Saturday, 26 January 2019

Brahma Kumaris Murli 27 January 2019 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 27 January 2019


27/01/2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 15/04/84 मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


स्नेही, सहयोगी, शक्तिशाली बच्चों की तीन अवस्थाएं
बापदादा सभी स्नेही, सहयोगी और शक्तिशाली बच्चों को देख रहे हैं। स्नेही बच्चों में भी भिन्न-भिन्न प्रकार के स्नेह वाले हैं। एक हैं - दूसरों की श्रेष्ठ जीवन को देख, दूसरों का परिवर्तन देख उससे प्रभावित हो स्नेही बनना। दूसरे हैं - किसी न किसी गुण की, चाहे सुख वा शान्ति की थोड़ी-सी अनुभव की झलक देख स्नेही बनना। तीसरे हैं संग अर्थात् संगठन का, शुद्ध आत्माओं का सहारा अनुभव करने वाली स्नेही आत्मायें। चौथे हैं - परमात्म स्नेही आत्मायें। स्नेही सब हैं लेकिन स्नेह में भी नम्बर हैं। यथार्थ स्नेही अर्थात् बाप को यथार्थ रीति से जान स्नेही बनना।

ऐसे ही सहयोगी आत्माओं में भी भिन्न-भिन्न प्रकार के सहयोगी हैं। एक हैं - भक्ति के संस्कार प्रमाण सहयोगी। अच्छी बातें हैं, अच्छा स्थान है, अच्छी जीवन वाले हैं, अच्छे स्थान पर करने से अच्छा फल मिलता है, इसी आधार पर, इसी आकर्षण से सहयोगी बनना अर्थात् अपना थोड़ा-बहुत तन-मन-धन लगाना। दूसरे हैं - ज्ञान वा योग की धारणा के द्वारा कुछ प्राप्ति करने के आधार पर सहयोगी बनना। तीसरे हैं - एक बाप दूसरा न कोई। एक ही बाप है, एक ही सर्व प्राप्ति का स्थान है। 
Brahma Kumaris Murli 27 January 2019 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 27 January 2019 (HINDI) 
बाप का कार्य सो मेरा कार्य है। ऐसे अपना बाप, अपना घर, अपना कार्य, श्रेष्ठ ईश्वरीय कार्य समझ सहयोगी सदा के लिए बनना। तो अन्तर हो गया ना!

ऐसे ही शक्तिशाली आत्मायें, इसमें भी भिन्न-भिन्न स्टेज वाले हैं - सिर्फ ज्ञान के आधार पर जानने वाले कि मैं आत्मा शक्ति स्वरूप हूँ, सर्वशक्तिमान बाप का बच्चा हूँ - यह जानकर प्रयत्न करते हैं शक्तिशाली स्थिति में स्थित होने का। लेकिन सिर्फ जानने तक होने कारण जब यह ज्ञान की प्वाइंट स्मृति में आती है, उस समय शक्तिशाली प्वाइंट के कारण वह थोड़ा-सा समय शक्तिशाली बनते फिर प्वाइंट भूली, शक्ति गई। जरा भी माया का प्रभाव, ज्ञान भुलाए निर्बल बना देता है। दूसरे हैं - ज्ञान का चिन्तन भी करते, वर्णन भी करते, दूसरों को शक्तिशाली बातें सुनाते, उस समय सेवा का फल मिलने के कारण अपने को उतना समय शक्तिशाली अनुभव करते हैं लेकिन चिन्तन के समय तक वा वर्णन के समय तक, सदा नहीं। पहली चिन्तन की स्थिति, दूसरी वर्णन की स्थिति।

