Saturday, 8 December 2018

Brahma Kumaris Murli 09 December 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 09 December 2018


09/12/2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 07/03/84 मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


कर्मातीत, वनाप्रस्थी आत्मायें ही तीव्रगति की सेवा के निमित्त
मधुबन वरदान भूमि, समर्थ भूमि, श्रेष्ठ संग की भूमि, सहज परिवर्तन भूमि, सर्व प्राप्तियों के अनुभव कराने वाली भूमि है। ऐसी भूमि पर आकर सभी स्वयं को सम्पन्न अर्थात् सब बातों से भरपूर अनुभव करते हो? कोई अप्राप्ति तो नहीं है? जो सर्व खजाने मिले हैं उन्हों को सदाकाल के लिए धारण किया है? ऐसे समझते हो कि यहाँ से सेवा स्थान पर जाकर महादानी बन यही शक्तियाँ, सर्व प्राप्तियाँ सर्व को देने के निमित्त बनेंगे? सदा के लिए स्वयं को विघ्न-विनाशक, समाधान स्वरूप अनुभव किया है? स्व की समस्या तो अलग रही लेकिन अन्य आत्माओं के समस्याओं का भी समाधान स्वरूप।

समय के प्रमाण अब ब्राह्मण आत्मायें समस्याओं के वश हो जाएं, इससे अभी पार हो गये। समस्याओं के वश होना - यह बाल अवस्था है। अब ब्राह्मण आत्माओं की बाल अवस्था का समय समाप्त हो चुका। युवा अवस्था में मायाजीत बनने की विधि से महावीर बने, सेवा में चक्रवर्ती बने, अनेक आत्माओं के वरदानी महादानी बने, अनेक प्रकार के अनुभव कर महारथी बने, अब कर्मातीत वानप्रस्थ स्थिति में जाने का समय पहुँच गया है। कर्मातीत वानप्रस्थ स्थिति द्वारा ही विश्व की सर्व आत्माओं को आधाकल्प के लिए कर्म बन्धनों से मुक्त कराए मुक्ति में भेजेंगे। मुक्त आत्मायें ही सेकण्ड में मुक्ति का वर्सा बाप से दिला सकती हैं। 
Brahma Kumaris Murli 09 December 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 09 December 2018 (HINDI)
मैजारिटी आत्मायें मुक्ति की भीख मांगने के लिए आप कर्मातीत वानप्रस्थ महादानी वरदानी बच्चों के पास आयेंगी। जैसे अभी आपके जड़ चित्रों के आगे, कोई मन्दिरों में जाकर प्रार्थना कर सुख शान्ति मांगते हैं। कोई तीर्थ स्थानों पर जाकर मांगते हैं। कोई घर बैठे मांगते हैं। जिसकी जहाँ तक शक्ति होती वहाँ तक पहुँचते हैं, लेकिन यथाशक्ति, यथाफल की प्राप्ति करते हैं। कोई दूरे बैठे भी दिल से करते हैं और कोई मूर्ति के सामने तीर्थ स्थान वा मन्दिरों में जाकर भी दिखावे मात्र करते हैं। स्वार्थ वश करते हैं। उन सब हिसाब अनुसार जैसा कर्म, जैसी भावना वैसा फल मिलता है। ऐसे अब समय प्रमाण आप चैतन्य महादानी वरदानी मूर्तियों के आगे प्रार्थना करेंगे। कोई सेवा स्थान रूपी मन्दिरों में पहुँचेंगे। कोई महान तीर्थ मधुबन तक पहुँचेंगे और कोई घर बैठे साक्षात्कार करते दिव्य बुद्धि द्वारा प्रत्यक्षता का अनुभव करेंगे। सम्मुख न आते भी स्नेह और दृढ़ संकल्प से प्रार्थना करेंगे। मन्सा में आप चैतन्य फरिश्तों का आह्वान कर मुक्ति के वर्से की अंचली मांगेंगे। थोड़े समय में सर्व आत्माओं को वर्सा दिलाने का कार्य तीव्रगति से करना होगा। जैसे विनाश के साधन रिफाइन होने के कारण तीव्रगति से समाप्ति के निमित्त बनेंगे, ऐसे आप वरदानी महादानी आत्मायें, अपने कर्मातीत फरिश्ते स्वरूप के सम्पूर्ण शक्तिशाली स्वरूप द्वारा, सर्व की प्रार्थना का रेसपान्ड मुक्ति का वर्सा दिलायेगी। तीव्रगति के इस कार्य के लिए मास्टर सर्व शक्तिवान, शक्तियों के भण्डार, ज्ञान के भण्डार, याद स्वरूप तैयार हो? विनाश की मिशनरी और वरदान की मशीनरी दोनों तीव्रगति से साथ-साथ चलेंगी।

