Sunday, 28 October 2018

Brahma Kumaris Murli 29 October 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 29 October 2018


29/10/2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


''मीठे बच्चे - आज्ञाकारी बनो, बाप की पहली आज्ञा है - अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो''
प्रश्नः-
आत्मा रूपी बर्तन अशुद्ध क्यों हुआ है? उसको शुद्ध बनाने का साधन क्या है?
उत्तर:-
वाह्यात बातों को सुनते और सुनाते आत्मा रूपी बर्तन अशुद्ध बन गया है। इसको शुद्ध बनाने के लिए बाप का फ़रमान है हियर नो ईविल, सी नो ईविल........ एक बाप से सुनो, बाप को ही याद करो तो आत्मा रूपी बर्तन शुद्ध हो जायेगा। आत्मा और शरीर दोनों पावन बन जायेंगे।
गीत:-
जो पिया के साथ है.........  
Brahma Kumaris Murli 29 October 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 29 October 2018 (HINDI)
ओम् शान्ति।
ओम् शान्ति का अर्थ तो बच्चों ने समझा हुआ है। बच्चों को घड़ी-घड़ी प्वाइन्ट्स दी जाती हैं। जैसे घड़ी-घड़ी कहा जाता है बाप और वर्से को याद करो। यहाँ कोई मनुष्य की याद नहीं है। मनुष्य, मनुष्य की वा किसी देवता की याद दिलायेंगे। पारलौकिक बाप की याद कोई दिला न सके क्योंकि बाप को कोई जानते नहीं। यहाँ तुमको घड़ी-घड़ी कहा जाता है अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। जैसे बाप को बच्चे होते हैं तो सब समझ सकते हैं यह बाप से वर्सा लेने आया है। फिर उनको बाप और वर्सा याद रहता है। यहाँ भी ऐसे है। जरूर बच्चे बाप को जानते नहीं हैं इसलिए बाप को आना पड़ता है। जो बाप के साथ हैं उन्हों के लिए यह ज्ञान बरसात है। वेद शास्त्रों में जो ज्ञान है वह सब है भक्ति मार्ग की सामग्री। जप, तप, दान, पुण्य, संध्या, गायत्री आदि जो कुछ करते हैं वह सब है भक्ति मार्ग की सामग्री। सन्यासी भी भक्त हुए। पवित्रता बिगर कोई शान्तिधाम में जा नहीं सकते इसलिए वह घरबार छोड़ जाते हैं। परन्तु सारी दुनिया तो ऐसे नहीं करेगी। उन्हों के इस हठयोग की भी ड्रामा में नूँध है। तुम बच्चों को राजयोग सिखलाने कल्प-कल्प एक ही बार आता हूँ। मेरा और कोई अवतार होता नहीं है। रीइनकारनेशन आफ गॉड। वह हुआ ऊंच ते ऊंच। फिर रीइनकारनेशन आफ जगत अम्बा और जगत पिता भी जरूर होने चाहिए। वास्तव में रीइनकारनेशन अक्षर सिर्फ बाप से ही लगता है। सद्गति दाता एक ही बाप है। यूँ तो हर एक चीज़ फिर से रीइनकारनेट होती है। जैसे अभी भ्रष्टाचार है तो कहेंगे भ्रष्टाचार रीइनकारनेट हुआ है। फिर से भ्रष्टाचार हुआ है, फिर से श्रेष्ठाचार आयेगा। रीइनकारनेट तो हर चीज़ का होता है। अभी पुरानी दुनिया है फिर नई दुनिया आयेगी। नई दुनिया के बाद कहेंगे फिर से पुरानी दुनिया आनी है। यह सब बातें बाप बैठ समझाते हैं। जब यहाँ बैठते हो तो हमेशा ऐसे समझो - मैं आत्मा हूँ, मुझे बाप का फ़रमान मिला हुआ है मुझे याद करो। बच्चों के सिवाए तो और कोई को बाप का फ़रमान मिल न सके। फिर बच्चों में कोई तो आज्ञाकारी होते हैं, कोई आज्ञा न मानने वाले भी होते हैं। बाप कहते हैं - हे आत्मायें, तुम मेरे साथ बुद्धि का योग लगाओ। बाप आत्माओं से बात करते हैं, और कोई विद्धान-पण्डित आदि ऐसे नहीं कहेंगे कि मैं आत्माओं से बात करता हूँ। वह तो आत्मा सो परमात्मा समझ लेते हैं। वह है रांग। तुम बच्चे जानते हो कि शिवबाबा इस शरीर द्वारा हमें समझा रहे हैं। शरीर बिगर तो एक्ट हो न सके। पहले-पहले तो यह निश्चय चाहिए। निश्चय बिगर तो कुछ भी बुद्धि में नहीं बैठेगा। पहले निश्चय चाहिए कि हम आत्माओं का बाप वह निराकार परमपिता परमात्मा है और साकार में है प्रजापिता ब्रह्मा, हम हैं ब्रह्माकुमार-कुमारियां। शिव के तो सब आत्मायें बच्चे हैं इसलिए शिवकुमार कहेंगे, कुमारी नहीं। यह सब बातें धारण करनी है। धारणा तब होगी जब निरन्तर याद करते रहेंगे। याद करने से ही बुद्धि रूपी बर्तन शुद्ध होगा। वाह्यात बातें सुनते-सुनते बर्तन अशुद्ध बन गया है, उसको शुद्ध बनाना है। बाप का फ़रमान है मुझे याद करो तो तुम्हारी बुद्धि पवित्र होगी। तुम्हारी आत्मा में खाद पड़ गई है, अब पवित्र बनना है। सन्यासी कहते हैं आत्मा निर्लेप है। बाप कहते हैं आत्मा में ही खाद पड़ी है। श्रीकृष्ण की आत्मा और शरीर दोनों पवित्र हैं। दोनों पवित्र सिर्फ सतयुग में ही होते हैं। यहाँ तो हो नहीं सकते। तुम आत्मायें नम्बरवार पवित्र होती जा रही हो। अभी पवित्र बनी नहीं है। कोई भी पवित्र नहीं है। सब पुरुषार्थ कर रहे हैं। अन्त में नम्बरवार सबकी रिजल्ट निकलेगी।

