Friday, 29 June 2018

Brahma Kumaris Murli 30 June 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 30 June 2018


30/06/2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


"मीठे बच्चे - दिल से बाबा-बाबा कहते रहो तो अपार खुशी रहेगी, यह मुख से कहने की बात नहीं, अन्दर में सिमरण चलता रहे तो सब कलह-क्लेष मिट जायेंगे"
प्रश्नः-
कई बच्चे कहते - बाबा, मेरा मन मूँझता है, उलझन रहती है, तो बाबा उन्हें कौनसी शिक्षा देते हुए खुशी में रहने की युक्ति बताते हैं?
उत्तर:-
बाबा कहते - बच्चे, तुम यह शब्द ही राँग बोलते हो। मन मूँझता है'- यह कहना ही ग़लत है। बाप से बुद्धियोग टूटता है तब बुद्धि भटक जाती है। उदासी आ जाती है इसलिए बाबा युक्ति बताते - अपना चार्ट रखो, अन्दर में बाबा-बाबा सिमरण करते रहो। हर कदम पर श्रीमत लो तो उलझन समाप्त हो जायेगी।
गीत:-
बनवारी रे, जीने का सहारा........  
Brahma Kumaris Murli 30 June 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 30 June 2018 (HINDI)

ओम् शान्ति।
निराकार भगवानुवाच, निराकार बच्चों प्रति। निराकार भगवानुवाच किस द्वारा? इस लोन लिए हुए तन द्वारा। समझाया गया है - निराकार परमपिता परमात्मा का कोई शारीरिक नाम नहीं है। बाकी जो भी मनुष्यमात्र हैं उनका शारीरिक नाम पड़ता है। उस नाम से बुलाया जाता है। यहाँ फिर निराकार बाप निराकार बच्चों को कहते हैं कि इस शरीर को भूल जाओ। तुम आत्माओं को यह शरीर छोड़ मेरे पास आना है। अभी तुमको इस मृत्युलोक में जन्म नहीं लेना है। वह लौकिक माँ-बाप शारीरिक सम्बन्ध में लाते हैं - यह तुम्हारा फलाना है... और पारलौकिक बाप कहते हैं - हम निराकार हैं, जिसको परमपिता परमात्मा कहा जाता है। तुम भी निराकार आत्मा हो। इस शरीर का आधार लिया है। तुम्हारा अपना शरीर है। हमारा यह शरीर उधार लिया हुआ है। अभी तुम मुझ बाप को याद करो। मैं तुम आत्माओं का निराकार बाप हूँ। बाबा-बाबा' अक्षर बोलो। कभी-कभी कोई बच्चे कहते हैं - हमारा मन मूँझता है, मन को खुशी नहीं है। अरे, मन अक्षर क्यों कहते हो? बोलो - बाबा, हमको क्यों भूल जाता है! बाबा जो हमको स्वर्ग के लिए लायक बनाते हैं, उनको हम क्यों भूलते हैं! शरीर का भान छोड़ देही-अभिमानी बनो। बाबा कहते हैं - अब तुमको वापिस आना है, मुझे याद करो। निराकार बाबा निराकार आत्माओं को कहते हैं - बाबा-बाबा' करते रहो। यह बाप है और माता फिर है गुप्त। फादर के साथ माता तो जरूर चाहिए ना। दुनिया में कोई को पता नहीं - बाप इनके द्वारा मुख वंशावली बनाते हैं, तब उनको फादर कहते हैं। फिर मदर कहाँ? जगत अम्बा को नहीं कहेंगे। जगत अम्बा तो निमित्त है सम्भालने लिए क्योंकि यह मेल होने के कारण सम्भाल न सके इसलिए जगत अम्बा है। उनकी भी माँ यह है। ब्रह्मा बड़ी माँ है। यह सब हैं - ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ। वह कहते हैं मात-पिता। तो यह बाप बैठ समझाते हैं। यह कोई साधू-सन्त का काम नहीं।

