Saturday, 21 July 2018

Brahma Kumaris Murli 22 July 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 22 July 2018


22/07/2018 प्रात:मुरलीओम् शान्ति''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 23/12/83 मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


डबल लाईट की स्थिति से मेहनत समाप्त
आज दूर देश में रहने वाले बापदादा दूरदेशी बच्चों से मिलने के लिए आये हैं। आप सब भी दूरदेश से आये हो तो बापदादा भी दूरदेश से आये हैं। सबसे दूर से दूर और नज़दीक से नज़दीक बापदादा का देश है। दूर इतना है जो इस साकार दुनिया की बाउन्ड्री से बहुत दूर है। लोक ही दूसरा है। आप सभी साकार लोक से आये हैं और बापदादा साकार लोक से भी परे परलोक से वाया सूक्ष्मवतन ब्रह्मा बाप को साथ लाये हैं। 
Brahma Kumaris Murli 22 July 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 22 July 2018 (HINDI) 

और नज़दीक भी इतना है जो सेकण्ड में पहुँच सकते हो ना। आप लोगों को आने में कितने घण्टे लगते हैं और कितना मेहनत का कमाया हुआ धन देना पड़ा। कितना समय लगा इकट्ठा करने में। और बाप के वतन से आने और जाने में खर्चा भी नहीं लगता है। सिर्फ स्नेह की पूँजी, इसके द्वारा सेकण्ड में पहुँच जाते हो। कोई मेहनत तो नहीं लगती है ना। बापदादा जानते हैं कि राज्य-भाग्य गँवाने के बाद बच्चे अनेक जन्म भिन्न-भिन्न प्रकार की तन की, मन की, धन की मेहनत ही करते रहे हैं। कहाँ विश्व के मालिक ताज, तख्तधारी, सर्व प्राप्तियों के भण्डार के मालिक! प्रकृति भी दासी! ऐसे राज्य अधिकारी, राज्य भाग्य करने वाले, अब अधीन बनने से क्या कर रहे हैं! नौकरी कर रहे हैं! तो मेहनत हुई ना। कहाँ राजे और कहाँ कमाई करके खाने वाले गवर्मेन्ट के सर्वेन्ट हो गये। कितने जन्म शरीर को चलाने के लिए, शरीर निर्वाह का कर्म, मन को बाप से लगाने के लिए भिन्न-भिन्न साधनायें, अनेक प्रकार की भक्ति और धन को इकट्ठा करने के लिए कितने प्रकार के भिन्न-भिन्न जन्मों में भिन्न-भिन्न कार्य किये। ऐसे ताज-तख्तधारी सुख-चैन से पलने वाले को क्या-क्या करना पड़ा! तो बच्चों की मेहनत को देख बापदादा ने मेहनत से छुड़ाए सहज योगी बना दिया है। सेकण्ड में स्वराज्य-अधिकारी बनाया ना। मेहनत से छुड़ाया ना। यह सब सोचते हैं कि नौकरी से तो नहीं छुड़ाया। लेकिन अभी कुछ भी करते हो अपने लिए नहीं करते हो। ईश्वरीय सेवा के प्रति करते हो। अभी मेरा काम समझकर नहीं करते हो। ट्रस्टी बन करके करते हो इसलिए मेहनत मुहब्बत में बदल गई। बाप की मुहब्बत में, सेवा की मुहब्बत में, मिलन मनाने की मुहब्बत में मेहनत नहीं लगती।



