Saturday, 1 September 2018

Brahma Kumaris Murli 02 September 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 02 September 2018


02/09/2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 12/01/84 मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


सदा समर्थ सोचो तथा वर्णन करो।
आज आवाज से परे रहने वाले बाप आवाज की दुनिया में आये हैं सभी बच्चों को आवाज से परे स्थिति में ले जाने के लिए क्योंकि आवाज से परे स्थिति में अति सुख और शान्ति की अनुभूति होती है। आवाज से परे श्रेष्ठ स्थिति में स्थित होने से सदा स्वयं को बाप समान सम्पन्न स्थिति में अनुभव करते हैं। आज के मानव आवाज से परे सच्ची शान्ति के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न करते रहते हैं। कितने साधन अपनाते रहते हैं। लेकिन आप सभी शान्ति के सागर के बच्चे शान्त स्वरूप, मास्टर शान्ति के सागर हो। सेकण्ड में अपने शान्ति स्वरूप की स्थिति में स्थित हो जाते हो। ऐसे अनुभवी हो ना। सेकण्ड में आवाज में आना और सेकण्ड में आवाज से परे स्वधर्म में स्थित हो जाना - ऐसी प्रैक्टिस है? इन कर्मेन्द्रियों के मालिक हो ना! जब चाहो कर्म में आओ, जब चाहो कर्म से परे कर्मातीत स्थिति में स्थित हो जाओ। इसको कहा जाता है अभी-अभी न्यारे और अभी-अभी कर्म द्वारा सर्व के प्यारे। ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर अनुभव होती है ना। जिन बातों को दुनिया के मानव मुश्किल कहते वह मुश्किल बातें आप श्रेष्ठ आत्माओं के लिए सहज नहीं लेकिन अति सहज हैं क्योंकि मास्टर सर्वशक्तिवान हो। दुनिया के मानव तो समझते यह कैसे होगा! इसी उलझन में बुद्धि द्वारा, शरीर द्वारा भटकते रहते हैं और आप क्या कहेंगे? कैसे होगा - यह संकल्प कभी आ सकता है? कैसे अर्थात् क्वेश्चन मार्क। 

Brahma Kumaris Murli 02 September 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 02 September 2018 (HINDI) 
तो कैसे के बजाए फिर से यही आवाज निकलता कि ऐसे होता है। ऐसे अर्थात् फुलस्टाप। क्वेश्चन मार्क बदलकर फुलस्टाप लग गया है ना। कल क्या थे और आज क्या हो! महान अन्तर है ना। समझते हो कि महान अन्तर हो गया। कल कहते थे ओ गाड और आज ओ के बजाए ओहो कहते हो। ओहो मीठे बाबा! गाड नहीं लेकिन बाबा। दूर से नजदीक में बाप मिल गया। आपने बाप को ढूँढा तो बाप ने भी आप बच्चों को कोने-कोने से ढूँढ लिया। लेकिन बाप को मेहनत नहीं करनी पड़ी। आपको बहुत मेहनत करनी पड़ी क्योंकि बाप को परिचय था, आपको परिचय नहीं था। आप सभी भी स्नेह के गीत गाते हो। बापदादा भी बच्चों के स्नेह के गीत गाते हैं। सबसे बड़े ते बड़ा स्नेह का गीत रोज़ बापदादा गाते हैं। जिस गीत को सुन-सुन सभी स्नेही बच्चों का मन खुशी में नाचता रहता है। रोज़ गीत गाते इसीलिए यादगार में भी गीत का महत्व श्रेष्ठ रहा है। बाप के गीत का यादगार ''गीता'' बना दी। और बच्चों के गीत सुन खुशी में नाचने और खुशी में, आनन्द में, सुख में भिन्न-भिन्न अनुभवों के यादगार - भागवत बना दिया है। तो दोनों का यादगार हो गया ना। ऐसे श्रेष्ठ भाग्यवान अपने को समझते हो वा अनुभव करते हो! समझने वाले अनेक होते हैं लेकिन अनुभव करने वाले कोटों में कोई होते हैं। अनुभवी मूर्त बाप समान सम्पन्न अनुभवी मूर्त हैं। हर बोल का, हर सम्बन्ध का अनुभव हो। सम्बन्ध द्वारा भिन्न-भिन्न प्राप्ति का अनुभव हो। हर शक्ति का अनुभव हो। हर गुण का अनुभव हो। जब चाहे तब गुणों के गहने को धारण कर सकते हो। यह सर्वगुण वैराइटी ज्वैलरी है। जैसा समय, जैसा स्थान हो वैसे गुणों के गहनों से स्वयं को सजा सकते हो। न सिर्फ स्वयं को लेकिन औरों को भी गुणों का दान दे सकते हो। ज्ञान दान के साथ-साथ गुण दान का भी बहुत महत्व है। गुणों की महादानी आत्मा कभी भी किसी के अवगुण को देखते हुए, धारण नहीं करेगी। किसी के अवगुण के संगदोष में नहीं आयेगी और ही गुणदान द्वारा दूसरे का अवगुण, गुण में परिवर्तन कर देंगी। जैसे धन के भिखारी को धन दे सम्पन्न बना देते हैं, ऐसे अवगुण वाले को गुण दान दे, गुणवान मूर्त बना दो। जैसे योग दान, शक्तियों का दान, सेवा का दान प्रसिद्ध है, तो गुण दान भी विशेष दान है। गुणदान द्वारा आत्मा में उमंग-उत्साह की झलक अनुभव करा सकते हो। तो ऐसे सर्व महादानी मूर्त अर्थात् अनुभवी मूर्त बने हो?