बाप स्वर्ग की स्थापना करते हैं। माया रावण नर्क बनाने लग पड़ती है। बाप सुख देते हैं, माया दु:ख देती है। यह है ही सुख-दु:ख का खेल और है भारत के लिए। भारत हीरे जैसा था। अब कौड़ी जैसा बन पड़ा है। भारत में पवित्र गृहस्थ धर्म था, जिन्हों के चित्र हैं। लक्ष्मी-नारायण का राज्य था परन्तु वह कब स्थापन हुआ - यह कोई जानते नहीं। कल्प की आयु लाखों वर्ष कह देते हैं। तुम बच्चों को समझाया जाता है - 5 हजार वर्ष पहले इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। फिर लक्ष्मी-नारायण दी फर्स्ट, सेकेण्ड, थर्ड चलते हैं। आठ गद्दियाँ चलती हैं। फिर चन्द्रवंशी में 12 चलती हैं। डिनायस्टी होती है ना। मुगलों की डिनायस्टी, सिक्खों की डिनायस्टी....। बच्चों को समझाया जाता है - 5000 वर्ष पहले भारत में एक ही लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी गवर्मेन्ट थी। वह बाप ही बनाते हैं। भारतवासी माँगते भी यह हैं। अभी तो राजाई है नहीं, न किंग-क्वीन हैं। यह है ही प्रजा का प्रजा पर राज्य, क्षण-भंगुर का, इनमें कोई सुख नहीं। जितना समय पास होता जाता, दु:ख जास्ती होता जायेगा, इनको मृगतृष्णा समान सुख कहा जाता है। शास्त्रों में द्रोपदी और दुर्योधन का एक मिसाल भी है। वास्तव में ऐसे है नहीं। यह सब बातें बैठ बनाई हैं। है यह रूण्य (मरुस्थल) के पानी मिसल राज्य। राज्य मिला है तो और ही दु:खी होते जाते हैं। ब्रिटिश गवर्मेन्ट के समय इतना दु:ख नहीं था। बहुत सस्ताई थी। अभी तो हर चीज़ की कितनी महंगाई हो गई है! फैमन (अकाल), मूसलाधार बरसात, अर्थ-क्वेक आदि यह सब सामने आयेंगे। मनुष्य पानी के लिए हैरान होंगे। अभी तुम बच्चे अपना तन-मन-धन भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा में स्वाहा करते हो। बाप को मदद करते हो। बाप फिर वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी, वन गवर्मेन्ट, वन राज्य स्थापन करते हैं। हाहाकार के बाद फिर जयजयकार होना है। जो विनाश का साक्षात्कार किया है, वह प्रैक्टिकल इन आंखों से देखना है। तो बाप बैठ समझाते हैं - तुम अपने को आत्मा समझो। बाबा के बच्चे हैं, बाबा-बाबा करते रहो। मन मूँझता है, मन में खुशी नहीं है, यह मन' अक्षर निकाल दो। बाबा को याद नहीं करेंगे तो फिर खुशी कैसे होगी? अपने आपको न जानने के कारण ही दु:खी होते हैं। तुममन' अक्षर क्यों कहते हो? अरे, तुमको बाप याद नहीं पड़ता! बाप को भूल जाते हो क्या! लौकिक बाप के लिए कभी कहते हो क्या - हमको याद नहीं पड़ता है? छोटे बच्चे को भी सिखलाया जाता है - यह माँ-बाप है। यह बेहद का बाप कहते हैं - मुझे याद करो तो मैं तुमको स्वर्ग में ले जाऊंगा। सिर्फ बाबा का बनना है। बाप कहते हैं मेरी मत पर चलते रहो। बाप को तो पोतामेल भी बताना पड़े ना। बाप को अपने बच्चों का पता रहता है ना - यह कितनी कमाई करता है? तो बाप को जब बतायेंगे तब तो पता पड़े। बाप तो झट बताते हैं - तुमको वैकुण्ठ का मालिक बनाता हूँ।

