली है। तो शान्ति की शक्ति से जो चाहो वह कर सकते हो। असम्भव को भी सम्भव कर सकते हो। जिसे दुनिया वाले असम्भव कहते हैं वह आपके लिए सम्भव है और सम्भव होने के कारण सहज है। शान्ति की शक्ति को धारण कर सहजयोगी बनो।
स्लोगन:-
वाणी द्वारा सबको सुख और शान्ति दो तो गायन योग्य बनेंगे।

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