बहुतकाल से अर्थात् अब से भी एवररेडी। तीव्र-गति वाले कर्मातीत, समाधान स्वरूप सदा रहने का अभ्यास नहीं करेंगे तो तीव्रगति के समय देने वाले बनने के बजाए देखने वाले बनना पड़े। तीव्र पुरुषार्थी बहुत काल वाले तीव्र-गति की सेवा निमित्त बन सकेंगे। यह है वानप्रस्थ अर्थात् सर्व बन्धन-मुक्त, न्यारे और बाप के साथ-साथ तीव्रगति के सेवा की प्यारी अवस्था। तो अब देने वाले बनने का समय है, ना कि अब भी स्वयं प्रति, समस्याओं प्रति लेने वाले बनने का समय है। स्व की समस्याओं में उलझना - अब वह समय गया। समस्या भी एक अपनी कमजोरी की रचना है। कोई द्वारा वा कोई सरकमस्टांस द्वारा आई हुई समस्या वास्तव में अपनी कमजोरी का ही कारण है। जहाँ कमजोरी है वहाँ व्यक्ति द्वारा वा सरकमस्टांस द्वारा समस्या वार करती है। अगर कमजोरी नहीं तो समस्या का वार नहीं। आई हुई समस्या, समस्या के बजाए समाधान रूप में अनुभवी बनायेगी। यह अपनी कमजोरी के उत्पन्न हुए मिक्की माउस हैं। अभी तो सब हॅस रहे हैं और जिस समय आती है उस समय क्या करते हैं? खुद भी मिक्की माउस बन जाते हैं। इससे खेलो न कि घबराओ। लेकिन यह भी बचपन का खेल है। न रचना करो, न समय गंवाओ। इससे परे स्थिति में वानप्रस्थी बन जाओ। समझा!

समय क्या कहता? बाप क्या कहता? अब भी खिलौनों से खेलना अच्छा लगता है क्या? जैसे कलियुग की मानव रचना भी क्या बन गई है? मुरली में सुनते हो ना। बिच्छु-टिण्डन हो गये हैं। तो यह कमजोर समस्याओं की रचना भी बिच्छू टिण्डन के समान स्वयं को काटती है, शक्तिहीन बना देती है। इसलिए सभी मधुबन से सम्पन्न बन यह दृढ़ संकल्प करके जाना कि अब से स्वयं की समस्या को तो समाप्त किया लेकिन और किसके लिए भी समस्या स्वरूप नहीं बनेंगे। स्व प्रति, सर्व के प्रति सदा समाधान स्वरूप रहेंगे। समझा!

