Sunday, 15 July 2018

Brahma Kumaris Murli 16 July 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 16 July 2018


16/07/2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


''मीठे बच्चे - कोई भी विकर्म करके छिपाना नहीं, छिपकर सभा में बैठने वाले पर बहुत दण्ड पड़ता है इसलिए सावधान, विकार की कड़ी भूल कभी भी नहीं हो''

प्रश्नः-
किस लक्ष्य को सामने रखते हुए पुरुषार्थ में सदा आगे बढ़ते रहना है?

उत्तर:-
लक्ष्य है - हमें सपूत बच्चा बन मात-पिता के तख्तनशीन बनना है। हर कदम में फालो फादर करना है। ऐसी कोई चलन नहीं चलनी है, जिससे कुल कलंकित बनें। ऐसे सपूत बच्चे अपने को यात्री समझ यात्रा में सदा तत्पर रहते हैं। यात्री कभी भी यात्रा पर पतित नहीं बनते, अगर कोई विकार के वश होते हैं तो चकनाचूर हो जाते हैं, सत्यानाश हो जाती है। फिर बहुत दु:खी होते हैं।

गीत:-   
बचपन के दिन भूला न देना........
Brahma Kumaris Murli 16 July 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 16 July 2018 (HINDI)

ओम् शान्ति।

यह बच्चों के लिए ही गीत है। मम्मा बाबा कहकर फिर विकार में गया तो ऐसे समझो मर गया। यह मंजिल बड़ी खबरदारी की है। मैं उस परमपिता परमात्मा की सन्तान हूँ और विचित्र हूँ। मेरा भी वास्तव में कोई चित्र नहीं है, जब वहाँ हूँ। फिर चित्र ले 84 जन्म भोग अब हम ईश्वरीय गोद की सन्तान बनता हूँ। ईश्वरीय गोद की सन्तान निश्चय कर फिर अगर विकारों में गया तो मरा। यह तो समझते हो - बाप सुख देने वाला भी है तो फिर धर्मराज द्वारा हिसाब भी पूरा लेते हैं। बाप दु:ख नहीं देते हैं। वह तो सुख दाता है लेकिन बाबा ने समझाया है - जैसे गवर्मेन्ट है तो उनके साथ धर्मराज अर्थात् चीफ जस्टिस (बड़ा जज) भी है। एक-दो को कसम उठवाते हैं ना। यहाँ भगवान खुद कहते हैं - अगर तुम विकारों में गिर पतित बने और सुनाया नहीं तो सौगुणा दण्ड पड़ता रहेगा। बाप का बच्चा बनकर फिर अगर छिपकर नर्क का द्वार बने और फिर बाबा को समाचार नहीं दिया तो एकदम मर पड़ेंगे फिर कितना भी पुरुषार्थ करे, विजय पा नहीं सकेंगे। बाबा इतला दे रहे हैं। बहुत बच्चे हैं जो छिपाते हैं। विकार में जाना बड़ा पाप है। छिपाया और मरा। ऐसे तो बच्चा न बनें तो अच्छा है। बच्चा कोई कपूत होता है तो बाप कहते हैं ना यह बच्चा तो मुआ भला। ऐसे कोई न समझे - बाबा को थोड़ेही मालूम पड़ता है। हाँ, यह (ब्रह्मा) भल बाहरयामी है, इनको पता नहीं पड़ता है। परन्तु वह बाबा तो अच्छी रीति जानते हैं। बाप कहते हैं - मुझे सुख देना है। सजायें फिर हर एक को चलन अनुसार मिलती हैं। बाबा सभी को बतलाते हैं। इसमें भी नारियों को बहुत खबरदार रहना है। कभी भी झूठ नहीं बोलना है। बाबा पुरुषों से नारी पर जास्ती रहमदिल रहते हैं क्योंकि नारी बहुत सताई जाती है। बाप आकर माताओं पर कलष रखते हैं, तो माताओं पर बड़ी रेसपान्सिबिलिटी है। बाबा क्रोध के लिए इतना नहीं कहते, जितना विकार के लिए। वास्तव में कोई भी पतित इस सभा में बैठ नहीं सकता। कहाँ फिर पतितों से मिलना भी पड़ता है। बड़े आदमी जास्ती पतित होते हैं क्योंकि उन्हों के पास पैसा होता है ना इसलिए माताओं ने ही पुकारा है कि नंगन होने से बचाओ। सब दु:खी हैं। माताओं की पुकार सुनकर बाप आते हैं। माताओं को बहुत खबरदार रहना चाहिए। नाम भी माताओं का है - पुखराज परी, नीलम परी........।