दूसरी बात, करावनहार बाप है। निमित्त करने वाले आप हो। सर्वशक्तिवान बाप की शक्ति से अर्थात् स्मृति के कनेक्शन से अभी निमित्त मात्र कार्य करने वाले हो। जैसे लाइट के कनेक्शन से बड़ी-बड़ी मशीनरी चलती है। तो आधार है लाइट। आप सभी हर कर्म करते कनेक्शन के आधार से स्वयं भी डबल लाइट बन चलते रहते हो ना। जहाँ डबल लाइट की स्थिति है वहाँ मेहनत और मुश्किल शब्द समाप्त हो जाता है। नौकरी से नही छुड़ाया लेकिन मेहनत से छुड़ाया ना। भावना और भाव बदल गया ना। ट्रस्टीपन का भाव और ईश्वरीय सेवा की भावना, तो बदल गया ना। अभी अपना-पन है? तीन पैर पृथ्वी जो मिली है, वह भी बाबा का घर कहते हो ना। मेरा घर तो नहीं कहते हो ना। अपने घर में नहीं रहते। बाप के घर में रहते हो। बाप के डायरेक्शन से कार्य करते हो। अपनी इच्छा से, अपनी आवश्यकताओं के कारण नहीं करते। जो डायरेक्शन बाप का, उसमें निश्चिंत और न्यारे होकर करते। जो मिला बाप का है वा सेवा अर्थ है। भले शरीर प्रति भी लगाते हो लेकिन शरीर भी अपना नहीं है। वह भी बाप को दे दिया ना। तन-मन-धन सब बाप को दे दिया है ना वा कुछ रखा है किनारे करके। ऐसे तो नहीं हो ना। तो बापदादा ने बच्चों की जन्म-जन्म की मेहनत देख अब से अनेक जन्मों तक मेहनत से छुड़ा दिया। यही निशानी है बाप और बच्चों के मुहब्बत की।



जैसे आप सब स्पेशल मिलने आये हो, बापदादा भी स्पेशल मिलने आये हैं। ब्रह्मा बाप को भी वतन से ले के आये हैं। ब्रह्मा बाप का ज्यादा स्नेह है। बाप का तो है ही लेकिन ब्रह्मा बाप का ज्यादा स्नेह है। डबल विदेशियों से विशेष स्नेह क्यों है? ब्रह्मा बोले - विदेशी बच्चों का बहुत समय से आह्वान किया। कितने वर्षों से पहले बच्चों को आह्वान किया। उसी आह्वान से विदेश से बाप के पास पहुँचे। तो बहुत समय जिसका आह्वान किया जाए और बहुत समय के आह्वान के बाद वह बच्चे पहुँचे तो जरुर विशेष प्यार होगा ना। तो ब्रह्मा बाप ने बहुत स्नेह से साकार रुप में वारिस बनने का, आप सबको आह्वान किया। समझा। सुनते रहते हो ना कि कितने वर्ष पहले आपको जन्म दिया। गर्भ में तो आ गये थे, पैदा पीछे हुए हो साकार रुप में, इसलिए ब्रह्मा बाप को विशेष स्नेह है और भविष्य की तकदीर जानते हुए स्नेह है।