इतना खर्चा करके मेहनत करके आते हो तो मेहनत का फल इस दृढ़ संकल्प द्वारा सहज सदा मिलता रहेगा। जैसे मुख्य बात पवित्रता के लिए दृढ़ संकल्प किया है ना कि मर जायेंगे, सहन करेंगे लेकिन इस व्रत को कायम रखेंगे। स्वप्न में वा संकल्प में भी अगर ज़रा भी हलचल होती है तो पाप समझते हो ना। ऐसे समस्या स्वरूप बनना या समस्या के वश हो जाना - यह भी पाप का खाता है। पाप की परिभाषा है, पहचान है, जहाँ पाप होगा वहाँ बाप याद नहीं होगा, साथ नहीं होगा। पाप और बाप, दिन और रात जैसे हैं। तो जब समस्या आती है उस समय बाप याद आता है? किनारा हो जाता है ना? फिर जब परेशान होते हो तब बाप याद आता है। और वह भी भक्त के रूप में याद करते हो, अधिकारी के रूप में नहीं। शक्ति दे दो, सहारा दे दो। पार लगा दो। अधिकारी के रूप में, साथी के रूप में, समान बनकर याद नहीं करते हो। तो समझा, अब कया करना है। समाप्ति समारोह मनाना है ना। समस्याओं का समाप्ति समारोह मनायेंगे ना! या सिर्फ डान्स करेंगे? अच्छे-अच्छे ड्रामा करते हो ना! अभी यह फंक्शन करना क्योंकि अभी सेवा में समय बहुत चाहिए। वहाँ पुकार रहे हैं और यहाँ हिल रहे हैं, यह तो अच्छा नहीं है ना! वह वरदानी, महादानी कह याद कर रहे हैं और आप मूड आफ में रो रहे हैं तो फल कैसे देंगे! उनके पास भी आपके गर्म आंसू पहुँच जायेंगे। वह भी घबराते रहेंगे। अभी याद रखो कि हम ब्रह्मा बाप के साथ-इष्ट देव पूज्य आत्मायें हैं। अच्छा!

सदा बहुतकाल के तीव्र पुरुषार्थी, तीव्रगति की सेवा के एवररेडी बच्चों को सदा विश्व परिवर्तन सो समस्या परिवर्तक, समाधान स्वरूप बच्चों को, सदा रहमदिल बन भक्त आत्माओं और ब्राह्मण आत्माओं के स्नेही और सहयोगी रहने वाली श्रेष्ठ आत्मायें, सदा समस्याओं से परे रहने वाले, कर्मातीत वानप्रस्थ स्थिति में रहने वाले सम्पन्न स्वरूप बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

न्यूयार्क पार्टी से:- सभी अपने को बाप की विशेष आत्मायें अनुभव करते हो? सदा यही खुशी रहती है कि जैसे बाप सदा श्रेष्ठ है वैसे हम बच्चे भी बाप समान श्रेष्ठ हैं? इसी स्मृति से सदा हर कर्म स्वत: ही श्रेष्ठ हो जायेगा। जैसा संकल्प होगा वैसे कर्म होंगे। तो सदा स्मृति द्वारा श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहने वाली विशेष आत्मायें हो। सदा अपने इस श्रेष्ठ जन्म की खुशियां मनाते रहो। ऐसा श्रेष्ठ जन्म जो भगवान के बच्चे बन जायें - ऐसा सारे कल्प में नहीं होता। पांच हजार वर्ष के अन्दर सिर्फ इस समय यह अलौकिक जन्म होता है। सतयुग में भी आत्माओं के परिवार में आयेंगे लेकिन अब परमात्म सन्तान हो। तो इसी विशेषता को सदा याद रखो। सदा मैं ब्राह्मण ऊंचे ते ऊंचे धर्म, कर्म और परिवार का हूँ। इसी स्मृति द्वारा हर कदम में आगे बढ़ते चलो। पुरुषार्थ की गति सदा तेज हो। उड़ती कला सदा ही मायाजीत और निर्बन्धन बना देगी। जब बाप को अपना बना दिया तो और रहा ही क्या। एक ही रह गया ना। एक में ही सब समाया हुआ है। एक की याद में, एकरस स्थिति में स्थित होने से शान्ति, शक्ति और सुख की अनुभूति होती रहेगी। जहाँ एक है वहाँ एक नम्बर है। तो सभी नम्बरवन हो ना! एक को याद करना सहज है या बहुतों को? बाप सिर्फ यही अभ्यास कराते हैं और कुछ नहीं। दस चीज़ें उठाना सहज है या एक चीज़ उठाना सहज है? तो बुद्धि द्वारा एक की याद धारण करना बहुत सहज है। लक्ष्य सबका बहुत अच्छा है। लक्ष्य अच्छा है तो लक्षण अच्छे होते ही जायेंगे। अच्छा!

