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Saturday, 19 January 2019

Brahma Kumaris Murli 20 January 2019 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 20 January 2019


20/01/2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 12/04/84 मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


ब्राह्मण जीवन का फाउन्डेशन - पवित्रता
आज बापदादा सभी होलीहंसों को देख रहे हैं। हर एक होलीहंस कहाँ तक होली बने हैं, कहाँ तक हंस बने हैं? पवित्रता अर्थात् होली बनने की शक्ति कहाँ तक जीवन में अर्थात् संकल्प, बोल और कर्म में, सम्बन्ध में, सम्पर्क में लाई है? हर संकल्प होली अर्थात् पवित्रता की शक्ति सम्पन्न है? पवित्रता के संकल्प द्वारा किसी भी अपवित्र संकल्प वाली आत्मा को परख और परिवर्तन कर सकते हो? पवित्रता की शक्ति से किसी भी आत्मा की दृष्टि, वृत्ति और कृति तीनों ही बदल सकते हो। इस महान शक्ति के आगे अपवित्र संकल्प भी वार नहीं कर सकते। लेकिन जब स्वयं संकल्प, बोल वा कर्म में हार खाते हो तब दूसरे व्यक्ति वा वायब्रेशन से हार होती है। किसी के भी सम्बन्ध वा सम्पर्क से हार खाना - यह सिद्ध करता है कि स्वयं बाप से सर्व सम्बन्ध जोड़ने में हार खाये हुए हैं, तब किसी सम्बन्ध वा सम्पर्क से हार खाते हैं। पवित्रता में हार खाना, इसका बीज है किसी भी व्यक्ति वा व्यक्ति के गुण, स्वभाव, व्यक्तित्व वा विशेषता से प्रभावित होना। 
Brahma Kumaris Murli 20 January 2019 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 20 January 2019 (HINDI) 
यह व्यक्ति वा व्यक्त भाव में प्रभावित होना, प्रभावित होना नहीं लेकिन बरबाद होना है। व्यक्ति की व्यक्तिगत विशेषता वा गुण, स्वभाव बाप की दी हुई विशेषता है अर्थात् दाता की देन है। व्यक्ति पर प्रभावित होना यह धोखा खाना है। धोखा खाना अर्थात् दु:ख उठाना। अपवित्रता की शक्ति, मृगतृष्णा समान शक्ति है जो सम्पर्क वा सम्बन्ध से बड़ी अच्छी अनुभव होती है, आकर्षण करती है। समझते हैं कि मैं अच्छाई की तरफ प्रभावित हो रहा हूँ इसलिए शब्द भी यही बोलते वा सोचते कि यह बहुत अच्छे लगते या अच्छी लगती है वा इसका गुण वा स्वभाव अच्छा लगता है। ज्ञान अच्छा लगता है। योग कराना अच्छा लगता है। इससे शक्ति मिलती है, सहयोग मिलता है, स्नेह मिलता है। अल्पकाल की प्राप्ति होती है लेकिन धोखा खाते हैं। देने वाले दाता अर्थात् बीज को, फाउन्डेशन को खत्म कर दिया और रंग-बिरंगी डाली को पकड़कर झूल रहे हैं तो क्या हाल होगा? सिवाए फाउन्डेशन के डाली झुलायेगी या गिरायेगी? जब तक बीज अर्थात् दाता, विधाता से सर्व सम्बन्ध, सर्व प्राप्ति के रस का अनुभव नहीं तब तक कब व्यक्ति से, कब वैभव से, कब वायब्रेशन वायुमण्डल आदि भिन्न-भिन्न डालियों से अल्पकाल की प्राप्ति का मृगतृष्णा समान धोखा खाते रहेंगे। यह प्रभावित होना अर्थात अविनाशी प्राप्ति से वंचित होना। पवित्रता की शक्ति जब चाहो, जिस स्थिति को चाहो, जिस प्राप्ति को चाहो, जिस कार्य में सफलता चाहो, वह सब आपके आगे दासी के समान हाजिर हो जायेगी। जब कलियुग के अन्त में भी रजोप्रधान पवित्रता की शक्ति धारण करने वाले नामधारी महात्माओं की अब अन्त तक भी प्रकृति दासी होने का प्रमाण देख रहे हो। अब तक भी नाम महात्मा चल रहा है, अब तक भी पूज्य हैं। अपवित्र आत्मायें झुकती हैं। तो सोचो - अन्त तक भी पवित्रता के शक्ति की कितनी महानता है और परमात्मा द्वारा प्राप्त हुई सतोप्रधान पवित्रता कितनी शक्तिशाली होगी। इस श्रेष्ठ पवित्रता की शक्ति के आगे अपवित्रता झुकी हुई नहीं लेकिन आपके पांव के नीचे हैं। अपवित्रता रूपी आसुरी शक्ति, शक्ति स्वरूप के पांव के नीचे दिखाई हुई है। जो पांव के नीचे हारी हुई है, हार कैसे खिला सकती है!