जानकी दादी को देख बाबा बोले:- अभी डबल विदेशी जैसे बाप को देख करके खुश होते हैं। वैसे आपको भी देख करके खुश होते हैं क्योंकि बाप से ली हुई पालना का प्रत्यक्ष रूप साकार में आप निमित्त बच्चों से सीखते हैं इसलिए विशेष आप से भी सभी का प्यार है। दादी वा दीदी जो भी निमित्त आत्माए हैं उन्हों की विशेषता यही दिखाई देती जो उनमें बाप को देखेंगे। यही बाप की पालना का विशेष अनुभव करते। जब भी दीदी दादी से मिलते हो तो क्या देखते हो! बाप साकार आधार से मिल रहे हैं। ऐसे अनुभव होता है ना। यही विशेष आत्माओं की पालना है, जो आप गुम हो जायेंगे और बाप दिखाई देंगे क्योंकि उन्हों के हर संकल्प, हर बोल में सदा बाबा, बाबा ही रहता है। तो औरों को भी वो ही बाबा शब्द सुनाई वा दिखाई देता है। आज दीदी भी याद आ रही है। गुप्त गंगा हो गई ना। वैसे भी 3 नदियों में एक नदी गुप्त ही दिखाते हैं। अभी दीदी तो दादी में समाई हुई है ना। सूक्ष्म रूप में वह भी अपनी भासना दे रही है क्योंकि कर्मबन्धनी आत्मा नहीं है। सेवा के सम्बन्ध से पार्ट बजाने गई है। कर्म-बन्धनी आत्माएं जहाँ हैं वहाँ ही कार्य कर सकती हैं और कर्मातीत आत्माएं एक ही समय पर चारों ओर अपना सेवा का पार्ट बजा सकती हैं क्योंकि कर्मातीत हैं इसलिए दीदी भी आप सबके साथ है। कर्मातीत आत्मा को डबल पार्ट बजाने में कोई मुश्किल नहीं। स्पीड बहुत तीव्र होती है। सेकण्ड में जहाँ चाहे वहाँ पहुँच सकती हैं। विशेष आत्मायें अपना विशेष पार्ट सदा बजाती हैं इसलिए ही हवा के मुआफिक चली गई ना। जैसे अनादि अविनाशी प्रोग्राम बना हुआ ही था। यह भी विचित्र पार्ट था। शुरू से लेकर दीदी का विचित्र ट्रांस का पार्ट रहा। अन्त में भी विचित्र रूप के ट्रांस में ही ट्रान्सफर हो गई। अच्छा।



सभी देश-विदेश के चात्रक बच्चों को कल्प के सिकीलधे बच्चों को, सदा बाप के स्नेह में लवलीन रहने वाले लवलीन आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।



पर्सनल मुलाकात:- कहाँ-कहाँ से बापदादा ने चुनकर अपने अल्लाह के बगीचे में लगा लिया। यह खुशी रहती है ना! अभी सभी रूहानी गुलाब बन गये। सदा औरों को भी रूहानी खुशबू देने वाले रूहे गुलाब हो। कोई भी आप सबके समीप आता है, सम्पर्क में आता है तो आप सभी से क्या महसूस करता है? समझते हैं कि यह रूहानी हैं, अलौकिक हैं। लौकिकता समाप्त हो गयी। जो भी आपकी तरफ देखेंगे उनको फरिश्ता रूप ही दिखाई दे। फरिश्ते बन गये ना। सदा डबल लाइट स्थिति में स्थित रहने वाले फरिश्ता दिखाई देंगे। फरिश्ते सदा ऊंचे रहते हैं। फरिश्तों को चित्र रूप में भी दिखायेंगे तो पंख दिखायेंगे। किसलिए? उड़ते पंछी हैं ना। तो पंछी सदा ऊपर उड़ जाते। तो बाप मिला, ऊंचा स्थान मिला, ऊंची स्थिति मिली और क्या चाहिए।



(विदेशी बच्चों के पत्रों के रिटर्न में) सबकी दिल के प्यार भरे याद-प्यार पत्र तथा याद मिली। बच्चे मीठी-मीठी रूहरिहान भी करते तो कभी-कभी मीठे-मीठे उल्हनें भी देते हैं। कब बुलायेंगे, क्यों नहीं हमको मदद करते जो हम पहुँच जाते। ऐसे उल्हनें भी बाप को प्रिय लगते हैं क्योंकि बाप को नहीं कहेंगे तो किसको कहेंगे इसलिए बापादादा को बच्चों का लाड-प्यार अच्छा लगता है इसलिए बाप के प्यारे हैं और सदा बाप के प्यारे होने के कारण रिटर्न में बाप द्वारा स्नेह और सहयोग मिलता है। अच्छा।



