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Monday, 25 February 2019

Brahma Kumaris Murli 26 February 2019 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 26 February 2019


26/02/2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


"मीठे बच्चे - इस शरीर से जीते जी मरने के लिए अभ्यास करो - 'मैं भी आत्मा, तुम भी आत्मा' - इस अभ्यास से ममत्व निकल जायेगा''

प्रश्नः-
सबसे ऊंची मंज़िल कौन-सी है? उस मंज़िल को प्राप्त करने वालों की निशानी क्या होगी?

उत्तर:-
सभी देहधारियों से ममत्व टूट जाए, सदा भाई-भाई की स्मृति रहे - यही है ऊंची मंज़िल। इस मंज़िल पर वही पहुँच सकते हैं जो निरन्तर देही-अभिमानी बनने का अभ्यास करते हैं। अगर देही-अभिमानी नहीं तो कहीं न कहीं फँसते रहेंगे या अपने शरीर में या किसी न किसी मित्र सम्बन्धी के शरीर में। उन्हें कोई की बात अच्छी लगेगी या कोई का शरीर अच्छा लगेगा। ऊंची मंज़िल पर पहुँ-चने वाले जिस्म (देह) से प्यार कर नहीं सकते। उनका शरीर का भान टूटा हुआ होगा।
Brahma Kumaris Murli 26 February 2019 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 26 February 2019 (HINDI) 
ओम् शान्ति।
रूहानी बाप रूहानी बच्चों को कहते हैं - देखो, मैं तुम सभी बच्चों को आपसमान बनाने आया हूँ। अब बाप आप समान बनाने कैसे आयेंगे? वह है निराकार, कहते हैं मैं निराकार हूँ तुम बच्चों को आपसमान अर्थात् निराकारी बनाने, जीते जी मरना सिखलाने आया हूँ। बाप अपने को भी आत्मा समझते हैं ना। इस शरीर का भान नहीं है। शरीर में रहते हुए भी शरीर का भान नहीं है। यह शरीर उनका तो नहीं है ना। तुम बच्चे भी इस शरीर का भान निकाल दो। तुम आत्माओं को ही मेरे साथ चलना है। यह शरीर जैसे मैंने लोन लिया है, वैसे आत्मायें भी लोन लेती हैं पार्ट बजाने लिए। तुम जन्म-जन्मान्तर शरीर लेते आये हो। अब जैसे मैं जीते जी इस शरीर में हूँ परन्तु हूँ तो न्यारा अर्थात् मरा हुआ। मरना शरीर छोड़ने को कहा जाता है। तुमको भी जीते जी इस शरीर से मरना है। मैं भी आत्मा, तुम भी आत्मा। तुमको भी मेरे साथ चलना है या यहाँ ही बैठना है? तुम्हारा इस शरीर में जन्म-जन्मान्तर का मोह है। जैसे मैं अशरीरी हूँ, तुम भी जीते जी अपने को अशरीरी समझो। हमको अब बाबा के साथ जाना है। जैसे बाबा का यह पुराना शरीर है, तुम आत्माओं का भी यह पुराना शरीर है। पुरानी जुत्ती को छोड़ना है। जैसे मेरा इसमें ममत्व नहीं है, तुम भी इस पुरानी जुत्ती से ममत्व निकालो। तुमको ममत्व रखने की आदत पड़ी हुई है। हमको आदत नहीं है। मैं जीते जी मरा हुआ हूँ। तुमको भी जीते जी मरना है। मेरे साथ चलना है तो अब यह प्रैक्टिस करो। शरीर का कितना भान रहता है, बात मत पूछो! शरीर रोगी हो जाता है तो भी आत्मा उसको छोड़ती नहीं है, इससे ममत्व निकालना पड़े। हमको तो बाबा के साथ जाना जरूर है। अपने को शरीर से न्यारा समझना है। इसको ही जीते जी मरना कहा जाता है। अपना घर ही याद रहता है। तुम जन्म-जन्मान्तर से इस शरीर में रहते आये हो इसलिए तुमको मेहनत करनी पड़ती है। जीते जी मरना पड़ता है। मैं तो इसमें आता ही टैप्रेरी हूँ। तो मरकर चलने से अर्थात् अपने को आत्मा समझकर चलने से कोई भी देहधारी में ममत्व नहीं रहेगा। अक्सर करके किसी न किसी का किसी में मोह हो जाता है। बस, उनको देखने बिगर रह नहीं सकते। यह देहधारी की याद एकदम उड़ा देनी चाहिए क्योंकि बहुत बड़ी मंज़िल है। खाते-पीते जैसेकि इस शरीर में हूँ ही नहीं। यह अवस्था पक्की करनी है तब 8 रत्नों की माला में आ सकते हैं। मेहनत बिगर थोड़ेही ऊंच पद मिल सकता है। जीते जी देखते हुए समझें कि मैं तो वहाँ का रहने वाला हूँ। जैसे बाबा इसमें टैप्रेरी बैठा है, ऐसे अब हमको भी घर जाना है। जैसे बाबा का ममत्व नहीं है, वैसे हमको भी इसमें ममत्व नहीं रखना है। बाप को तो इस शरीर में बैठना पड़ता है, तुम बच्चों को समझाने लिए।

