Tuesday, 28 August 2018

Brahma Kumaris Murli 29 August 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 29 August 2018


29/08/2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


"मीठे बच्चे - 21 जन्मों के लिए पुण्य का खाता जमा करना है, योगबल से पापों के खाते को भस्म करना है इसलिए अन्तर्मुखी बनो"
प्रश्नः-
किस श्रीमत का पालन करने से वाणी से परे जाने का पुरुषार्थ सहज हो जायेगा?
उत्तर:-
श्रीमत कहती है - बच्चे, अन्तर्मुखी हो जाओ, बाहर से कुछ भी न बोलो। इस श्रीमत को पालन करेंगे तो सहज ही वाणी से परे जा सकेंगे। जितना याद करेंगे, स्वदर्शन चक्र फिरायेंगे उतना कमाई जमा होती जायेगी। याद के लिए अमृतवेले का समय बहुत अच्छा है। उस समय उठकर अन्तर्मुखी बन आत्म स्वरूप में स्थित होकर बैठ जाओ।
गीत:-
तूने रात गँवाई........  
Brahma Kumaris Murli 29 August 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 29 August 2018 (HINDI)
ओम् शान्ति।
यह कौन समझाते हैं कि अन्तर्मुखी हो जाओ, बाहर से कुछ भी न बोलो, अपनी आत्मा के स्वरूप में स्थित होकर बैठो? बाप बच्चों से कहते हैं मुख से कुछ भी बोलो नहीं। राम-राम आदि तो बहुत कहते आये परन्तु उस कहने से भी मनुष्य पावन नहीं बन सकते। मनुष्य पतित से पावन तब बन सकते जब पतित-पावन बाप की श्रीमत पर चलें। पतित-पावन कहने से बाप याद आता है। बाप कहते है कि तुम बरोबर पतित थे ना। अब तुम पावन बन रहे हो। सतयुग में कोई पतित होता नहीं। पांच हजार वर्ष पहले जब भारत पावन था तो एक ही धर्म था। बाप तो सुख की ही सृष्टि रचेंगे ना। भारत सुखधाम था। लक्ष्मी-नारायण, राम-सीता आदि के मन्दिर सतयुग-त्रेता की निशानी हैं। सतयुग में बरोबर लक्ष्मी-नारायण की डिनायस्टी थी। यही भारत था जिसमें सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी का राज्य चलता था, जो अब फिर से स्थापन हो रहा है। इसको कहा जाता है वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी। यह मनुष्य ही तो जानेंगे। मनुष्य नहीं जानते तो जानवर से भी बदतर कहा जाता है। बाप को जानने लिए कितने धक्के खाते हैं, परन्तु जान नहीं सकते। तुम बाप के बच्चे बने हो तो बाप अपना परिचय देते हैं। पहले परिचय नहीं था तो इसका परिणाम क्या हुआ? आरफन, नास्तिक, निधन के बन जाते हैं। अभी तुम बाप के बने हो, बाप से वर्सा ले रहे हो। बड़ा भारी वर्सा है, 21 जन्म स्वर्ग की राजधानी मिलती है, कोई कम बात है क्या! लक्ष्मी-नारायण को पांच हजार वर्ष हुआ राज्य करते। फिर से हिस्ट्री रिपीट होती है।