बाबा सावधान करते हैं - यहाँ असुर से देवता बनाया जाता है। असुर पतित को कहा जाता है। यह सारी पतित आसुरी दुनिया है। पतित दुनिया में पावन कोई होता नहीं। सन्यासियों के लिए भी समझाया है कि वह कोई देवताओं जैसे पावन नहीं हैं। रहते तो फिर भी पतित दुनिया में हैं। और हैं भी निवृत्ति मार्ग वाले। सतयुग में तो सब पवित्र सम्पूर्ण निर्विकारी थे। तुम यहाँ आये हो सम्पूर्ण पावन बनने क्योंकि यह सम्पूर्ण पतित दुनिया है। एक भी पावन नहीं। त्रेता को भी कहा जाता है 2 कला कम। सतयुग में हैं 16 कला, त्रेता में दो कला कम हो जाती हैं। वास्तव में त्रेता को स्वर्ग नहीं कहेंगे। स्वर्ग है ही सतयुग। तुम बच्चों को तैयारी करनी है सतयुग के लिए। विकार में गिरे तो स्वर्ग में आ नहीं सकेंगे। मूल बात यह है कि पतित नहीं बनना है। शिवबाबा तो जानते हैं ना परन्तु एक-एक से कितना पूछते रहेंगे। अपवित्र बन और फिर छिपाया तो बहुत-बहुत कड़ी सजा भोगनी पड़ेगी। ट्रिब्युनल बैठती है फिर यह बाबा भी बैठेंगे। धर्मराज भी बैठेंगे। फिर धर्मराज बतलाते हैं - तुम फलाने समय विकार में गये और सभा में आकर बैठे। बताया नहीं था, अब खाओ सजा इसलिए बाबा कहते हैं - बहुत खबरदार रहना है। कभी भी विकार में जाकर फिर यहाँ बैठ नहीं सकते। ऐसे बहुत सेन्टर्स पर आकर बैठते हैं। बाबा जानते हैं - अगर कहें न बैठो तो कोई समय फिर असुर बन विघ्न डालते हैं। ट्रेटर बन पड़ेंगे। हंगामा करने लग पड़ेंगे। इसको कहा जाता है - पतित राज्य, कांटों की दुनिया। राजा-रानी तो है नहीं। यथा बड़े मिनिस्टर तथा प्रजा। वह इन बातों को समझेंगे नहीं। सच्चे बाबा के साथ सच्चा होना चाहिए। सच्ची दिल पर साहेब राजी। बुद्धि का ताला खोल देंगे। सच्ची दिल नहीं होगी तो ताला नहीं खोलेंगे। फिर मुरझाते रहेंगे। विघ्न पड़ते रहेंगे, इसलिए बाबा समझा देते हैं। शास्त्रों में भी लिखा हुआ है - इन्द्रप्रस्थ में शैतान आकर छिपकर बैठ जाते थे। यहाँ अथवा सेन्टर में तो ऐसे ही आकर बैठ जाते हैं। देखें क्या है फिर कन्याओं को देखेंगे। चंचलता करेंगे।