विशेष महावाक्य - रूहानियत की शक्ति से सम्पन्न बनो



समय अनुसार अब विश्व की आत्मायें आप आत्माओं को रूहानियत का सैम्पुल देखना चाहती हैं इसलिए रूहानियत की शक्ति से सम्पन्न बनो। इसके लिए ''एकव्रता भव'' यह एक शब्द सिर्फ अटेन्शन में रखो और बार-बार अपने आप में अण्डरलाइन कर सम्पूर्ण पवित्र बनो। जैसे विदेश की सेवाओं में रूहानी दृष्टि का और रूहानियत की शक्ति का प्रभाव पड़ता है, चाहे भाषा ना समझे लेकिन जो छाप लगती है वह फरिश्तेपन की, सूरत और नयनों द्वारा रूहानी दृष्टि की लगती है। तो अब रूहानियत की गुह्यता में जाकर अपने फरिश्ते रूप को प्रत्यक्ष करो। जो कर्म वाणी करती है उससे कई गुणा अधिक रूहानियत की शक्ति कार्य कर सकती है। जैसे वाणी में आने का अभ्यास हो गया है, वैसे रूहानियत का अभ्यास बढ़ाओ तो वाणी में आने का दिल नहीं होगा।



जो सम्पूर्ण समर्पण हो जाता है उसकी वृत्ति-दृष्टि शुद्ध हो जाती है, उसमें रूहानियत की शक्ति आ जाती है। वे जिस्म को नहीं देखते हैं। पहले दृष्टि देखती है तब वृत्ति जाती है। रूहानी दृष्टि अर्थात् अपने को वा दूसरों को भी रूह देखना। जिस्म तरफ देखते हुए भी नहीं देखना, अब ऐसी प्रैक्टिस होनी चाहिए। समय प्रमाण अब हर एक नई रौनक देखना चाहते हैं इसलिए हर कर्म में, हर संकल्प में, वाणी में रूहानियत की शक्ति धारण करो लेकिन रूहानियत सदा कायम तब रहेगी जब स्वयं को और दूसरों को, जिनकी सर्विस के लिये निमित्त हो, उन्हें बापदादा की अमानत समझ कर चलेंगे। मन में जो संकल्प करते हो वह भी ऐसे समझ करके करो कि यह मन भी एक अमानत है। इस अमानत में ख्यानत नहीं डालनी है। तो अपने मन और तन को और जो कुछ भी निमित्त रूप में मिला है, चाहे जिज्ञासु हैं, सेन्टर है वा स्थूल कोई भी वस्तु है वह सब अमानत मात्र है। अमानत समझने से अनासक्त रहेंगे, अनासक्त होने से ही रूहानियत आयेगी। आपके यह दिव्य नेत्र जितना-जितना क्लीयर अर्थात् रूहानियत से सम्पन्न होंगे उतना ही इन नयनों द्वारा बापदादा और पूरी रचना के स्थूल, सूक्ष्म, मूल तीनों लोकों के चित्र ऐसे स्पष्ट दिखाई देंगे, जैसे प्रोजेक्टर द्वारा स्पष्ट देखते हैं। अभी रूहानियत की शक्ति से सम्पन्न होने का समय है। अगर रूहानियत नहीं होगी तो भिन्न-भिन्न प्रकार की माया की रंगत में आ जायेंगे। अभी परीक्षाओं के पेपर देने के लिए तैयार हो जाओ अर्थात् रूहानियत की शक्ति से सम्पन्न बनो तब हर प्रकार के पेपर में पास हो सकेंगे। यह शरीर ईश्वरीय सर्विस के लिए अमानत के रूप में मिला हुआ है। जिसकी अमानत है उनकी स्मृति, अमानत को देखकर आती है। तो रूहानी बाप की यह अमानत है, अमानत समझने से रूहानियत रहेगी और रूहानियत से सदैव बुद्धि में राहत रहेगी, थकावट नहीं होगी। अमानत में ख्यानत करेंगे तो रूहानियत के बदले उलझन में आ जायेंगे, राहत के बजाए घबराहट में आ जायेंगे। सदा हर्षित रहना यह ज्ञान का गुण है। जो स्वयं हर्षित है वह कैसे भी मन वाले को हर्षित करेगा। लेकिन इसमें सिर्फ रूहानियत शब्द को एड करो। हर्षितपन का संस्कार भी एक वरदान है जो समय पर बहुत सहयोग देता है। सर्व कमजोरियों से मुक्ति की युक्ति है कि ‘सदा स्नेही बनो' - जिसके स्नेही हैं, उस स्नेही के संग से रूहानियत का रंग सहज ही लग जायेगा।