बाप समझाते हैं - मेरी श्रीमत पर चलो, अन्तर्मुखी बनो, बाहरमुखी मत बनो। अब इस समय है घोर अन्धियारा, इनको रात कहा जाता है। अभी सवेरा आ रहा है। कलियुग अन्त को घोर अन्धियारा, सतयुग आदि को घोर सोझरा कहा जाता है। बाप कहते हैं मैं आता ही हूँ संगम पर जबकि सभी मनुष्य पतित हैं। अभी तुम बच्चों को सदा सुख का वर्सा देने आया हूँ। विनाश सामने खड़ा है। बहुत गई थोड़ी रही.... इसलिए अब जल्दी-जल्दी पुरुषार्थ कर बेहद के बाप से वर्सा लो, जैसे सब ले रहे हैं। सब पुरुषार्थी हैं। अब सबको स्वीट होम, वाणी से परे जाना है। वह है हम आत्माओं का घर, निर्वाणधाम। धाम में कोई एक नहीं रहते। जितनी भी जीव आत्मायें हैं,, वे सभी शरीर छोड़ जायेंगे अपने घर बाबा के पास। वह है निराकारी झाड़। जैसे चित्र में भी झाड़ दिखाया जाता है। वह है हम आत्माओं का घर - शान्तिधाम। फिर हम आयेंगे सुखधाम। अभी 84 जन्मों का चक्र पूरा होता है, कलियुग के बाद सतयुग जरूर आयेगा ना। द्वापर के बाद कलियुग जरूर आयेगा। बाप कहते हैं - मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुगे आता हूँ, पुरानी दुनिया का विनाश कराता हूँ। जब तक नई दुनिया स्थापन हो जाए तब तक इस पुरानी दुनिया में रहना पड़े। जब तक नया मकान बन जायें तब तक पुराने मकान में बैठे रहते हैं ना। फिर जब नया बन जाये फिर पुराने को तोड़ा जाता है। यह भी पुरानी चीज़ है ना। इसके विनाश के लिए यह है महाभारत लड़ाई। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। आत्मा ही समझती है - जिस्मानी नॉलेज भी आत्मा सीखती है ना। आत्मा कहती है मैं प्रिन्सीपाल हूँ, सर्जन हूँ। आत्मा की नॉलेज न होने कारण देह-अभिमानी हो जाते हैं। आत्मा ही संस्कार ले जाती है। तुम बच्चे समझते हो शिवबाबा हम आत्माओं को समझा रहे हैं। हम आत्मा यह पुराना शरीर छोड़ फिर नया जाकर लेंगी। अभी हम श्याम हैं फिर सुन्दर बनेंगे। सुन्दर से श्याम बनते हैं। 84 जन्म लग जाते हैं। फिर बाबा काम चिता से उतार ज्ञान चिता पर बिठाए गोल्डन एज का मालिक बना देते हैं। बेहद का बाप जरूर बेहद का वर्सा देगा ना। बाप तो ऊंच ते ऊंच है। कहते हैं बच्चों के लिए वैकुण्ठ की सौगात लाये है। हथेली पर बहिश्त लाया हूँ। सेकेण्ड में तुम साक्षात्कार कर लेते हो। कितने ढेर ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं। जरूर ब्रह्मा के बच्चे हैं और शिवबाबा के पोत्रे हैं। तुम कहते हो हम शिवबाबा से वर्सा लेते हैं। वही सर्व का सद्गति दाता है। राजयोग सिखलाते हैं। निराकार कैसे सिखलाये, इसलिए आरगन्स द्वारा पढ़ाते हैं। सृष्टि चक्र की नॉलेज देते हैं। जिसको परम आत्मा, सुप्रीम सोल कहते हैं उसकी ही सारी महिमा है। ज्ञान का सागर, पतित-पावन वह है तो जरूर आना पड़े। तुमको भी मास्टर सुप्रीम अथवा पावन बनाते हैं। वह है बेहद का बाप जिसको सभी भक्त बुलाते हैं। सभी भक्तों का बाप वह भगवान् है - परमपिता परमात्मा। अगर उनको सर्वव्यापी कह देते तो फिर वर्सा कैसे मिलेगा? मनुष्य को भगवान् नहीं कह सकते। कृष्ण को भी दैवीगुणधारी मनुष्य कहा जाता है, वह है फर्स्ट प्रिन्स। सभी उनको झूले में झुलाते हैं। शिवबाबा को कभी झुलाते नहीं होंगे क्योंकि वह कभी बच्चा बनता ही नहीं। यह तो साक्षात्कार कराते हैं समझाने के लिए - हम तुम्हारा बच्चा हूँ, तुम हमको अपना वारिस बनायेंगे, बलिहार जायेंगे तो मैं भी बलिहार जाऊंगा। बलिहार जाते हो तो जैसे मैं तुम्हारा बालक हो गया।