तुमको अब वापिस चलना है इसलिए कोई देहधारी में ममत्व न रहे। यह फलानी बहुत अच्छी है, मीठी है - आत्मा की बुद्धि जाती है ना। बाप कहते हैं शरीर को नहीं, आत्मा को देखना है। शरीर को देखने से तुम फँस मरेंगे। बड़ी मंज़िल है। तुम्हारा भी जन्म-जन्मान्तर का पुराना ममत्व है। बाबा का ममत्व नहीं है तब तो तुम बच्चों को सिखलाने आया हूँ। बाप खुद कहते हैं मैं तो इस शरीर में नहीं फँसता हूँ, तुम फँसे हुए हो। मैं तुमको छुड़ाने आया हूँ। तुम्हारे 84 जन्म पूरे हुए, अब शरीर से भान निकालो। देही-अभिमानी होकर न रहने से तुम कहीं न कहीं फँसते रहेंगे। कोई की बात अच्छी लगेगी, कोई का शरीर अच्छा लगेगा, तो घर में भी उनकी याद आती रहेगी। जिस्म पर प्यार होगा तो हार खा लेंगे। ऐसे बहुत खराब हो जाते हैं। बाप कहते हैं स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध छोड़ अपने को आत्मा समझो। यह भी आत्मा, हम भी आत्मा। आत्मा समझते-समझते शरीर का भान निकलता जायेगा। बाप की याद से ही विकर्म भी विनाश होंगे। इस बात पर तुम अच्छी तरह से विचार सागर मंथन कर सकते हो। विचार सागर मंथन करने बिगर तुम उछल नहीं सकेंगे। यह पक्का होना चाहिए कि हमको बाप के पास जाना है जरूर। मूल बात है याद की। 84 का चक्र पूरा हुआ फिर शुरू होना है। इस पुरानी देह से ममत्व नहीं हटाया तो फँस पड़ेंगे या अपने शरीर में या कोई मित्र-सम्बन्धी के शरीर में। तुमको तो किससे भी दिल नहीं लगानी है। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना है। हम आत्मा भी निराकार, बाप भी निराकार, आधा-कल्प तुम भक्ति मार्ग में बाप को याद करते आये हो ना। 'हे प्रभू' कहने से शिवलिंग ही सामने आयेगा। कोई देहधारी को 'हे प्रभू' कह न सके। सभी शिव के मन्दिर में जाते हैं, उनको ही परमात्मा समझ पूजते हैं। ऊंचे से ऊंचा भगवान् एक ही है। ऊंचे से ऊंचा अर्थात् परमधाम में रहने वाला। भक्ति भी पहले अव्यभिचारी होती है एक की। फिर व्यभिचारी बन जाती है। तो बाप बार-बार बच्चों को समझाते हैं कि तुमको ऊंच पद पाना है तो यह प्रैक्टिस करो। देह का भान छोड़ो। सन्यासी भी विकारों को छोड़ते हैं ना। आगे तो सतोप्रधान थे अभी तो वह भी तमोप्रधान बन पड़े हैं। सतोप्रधान आत्मा कशिश करती है, अपवित्र आत्माओं को खींचती है क्योंकि आत्मा पवित्र है। भल पुनर्जन्म में आते हैं तो भी पवित्र होने के कारण खींचते हैं। कितने उन्हों के फालोअर्स बनते हैं। जितनी पवित्रता की जास्ती ताकत, उतने ज्यादा फालोअर्स। यह बाप तो है ही एवरप्योर और है भी गुप्त। डबल है ना, त़ाकत सारी उनकी है। इनकी (ब्रह्मा की) नहीं। शुरू में भी तुमको उसने कशिश की। इस ब्रह्मा ने नहीं क्योंकि वह तो एवरप्योर है। तुम कोई इनके पिछाड़ी नहीं भागे। यह कहते हैं मैं तो सबसे जास्ती पूरे 84 जन्म प्रवृत्ति मार्ग में रहा। यह तो तुमको खींच न सके। बाप कहते हैं मैंने तुमको खींचा। भल सन्यासी पवित्र रहते हैं। परन्तु मेरे जैसा पवित्र तो कोई भी होगा नहीं। वह तो सब भक्ति मार्ग के शास्त्र आदि सुनाते हैं। मैं आकर तुमको सब वेदों शास्त्रों का सार सुनाता हूँ। चित्र में भी दिखाया है विष्णु की नाभी से ब्रह्मा निकला फिर ब्रह्मा के हाथ में शास्त्र दिखाये हैं। अब विष्णु तो ब्रह्मा द्वारा शास्त्रों का सार सुनाते नहीं हैं। वो तो विष्णु को भी भगवान् समझ लेते हैं। बाप समझाते हैं मैं इन ब्रह्मा द्वारा सुनाता हूँ। मैं विष्णु द्वारा थोड़ेही समझाता हूँ। कहाँ ब्रह्मा, कहाँ विष्णु। ब्रह्मा सो विष्णु बनते हैं फिर 84 जन्म के बाद यह संगम होगा। यह तो नई बातें हैं ना। कितनी वन्डरफुल बातें हैं समझाने की।

