Saturday, 9 June 2018

Brahma Kumaris Murli 10 June 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 10 June 2018


10/06/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 25-05-83 मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


ब्रह्मा बाप की बच्चों से एक आशा
आज बापदादा सर्व बच्चों की सेवा का, याद का और बाप समान बनने का चार्ट देख रहे थे। बापदादा द्वारा जो भी सर्व खजाने मिले, बाप को निराकार और आकार रूप से साकार में बुलाया और बाप-दादा भी बच्चो के स्नेह में बच्चों के बुलावे पर आये, मिलन मनाया

Brahma Kumaris Murli 10 June 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 10 June 2018 (HINDI) 

अब उसके फलस्वरूप सभी बच्चे कौन से फल बने - प्रत्यक्षफल बने
? सीजन के फल बने? रूप वाले फल बने वा रूप रस वाले फल बने? डायेरक्ट पालना के अर्थात् पेड़ के पके हुए फल बने वा कच्चे फलों को कोई एक दो विशेषता के मसालों के आधार पर स्वयं को रंग रूप में लाया है वा अब तक भी कच्चे फल हैं? यह चार्ट बच्चों का देख रहे थे। संगमयुग की विशेषता प्रमाण, प्रत्यक्ष फल के समय प्रमाण, हर सबजेक्ट में, हर कदम में, कर्म में प्रत्यक्षफल देने वाले, प्रत्यक्षफल खाने वाले बाप की पालना के पके हुए रंग, रूप, रस तीनों से सम्पन्न अमूल्य फल होना चाहिए। अभी अपने आप से पूछो - मैं कौन? सदा संग रहने का रंग सदा ब्रह्मा बाप समान बाप को प्रत्यक्ष करने का रूप, सदा सर्व प्राप्तियों का रस - ऐसा बाप समान बने हैं? आजकल ब्रह्मा बाप ब्राह्मण बच्चों की समान सम्पन्नता को विशेष देखते रहते हैं। सारा समय हर एक विशेष बच्चे का चित्र और चरित्र दोनों सामने रख देखते रहते हैं कि कहाँ तक सम्पन्न बने हैं! माला के मणके कौन और कितने अपने नम्बर पर सेट हो गये हैं! उसी हिसाब से रिजल्ट को देख विशेष ब्रह्मा बाप बोले - ब्राह्मण आत्मा अर्थात् हर कर्म में बापदादा को प्रत्यक्ष करने वाली। कर्म की कलम से हर आत्मा के दिल पर, बुद्धि पर, बाप का चित्र वा स्वरूप खींचने वाले रूहानी चित्रकार बने हो ना! अभी ब्रह्मा बाप की, इस सीजन के रिज़ल्ट में बच्चों के प्रति एक आशा है। क्या आशा होगी? बाप की सदा यही आशा रहती कि हर बच्चा अपने कर्मो के दर्पण द्वारा बाप का साक्षात्कार करावे अर्थात् हर कदम में फालो फादर कर बाप समान अव्यक्त फरिश्ता बन कर्मयोगी का पार्ट बजावे। यह आशा पूर्ण करना मुश्किल है वा सहज है? ब्रह्मा बाप तो सदा आदि से "तुरन्त दान महापुण्य" इसी संस्कार को साकार रूप में लाने वाले रहे ना। करेंगे, सोचेंगे, प्लैन बनायेंगे, यह संस्कार कभी साकार रूप में देखे? अभी-अभी करने का महामंत्र हर संकल्प और कर्म में देखा ना! उसी संस्कार प्रमाण बच्चों से भी क्या आशा रखेंगे? समान बनने की आशा रखेंगे ना? सबसे पहले बापदादा मधुबन वालों को आगे रखते हैं। हो भी आगे ना। सबसे अच्छे ते अच्छे सैम्पल कहाँ देखते हैं सभी? सबसे बड़े ते बड़ा शोकेस मधुबन है ना। देश-विदेश से सब अनुभव करने के लिए मधुबन में आते हैं ना। तो मधुबन सबसे बड़ा शोकेस है। ऐसे शोकेस में रखने वाले शोपीस कितने अमूल्य होंगे। सिर्फ बापदादा से मिलने के लिए नहीं आते हैं लेकिन परिवार का प्रत्यक्ष रूप भी देखने आते हैं। वह रूप दिखाने वाले कौन? परिवार का प्रत्यक्ष सैम्पल, कर्मयोगी का प्रत्यक्ष सैम्पल, अथक सेवाधारी का प्रत्यक्ष सैम्पल, वरदान भूमि के वरदानी स्वरूप का प्रत्यक्ष सैम्पल कौन हैं? मधुबन निवासी हो ना!