अव्यक्त महावाक्य - संकल्प शक्ति को कन्ट्रोल करो

समय प्रमाण शीतलता की शक्ति द्वारा हर परिस्थिति में अपने संकल्पों की गति को, बोल को शीतल और धैर्यवत बनाओ। यदि संकल्प की स्पीड फास्ट होगी तो बहुत समय व्यर्थ जायेगा, कन्ट्रोल नहीं कर सकेंगे इसलिए शीतलता की शक्ति धारण कर लो तो व्यर्थ से वा एक्सीडेंट से बच जायेंगे। यह क्यों, क्या, ऐसा नहीं वैसा, इस व्यर्थ की फास्ट गति से छूट जायेंगे। कोई-कोई बच्चे कभी-कभी बड़ा खेल दिखाते हैं। व्यर्थ संकल्प इतना फोर्स से आते जो कन्ट्रोल नहीं कर पाते। फिर उस समय कहते क्या करें हो गया ना! रोक नहीं सकते। जो आया वह कर लिया लेकिन व्यर्थ के लिए कन्ट्रोलिंग पावर चाहिए। जैसे एक समर्थ संकल्प का फल पदमगुणा मिलता है। ऐसे ही एक व्यर्थ संकल्प का हिसाब-किताब - उदास होना, दिलशिकस्त होना वा खुशी गायब होना-यह भी एक का बहुत गुणा के हिसाब से अनुभव होता है। रोज़ अपनी दरबार लगाओ और अपने सभी कार्यकर्ता कर्मचारियों से हालचाल पूछो। आपकी जो सूक्ष्म शक्तियां मंत्री वा महामंत्री हैं, उन्हें अपने आर्डर प्रमाण चलाओ। यदि अभी से राज्य दरबार ठीक होगा तो धर्मराज की दरबार में नहीं जायेगे। धर्मराज भी स्वागत करेगा। लेकिन यदि कन्ट्रोलिंग पावर नहीं होगी तो फाइनल रिज़ल्ट में फाइन भरने के लिए धर्मराज पुरी में जाना पड़ेगा। यह सजायें फाइन हैं। रिफाइन बन जाओ तो फाइन नहीं भरना पड़ेगा।

वर्तमान, भविष्य का दर्पण है। वर्तमान की स्टेज अर्थात् दर्पण द्वारा अपना भविष्य स्पष्ट देख सकते हो। भविष्य राज्यअधिकारी बनने के लिए चेक करो कि वर्तमान मेरे में रूलिंग पावर कहाँ तक है? पहले सूक्ष्म शक्तियाँ, जो विशेष कार्यकर्ता हैं - संकल्प शक्ति के ऊपर, बुद्धि के ऊपर और संस्कारों के ऊपर पूरा अधिकार हो। यह विशेष तीन शक्तियाँ राज्य की कारोबार चलाने वाले मुख्य सहयोगी कार्यकर्ता हैं। अगर यह तीनों कार्यकर्ता आप आत्मा अर्थात् राज्य-अधिकारी राजा के इशारे पर चलते हैं तो सदा वह राज्य यथार्थ रीति से चलेगा। जैसे राजा स्वयं कोई कार्य नहीं करता, कराता है। करने वाले राज्य कारोबारी अलग होते हैं। अगर राज्य कारोबारी ठीक नहीं होते तो राज्य डगमग हो जाता है। ऐसे आत्मा भी करावनहार है, करनहार ये विशेष त्रिमूर्ति शक्तियाँ हैं। पहले इनके ऊपर रूलिंग पावर हो तो यह साकार कर्मेन्द्रियाँ उनके आधार पर स्वत: ही सही रास्ते पर चलेंगी। जैसे सतयुगी सृष्टि के लिए कहते हैं एक राज्य एक धर्म है। ऐसे ही अब स्वराज्य में भी एक राज्य अर्थात् स्व के इशारे पर सर्व चलने वाले हों। मन अपनी मनमत पर न चलावे, बुद्धि अपनी निर्णय शक्ति की हलचल न करे। संस्कार आत्मा को नाच नचाने वाले न हो तब कहेंगे एक धर्म, एक राज्य। तो ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर धारण करो।

