Tuesday, 29 May 2018

Brahma Kumaris Murli 30 May 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 30 May 2018


30/05/2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


"मीठे बच्चे - वारिस बनना है तो वारी जाओ अर्थात् सबसे नष्टोमोहा बनो। साकार बाप को पूरा-पूरा फालो करो।"
प्रश्नः-
पापों से बचने तथा अनेक आत्माओं की आशीर्वाद प्राप्त करने का साधन क्या है?
उत्तर:-
पापों से बचने के लिए तन-मन-धन सब कुछ बाप पर बलिहार कर दो, फिर ट्रस्टी होकर सम्भालो। कदम-कदम पर श्रीमत लेते रहो। श्रीमत कहती है - तुम बच्चे अपना पैसा पाप के काम में नहीं लगा सकते हो। पाप आत्मा को दान देना - यह भी पाप कराने के निमित्त बनना है इसलिए अगर धन है तो रूहानी हॉस्पिटल खोलो - इससे बहुतों की आशीर्वाद मिलेगी।
गीत:-
हमारे तीर्थ न्यारे हैं....  

Brahma Kumaris Murli 30 May 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 30 May 2018 (HINDI)

ओम् शान्ति।
मीठे वा सिकीलधे बच्चों ने अपनी महिमा सुनी। बाप ने समझाया है - भारत ही पापात्मा, भारत ही पुण्यात्मा कहलाता है। भारतवासी ही पतित-पावन को बुलाते हैं। सतयुग में तो पतित होते नहीं। उनको कहा जाता है स्वर्ग, शिवालय, पुण्य आत्माओं की भूमि। कलियुग है पाप आत्माओं की भूमि। भारत में फिर दान-पुण्य भी बहुत करते हैं। इस समय तुम बच्चे भी बाप को तन-मन-धन सब कुछ दे देते हो। तुम्हारे आगे मिसाल भी हैं। यह बाप (ब्रह्मा) निमित्त बना है, क्योंकि समझते भी हैं जैसा कर्म मैं करूंगा, मुझे देख और भी करने लग पड़ेंगे। तो बाप कहते हैं इनसे मैं ऐसा कर्म कराता हूँ जो स्वर्ग में यह नम्बरवन बन जाते हैं। यह तन-मन-धन सब देकर फौरन नष्टोमोहा बन गये। अपने बच्चों को वारिस न बनाए इन्हीं माताओं को बना दिया। सब कुछ माताओं के हवाले कर दिया। ट्रस्टी बना दिया। बोला - यह सब कुछ आप माताओं के चरणों में है। तुम वारिस बन जाओ। बस, कुछ भी ख्याल नहीं किया। हम तो बाबा के बन जाते हैं। भक्तिमार्ग में जन्म बाई जन्म गाते आये हैं वारी जाऊं, मेरा तो एक बाबा दूसरा न कोई... तो अब मैं इन माताओं को अपना वारिस बनाता हूँ। इन माताओं द्वारा ही सृष्टि का कल्याण होना है। पहले माता को अपना गुरू बना दिया। बस, मेरा तो एक बाबा दूसरा न कोई। नहीं तो बच्चों आदि से मोह होता है ना। परन्तु एकदम उनसे दिल टूट, बाप से दिल लग गई। बेहद का वर्सा लेना है तो हद का सब कुछ देना पड़े। परन्तु बाप तो दाता है, वह कब लेते नहीं हैं। शिवबाबा देने वाला है। डायरेक्शन देंगे - ऐसे-ऐसे करो। तो यह माता गुरू बन जाती है। त्वमेव माताश्च पिता.... पहले माता। सतयुग में भी पहले लक्ष्मी फिर नारायण। पहले राधे फिर कृष्ण। जैसे बाप माताओं को आगे रखते हैं वैसे पुरुषों को भी माताओं को आगे रखना है। उन्हों की सम्भाल करनी है। बिचारी अबलायें हैं।