मनुष्यों में कितनी अन्धश्रद्धा है जहाँ तहाँ माथा टेकते रहते हैं इसको कहा जाता है गुड़ियों की पूजा। नवरात्रि में बहुत गुड़ियां बनायेंगे। उनके आक्यूपेशन का किसको पता नहीं है। 4-6 भुजा वाली देवी थोड़ेही होती है और फिर तलवार आदि दे देते हैं। देवतायें हिंसक थोड़ेही होते हैं। शास्त्रवादियों ने उन्हें भी हिंसक बना दिया है। नेपाल में भी काली को पूजते हैं फिर ऐसे है थोड़ेही। मम्मा ऐसी काली जीभ वाली है थोड़ेही। मनुष्य तो मनुष्य ही होता है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर हैं सूक्ष्मवतनवासी। बस, और कोई चीज़ ही नहीं है फिर 8-10 भुजा वाले कहाँ से आये! यह सब भक्ति मार्ग के अलंकार बनाते हैं। पैसा कमाने के लिए कुछ तो चाहिए ना। फिर किस्म-किस्म के चित्र बैठ बना देते हैं। वहाँ ही देखो सुन्दर कृष्ण का मन्दिर, वहाँ ही सांवरे कृष्ण का मन्दिर। कारण तो चाहिए ना। कितनी अन्धश्रद्धा है! अब भक्ति मार्ग खत्म हो ज्ञान मार्ग जिंदाबाद होता है। बाकी समय तो थोड़ा है, सबको मरना तो जरूर है। पुत्र-पोत्रे वारिस बनने नहीं हैं। वहाँ तुमको यह ज्ञान ही नहीं रहेगा कि संगम पर हमने राजाई के लिए यह पुरुषार्थ किया था। वहाँ तो पवित्र सृष्टि चल पड़ती है। यहाँ तुम जानते हो कि बरोबर हम बाबा की राजधानी के हकदार हैं। वहाँ यह पता नहीं रहेगा कि कौन-से कर्म किये थे, कैसे बनें - यह सब भूल जाता है। वहाँ पतित होते ही नहीं, जो पावन बनने के लिए गुरू की दरकार पड़े। बाप पैर धोकर बच्चों को तख्त पर बिठाते हैं। गुरू चाहिए सद्गति के लिए। वहाँ तो है ही सद्गति। गुरू की दरकार ही नहीं। बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझो, देह-अभिमान में न रहो। मैं आत्मा अभी डॉक्टर के रूप में हूँ, मैं आत्मा मजिस्ट्रेट हूँ फिर यह शरीर छोड़ने के बाद पता नहीं क्या बनूँगा? हम इस शरीर द्वारा पढ़ते हैं। आत्मा ही इन आरगन्स द्वारा पढ़ती है, आत्मा ही सुनती है - यह समझने की बातें हैं, न कि दन्त कथायें हैं।