पास विद आनर बनने अथवा राज्य अधिकारी बनने के लिए मन जो सूक्ष्म शक्ति है वह कन्ट्रोल में हो अर्थात् आर्डर प्रमाण कार्य करे। जो सोचो वह आर्डर में हो। स्टॉप कहो तो स्टॉप हो जाए, सेवा का सोचो तो सेवा में लग जाए। परमधाम का सोचो तो परमधाम में पहुंच जाए। ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर अभी बढ़ाओ। छोटे-छोटे संस्कारों में, युद्ध में समय नहीं गंवाओ। कन्ट्रोंलिग पावर धारण कर लो तो कर्मातीत अवस्था के समीप पहुंच जायेंगे। जब और सब संकल्प शान्त हो जाते हैं, बस एक बाप और आप - इस मिलन की अनुभूति का संकल्प रहता है तब पावरफुल योग कहा जाता है। इसके लिए समाने वा समेटने की शक्ति चाहिए। स्टॉप कहते ही संकल्प स्टॉप हो जाएं। फुल ब्रेक लगे, ढीली नहीं। पावरफुल ब्रेक हो। कन्ट्रोलिंग पावर हो। अगर एक सेकण्ड के सिवाए ज्यादा समय लग जाता है तो समाने की शक्ति कमजोर है। लास्ट में फाइनल पेपर का क्वेश्चन होगा-सेकण्ड में फुल स्टॉप, इसी में ही नम्बर मिलेंगे। सेकेण्ड से ज्यादा हो गया तो फेल हो जायेंगे। एक बाप और मैं, तीसरी कोई बात न आये। ऐसे नहीं यह कर लूं, यह देख लूं...यह हुआ, नहीं हुआ। यह क्यों हुआ, यह क्या हुआ-कोई भी बात आई तो फेल। कोई भी बात में क्यों, क्या की क्यू लगा दी तो उस क्यू को समाप्त करने में बहुत समय जायेगा। जब रचना रच ली तो पालना करनी पड़ेगी, पालना से बच नहीं सकते। समय, एनर्जी देनी ही पड़ेगी, इसलिए इस व्यर्थ रचना का बर्थ कन्ट्रोल करो।

जो अपनी सूक्ष्म शक्तियों को हैंडिल कर सकता है, वह दूसरों को भी हैंडिल कर सकता है। तो स्व के ऊपर कन्ट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर सर्व के लिए यथार्थ हैंडलिंग पावर बन जाती है। चाहे अज्ञानी आत्माओं को सेवा द्वारा हैंडिल करो, चाहे ब्राह्मण-परिवार में स्नेह सम्पन्न, सन्तुष्टता सम्पन्न व्यवहार करो - दोनों में सफल हो जायेंगे।
वरदान:-
मन्सा और वाचा के मेल द्वारा जादूमंत्र करने वाले नवीनता और विशेषता सम्पन्न भव
मन्सा और वाचा दोनों का मिलन जादूमंत्र का काम करता है, इससे संगठन की छोटी-छोटी बातें ऐसे समाप्त हो जायेंगी जो आप सोचेंगे कि यह तो जादू हो गया। मन्सा शुभ भावना वा शुभ दुआयें देने में बिजी हो तो मन की हलचल समाप्त हो जायेगी, पुरुषार्थ से कभी दिलशिकस्त नहीं होंगे। संगठन में कभी घबरायेंगे नहीं। मन्सा-वाचा की सम्मिलित सेवा से विहंग मार्ग की सेवा का प्रभाव देखेंगे। अब सेवा में इसी नवीनता और विशेषता से सम्पन्न बनो तो 9 लाख प्रजा सहज तैयार हो जायेगी।
स्लोगन:-
बुद्धि यथार्थ निर्णय तब देगी जब पूरे-पूरे वाइसलेस बनेंगे।

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