ब्राह्मण जीवन और हार खाना इसको कहेंगे नामधारी ब्राह्मण, इसमें अलबेले मत बनो। ब्राह्मण जीवन का फाउन्डेशन है पवित्रता की शक्ति। अगर फाउन्डेशन कमजोर है तो प्राप्तियों की 21 मंजिल वाली बिल्डिंग कैसे टिक सकेगी। यदि फाउन्डेशन हिल रहा है तो प्राप्ति का अनुभव सदा नहीं रह सकता अर्थात् अचल नहीं रह सकते और वर्तमान युग को वा जन्म की महान प्राप्ति का अनुभव भी नहीं कर सकते। युग की, श्रेष्ठ जन्म की महिमा गाने वाले ज्ञानी भक्त बन जायेंगे अर्थात् समझ है लेकिन स्वयं नहीं हैं, इसको कहते हैं ज्ञानी भक्त। अगर ब्राह्मण बनकर सर्व प्राप्तियों का, सर्व शक्तियों का वरदान या वर्सा अनुभव नहीं किया तो उसको क्या कहेंगे? वंचित आत्मा वा ब्राह्मण आत्मा? इस पवित्रता के भिन्न-भिन्न रूपों को अच्छी तरह से जानों, स्वयं के प्रति कड़ी दृष्टि रखो। चलाओ नहीं। निमित्त बनी हुई आत्माओं को, बाप को भी चलाने की कोशिश करते हैं। यह तो होता ही है, ऐसा कौन बना है! वा कहते हैं यह अपवित्रता नहीं है, महानता है, यह तो सेवा का साधन है। प्रभावित नहीं हैं, सहयोग लेते हैं। मददगार है इसीलिए प्रभावित हैं। बाप भूला और लगा माया का गोला या फिर अपने को छुड़ाने के लिए कहते हैं - मैं नहीं करती, यह करते हैं। लेकिन बाप को भूले तो धर्मराज के रूप में ही बाप मिलेगा। बाप का सुख कभी पा नहीं सकेंगे इसलिए छिपाओ नहीं, चलाओ नहीं। दूसरे को दोषी नहीं बनाओ। मृगतृष्णा के आकर्षण में धोखा नहीं खाओ। इस पवित्रता के फाउन्डेशन में बापदादा धर्मराज द्वारा 100 गुणा, पदमगुणा दण्ड दिलाता है। इसमें रियायत कभी नहीं हो सकती इसमें रहमदिल नहीं बन सकते क्योंकि बाप से नाता तोड़ा तब तो किसी के ऊपर प्रभावित हुए। परमात्म प्रभाव से निकल आत्माओं के प्रभाव में आना अर्थात् बाप को जाना नहीं, पहचाना नहीं। ऐसे के आगे बाप, बाप के रूप में नहीं धर्मराज के रूप में है। जहाँ पाप है वहाँ बाप नहीं। तो अलबेले नहीं बनो। इसको छोटी सी बात नहीं समझो। वह भी किसी के प्रति प्रभावित होना, कामना अर्थात् काम विकार का अंश है। बिना कामना के प्रभावित नहीं हो सकते। वह कामना भी काम विकार है। महाशत्रु है। यह दो रूप में आता है। कामना या तो प्रभावित करेगी या परेशान करेगी इसलिए जैसे नारे लगाते हो - काम विकार नर्क का द्वार। ऐसे अब अपने जीवन के प्रति यह धारणा बनाओ कि किसी भी प्रकार की अल्पकाल की कामना मृगतृष्णा के समान धोखेबाज है। कामना अर्थात् धोखा खाना। ऐसी कड़ी दृष्टि वाले इस काम अर्थात् कामना पर काली रूप बनो। स्नेही रूप नहीं बनो, बिचारा है, अच्छा है, थोड़ा-थोड़ा है, ठीक हो जायेगा। नहीं! विकर्म के ऊपर विकराल रूप धारण करो। दूसरों के प्रति नहीं अपने प्रति, तब विकर्म विनाश कर फरिश्ता बन सकेंगे। योग नहीं लगता तो चेक करो - जरूर कोई छिपा हुआ विकर्म अपने तरफ खींचता है। ब्राह्मण आत्मा और योग नहीं लगे, यह हो नहीं सकता। ब्राह्मण माना ही एक के हैं, एक ही है। तो कहाँ जायेंगे? कुछ है ही नहीं तो कहाँ जायेंगे? अच्छा!

सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं लेकिन और भी काम विकार के बाल बच्चे हैं। बापदादा को एक बात पर बहुत आश्चर्य लगता है। ब्राह्मण कहता है, ब्राह्मण आत्मा पर व्यर्थ की विकारी दृष्टि, वृत्ति जाती है। यह कुल कलंकित की बात है। कहना बहन जी वा भाई जी और करना क्या है! लौकिक बहन पर भी अगर कोई बुरी दृष्टि जाए, संकल्प भी आये, तो उसे कुल कलंकित कहा जाता है। तो यहाँ क्या कहेंगे? एक जन्म के नहीं लेकिन जन्म-जन्म का कलंक लगाने वाले। राज्य भाग्य को लात मारने वाले। ऐसे पदमगुणा विकर्म कभी नहीं करना। यह विकर्म नहीं महा विकर्म है इसलिए सोचो, समझो, सम्भालो। यही पाप जमदूतों की तरह चिपक जायेंगे। अभी भले समझते हैं बहुत मजे में रह रहे हैं, कौन देखता है, कौन जानता है लेकिन पाप पर पाप चढ़ता जाता है और यही पाप खाने को आयेंगे। बापदादा जानते हैं कि इसकी रिजल्ट कितनी कड़ी है। जैसे शरीर से कोई तड़प-तड़प कर शरीर छोड़ता है वैसे बुद्धि पापों में तड़प-तड़प कर शरीर छोड़ेगी। सदा सामने यह पाप के जमदूत रहते हैं। इतना कड़ा अन्त है इसलिए वर्तमान में गलती से भी ऐसा पाप नहीं करना। बापदादा सिर्फ सम्मुख बैठे हुए बच्चों को नहीं कह रहे हैं लेकिन चारों ओर के बच्चों को समर्थ बना रहे हैं। खबरदार, होशियार बना रहे हैं। समझा - अभी तक इस बात में कमजोरी काफी है। अच्छा।

सभी स्वयं प्रति इशारे से समझने वाले, सदा अपने विकल्प और विकर्म पर काली रूप धारण करने वाले, सदा भिन्न-भिन्न धोखों से बचने वाले, दु:खों से बचने वाले, शक्तिशाली आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