बाप कहते हैं यह सारी दुनिया कब्रिस्तान होनी है। अब जागो, नहीं तो भंभोर को आग लगने के समय हाय-हाय करेंगे। परन्तु कुछ भी कर नहीं सकेंगे, काल खा जायेगा, त्राहि-त्राहि करके रह जायेंगे। सजायें भी बहुत खायेंगे। अभी हमें पापों का खाता ख़लास कर पुण्य के खाते को जमा करना है। नयेसिर 21 जन्मों के लिए जमा करना है। जमा होगा बाप को याद करने से। पुराना खाता चुक्तू हो जाना चाहिए। ज्ञान कितना सहज है! तुम्हारी रोज कितनी कमाई होती है! जितना जो याद करते हैं, स्वदर्शन चक्र फिराते हैं तो अथाह कमाई करते हैं, अनगिनत। वहाँ कोई गिनती थोड़ेही होती है। अभी झोपड़ियों में बैठे हैं फिर महलों में बैठेंगे। फ़र्क तो रहता है ना - झोपड़ी और महल में। ब्रह्मा द्वारा नई दुनिया स्थापन हो जायेगी तो पुरानी दुनिया का विनाश हो जायेगा। अभी की बात है ना। राजधानी की स्थापना हो जायेगी फिर जिसने जितना पुरुषार्थ किया सो किया फिर विनाश हो जायेगा इसलिए अब ग़फलत नहीं करनी चाहिए। सवेरे उठकर याद में बैठ जाना चाहिए। जितना याद का चार्ट रखो उतना अच्छा है और फिर उतना ही ऊंच पद पायेंगे। शिवबाबा के गले का हार बनेंगे। दिल दर्पण में देखना है कि मैं लायक बना हूँ - लक्ष्मी-नारायण को वरने? हम बाबा-मम्मा जैसी सर्विस करते हैं? किस्म-किस्म के फूल हैं। यह बागवान बाबा का ह्युमन गुलशन है। कहेंगे - देखो, कुमारका, मनोहर कितने अच्छे-अच्छे फूल हैं! यह रतन ज्योत है। बाबा इस बगीचे को देखते फिर उस बगीचे में जाकर फूलों को देखते हैं। बागवान जांच करते हैं फूलों की, तो बच्चों को फालो करना चाहिए - नम्बर वन, टू फूल कौन-कौन हैं? ऐसा बनना चाहिए। 21 जन्मों के लिए राजाई पद पाना कोई कम बात थोड़ेही है! अथाह सुख हैं। विश्व का मालिक बनना है। यह स्कूल है। उस जिस्मानी पढ़ाई के साथ यह रूहानी पढ़ाई करो। टीचर्स के हमेशा अच्छे मैनर्स होते हैं। ऑनेस्ट होते हैं। स्कूल में अन्धश्रद्धा की बात नहीं। वहाँ बैरिस्टरी पढ़ते, इन्जीनियरिंग पढ़ते। यहाँ तुम राजाओं का राजा बनने के लिए पढ़ते हो। सन्यासी तो कह देते ईश्वर सर्वव्यापी है। बस, खेल ही खत्म। बेहद का बाप बच्चों को समझाते हैं - बच्चे, यह अन्तिम जन्म पवित्र रहो। तुम बहुत सर्विस कर सकते हो।

वहाँ भी एज्युकेशन डिपार्टमेन्ट है। यह भी गॉडली एज्युकेशन डिपार्टमेन्ट है। तुम बच्चे हो राजऋषि। वह तो घरबार छोड़ देते हैं। तुम घर में रहते सारी दुनिया का त्याग करते हो। तुम्हारी बुद्धि में अब नई दुनिया है, जो बाप ही बनाते हैं, इसलिए बाप कहते हैं तुम मुझे याद करो, यह पुरानी दुनिया ख़लास हो जायेगी। यह रूहानी कॉलेज अथवा हॉस्पिटल भी बहुत बड़ा है, जिससे तुम एवरेहल्दी, एवरवेल्दी बनते हो। घर-घर में तुम यह हॉस्पिटल अथवा कॉलेज खोल सकते हो, इसमें खर्चा कुछ भी नहीं। सिर्फ तीन पैर पृथ्वी के चाहिए। अच्छा!

मात-पिता बापदादा का मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सवेरे-सवेरे उठकर याद में जरूर बैठना है, इसमें ग़फलत नहीं करनी है। पुण्य का खाता जमा करना है।
2) एम ऑब्जेक्ट को बुद्धि में रख अच्छे मैनर्स धारण करने हैं। रूहानी पढ़ाई जरूर करनी है। अन्तर्मुखी होकर रहना है।
वरदान:-
न्यारे और प्यारे पन की विशेषता द्वारा बाप के प्रिय बनने वाले निरन्तर योगी भव
मैं बाप का कितना प्यारा हूँ - इसका हिसाब न्यारेपन से लगा सकते हो। अगर थोड़ा न्यारे हैं, बाकी फंस जाते हैं तो प्यारे भी इतने होंगे। जो सदा बाप के प्यारे हैं उसकी निशानी है स्वत: याद। प्यारी चीज़ स्वत: और निरन्तर याद रहती है। तो यह कल्प-कल्प की प्रिय चीज़ है। ऐसी प्रिय वस्तु भूल कैसे सकते! भूलते तब हो जब बाप से भी अधिक कोई व्यक्ति या वस्तु को प्रिय समझने लगते हो। अगर सदा बाप को प्रिय समझो तो निरन्तर योगी बन जायेंगे।
स्लोगन:-
जो अपने नाम-मान और शान का त्याग कर बेहद सेवा में रहते हैं वही परोपकारी हैं।

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