बाप आकर सभी आत्माओं को फ़रमान करते हैं कि मुझे याद करो, अपने को अशरीरी समझो, देही-अभिमानी बनो। मूल यह बात बाप बिगर कोई समझा नहीं सकते। पहले यह पूरा निश्चय होगा तो विजय पायेंगे, निश्चय नहीं होगा तो विजय नहीं पायेंगे। निश्चय बुद्धि विजयन्ती, संशय बुद्धि विनशयन्ती। गीता में कोई-कोई अक्षर बहुत अच्छे हैं। इसको कहा जाता है आटे में नमक। बाप कहते हैं मैं तुमको सभी वेदों शास्त्रों का सार समझाता हूँ कि इनमें क्या-क्या है? यह सब हैं भक्तिमार्ग के रास्ते। इनकी भी ड्रामा में नूँध है। यह प्रश्न नहीं उठ सकता कि यह भक्तिमार्ग क्यों बनाया हुआ है? यह तो अनादि बना बनाया ड्रामा है। तुमने भी इस ड्रामा में बाप से स्वर्ग के मालिक बनने का वर्सा अनेक बार लिया है और लेते रहेंगे। कभी अन्त नहीं हो सकता। यह चक्र अनादि फिरता ही रहता है। तुम बच्चे अभी दु:खधाम में हो फिर शान्तिधाम में जायेंगे, शान्तिधाम से सुखधाम में जायेंगे फिर दु:खधाम में आयेंगे - यह अनादि चक्र चलता ही रहता है। सुखधाम से दु:खधाम आने में तुम बच्चों को 5 हजार वर्ष लगते हैं। जिसमें तुम 84 जन्म लेते हो। सिर्फ तुम बच्चे ही 84 जन्म लेते हो, सब नहीं ले सकते। यह बेहद का बाप तुमको डायरेक्ट समझा रहे हैं, और बच्चे फिर मुरली सुनेंगे वा पढ़ेंगे या टेप सुनेंगे। टेप भी सब नहीं सुन सकते। तो पहले-पहले तुम बच्चों को उठते-बैठते इस याद में रहना है। मनुष्य तो माला फेरते राम-राम जपते हैं। रुद्राक्ष की माला कहते हैं ना। अब रुद्र तो है भगवान्। फिर इस माला में मेरु दाना इकट्ठा है। वह तो विष्णु के युगल स्वरूप हैं। वह कौन हैं? यह मात-पिता जो फिर विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण बनते हैं इसलिए इनको मेरु कहा जाता है। फूल है शिवबाबा फिर मेरु यह मम्मा-बाबा जिनको मात-पिता कहते हो। विष्णु को मात-पिता नहीं कह सकेंगे। लक्ष्मी-नारायण को मात-पिता तो उनके बच्चे ही कहेंगे। आजकल तो सबके आगे जाकर कहते हैं त्वमेव माताश्च पिता..... बस, कोई एक ने महिमा की तो उनके पीछे फालो करने लग पड़ते। यह है ही अनराइटियस दुनिया। कलियुग को कहा जाता है अनराइटियस, सतयुग को कहा जाता है राइटियस। वहाँ आत्मा और शरीर दोनों पवित्र होते हैं। सतयुग में कृष्ण गोरा है, फिर अन्तिम जन्म में उनकी आत्मा सांवरी बनी है। यह ब्रह्मा-सरस्वती इस समय सांवरे हैं ना। आत्मा काली बन गई है तो उनका जेवर भी काला बन गया है। सोने में ही खाद पड़ती है, उससे जेवर भी जो बनता है वह खाद वाला। सतयुग में जब देवी-देवताओं की गवर्मेन्ट है तो यह झूठ (खाद) होती नहीं। वहाँ तो सोने के महल बनते है। भारत सोने की चिड़िया था, अभी तो मुलम्मा है। ऐसे भारत को फिर से स्वर्ग बाप ही बना सकते हैं।