तीसरे हैं - सदा शक्तिशाली आत्मायें। सिर्फ चिन्तन और वर्णन नहीं करते लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान स्वरूप बन जाते। स्वरूप बनना अर्थात् समर्थ बनना। उनके हर कदम, हर कर्म स्वत: ही शक्तिशाली होते हैं। स्मृति स्वरूप हैं इसलिए सदा शक्तिशाली स्थिति है। शक्तिशाली आत्मा सदा अपने को सर्वशक्तिमान बाप के साथ, कम्बाइन्ड अनुभव करेगी और सदा श्रीमत का हाथ छत्रछाया के रूप में अनुभव होगा। शक्तिशाली आत्मा, सदा दृढ़ता की चाबी के अधिकारी होने कारण सफलता के खजाने के मालिक अनुभव करते हैं। सदा सर्व प्राप्तियों के झूलों में झूलते रहते हैं। सदा अपने श्रेष्ठ भाग्य के मन में गीत गाते रहते हैं। सदा रूहानी नशे में होने कारण पुरानी दुनिया की आकर्षण से सहज परे रहते हैं। मेहनत नहीं करनी पड़ती है। शक्तिशाली आत्मा का हर कर्म, बोल स्वत: और सहज सेवा कराता रहता है। स्व परिवर्तन वा विश्व परिवर्तन शक्तिशाली होने के कारण सफलता हुई पड़ी है, यह अनुभव सदा ही रहता है। किसी भी कार्य में क्या करें, क्या होगा यह संकल्प मात्र भी नहीं होगा। सफलता की माला सदा जीवन में पड़ी हुई है। विजयी हूँ, विजय माला का हूँ। विजय जन्म सिद्ध अधिकार है, यह अटल निश्चय स्वत: और सदा रहता ही है। समझा! अब अपने आप से पूछो मैं कौन? शक्तिशाली आत्मायें मैनारिटी हैं। स्नेही, सहयोगी उसमें भी भिन्न-भिन्न वैराइटी वाले मैजारिटी हैं। तो अब क्या करेंगे? शक्तिशाली बनो। संगमयुग का श्रेष्ठ सुख अनुभव करो। समझा! सिर्फ जानने वाले नहीं, पाने वाले बनो। अच्छा-

अपने घरे में आये वा बाप के घर में आये। पहुँच गये, यह देख बापदादा खुश होते हैं। आप भी बहुत खुश हो रहे हैं ना। यह खुशी सदा कायम रहे। सिर्फ मधुबन तक नहीं - संगमयुग ही साथ रहे। बच्चों की खुशी में बाप भी खुश है। कहाँ-कहाँ से चलकर, सहन कर पहुँच तो गये ना। गर्मी-सर्दी, खान-पान सबको सहन कर पहुँचे हो। धूल मिट्टी की वर्षा भी हुई। यह सब पुरानी दुनिया में तो होता ही है। फिर भी आराम मिल गया ना। आराम किया? तीन फुट नहीं तो दो फुट जगह तो मिली। फिर भी अपना घर दाता का घर मीठा लगता है ना। भक्ति मार्ग की यात्राओं से तो अच्छा स्थान है। छत्रछाया के अन्दर आ गये। प्यार की पालना में आ गये। यज्ञ की श्रेष्ठ धरनी पर पहुँचना, यज्ञ के प्रसाद का अधिकारी बनना, कितना महत्व है। एक कणा, अनेक मूल्यों के समान है। यह तो सब जानते हो ना! वह तो प्रसाद का एक कणा मिलने के प्यासे हैं और आपको तो ब्रह्मा भोजन पेट भरकर मिलेगा। तो कितने भाग्यवान हो। इस महत्व से ब्रह्मा भोजन खाना तो सदा के लिए मन भी महान बन जायेगा।

अच्छा- सबसे ज्यादा पंजाब आया है। इस बारी ज्यादा क्यों भागे हो? इतनी संख्या कभी नहीं आई है। होश में आ गये! फिर भी बापदादा ये ही श्रेष्ठ विशेषता देखते - पंजाब में सतसंग और अमृतवेले का महत्व है। नंगे पाव भी अमृतवेले पहुँच जाते हैं। बापदादा भी पंजाब निवासी बच्चों को, इसी महत्व को जानने वालों की महानता से देखते हैं। पंजाब निवासी अर्थात् सदा संग के रूहानी रंग में रंगे हुए। सदा सत के संग में रहने वाले। ऐसे हो ना? पंजाब वाले सभी अमृतवेले समर्थ हो मिलन मनाते हो? पंजाब वालों में अमृतवेले का आलस्य तो नहीं है ना? झुटके तो नहीं खाते हो? तो पंजाब की विशेषता सदा याद रखना। अच्छा-