अब बेहद का बाप आकर बच्चों को समझाते हैं, दुनिया नहीं जानती है। गीता में बाप के बदले कृष्ण का नाम डाल दिया है। भगवान तो खुद ज्ञान का सागर है, वह बैठ समझाते हैं। उस बाप को ही याद करना है क्योंकि अब वापिस जाना है। तुम अब याद की यात्रा पर हो। तीर्थ यात्रा पर कभी कोई विकार में नहीं जाते हैं। यह लम्बी यात्रा है। जब तक जीते हैं तब तक यात्रा पर हैं। यात्रा पर चलते-चलते विकार में गिरा तो चकनाचूर हो जायेगा। यह ख्याल में रखना है - हम यात्रा पर हैं, विकार में नहीं जाना है। आजकल दुनिया तो बहुत गन्दी है। तीर्थों पर भी पण्डे लोग बहुत गन्दे होते हैं। बाबा अनुभवी बहुत है। तो बाप आकर सबसे जास्ती कन्याओं और माताओं को उठाते हैं। जगत अम्बा शक्ति सेना नाम गाया हुआ है। बाबा समझाते हैं, यह तो ख्याल रखना होता है - जैसा कर्म हम करेंगे हमको देख और करेंगे। अगर बी.के. में ही कोई विकार, देह-अभिमान वा लोभ आदि होगा तो सर्विस कर नहीं सकेंगी। फिर नापास हो जाती हैं, जिज्ञासु नाराज हो जाते हैं। ब्रह्माकुमारी अच्छी होगी तो जरूर अच्छा दुकान चलायेगी। जो अच्छी सर्विस करते हैं तो महाराजा-महारानी बनते हैं। कम सर्विस तो महाराजा-महारानी के दास-दासियां बन पड़ेंगे। लक्ष्मी-नारायण के पास दास-दासियां भी तो होंगे ना। वह तो किंग क्वीन के साथ रहते हैं। यहाँ तुम मनुष्य से देवता बनते हो। तुम यात्रा पर हो। यात्रा को भूले, शिवबाबा अथवा स्वीट होम को भूले तो माया का थप्पड़ बड़ा जोर से लग जाता है। तुमको बहुत पुरुषार्थ करना है। विकार से बचकर रहना है। यहाँ कोई भी बात छिप नहीं सकती। शिवबाबा से कुछ छिप न सके। सजा तो उनको देनी है।

कहा जाता है - फालो फादर मदर........। फादर थोड़ेही ऐसे कुछ करेंगे। बाबा के पास बहुत आते हैं, उनकी बातचीत से ही पता पड़ जाता है कि यह पतित है। मुश्किल पवित्र रहते होंगे। शक पड़ता है फिर मुरली में समझाना पड़ता है। बहुत हैं जो छिपाते हैं। यात्रा पर विकार में जाना बड़ा खराब है। तुम विजय माला में पिरो नहीं सकेंगे। चाहते हो - हम सूर्यवंशी बनें तो यात्रा पर चलते कभी अपवित्र नहीं बनना है। यात्रा पर हूँ - यह बच्चे भूलते रहते हैं। कोई तो सारे दिन में एक घण्टा, आधा घण्टा भी याद नहीं करते। बाबा की याद में रहना बड़ा मुश्किल है। फिर रॉयल घराने में भी आकर दास-दासी पद पाते हैं। पुरुषार्थ कर मात-पिता के तख्तनशीन बन दिखाओ। नहीं तो बाप कहेंगे कपूत बच्चा है जो ठीक रीति से चलते नहीं हैं। तुम ब्राह्मण यात्रा पर हो, अगर कुछ ऐसी चलन चल कुल को कलंक लगाया तो बहुत सजा खायेंगे। जन्म-जन्मान्तर तो गर्भ जेल बर्डस बने हो। इस समय सभी मनुष्य जेल बर्डस हैं। घड़ी-घड़ी सजा खाते हैं। तुमको तो अभी गर्भ महल में जाना है। तो कितनी मेहनत करनी चाहिए! भले तुम कहाँ भी बैठे हो, ट्रेन में हो अथवा कहाँ भी तुम यात्रा पर हो, याद में रहना है। कहते तो सब हैं - हम नारायण वा लक्ष्मी को वरेंगे। तो ऐसा बनकर दिखाओ। पद न पाया तो बाकी क्या किया। बाबा सावधान कर देते हैं। बाबा के पास आते हो तो बाबा अच्छी रीति हंसाते-बहलाते हैं। कोई तो मोह के कीड़े ऐसे हैं जैसे बन्दर-बन्दरियां। मित्र-सम्बन्धियों आदि से बुद्धियोग टूटता ही नहीं है। जो अपवित्र बनते हैं फिर लिखते भी हैं - बाबा, हमने हार खाई, काम के गटर में गिर पड़ा। चकनाचूर हो जाते हैं। बाबा सावधान करते रहते हैं - तुम यात्रा पर हो। काम विकार यहाँ नहीं होना चाहिए। नहीं तो बहुत दु:खी होंगे। बाप से वैकुण्ठ का वर्सा लेना है तो ऐसे भूलकर भी अपनी सत्यानाश नहीं कर देना। काम महाशत्रु है। आदि-मध्य-अन्त दु:ख देने वाला है। मृत्युलोक में सब आदि-मध्य-अन्त दु:ख भोगते रहते हैं। सतयुग को अमरलोक कहा जाता है। अमरनाथ शिवबाबा से कथा सुनने से बादशाही मिलती है। बुढ़ियायें और कन्यायें विकार से बची हुई हैं, विधवायें भी बहुत भाग्यशाली हैं। पतियों का पति तो शिवबाबा है। ईश्वरीय पाठशाला में आकर मुरली सुनेंगे तो नई-नई बातें सुनेंगे। बेहद का बाप स्वर्ग पवित्र दुनिया का मालिक बनाते हैं तो फट से पवित्र बनना चाहिए ना। घुटका खाते रहेंगे, विष पीते रहेंगे तो धारणा नहीं होगी। इसमें सोने का बर्तन चाहिए। बाप को निरहंकारी बन पतित दुनिया में आना पड़ता है। मुझे सिर्फ बच्चे ही जानते हैं। उनमें से भी माया कोई-कोई को नाक से पकड़ गिरा देती है। वह रिगार्ड नहीं रखते। ओहो, भगवान हमको पढ़ाते हैं! हम कितने सौभाग्यशाली हैं! बाबा कितने साधारण तन में बैठा है! तुम बच्चों को भी निरहंकारी बनना है। वह है ही निराकार, देह का अहंकार उनको हो न सके। तुम भी निरहंकारी बनो। आप मरे, मर गई दुनिया। हमको अब बाबा पास जाना है। इस कब्रिस्तान को क्या याद करना है। अपने से ऐसी-ऐसी बातें करते रहेंगे तब खुशी का पारा चढ़ेगा और सदैव प्रफुल्लित रहेंगे।