बाप समझाते हैं, श्रीमत भगवानुवाच है ना। कृष्ण तो दैवीगुणों वाला है, दो भुजा, दो टांग वाला है। चित्रों में तो कहाँ नारायण को, कहाँ लक्ष्मी को 4 भुजायें दी हैं। समझते कुछ भी नहीं। ‘ओम्' अक्षर भी कहते हैं, ओम् का अर्थ बताते हैं - ओम् माना मैं गॉड, जिधर देखता हूँ गॉड ही गॉड है। परन्तु यह तो रांग है। ओम् माना अहम् आत्मा। बाप भी कहते हैं अहम् आत्मा परन्तु मैं सुप्रीम हूँ इसलिए मुझे परमात्मा कहा जाता है। मैं परमधाम में रहता हूँ। ऊंचे ते ऊंच भगवान् फिर सूक्ष्मवतन में ब्रह्मा-विष्णु-शंकर की आत्मा है। फिर नीचे आओ तो यह मनुष्य लोक है। वह दैवी लोक, वह आत्माओं का लोक जिसको मूलवतन कहा जाता है। यह बातें समझने की हैं। तुम बच्चों को यह अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान मिलता है जिससे तुम भविष्य में मालामाल डबल सिरताज बनते हो। देखो, श्रीकृष्ण को दोनों ताज है ना। फिर वही बच्चा चन्द्रवंशी में आता है तो दो कला कम हो जाती हैं। फिर वैश्य वंशी में आयेंगे तो और 4 कला कम हो जायेगी। फिर लाइट का ताज उड़ जायेगा। बाकी रत्न जड़ित ताज रहेगा। फिर जो अच्छा दान-पुण्य करते हैं, उनको एक जन्म के लिये अच्छी राजाई मिलती है। फिर दूसरे जन्म में भी अच्छा दान-पुण्य किया तो फिर भी राजाई मिल सकती है। यहाँ तो तुम 21 जन्मों के लिए राजाई पा सकते हो, मेहनत करनी पड़ती है। तो बाप अपना परिचय देते हैं, कहते हैं - आई एम सुप्रीम सोल इसलिए उनको परमपिता परम आत्मा अर्थात् परमात्मा कहा जाता है। तुम बच्चे उस सुप्रीम को याद करते हो। तुम हो सालिग्राम, वह है शिव। शिव का बड़ा लिंग और सालिग्राम मिट्टी के बनाते हैं। यह कौन सी आत्माओं का यादगार बनाते हैं, यह भी कोई नहीं जानते। तुम शिवबाबा के बच्चे भारत को स्वर्ग बनाते हो इसलिए तुम्हारी पूजा होती है। फिर तुम देवता बनते हो तब भी तुम्हारी पूजा होती है। शिवबाबा के साथ तुम इतनी सर्विस करते हो इसलिए सालिग्रामों की भी पूजा होती है। जो उत्तम से उत्तम कर्तव्य करते हैं, उन्हों की पूजा होती है और कलियुग में जो अच्छा काम करते है उन्हों का यादगार बनाते हैं। कल्प-कल्प बाप तुम बच्चों को सारे सृष्टि चक्र का राज़ समझाते है अर्थात् तुमको स्वदर्शन चक्रधारी बनाते हैं। स्वदर्शन चक्र विष्णु को नहीं हो सकता, वह तो देवता बन गया। यह ज्ञान सारा तुमको है। फिर लक्ष्मी-नारायण बनेंगे तो यह ज्ञान नहीं रहेगा। वहाँ तो सब सद्गति में हैं। तुम बच्चे यह ज्ञान अभी ही सुनते हो फिर राजाई पा लेते हो। स्वर्ग की स्थापना हो गई फिर ज्ञान की दरकार नहीं रहती।