ईस्टर्न ज़ोन भी आया है, ईस्ट की विशेषता क्या होती है? (सनराइज) सूर्य सदा उदय होता है। सूर्य अर्थात् रोशनी का पुंज। तो सभी ईस्टर्न ज़ोन वाले मास्टर ज्ञान सूर्य हैं। सदा अंधकार को मिटाने वाले, रोशनी देने वाले हैं ना! यह विशेषता है ना। कभी माया के अंधकार में नहीं आने वाले। अंधकार मिटाने वाले मास्टर दाता हो गये ना! सूर्य दाता है ना। तो सभी मास्टर सूर्य अर्थात् मास्टर दाता बन विश्व को रोशनी देने के कार्य में बिजी रहते हो ना। जो स्वयं बिजी रहते हैं, फुर्सत में नहीं रहते, माया को भी उन्हों के लिए फुर्सत नहीं होती। तो ईस्टर्न ज़ोन वाले क्या समझते हो? ईस्टर्न ज़ोन में माया आती है? आती भी है तो नमस्कार करने आती या मिक्की माउस बना देती है? क्या मिक्की माउस का खेल अच्छा लगता है? ईस्टर्न ज़ोन की गद्दी है बाप की गद्दी। तो राजगद्दी हो गई ना। राज-गद्दी वाले राज़े होंगे या मिक्की माउस होंगे? तो सभी मास्टर ज्ञान सूर्य हो? ज्ञान सूर्य उदय भी वहीं से हुआ है ना। इस्ट से ही उदय हुआ। समझा - अपनी विशेषता। प्रवेशता की श्रेष्ठ गद्दी के अर्थात् वरदानी स्थान की श्रेष्ठ आत्मायें हो। यह विशेषता किसी और ज़ोन में नहीं है। तो सदा अपनी विशेषता को विश्व की सेवा में लगाओ। क्या विशेषता करेंगे? सदा मास्टर ज्ञान सूर्य। सदा रोशनी देने वाले मास्टर दाता। अच्छा - सभी मिलने आये हैं, सदा श्रेष्ठ मिलन मनाते रहना। मेला अर्थात् मिलना। एक सेकण्ड भी मिलन मेले से वंचित नहीं होना। निरन्तर योगी का अनुभव पक्का करके जाना। अच्छा-

सदा एक बाप के स्नेह में रहने वाले, स्नेही आत्मओं को, हर कदम ईश्वरीय कार्य के सहयोगी आत्माओं को, सदा शक्तिशाली स्वरूप श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा विजय के अधिकार को अनुभव करने वाले, विजयी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों से:- एक बल और एक भरोसे से सदा उन्नति को पाते रहो। सदा एक बाप के हैं, एक बाप की श्रीमत पर चलना है। इसी पुरुषार्थ से आगे बढते चलो। अनुभव करो श्रेष्ठ ज्ञान स्वरूप बनने का। महान योगी बनने का, गहराई में जाओ। जितना ज्ञान की गहराई में जायेंगे उतना अमूल्य अनुभव के रत्न प्राप्त करेंगे। एकाग्र बुद्धि बनो। जहाँ एकाग्रता है वहाँ सर्व प्राप्तियों का अनुभव है। अल्पकाल की प्राप्ति के पीछे नहीं जाओ। अविनाशी प्राप्ति करो। विनाशी बातों में आकर्षित नहीं हो। सदा अपने को अविनाशी खजाने के मालिक समझ बेहद में आओ। हद में नहीं आओ। बेहद का मज़ा और हद की आकर्षण का मजा इसमें रात-दिन का फ़र्क है इसलिए समझदार बन समझ से काम लो और वर्तमान तथा भविष्य श्रेष्ठ बनाओ।

चुने हुए विशेष अव्यक्त महावाक्य - प्रीत बुद्धि विजयी रत्न बनो

प्रीत बुद्धि अर्थात् सदा अलौकिक अव्यक्त स्थिति में रहने वाले अल्लाह लोग। जिनका हर संकल्प, हर कार्य अलौकिक हो, व्यक्त देश और कर्तव्य में रहते हुए भी कमल पुष्प के समान न्यारे और एक बाप के सदा प्यारे रहना - यह है प्रीत बुद्धि बनना। प्रीत बुद्धि अर्थात् विजयी। आपका स्लोगन भी है विनाश काले प्रीत बुद्धि विजयन्ती और विनाश काले विपरीत बुद्धि विनश्यन्ती। जब यह स्लोगन दूसरों को सुनाते हो कि विनाश काले विपरीत बुद्धि मत बनो, प्रीत बुद्धि बनो तो अपने को भी देखो - हर समय प्रीत बुद्धि रहते हैं? कभी विपरीत बुद्धि तो नहीं बनते हैं?