आज विशेष डबल विदेशी बच्चों से मिलने आये हैं। डबल विदेशी बच्चों की विशेषता तो बापदादा ने सुनाई है। फिर भी बापदादा डबल विदेशी बच्चों को दूरादेशी बुद्धि वाले बच्चे कहते हैं। दूर होते भी बुद्धि द्वारा बाप को पहचान अधिकारी बन गये हैं। ऐसे दूरादेशी बुद्धि वाले बच्चों पर विशेषता प्रमाण बापदादा का विशेष स्नेह है। सभी परवाने बन अपने-अपने देशों से उड़ते-उड़ते शमा पर जलने वाले हो वा कोई सिर्फ चक्र लगाने वाले भी हो। जलना अर्थात् समान बनना। तो जलने वाले हो वा चक्र लगाने वाले हो? ज्यादा संख्या कौन-सी है? जो भी हो, जैसे भी हो लेकिन बापदादा को पसन्द हो। फिर भी देखो कितनी मेहनत कर पहुँच तो गये ना इसलिए सदा अपने को समझो कि बाप के हैं और सदा ही बाप के रहेंगे। यह दृढ़ संकल्प सदा ही आगे बढ़ाता रहेगा। ज्यादा कमजोरियों को सोचो नहीं। कमजोरियों को सोचते-सोचते भी और कमजोर हो जाते हैं। मैं बीमार हूँ, बीमार हूँ, कहने से डबल बीमार हो जाते हैं। मैं इतनी शक्तिशाली नहीं हूँ, मेरा योग इतना अच्छा नहीं है, मेरी सेवा इतनी अच्छी नहीं है। मैं बाबा की प्यारी हूँ वा नहीं हूँ। पता नहीं आगे चल सकूँगी वा नहीं - यह सोच भी ज्यादा कमजोर बनाता है। पहले माया हल्के रूप में ट्रायल करती है और आप उसको बड़ा रूप कर देते हो तो माया को आपका साथी बनने का चाँस मिल जाता है। वह सिर्फ ट्रायल करती है लेकिन उसकी ट्रायल को न जानकर समझते हो कि मैं हूँ ही ऐसी, इसलिए वह भी साथी बन जाती है। कमजोरों की साथी माया है। कभी भी कमजोर संकल्पों को बार-बार न वर्णन करो, न सोचो। बार-बार सोचने से भी स्वरूप बन जाते हैं। सदा यह सोचो कि मैं बाबा का नहीं बनूँगा तो और कौन बनेगा! मैं ही था वा मैं ही थी। मैं ही हूँ। कल्प-कल्प मैं ही बनूँगी - यह संकल्प तन्दरूस्त, मायाजीत बना देंगे। कमजोरी पीछे आती है। आप उसको न पहचान सत्य समझ लेते हो तो माया अपना बना देती है। जैसे सीता का ड्रामा दिखाते हो ना। भिखारी था नहीं लेकिन सीता ने भिखारी समझ लिया। वह तो सिर्फ ट्रायल करने आया और उसे सच समझ लिया इसलिए उसने उनका भोलापन देख अपना बना लिया। यह भी व्यर्थ संकल्प, कमजोर संकल्प माया का रूप बन आते हैं, ट्रायल करने के लिए। लेकिन भोले बन जाते हो इसलिए वह अपना बना देती है। ''मैं हूँ ही ऐसी'', ऐसे करते-करते माया अपना स्थान बना देती है। ऐसे कमजोर हो नहीं। समर्थ हो। मास्टर सर्वशक्तिवान हो। बापदादा के चुने हुए कोटों में कोई हो। ऐसे कमजोर कैसे हो सकते! यह सोचना ही माया को स्थान देना है। स्थान देकर फिर-फिर यह कहते हो - अब निकालो। स्थान देते ही क्यों हो। कोई कमजोर नहीं। सब मास्टर हो। सदा बहादुर, सदा के महावीर हो। यही श्रेष्ठ संकल्प रखो। सदा बाप के साथी हैं। जहाँ बाप के साथी हैं वहाँ माया साथी बना नहीं सकती। मधुबन में किसलिए आये हो? (माया को छोड़ने) मधुबन महायज्ञ है ना। तो यज्ञ में स्वाहा करने आये हो लेकिन बापदादा कहते हैं सभी अपनी विजय अष्टमी मनाने आये हो। विजय के तिलक की सेरीमनी मनाने आये हो। विजयी बन करके विजय के तिलक की सेरीमनी मनाने आये हो ना। जी हाँ, कापी करने में सब होशियार हैं। यह भी गुण है। यहाँ भी बाप को कापी ही करना है। फालो करना अर्थात् कापी करना। यह तो सहज है ना। आप अपना देश छोड़कर आते हो तो बापदादा भी अपना देश छोड़कर आते हैं।