भागवत का महात्तम सुनने का बड़ा महत्व होता है। सारे भागवत का इतना नहीं होता। तो चरित्र भूमि का महात्तम मधुबन वाले हैं ना। अपने महत्व को तो याद रखते हो ना। मधुबन निवासियों को याद स्वरूप बनने में मेहनत है वा सहज है? मधुबन है ही प्रजा और राजा दोनों आत्माओं को वरदान देने वाला।

आजकल तो प्रजा आत्मायें भी अपना वरदान का हक लेकर जा रहीं हैं। जब प्रजा भी वरदान ले रही है तो वरदान भूमि में रहने वाले कितने वरदानों से सम्पन्न आत्मायें होंगी। अभी के समय प्रमाण सभी प्रकार की प्रजा अपना अधिकार लेने के लिए चारों ओर आने शुरू हो गई है। चारों ओर सहयोगी और सम्पर्क वाले वृद्धि को पा रहे हैं। प्रजा की सीजन शुरू हो गई है। तो राजे तो तैयार हो ना वा राजाओं का छत्र कब फिट होता है कब नहीं होता। तख्तनशीन ही ताजधारी बन सकते हैं। तख्तनशीन नहीं तो ताज भी सेट नहीं हो सकता। इसलिए छोटी-छोटी बातों में अपसेट होते रहते। यह (अपसेट होना) निशानी है तख्तनशीन अर्थात् तख्त पर सेट न होने की। तख्तनशीन आत्मा को व्यक्ति तो क्या लेकिन प्रकृति भी अपसेट नहीं कर सकती। माया का तो नाम निशान ही नहीं। तो ऐसे तख्तनशीन ताजधारी वरदानी आत्मायें हो ना। समझा - मधुबन के ब्राह्मणों के महात्तम का महत्व। अच्छा - आज तो मधुबन निवासियों का टर्न है। बाकी सब गैलरी में बैठे हैं। गैलरी भी अच्छी मिली है ना। अच्छा।

आदि रत्न आदि स्थिति में आ गये ना। मध्य भूल गया ना। डालियाँ वगैरा सब छूट गई ना। आदि रत्न सभी उड़ते पंछी बनकर जा रहे हो ना। सोने हिरण के पीछे भी नहीं जाना। किसी भी तरह की आकर्षण वश नीचे नहीं आना। चाहे किसी भी प्रकार के सरकमस्टांस बुद्धि रूपी पाँव को हिलाने आवें लेकिन सदा अचल अडोल, नष्टोमोहा और निर्माण रहना तभी उड़ते पंछी बन उड़ते और उड़ाते रहेंगे। सदा न्यारे और सदा बाप के प्यारे। न किसी व्यक्ति के, न किसी हद के प्राप्ति के प्यारे बनना। ज्ञानी तू आत्मा के आगे यह हद की प्राप्तियाँ ही सोने हिरण के रूप में आती हैं इसलिए हे आदि रत्नों, आदि पिता समान सदा निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी रहना। समझा। अच्छा-

ऐसे हर कर्म में बाप का प्रत्यक्ष स्वरूप दिखाने वाले, पुण्य आत्मायें, हर कर्म में ब्रह्मा बाप को फालो करने वाले, विश्व के आगे चित्रकार बन बाप का चित्र दिखाने वाले - ऐसे ब्रह्मा बाप समान श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