चुने हुए विशेष अव्यक्त महावाक्

ब्रह्मा बाप के कदम पर कदम रखने वाले ब्रह्माचारी बनो

ब्रह्माचारी अर्थात् ब्रह्मा बाप के आचरण पर चलने वाले। संकल्प, बोल और कर्म रूपी कदम नैचुरल ब्रह्मा बाप के कदम-पर-कदम हो, जिसको फुट स्टेप कहते हैं। हर कदम में ब्रह्मा बाप का आचरण दिखाई दे अर्थात् यह मन-वाणी-कर्म के कदम ब्रह्माचारी हों, ऐसे जो ब्रह्माचारी हैं उनका चेहरा और चलन सदा ही अन्तर्मुखी और अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करायेगा। ब्रह्माचारी वह है जिसके हर कर्म से ब्रह्मा बाप के कर्म दिखाई दें। बोल, ब्रह्मा के बोल समान हो, उठना-बैठना, देखना, चलना-सब समान हो। ब्रह्मा बाप ने जो अपना संस्कार बनाया और शरीर के अन्त में भी याद दिलाया - निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी-यही ब्राह्मणों के नेचुरल संस्कार हों, तब कहेंगे ब्रह्माचारी। स्वभाव-संस्कार में बाप समान की नवीनता हो। मेरा स्वभाव नहीं लेकिन जो बाप का स्वभाव सो मेरा स्वभाव।

पवित्रता का व्रत सिर्फ ब्रह्मचर्य का व्रत नहीं है लेकिन ब्रह्मा समान हर बोल में पवित्रता का वायब्रेशन समाया हुआ हो, एक-एक बोल महावाक्य हो, साधारण नहीं-अलौकिक हो। हर संकल्प में पवित्रता का महत्व हो, हर कर्म में कर्म और योग अर्थात् कर्मयोगी का अनुभव हो - इसको कहा जाता है ब्रह्मचारी और ब्रह्माचारी। जैसे ब्रह्मा बाप साधारण तन में होते भी पुरुषोत्तम अनुभव होते थे। सभी ने देखा या सुना है। अभी अव्यक्त रूप में भी साधारण में पुरुषोत्तम की झलक देखते हो! ऐसे फालो फादर। काम भल साधारण हो लेकिन स्थिति महान् हो। चेहरे पर श्रेष्ठ जीवन का प्रभाव हो। हर चलन से बाप का अनुभव हो-इसको कहते हैं ब्रह्माचारी।

जैसे ब्रह्मा बाप का स्नेह विशेष मुरली से रहा इसलिए मुरलीधर बना। भविष्य श्रीकृष्ण रूप में भी ‘मुरली' ही निशानी दिखाते हैं। तो जिससे बाप का प्यार रहा उससे प्यार रहना-यही प्यार की निशानी है। इसी को कहेंगे ब्रह्मा बाप के प्यारे अर्थात् ब्रह्माचारी। जो भी कर्म करो तो कर्म के पहले, बोल के पहले, संकल्प के पहले चेक करो कि यह ब्रह्मा बाप समान है? फिर संकल्प को स्वरूप में लाओ, बोल को मुख से बोलो, कर्म को कर्मेन्द्रियों से करो। ऐसे नहीं कि सोचा तो नहीं था लेकिन हो गया। ब्रह्मा बाप की विशेषता विशेष यही है-जो सोचा वह किया, जो कहा वह किया, ऐसे फालो फादर करने वाले ही ब्रह्माचारी हैं।

जैसे ब्रह्मा बाप ने निश्चय के आधार पर, रूहानी नशे के आधार पर निश्चित भावी के ज्ञाता बन सेकेण्ड में सब कुछ सफल कर दिया; अपने लिए नहीं रखा, सफल किया। जिसका प्रत्यक्ष सबूत देखा कि अन्तिम दिन तक तन से पत्र-व्यवहार द्वारा सेवा की, मुख से महावाक्य उच्चारण किये। अन्तिम दिवस भी समय, संकल्प, शरीर को सफल किया। तो ब्रह्माचारी अर्थात् सब कुछ सफल करने वाले। सफल करने का अर्थ ही है-श्रेष्ठ तरफ लगाना। जैसे ब्रह्मा बाप सदा हर्षित और गम्भीर-दोनों के बैलेन्स की एकरस स्थिति में रहे, ऐसे फालो फादर। न कभी कोई बात में कन्फ्यूज होना और न कभी किसी बात से मूड चेंज करना। सदा हर कर्म में फालो ब्रह्मा बाप करना तब कहेंगे ब्रह्माचारी।