बापदादा की प्रवृत्ति नहीं है क्या! सारे विश्व के कार्य को छोड़ यहाँ आते हैं। विश्व की प्रवृत्ति बाप की प्रवृत्ति है ना। बाप के लिए तो सभी बच्चे हैं। अंचली तो सबको देनी है। वर्सा नहीं देते, अंचली तो देते हैं ना! अच्छा !

सर्व श्रेष्ठ अधिकारी बाप समान सदा महादानी, वरदानी आत्माओं को, सदा महान अन्तर द्वारा स्वयं को महान अनुभव करने वाले, सदा माया को पहचान मायाजीत, सर्व शक्ति स्वरूप श्रेष्ठ आत्माओं को, चारों ओर के देश-विदेश के, लगन में मगन रहने वाले, बाप से रूहरिहान करने वाले, बाप से मिलन मनाने वाले, यादप्यार देने और पत्रों द्वारा भेजने वाले, कुछ मीठे-मीठे समाचार और स्व के स्नेह के पुरुषार्थ के समाचार देने वाले सर्व बच्चों को बापदादा सम्मुख देख याद-प्यार दे रहे हैं। साथ-साथ परवाने बन शमा के ऊपर जलने वाले अर्थात् हर कदम में बाप समान बनने वाले बच्चों को स्नेह सम्पन्न याद-प्यार और नमस्ते।

महारथी भाई-बहनों प्रति उच्चारे हुए अव्यक्त महावाक्य:-

सेवा के निमित्त बने हुए बच्चों की भी तो माला है ना। सभी विशेष रत्न निमित्त बने हुए हो। निमित्त बनने की विशेषता निमित्त बनाती है। ब्रह्मा बाप को आप सबके ऊपर एक बात का नाज़ है। कौन-सी बात का विशेष नाज़ है? सभी बच्चों ने एक दो में विचार मिलाते हुए आदि से युनिटी का जो रूप दिखाया है इस पर ब्रह्मा बाप को विशेष नाज़ है। युनिटी इस ब्राह्मण परिवार का फाउन्डेशन है इसलिए ब्रह्मा बाप को अव्यक्त वतन में रहते भी बच्चों पर नाज़ है। देखते तो हैं ना कारोबार।