सभी महारथियों ने सेवा के जो प्लैन्स बनाये हैं उसमें भी विशेष यूथ का बनाया है ना। यूथ वा युवा वर्ग की सेवा के पहले जब युवा वर्ग गवर्मेंन्ट के आगे प्रत्यक्ष होने का संकल्प रख आगे बढ़ रहा है तो मैदान में आने से पहले एक बात सदा ध्यान में रहे कि बोलना कम है, करना ज्यादा है। मुख द्वारा बताना नहीं है लेकिन दिखाना है। कर्म का भाषण स्टेज पर करें। मुख का भाषण करना तो नेताओं से सीखना हो तो सीखो। लेकिन रूहानी युवा वर्ग सिर्फ मुख से भाषण करने वाले नहीं लेकिन उनके नयन, मस्तक, उनके कर्म भाषण करने के निमित्त बन जाऍ। कर्म का भाषण कोई नहीं कर सकता है। मुख का भाषण अनेक कर सकते । कर्म बाप को प्रत्यक्ष कर सकता है। कर्म रूहानियत को सिद्ध कर सकता है। दूसरी बात - युवा वर्ग सदा सफलता के लिए अपने पास एक रूहानी तावीज रखे। वह कौन सा? रिगार्ड देना ही रिगार्ड लेना है। यह रिगार्ड का रिकार्ड सफलता का अविनाशी रिकार्ड हो जायेगा। युवा वर्ग के लिए सदा मुख पर एक ही सफलता का मंत्र हो - "पहले आप" - यह महामंत्र मन से पक्का रहे। सिर्फ मुख के बोल हों कि पहले आप और अन्दर में रहे कि पहले मैं, ऐसे नहीं। ऐसे भी कई चतुर होते हैं मुख से कहते पहले आप, लेकिन अन्दर भावना पहले मैं की रहती है। यथार्थ रूप से पहलें मैं को मिटाकर दूसरे को आगे बढ़ाना सो अपना बढ़ना समझते हुए इस महामंत्र को आगे बढ़ाते सफलता को पाते रहेंगे। समझा। यह मंत्र और तावीज सदा साथ रहा तो प्रत्यक्षता का नगाड़ा बजेगा।