अब तो बाप कहते हैं - बच्चे, जीते जी मरना है। तुम शरीर में जीते हो ना। समझते हो हम आत्मा हैं, हम बाबा के साथ चले जायेंगे। यह शरीर आदि कुछ भी ले नहीं जाना है। अब बाबा आया है, कुछ तो नई दुनिया में ट्रांसफर कर दें। मनुष्य दान-पुण्य आदि करते हैं दूसरे जन्म में पाने के लिए। तुमको भी नई दुनिया में मिलना है। यह भी करेंगे वही जिन्होंने कल्प पहले किया होगा। कम जास्ती कुछ भी होगा नहीं। तुम साक्षी होकर देखते रहेंगे। कुछ कहने की भी दरकार नहीं रहती। फिर भी बाप समझाते हैं जो कुछ करते हैं तो उसका भी अहंकार नहीं आना चाहिए। हम आत्मा यह शरीर छोड़कर जायेंगे। वहाँ नई दुनिया में जाकर नया शरीर लेंगे। गाया भी जाता है राम गयो रावण गयो..... रावण का परिवार कितना बड़ा है। तुम तो मुट्ठी भर हो। यह सारा रावण सम्प्रदाय है। तुम्हारा राम सम्प्रदाय कितना थोड़ा होगा - 9 लाख। तुम धरनी के सितारे हो ना। माँ-बाप और तुम बच्चे। तो बाप बार-बार बच्चों को समझाते हैं कि मरजीवा बनने की कोशिश करो। अगर किसको देखकर बुद्धि में आता है - यह बहुत अच्छी है, बहुत मीठा समझाती है, यह भी माया का वार होता है, माया ललचा देती है। उनकी तकदीर में नहीं है तो माया सामने आ जाती है। कितना भी समझाओ तो गुस्सा लगेगा। यह नहीं समझते हैं कि यह देह-अभिमान ही काम करा रहा है। अगर ज्यादा समझाते हैं तो टूट पड़ते हैं इसलिए प्यार से चलाना पड़ता है। किससे दिल लग जाता है तो बात मत पूछो, पागल हो जाते हैं। माया एकदम बेसमझ बना देती है इसलिए बाप कहते हैं कभी कोई के नाम-रूप में नहीं फँसना। मैं आत्मा हूँ और एक बाप जो विदेही है, उनसे ही प्यार रखना है। यही मेहनत है। कोई भी देह में ममत्व न हो। ऐसे नहीं, घर में बैठे भी वह ज्ञान देने वाली याद आती रहे - बड़ी मीठी है, बहुत अच्छा समझाती है। अरे, मीठा तो ज्ञान है। मीठी आत्मा है। शरीर थोड़ेही मीठा है। बात करने वाली भी आत्मा है। कभी भी शरीर पर आशिक नहीं होना है।