बाप ही आकर अपना और रचना का पूरा परिचय देते हैं। सन्यासियों ने माताओं की निंदा की है, परन्तु बाप आकर माताओं को उठाते हैं। बाप यह भी समझाते हैं कि यह सन्यासी न होते तो भारत काम चिता पर बैठ एकदम ख़ाक हो जाता। जब देवी-देवता वाम मार्ग में गिरते हैं तो उस समय अर्थक्वेक बड़ी जोर की होती है फिर सब नीचे चला जाता है। और खण्ड आदि तो होते नहीं, भारत ही होता है। इस्लामी आदि तो पीछे आते हैं तो फिर वह सतयुग की चीजें यहाँ रहती नहीं। तुम जो सोमनाथ का मन्दिर देखते हो वह कोई वैकुण्ठ का नहीं है। यह तो भक्ति मार्ग में बना है, जिसको मुहम्मद गज़नवी आदि ने लूटा। बाकी देवताओं के महल आदि सब अर्थक्वेक में गायब हो जाते हैं। ऐसे नहीं कि महल के महल नीचे गये हैं वही फिर ऊपर आ जायेंगे। नहीं, वह तो अन्दर ही टूट फूट सड़ जाते हैं। फिर उसी समय खोदते हैं तो कुछ न कुछ मिलता है। अभी तो कुछ भी नहीं मिलता है। शास्त्रों में कोई यह बातें नहीं हैं। सद्गति दाता है ही एक बाप। पहले-पहले तो यह निश्चय चाहिए। निश्चय में ही माया विघ्न डालती है। कहते हैं भगवान् कैसे आयेगा? अरे, शिव जयन्ती है तो जरूर आये होंगे। बाप ने समझाया है मैं बेहद के दिन और बेहद की रात के संगम पर आता हूँ। यह कोई नहीं जानते कि किस समय आता हूँ? तुम बच्चे जानते हो। बाप ने ही यह नॉलेज दी है और दिव्य दृष्टि से यह चित्र आदि बनवाये हैं। गीता में भी कल्प वृक्ष का कुछ वर्णन है। बच्चों को कहते हैं हम तुम अभी हैं, कल्प पहले भी थे और फिर कल्प-कल्प मिलते रहेंगे। मैं कल्प-कल्प तुमको यह ज्ञान दूँगा। तो चक्र भी सिद्ध होता है। परन्तु तुम्हारे सिवाए कोई समझ न सके। यह सारे सृष्टि चक्र का चित्र है, जरूर कोई ने बनवाया है। बाप भी इस पर, बच्चे भी इस पर समझाते है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) हर बात में विजय का आधार निश्चय है इसलिए निश्चयबुद्धि जरूर बनना है। सद्गति दाता बाप में कभी संशय नहीं उठाना है।
2) बुद्धि को पवित्र वा शुद्ध बनाने के लिए अशरीरी बनने का अभ्यास करना है। वाह्यात (व्यर्थ) बातें न सुननी है, न सुनानी है।
वरदान:-
अपने शक्ति स्वरूप द्वारा अलौकिकता का अनुभव कराने वाले ज्वाला रूप भव
अभी तक बाप शमा की आकर्षण है, बाप का कर्तव्य चल रहा है, बच्चों का कर्तव्य गुप्त है। लेकिन जब आप अपने शक्ति स्वरूप में स्थित होंगे तो सम्पर्क में आने वाली आत्मायें अलौकिकता का अनुभव करेंगी। अच्छा-अच्छा कहने वालों को अच्छा बनने की प्रेरणा तब मिलेगी जब संगठित रूप में आप ज्वाला स्वरूप, लाइट हाउस बनेंगे। मास्टर सर्वशक्तिमान् की स्टेज, स्टेज पर आ जाए तो सभी आपके आगे परवाने समान चक्र लगाने लग जायें।
स्लोगन:-
अपनी कर्मेन्द्रियों को योग अग्नि में तपाने वाले ही सम्पूर्ण पावन बनते हैं।

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