प्रीत बुद्धि वाले कभी श्रीमत के विपरीत एक संकल्प भी नहीं उठा सकते। अगर श्रीमत के विपरीत संकल्प, वचन वा कर्म होता है तो उसको प्रीत बुद्धि नहीं कहेंगे। तो चेक करो हर संकल्प वा वचन श्रीमत प्रमाण है? प्रीत बुद्धि अर्थात् बुद्धि की लगन वा प्रीत एक प्रीतम के साथ सदा लगी हुई हो। जब एक के साथ सदा प्रीत है तो अन्य किसी भी व्यक्ति वा वैभवों के साथ प्रीत जुट नहीं सकती क्योंकि प्रीत बुद्धि अर्थात् सदा बापदादा को अपने सम्मुख अनुभव करने वाले। ऐसे सम्मुख रहने वाले कभी विमुख नहीं हो सकते।

प्रीत बुद्धि वालों के मुख से, उनके दिल से सदैव यही बोल निकलेंगे -तुम्हीं से खाऊं, तुम्हीं से बैठूँ, तुम्हीं से बोलूँ, तुम्हीं से सुनूँ, तुम्हीं से सर्व सम्बन्ध निभाऊं, तुम्हीं से सर्व प्राप्ति करूं। उनके नैन, उनका मुखड़ा न बोलते हुए भी बोलता है। तो चेक करो ऐसे विनाश काले प्रीत बुद्धि बने हैं अर्थात् एक ही लगन में एकरस स्थिति वाले बने हैं?

जैसे सूर्य के सामने देखने से सूर्य की किरणें अवश्य आती हैं-इसी प्रकार अगर ज्ञान सूर्य बाप के सदा सम्मुख रहते हैं अर्थात् सच्ची प्रीत बुद्धि है तो ज्ञान सूर्य के सर्व गुणों की किरणें अपने में अनुभव करेंगे। ऐसे प्रीत बुद्धि बच्चों की सूरत पर अन्तर्मुखता की झलक और साथ-साथ संगमयुग के वा भविष्य के सर्व स्वमान की फलक रहती है।

अगर सदा यह स्मृति रहे कि इस तन का किसी भी समय विनाश हो सकता है तो यह विनाश काल स्मृति में रहने से प्रीत बुद्धि स्वत: हो ही जायेंगे। जैसे विनाश काल आता है तो अज्ञानी भी बाप को याद करने का प्रयत्न जरूर करते हैं लेकिन परिचय के बिना प्रीत जुट नहीं पाती। अगर सदा यह स्मृति में रखो कि यह अन्तिम घड़ी है, तो यह याद रहने से और कोई भी याद नहीं आयेगा।

जो सदा प्रीत बुद्धि हैं उनकी मन्सा में भी श्रीमत के विपरीत व्यर्थ संकल्प वा विकल्प नहीं आ सकते। ऐसे प्रीत बुद्धि रहने वाले ही विजयी रत्न बनते हैं। कहाँ भी किसी प्रकार से कोई देहधारी के साथ प्रीत न हो, नहीं तो विपरीत बुद्धि की लिस्ट में आ जायेंगे। जो बच्चे प्रीत बुद्धि बन सदा प्रीत की रीति निभाते हैं उन्हें सारे विश्व के सर्व सुखों की प्राप्ति सदाकाल के लिए होती है। बापदादा ऐसे प्रीत निभाने वाले बच्चों के दिन रात गुण-गान करते हैं। अन्य सभी को मुक्तिधाम में बिठाकर प्रीत की रीति निभाने वाले बच्चों को विश्व का राज्य भाग्य प्राप्त कराते हैं।