ब्रह्मा बाप का सबसे प्यारा स्लोगन रहा -"कम खर्चा बालानशीन''। तो कम खर्चे में भी बालानशीन करके दिखाओ। खर्चा कम हो लेकिन उससे जो प्राप्ति हो वह बहुत शानदार हो। कम खर्चे में काम ज्यादा हो। एनर्जी वा संकल्प ज्यादा खर्च न हो। कम बोल हों लेकिन उस कम बोल में स्पष्टीकरण ज्यादा हो, संकल्प कम हों लेकिन शक्तिशाली हों-इसको कहा जाता है ‘कम खर्च बालानशीन' अथवा एकानामी के अवतार।

जैसे ब्रह्मा बाप ने - एक बाप, दूसरा न कोई - यह प्रैक्टिकल में कर्म करके दिखाया। ऐसे बाप समान बनने वालों को भी फालो करना है। ब्रह्मा बाप के समान यही दृढ़ संकल्प करना कि कभी दिलशिकस्त नहीं होना है, सदा दिलखुश रहना है। माया हिलाये तो भी हिलना नहीं है। अगर माया हिमालय जितने बड़े रूप से भी आये तो उस समय रास्ता नहीं निकालना, उड़ जाना। सेकेण्ड में उड़ती कला वाले के लिए पहाड़ भी रूई बन जायेगी।

जैसे साकार ब्रह्मा बाप से प्योरिटी की पर्सनैलिटी स्पष्ट अनुभव करते थे। ये तपस्या के अनुभव की निशानी है। ऐसे यह पर्सनैलिटी अब आपकी सूरत और सीरत द्वारा औरों को अनुभव हो। ब्रह्मा बाप साकार कर्मयोगी का सिम्बल है। कोई कितना भी बिजी हो लेकिन ब्रह्मा बाप से ज्यादा बिज़ी और कोई हो ही नहीं सकता। कितनी भी जिम्मेवारी हो लेकिन ब्रह्मा बाप जितनी जिम्मेवारी कोई के ऊपर नहीं है। तो जैसे ब्रह्मा बाप जिम्मेवारी निभाते भी कर्मयोगी रहे, स्वयं को करनहार समझकर कर्म किया, करावनहार नहीं समझा। ऐसे फालो फादर। कितना भी बड़ा कार्य करो लेकिन ऐसे समझो जैसे नचाने वाला नचा रहा है और हम नाच रहे हैं तो थकेंगे नहीं। कन्फ्यूज़ नहीं होंगे। एवरहैप्पी रहेंगे।

ब्रह्मा बाप समान बनने के लिए विशेष पुरुषार्

जैसे ब्रह्मा बाप सदा परमात्म प्यार में लवलीन रहे। ऐसे आपके ब्राह्मण जीवन का आधार परमात्म प्यार है। प्रभु प्यार ही आपकी प्रापॅर्टी है। यही प्यार ब्राह्मण जीवन में आगे बढ़ाता है इसलिए सदा प्यार के सागर में लवलीन रहो।
वरदान:-
सत्यता की शक्ति द्वारा सदा खुशी में नाचने वाले शक्तिशाली महान आत्मा भव
कहा जाता है "सच तो बिठो नच''। सच्चा अर्थात् सत्यता की शक्ति वाला सदा नाचता रहेगा, कभी मुरझायेगा नहीं, उलझेगा नहीं, घबरायेगा नहीं, कमजोर नहीं होगा। वह खुशी में सदा नाचता रहेगा। शक्तिशाली होगा। उसमें सामना करने की शक्ति होगी, सत्यता कभी हिलती नहीं है, अचल होती है। सत्य की नांव डोलती है लेकिन डूबती नहीं। तो सत्यता की शक्ति को धारण करने वाली आत्मा ही महान है।
स्लोगन:-
व्यस्त मन-बुद्धि को सेकण्ड में स्टॉप कर लेना ही सर्व श्रेष्ठ अभ्यास है।

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