लण्डन ग्रुप से:- सदा रूहानी गुलाब बन औरों को भी खुशबू देने वाले अविनाशी बगीचे के पुष्प हो ना। सभी रूहानी गुलाब हो। जिस रूहानी गुलाब को देख सारी विश्व आकर्षित होती है। एक-एक रूहानी गुलाब कितना वैल्युबुल है। अमूल्य है। जो अभी तक भी आप सबके जड़ चित्रों की भी वैल्यु है। एक-एक जड़ चित्र कितनी वैल्यु से लेते वा देते हैं। हैं तो साधारण पत्थर या चांदी या सोना लेकिन वैल्यु कितनी है। सोने की मूर्ति कितनी वैल्यु में देंगे। इतने वैल्युबुल कैसे बने! क्योंकि बाप का बनने से सदा ही श्रेष्ठ बन गये। इसी भाग्य के गीत सदा गाते रहो। वाह मेरा भाग्य और वाह भाग्य विधाता और वाह संगमयुग। वाह मीठा ड्रामा। सबमें वाह-वाह आता है ना। वाह-वाह के गीत गाते रहते हो ना! बापदादा को लण्डन निवासियों पर नाज़ है, सेवा के वृक्ष का बीज जो है वह लण्डन है। तो लण्डन निवासी भी बीजरूप हो गये। यू.के. वाले अर्थात् सदा ओ.के. रहने वाले, सदा पढ़ाई और सेवा दोनों का बैलेन्स रखने वाले। सदा हर कदम में स्वयं की उन्नति को अनुभव करने वाले। जब बाप के बने तो सदा बाप का साथ और बाप का हाथ है, हर बच्चे के ऊपर - ऐसे अनुभव करते हो ना। जिनके ऊपर बाप का हाथ है, वह सदा ही सेफ हैं। सदा सेफ रहने वाले हो ना। ओ.के. ग्रुप के पास माया तो नहीं आती है ना। माया भी सदा के लिए ओ.के., ओ.के. करके विदाई करके चली जाती है। यू.के. अर्थात् ओ.के. ग्रुप को संग भी तो बहुत श्रेष्ठ है ना। संग अच्छा, वायुमण्डल शक्तिशाली तो माया आ कैसे सकती। सदा ही सेफ होंगे। ओ.के. ग्रुप अर्थात् मायाजीत ग्रुप।

मॉरीशियस पाटी:- सदा अपने को श्रेष्ठ भाग्यवान समझते हो? भाग्य में क्या मिला? भगवान ही भाग्य में मिल गया! स्वयं भाग्य विधाता भगवान भाग्य में मिल गया, इससे बड़ा भाग्य और क्या हो सकता है? तो सदा ये खुशी रहती है कि विश्व में सबसे बड़े ते बड़े भाग्यवान हम आत्मायें हैं। हम नहीं, हम आत्मायें। आत्मायें कहेंगे तो कभी भी उल्टा नशा नहीं आयेगा। देही-अभिमानी बनने से श्रेष्ठ नशा - ईश्वरीय नशा रहेगा। भाग्यवान आत्मायें हैं, जिन्हों के भाग्य का अब भी गायन हो रहा है। भागवत' - आपके भाग्य का यादगार है। ऐसा अविनाशी भाग्य जो अब तक भी गायन है, इसी खुशी में सदा आगे बढ़ते रहो। कुमारियाँ तो निर्बन्धन, तन से भी निर्बन्धन, मन से भी निर्बन्धन। ऐसे निर्बन्धन ही उड़ती कला का अनुभव कर सकते हैं। अच्छा। ओम शान्ति।
वरदान:-
सेवा का पार्ट बजाते पार्ट से न्यारे और बाप के प्यारे रहने वाले सहज योगी भव
कई बच्चे कहते हैं योग कभी लगता है कभी नहीं लगता, इसका कारण है - न्यारे पन की कमी। न्यारे न होने के कारण प्यार का अनुभव नहीं होता और जहाँ प्यार नहीं वहाँ याद नहीं। जितना ज्यादा प्यार उतनी सहज याद, इसलिए संबंध के आधार पर पार्ट नहीं बजाओ, सेवा के संबंध से पार्ट बजाओ तो न्यारे रहेंगे। कमल पुष्प समान पुरानी दुनिया के वातावरण से न्यारे और बाप के प्यारे बनो तो सहजयोगी बन जायेंगे।
स्लोगन:-
ज्ञानी वह है जो कारण शब्द को मर्ज कर हर बात का निवारण कर दे।

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