हम बाबा के साथ यात्रा पर हैं। बाबा लेने के लिए आया है। ऐसा न हो माया कहीं कान काट दे। फिर सुनते हुए भी धारणा नहीं होगी। खुशी का पारा नहीं चढ़ेगा। बहुतों को दान करेंगे तो बहुतों की आशीर्वाद मिलेगी। ज्ञान मार्ग में सबसे बहुत मीठा रहना है। लून-पानी नहीं बनना है। विकारी सम्बन्ध से और दैवी सम्बन्ध से तोड़ निभाना है। दोनों तरफ से स्नेही बनना है। बाप भी अपने सपूत बच्चों को देख खुश होते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अभी हम यात्रा पर हैं, इसलिए बहुत सम्भलकर चलना है। पवित्र जरूर रहना है।
2) बाप समान निरहंकारी बनना है। हमको बाबा पास जाना है इसलिए सबसे ममत्व निकाल देना है। अपने आपसे बातें कर प्रफुल्लित रहना है।

वरदान:-  
दु:ख के चक्करों से सदा मुक्त रहने और सबको मुक्त करने वाले स्वदर्शन चक्रधारी भव

जो बच्चे कर्मेन्द्रियों के वश होकर कहते हैं कि आज आंख ने, मुख ने वा दृष्टि ने धोखा दे दिया, तो धोखा खाना अर्थात् दु:ख की अनुभूति होना। दुनिया वाले कहते हैं - चाहते नहीं थे लेकिन चक्कर में आ गये। लेकिन जो स्वदर्शन चक्रधारी बच्चे हैं वह कभी किसी धोखे के चक्कर में नहीं आ सकते। वह तो दु:ख के चक्करों से मुक्त रहने और सबको मुक्त करने वाले, मालिक बन सर्व कर्मेन्द्रियों से कर्म कराने वाले हैं।

स्लोगन:- 
अकाल तख्तनशीन बन अपनी श्रेष्ठ शान में रहो तो कभी परेशान नहीं होंगे।

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