प्लैन्स तो बहुत अच्छे हैं लेकिन प्लेन बुद्धि बन प्लैन प्रैक्टिकल में लाओ। सेवा भले करो लेकिन ज्ञान को जरूर प्रत्यक्ष करो। सिर्फ शान्ति, शान्ति तो विश्व में भी सब कह रहे हैं। अशान्ति में शान्ति मिक्स कर देते हैं। बाहर से तो सब यही नारे लगा रहे हैं कि शान्ति हो। अशान्ति वाले भी नारा शान्ति का ही लगा रहे हैं। शान्ति तो चाहिए लेकिन जब अपनी स्टेज पर प्रोग्राम करते हो तो अपनी अथॉरिटी से बोलो! वायुमण्डल को देखकर नहीं। वह तो बहुत समय किया और उस समय के प्रमाण यही ठीक रहा। लेकिन अब जबकि धरती बन गई है तो ज्ञान का बीज डालो। टॉपिक भी ऐसी हो। तुम लोग टॉपिक इसलिए चेन्ज करते हो कि दुनिया वाले इन्ट्रेस्ट लें। लेकिन आवे ही इन्ट्रेस्ट वाले। कितने मेले, कितनी कान्फ्रेन्स, कितने सेमीनार आदि किये हैं। इतने वर्ष तो लोगों के आधार पर टॉपिक्स बनाये। आखिर गुप्त वेष में कितना रहेंगे! अब तो प्रत्यक्ष हो जाओ। वह समय अनुसार जो हुआ वह तो हुआ ही। लेकिन अभी अपनी स्टेज पर परमात्म बॉम तो लगाओ। उन्हों का दिमाग तो घूमे कि यह क्या कहते हैं! नहीं तो सिर्फ कहते कि बहुत अच्छी बातें बोलीं। तो अच्छी, अच्छी ही रही और वह वहाँ के वहाँ रह जाते। कुछ हलचल तो मचाओ ना। हरेक को अपना हक होता है। प्वाइन्टस भी दो तो अथॉरिटी और स्नेह से दो तो कोई कुछ नहीं कर सकता। ऐसे तो कई स्थानों पर अच्छा भी मानते हैं कि अपनी बात को स्पष्ट करने में बहुत शक्तिशाली हैं। ढंग कैसा हो वह तो देखना पड़ेगा। लेकिन सिर्फ अथॉरिटी नहीं, स्नेह और अथॉरिटी दोनों साथ-साथ चाहिए। बापदादा सैदव कहते हैं कि तीर भी लगाओ साथ-साथ मालिश भी करो। रिगार्ड भी अच्छी तरह से दो लेकिन अपनी सत्यता को भी सिद्ध करो। भगवानुवाच कहते हो ना! अपना थोड़े ही कहते हो। बिगड़ने वाले तो चित्रों से भी बिगड़ते हैं फिर क्या करते हो? चित्र तो नहीं निकालते हो ना! साकार रूप में तो फलक से किसी के भी आगे अथॉरिटी से बोलने का प्रभाव क्या निकला। कब झगड़ा हुआ क्या? यह तरीका भाषण का भी सीखे ना। ज्ञान की रीति कैसे बोलना है - स्टडी की ना। अब फिर यह स्टडी करो। दुनिया के हिसाब से अपने को बदला, भाषा को चेन्ज किया ना। तो जब दुनिया के रूप में चेन्ज कर सके तो यथार्थ रूप से क्या नहीं कर सकते। कब तक ऐसे चलेंगे? इसमें तो खुश हैं कि यह जो कहते हैं बहुत अच्छा है। आखिर दुनिया में यह प्रसिद्ध हो कि -यही यथार्थ ज्ञान है'। इससे ही गति सद्गति होगी। इस ज्ञान बिना गति सद्गति नहीं। अभी तो देखो योग शिविर करके जाते हैं। बाहर जाते फिर वही की वही बात कहेंगे कि परमात्मा सर्वव्यापी है। यहाँ तो कहते योग बहुत अच्छा लगा, फाउण्डेशन नहीं बदलता। आपके शक्ति के प्रभाव से परिवर्तन हो जाते हैं। लेकिन स्वयं शक्तिशाली नहीं बनते। जो हुआ है यह भी जरूरी था। जो धरनी कलराठी बन गई थी वह धरनी को हल चलाके योग्य धरनी बनाने का यही साधन यथार्थ था। लेकिन आखिर तो शक्तियाँ अपने शक्ति स्वरूप में भी आयेंगी ना! स्नेह के रूप में आयें, लेकिन यह शक्तियाँ हैं, इनका एक-एक बोल हृदय को परिवर्तन करने वाला है, बुद्धि बदल जाये, `ना' से ‘`हाँ' में आ जायें। यह रूप भी प्रत्यक्ष होगा ना। अभी उसको प्रत्यक्ष करो। उसका प्लैन बनाओ। आते हैं खुश होकर जाते हैं। वो तो जिन्हों को इतना आराम, इतना स्नेह, खातिरी मिलेगी तो जरूर सन्तुष्ट होकर जाते हैं। लेकिन शक्ति रूप बनकर नहीं जाते। ब्रह्मा बाप कहते थे कि सब प्रदर्शनियों में प्रश्नावली लगाओ। उसमें कौन सी बातें थी? तीर समान बातें थी ना! फार्म भराने के लिए कहते थे। यह राइट है वा रांग, हाँ वा ना लिखो। फार्म भराते थे ना। तो क्या योजनायें रहीं? एक है ऐसे ही भरवाना। जल्दी-जल्दी में रांग वा राइट कर दिया, लेकिन समझाकर भराओ। तो उसी अनुसार यथार्थ फार्म भरेंगे। सिद्ध तो करना ही पड़ेगा। वह आपस में प्लैन बनाओ। जो अथॉरिटी भी रहे और स्नेह भी रहे। रिगार्ड भी रहे और सत्यता भी प्रसिद्ध हो। ऐसे किसकी इन्सल्ट थोड़ेही करेंगे? यह भी लक्ष्य है कि हमारी ही ब्रान्चेज हैं, हमारे से ही निकले हुए हैं। उन्हों को रिगार्ड देना तो अपना कर्तव्य है। छोटों को प्यार देना यह तो परम्परा ही है। अच्छा।
वरदान:-
दया भाव को धारण कर सर्व की समस्याओं को समाप्त करने वाले मास्टर दाता भव
जिन आत्माओं के भी सम्पर्क में आते हो, चाहे कोई कैसे भी संस्कार वाला हो, आपोजीशन करने वाला हो, स्वभाव के टक्कर खाने वाला हो, क्रोधी हो, कितना भी विरोधी हो, आपकी दया भावना उसके अनेक जन्मों के कड़े हिसाब-किताब को सेकण्ड में समाप्त कर देगी। आप सिर्फ अपने अनादि आदि दाता पन के संस्कारों को इमर्ज कर दया भाव को धारण कर लो तो ब्राह्मण परिवार की सर्व समस्यायें समाप्त हो जायेंगी।
स्लोगन:-
अपने रहमदिल स्वरूप वा दृष्टि से हर आत्मा को परिवर्तन करना ही पुण्यात्मा बनना है।

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