बाबा कहते हैं - मैं तो दाता हूँ, तुमको देने लिए आया हूँ। तुम भी अपना सब कुछ सफल करने वाले हो इसलिए भविष्य के लिए अब बनाना है। जो जितना सफल करेंगे उन्हें उतनी बड़ी वैकुण्ठ की बादशाही भी मिलेगी। लेन-देन का हिसाब है। एक्सचेन्ज करते हैं। पुराने के बदले सब नया देते हैं। यह तो फर्स्ट क्लास ग्राहक है। एक हाथ दो, दूसरे हाथ लो। एक कहावत है ना - सुबह का सांई.... बाप तो एकदम विश्व का मालिक बनाने आते हैं। बाप कहते हैं - यह सब कुछ धन माल आदि धूल में मिल जाना है। इनको छोड़ो। देह सहित देह के सभी सम्बन्धों को भूलो, अपने को ट्रस्टी समझो। यह सब ईश्वर का दिया हुआ है। उनका ही है। बाकी शरीर निर्वाह अर्थ कर्म तो करना ही है। बाबा को मालूम होगा तो राय देते रहेंगे। कहते हैं - बाबा मोटर लूँ? अच्छा, पैसा है तो भल मोटर लो। मकान बनाना है? अच्छा, भल बनाओ। राय देते रहेंगे। पैसा है तो खूब मकान बनाओ, एरोप्लेन में घूमो, भल सुख लो। बच्चों को ही मत देंगे ना। कन्या की शादी के लिए पूछते हैं। अगर ज्ञान में नहीं चल सकती तो भल करा दो। बाप (ब्रह्मा) हमेशा राइट डायरेक्शन देंगे। अगर राँग दिया तो रेस्पान्सिबुल बाबा (शिवबाबा) है। वह तो फिर धर्मराज भी है ना। यह कोई कॉमन सतसंग नहीं है। गॉड फादरली युनिवर्सिटी है। बाप राय देते हैं - बच्चे स्वर्ग के मालिक बनो, श्रीमत पर चलो, देही-अभिमानी बनो। वहाँ के नाम भी कितने सुन्दर होते हैं! बसरमल आदि नाम वहाँ होते नहीं। वहाँ रामचन्द्र, कृष्णचन्द्र आदि नाम होते हैं। श्री का टाइटिल भी मिलता है क्योंकि श्रेष्ठ हैं ना! यहाँ तो कुत्ते-बिल्ली सबको श्री-श्री का टाइटिल देते रहते हैं। तो बाप समझाते हैं - यह पुरानी छी-छी दुनिया है। यह सब खत्म हो जाना है। अभी तुम मेरी श्रीमत पर चलो। श्रीमत भगवत गीता है मुख्य। बाकी वेद-शास्त्र आदि तो अनेक हैं।

बाप ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय - तीनों धर्म स्थापन करते है। फिर इब्राहिम अपना धर्म स्थापन करते हैं। उनका शास्त्र फलाना। अच्छा, वेद किस धर्म का शास्त्र है? कुछ भी पता नहीं! सन्यास धर्म का शास्त्र कोई वेद नहीं है। अगर वेद शास्त्र है तो वही पढ़ें। फिर गीता क्यों उठाते? क्रिश्चियन लोग सयाने हैं। दूसरे धर्म का शास्त्र कभी नहीं लेंगे। भारत-वासी तो सबको गुरू करते रहेंगे। बाबा ने समझाया था - जब कोई 4-5 इकट्ठे आयें तो हरेक को अलग-अलग समझाना चाहिए। जैसे पाकिस्तान में तुम अलग-अलग बैठते थे। अलग-अलग समझाने से उनकी नब्ज का पता पड़ेगा। फार्म भराना है क्योंकि हरेक की बीमारी अलग-अलग है। सर्जन एक-एक को बुलाकर नब्ज देखकर दवा देते हैं।

निश्चय करना है हम आत्मा हैं। आत्मा ही सुनती है। आत्मा ही पतित बनती है। आत्मा को निर्लेप कहना - यह तो झूठ बात है। आत्मा जैसा कर्म करती है, वैसा फल मिलता है। कहते हैं ना - इनके कर्म ऐसे किये हुए हैं। अभी बाबा हमको कर्म ऐसा अच्छा सिखलाते हैं जो 21 जन्म हम सुखी रहेंगे। कर्मों की गति है ना। सतयुग में तो कर्म अकर्म हो जाता है। विकर्म कोई होता नहीं। विकर्म कराने वाली माया ही नहीं होती। राजधानी स्थापन होती है तो जरूर तुम वर्सा तो पायेंगे। कर्मातीत अवस्था को पाना है। जन्म-जन्मान्तर के पाप सिर पर हैं। गंगा स्नान वा जप-तप आदि करने से विकर्म विनाश नहीं हो सकते। विकर्म विनाश योग अग्नि से ही होते हैं। अन्त में सबका हिसाब-किताब चुक्तू होगा, नम्बरवार। चुक्तू नहीं होगा तो सजा खानी पड़ेगी। चुक्तू करना है बाप की याद से। याद नहीं करते हैं, तब आत्मा मुरझाती है। बाप कहते हैं - मेरे को याद नहीं करेंगे तो माया वार करेगी। जितना हो सके याद करो। कम से कम 8 घण्टे तक याद रहेगी तो तुम पास हो जायेंगे। चार्ट रखो। तूफान तब आते हैं जब अपने को आत्मा समझ बाप को याद नहीं करते हो। गाते भी हैं - सिमर-सिमर सुख पाओ। अन्दर सिमरना है। चुप रहना है। राम-राम वा शिव-शिव कहना नहीं है। याद से तुम्हारे कलह-क्लेष मिट जायेंगे। तुम निरोगी बन जायेंगे। सीधी बात है। बाप को भूलने से ही माया का थप्पड़ लगता है। बाप कहते हैं - रहो भी भल गृहस्थ व्यवहार में। कदम-कदम पर बाबा से राय पूछते रहो। कहाँ पाप का काम न हो जाये। कन्या ज्ञान में नहीं आती है तो उनको देना ही पड़े। बच्चा अगर पवित्र नहीं रह सकता तो अपना कमा सकते हैं। वो जाकर शादी करें। कई फिर बाप की मिलकियत पर बड़ा झगड़ा करते हैं। पूरा समाचार नहीं देते हैं। वह हुए सौतेले। मातेले जरूर बतायेंगे। बाप को समाचार नहीं देंगे तो बाप कैसे जानें?