जैसे वायुमण्डल में कोई चीज़ फैल जाती है तो सारे वायुमण्डल में काफी दूर तक उसका प्रभाव छाया होता है। इसी रीति से इतने सब सहज योगी वा श्रेष्ठ आत्मायें अपने वायुमण्डल को ऐसा रूहानी बना दो जो आसपास का वायुमण्डल रूहानियत के कारण आत्माओं को अपनी तरफ खैंच ले। वायुमण्डल का फाउन्डेशन वृत्ति है। तो वृत्तियों को जब तक रूहानियत की शक्ति से सम्पन्न पावरफुल नहीं बनाया है तब तक सर्विस में वृद्धि जो चाहते हो वह नहीं हो सकती। जैसे कोई भी आत्मा को पकड़ना होता है तो घेराव डालते हैं ताकि निकल नहीं सकें। ऐसे वृत्ति द्वारा रूहानियत का घेराव डालने से कोई भी आत्मा रूहानी आकर्षण से बाहर नहीं निकल सकती। अभी ऐसी सर्विस करो। कोई कैसी भी अथॉरिटी वाला आये वा कैसे भी मूड वाला आये लेकिन आपके गुणों की पर्सनैलिटी, रूहानियत की पर्सनैलिटी, सर्व-शक्तियों की पर्सनैलिटी के सामने झुक जायेंगे। अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे। रूहानियत की शक्ति उन्हों के अन्दर की वृत्तियों को बदल देगी। जैसे फूलों में खुशबू समाई हुई होती है, अलग नहीं होती। ऐसे आप लोगों में रूहानियत की खुशबू समाई हुई हो। खुशबू ऐसी चीज़ होती है जो दूर वालों को भी आकर्षित करती है। दूर से ही सोचेंगे - यह खुशबू कहाँ से आ रही है। तो आपकी रूहानियत विश्व को आकर्षित करेगी। तो ज्ञानयुक्त रहम के साथ-साथ रूहानियत का रूहाब भी धारण करो। आजकल के समय प्रमाण रूहानियत के शक्ति की बहुत-बहुत आवश्यकता है। रूहानियत न होने के कारण ही यह सब लड़ाई झगड़े हैं। तो रूहानी गुलाब बन रूहानियत की खुशबू फैलाओ, यही ब्राह्मण जीवन का आक्यूपेशन है। अच्छा।
वरदान:
अपनी शक्तिशाली स्थिति द्वारा दान और पुण्य करने वाले पूज्यनीय और गायन योग्य भव!
अन्तिम समय में जब कमजोर आत्मायें आप सम्पूर्ण आत्माओं द्वारा प्राप्ति का थोड़ा भी अनुभव करेंगी तो यही अन्तिम अनुभव के संस्कार लेकर आधाकल्प के लिए अपने घर में विश्रामी होंगी और फिर द्वापर में भक्त बन आपका पूजन और गायन करेंगी इसलिए अन्त की कमजोर आत्माओं के प्रति महादानी वरदानी बन अनुभव का दान और पुण्य करो। यह सेकण्ड का शक्तिशाली स्थिति द्वारा किया हुआ दान और पुण्य आधाकल्प के लिए पूज्यनीय और गायन योग्य बना देगा।
स्लोगन:
परिस्थितियों में घबराने के बजाए साक्षी हो जाओ तो विजयी बन जायेंगे।

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