एक बाप के साथ दिल की सच्ची प्रीत हो तो माया कभी डिस्टर्ब नहीं करेगी। उसका डिस्ट्रक्शन हो जायेगा। लेकिन अगर सच्चे दिल की प्रीत नहीं है, सिर्फ बाप का हाथ पकड़ा है साथ नहीं लिया है तो माया द्वारा घात होता रहेगा। जब मरजीवा बने, नया जन्म, नये संस्कारों को धारण किया तो पुराने संस्कार रूपी वस्त्रों से प्रीत क्यों? जो चीज़ बाप को प्रिय नहीं वह बच्चों को क्यों? इसलिए प्रीत बुद्धि बन अन्दर की कमजोरी, कमी, निर्बलता और कोमलता के पुराने खाते को सदाकाल के लिए समाप्त कर दो। रत्नजड़ित चोले को छोड़ जड़-जड़ीभूत चोले से प्रीत नहीं रखो।

कई बच्चे प्रीति जुटा लेते हैं लेकिन निभाते नम्बरवार हैं। निभाने में लाइन बदली हो जाती है। लक्ष्य एक होता है लक्षण दूसरे हो जाते हैं। कोई एक सम्बन्ध में भी अगर निभाने में कमी हो गई मानों 75 परसेन्ट सम्बन्ध बाप से हैं और 25 परसेन्ट सम्बन्ध कोई एक आत्मा से है तो भी निभाने वाले की लिस्ट में नहीं आ सकते। निभाना माना निभाना। कैसी भी परिस्थिति हो, चाहे मन की, तन की या सम्पर्क की, लेकिन कोई आत्मा संकल्प में भी याद न आये। संकल्प में भी कोई आत्मा की स्मृति आई तो उसी सेकेण्ड का भी हिसाब बनता है, यह कर्मो की गुह्य गति है।

कोई-कोई बच्चे अभी तक प्रीति लगाने में लगे हुए हैं, इसलिये कहते है कि योग नहीं लगता। जिसका थोड़ा समय योग लगता है फिर टूटता है - ऐसे को कहेंगे प्रीति लगाने वाले। जो प्रीति निभाने वाले होते हैं वह प्रीति में खोये हुए होते हैं। उनको देह की और देह के सम्बन्धियों की सुध-बुध भूली हुई होती है तो आप भी बाप के साथ ऐसी प्रीति निभाओ तो फिर देह और देह के सम्बन्धी याद आ नहीं सकते।
वरदान:-
समय और संकल्प रूपी खजाने पर अटेन्शन दे जमा का खाता बढ़ाने वाले पदमापदमपति भव
वैसे खजाने त&##2379; बहुत हैं लेकिन समय और संकल्प विशेष इन दो खजानों पर अटेन्शन दो। हर समय संकल्प श्रेष्ठ और शुभ हो तो जमा का खाता बढ़ता जायेगा। इस समय एक जमा करेंगे तो पदम मिलेगा, हिसाब है। एक का पदमगुणा करके देने की यह बैंक है इसलिए क्या भी हो, त्याग करना पड़े, तपस्या करनी पड़े, निर्मान बनना पड़े, कुछ भी हो जाए....इन दो बातों पर अटेन्शन हो तो पदमापदमपति बन जायेंगे।
स्लोगन:-
मनोबल से सेवा करो तो उसकी प्रालब्ध कई गुणा ज्यादा मिलेगी।
ब्रह्मा बाप समान बनने के लिए विशेष पुरुषार्
जैसे ब्रह्मा बाप ने याद की शक्ति वा अव्यक्ति शक्ति द्वारा मन और बुद्धि दोनों को कन्ट्रोल किया। पावरफुल ब्रेक द्वारा मन और बुद्धि को कन्ट्रोल कर बीजरूप स्थिति का अनुभव किया। ऐसे आप बच्चे भी ब्रेक देने और मोड़ने की शक्ति धारण कर लो तो बुद्धि की शक्ति व्यर्थ नहीं जायेगी। जितनी एनर्जी जमा होगी उतना ही परखने की, निर्णय करने की शक्ति बढ़ेगी।


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