यहाँ तुम्हारा चेहरा हर्षितमुख होगा तब वहाँ भी तुम सदा हर्षितमुख रहेंगे। बिरला मन्दिर में लक्ष्मी-नारायण का कितना फर्स्टक्लास चित्र है! परन्तु जानते नहीं कि यह कब आये थे? अभी वह भारत का राज्य कहाँ गया? तुम जाकर समझा सकते हो। पहले थी सतोप्रधान अव्यभिचारी भक्ति। फिर बाद में व्यभिचारी रजो, तमोप्रधान भक्ति होती है। आगे तो परमात्मा को बेअन्त कहते थे। अभी कहते हैं सब ईश्वर ही ईश्वर हैं, इसको तमो बुद्धि कहा जाता है।

तो ऐसे नहीं कहना चाहिए कि हमारा मन नहीं लगता। यह तुम क्या कहते हो! बाप को भूलने से ही यह हाल होता है। बाप को याद करो तो खुशी का पारा चढ़ा रहेगा। बाप को याद करने से बड़ी भारी कमाई है। सारी रात बाप को याद करो। नींद को जीतने वाले बनो। गाते आये हो - बलिहार जाऊं। अब कहते हैं - मैं आया हूँ, तो मामेकम् याद करो ना। मुझ आत्मा का बाप वह है, उनको याद करना है। इनसे ममत्व मिट जाना चाहिए। नष्टोमोहा बन एक के साथ बुद्धि लगानी है तो पक्के हो जायेंगे। मुझे अब नये घर जाना है। पुराने घर से क्या ममत्व रखें। नया मकान बनाया जाता है तो फिर पुराने से दिल हट जाती है ना। बाप कहते हैं - देह सहित सब कुछ यह पुराना है। अब बाप और वर्से को याद करो। इस पढ़ाई से हम प्रिन्स-प्रिन्सेज जाकर बनेंगे सतयुग में। सेकेण्ड में बाबा प्रत्यक्षफल देते हैं। यह है प्रिन्स प्रिन्सेज बनने का कॉलेज। प्रिन्स-प्रिन्सेज का कॉलेज नहीं। यहाँ बनना है। फिर प्रिन्स के बाद राजा तो जरूर बनेंगे। अच्छा।

बापदादा, मीठी-मीठी मम्मा का सिकीलधे बच्चों को याद, प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा में अपना तन-मन-धन स्वाहा करना है। बाप का पूरा पूरा मददगार बनना है।
2) यहाँ हर्षितमुख रहना है। किसी भी बात में मुरझाना नहीं है, बाप की याद से सब कलह-क्लेष मिटा देने हैं।
वरदान:-
अपनी चलन और चेहरे द्वारा सेवा करने वाले निरन्तर योगी निरन्तर सेवाधारी भव
सदा इस स्मृति में रहो कि बाप को जानने और पाने वाली कोटों में कोई हम आत्मायें हैं, इसी खुशी में रहो तो आपके यह चेहरे चलते फिरते सेवाकेन्द्र हो जायेंगे। आपके हर्षित चेहरे से बाप का परिचय मिलता रहेगा। बापदादा हर बच्चे को ऐसा ही योग्य समझते हैं। तो चलते फिरते, खाते पीते अपनी चलन और चेहरे द्वारा बाप का परिचय देने की सेवा करने से सहज ही निरन्तर योगी, निरन्तर सेवाधारी बन जायेंगे।
स्लोगन:-
जो अंगद समान सदा अचल अडोल एकरस रहते हैं, उन्हें माया दुश्मन हिला भी नहीं सकती।

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