आजकल तो भक्ति मार्ग बहुत है। आनन्दमई माँ को भी माँ-माँ करते याद करते रहते हैं। अच्छा, बाप कहाँ है? वर्सा बाप से मिलना है या माँ से? माँ को भी पैसा कहाँ से मिलेगा? सिर्फ माँ-माँ कहने से जरा भी पाप नहीं कटेंगे। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। नाम रूप में नहीं फँसना है, और ही पाप हो जायेगा क्योंकि बाप का ऩाफरमानबरदार बनते हो। बहुत बच्चे भूले हुए हैं। बाप समझाते हैं मैं तुम बच्चों को लेने आया हूँ सो जरूर ले जाऊंगा, इसलिए मेरे को याद करो। एक मुझे याद करने से ही तुम्हारे पाप कटेंगे। भक्ति मार्ग में बहुतों को याद करते आये हो। परन्तु बाप बिगर कोई काम कैसे होगा। बाप थोड़ेही कहते हैं माँ को याद करो। बाप तो कहते हैं मुझे याद करो। पतित-पावन मैं हूँ। बाप के डायरेक्शन पर चलो। तुम भी बाप के डायरेक्शन पर औरों को समझाते रहो। तुम थोड़ेही पतित-पावन ठहरे। याद एक को ही करना है। हमारा तो एक बाप, दूसरा न कोई। बाबा हम आप पर ही वारी जायेंगे। वारी जाना तो शिवबाबा पर ही है और सबकी याद छूट जानी चाहिए। भक्ति मार्ग में तो बहुतों को याद करते रहते हैं। यहाँ तो एक शिवबाबा, दूसरा न कोई। फिर भी कोई अपनी चलाते हैं तो क्या गति-सद्गति होगी! मूँझ पड़ते हैं - बिन्दी को कैसे याद करें? अरे, तुमको अपनी आत्मा याद है ना कि मैं आत्मा हूँ। वह भी बिन्दी रूप ही है। तो तुम्हारा बाप भी बिन्दी है। बाप से वर्सा मिलता है। माँ तो फिर भी देह-धारी हो जाती है। तुमको विदेही से ही वर्सा मिलना है इसलिए और सब बातें छोड़ एक से बुद्धियोग लगाना है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) शरीर का भान खत्म करने के लिए चलते-फिरते अभ्यास करना है-जैसे कि इस शरीर से मरे हुए हैं, न्यारे हैं। शरीर में हैं ही नहीं। बिगर शरीर आत्मा को देखो।

2) कभी भी किसी के शरीर पर तुम्हें आशिक नहीं होना है। एक विदेही बाप से ही प्यार रखना है। एक से ही बुद्धियोग लगाना है।

वरदान:-
ब्राह्मण जीवन में सर्व खजानों को सफल कर सदा प्राप्ति सम्पन्न बनने वाले सन्तुष्टमणि भव

ब्राह्मण जीवन का सबसे बड़े से बड़ा खजाना है सन्तुष्ट रहना। जहाँ सर्व प्राप्तियां हैं वहाँ सन्तुष्टता है और जहाँ सन्तुष्टता है वहाँ सब कुछ है। जो सन्तुष्टता के रत्न हैं वह सब प्राप्ति स्वरूप हैं, उनका गीत है पाना था वह पा लिया... ऐसे सर्व प्राप्ति सम्पन्न बनने की विधि है - मिले हुए सर्व खजानों को यूज़ करना क्योंकि जितना सफल करेंगे उतना खजाने बढ़ते जायेंगे।

स्लोगन:-
होलीहंस उन्हें कहा जाता जो सदा अच्छाई रूपी मोती ही चुगते हैं, अवगुण रूपी कंकड़ नहीं।



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