तुम सब इस समय ज्ञान नदियाँ हो। ब्रह्मपुत्रा नदी का छोर (किनारा) सागर में होता है। कलकत्ता में ब्रह्मपुत्रा नदी है। शिवजयन्ती पर वहाँ भारी मेला लगता है। ब्रह्मपुत्रा नदी और सागर के संगम पर सब यात्री जाते हैं। वहाँ जाकर सब स्नान करते हैं। शिवबाबा है ज्ञान सागर और यह ब्रह्मा है नदी। अभी तुम आये हो ब्रह्मा नदी, शिव सागर के मेले पर। परन्तु यह सब हैं ज्ञान की बातें। ज्ञान सागर से तुम निकले हो। ज्ञान स्नान से ही सबका कल्याण होना है। पानी की बात नहीं। यह ब्रह्मपुत्रा ब्रह्मा है, शिवबाबा की सन्तान। तीर्थों का राज़ भी तुम समझते हो। हम बुद्धियोग की यात्रा पर हैं। बुद्धियोग लगाते हैं परमपिता परमात्मा साथ। भक्तिमार्ग में तो कितना माथा मारते हैं। बाप के साथ बुद्धियोग रहता ही नहीं। बाप भी कहते हैं - मैं एक ही बार आकर मत देता हूँ कि मेरे साथ योग लगाओ। ऐसा और कोई कह न सके। ज्ञान सागर बाप ही सुख का सागर, आनन्द का सागर है। हरेक की महिमा अलग-अलग है। ऊंच ते ऊंच भगवान वह पतित-पावन है। वह एक है, वह पतित दुनिया को पावन बनाने का पार्ट बजा रहे हैं। खुद भी कहते हैं - कल्प-कल्प आकर सबको तीर्थ पर ले जाता हूँ। सब भक्त पुरुषार्थ करते हैं मुक्ति के लिए। सन्यासी निवृति मार्ग वाले मुक्ति चाहते हैं, वह तो समझते हैं सुख काग विष्टा के समान है। एक पाई का सुख है बाकी है दु:ख। स्वर्ग में तो ऐसे नहीं होगा। बाप ने समझाया है वह निवृति मार्ग का रजोगुणी हद का सन्यास है। यह है सतोगुणी बेहद का सन्यास। हमको तो सारी छी-छी सृष्टि को बदल नई सृष्टि में आना है। हम देवता बनते हैं ना। लक्ष्मी का आह्वान करते हैं तो कितनी सफाई करते हैं! अभी तो है बेहद की बात। सारी दुनिया की सफाई होनी है, 5 तत्व भी तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जाते हैं। वहाँ तो नम्बरवन वैभव रहते हैं। फूल आदि ऐसे होते हैं जो घर बैठे भी सुगन्ध आती है। इतर आदि भी लगाने की दरकार नहीं रहती। अगरबत्ती की दरकार नहीं रहती। नेचुरल खुशबू रहती है। स्वर्ग कहने से ही मुख मीठा हो जाता है।

परमपिता परमात्मा आकर सृष्टि को इतना ऊंच बनाते हैं, तो ऐसे बाप से कितना लॅव करना चाहिए! प्रामिस करनी चाहिए कि - बाबा, हम नष्टोमोहा हो आपसे योग लगायेंगे। आपको ही वारिस बनायेंगे। हरेक को अपनी कमाई करनी है। तो कमाई का ओना होना चाहिए। जो करेगा सो पायेगा। इस दुनिया में मनुष्य जो भी करेंगे पाप करेंगे। अभी बाप के पास बलि चढ़ने से ही तुम मेरी मत पर चलेंगे। धन हमेशा पात्र को दिया जाता है। अगर कोई शराबी को दिया तो उस पर दोष आ जाता है। कपूत बच्चे को दिया तो उनका पाप भी तुम्हारे पर चढ़ जायेगा इसीलिए हिसाब-किताब चुक्तू करो। सरेण्डर हुए फिर एलाउ नहीं करेंगे किसको देने के लिए, नहीं तो फिर पाप हो जायेगा। कन्या को तो देना ही पड़े। अगर स्वर्ग का मालिक नहीं बनती, स्वर्ग में नहीं चलती, नर्क में ही गोता खाने चाहती है तो क्या कर सकते हैं। तुम बच्चे जानते हो - अभी छोटे-बड़े सबका मौत है। यह यादव-कौरव अपना प्लैन बना रहे हैं। पाण्डवों का फिर अपना प्लैन है। जीत तो पाण्डवों की है ना। स्थूल लड़ाई की बात ही नहीं है। यहाँ तो योग और ज्ञान की बात है। जो कुछ शास्त्र आदि पढ़े हैं उन सबको भूल जाओ। नये सिर यहाँ बैठ पढ़ो। जीते जी मरकर बच्चा बनेंगे तो वह सब कुछ भूल जायेंगे। तुम छोटे बच्चे हो। बाप कहते हैं अब तुम हमारे बन हम से सीखो। अपने को छोटा गोद का बच्चा समझो। बच्चों को बाप बैठ पढ़ाते हैं। उनमें छोटे भी हैं, बूढ़े भी हैं। सबको बच्चा बना देते हैं। फिर श्रीमत देते हैं - बच्चे, अभी तक जो कुछ सुना है वह भूलते जाओ। हियर नो ईविल, सी नो ईविल... कोई मनुष्य की बात नहीं सुनो। मनुष्य जो कुछ करेंगे सो अनराइटियस, राँग करेंगे। सबसे बुरा है ईश्वर को सर्वव्यापी कहना। अरे, बाप सर्वव्यापी हुआ तो वर्सा किससे लेंगे! फिर तो सब बाप हो गये। शिवोहम्, तत् त्वम् कह देने से वर्से की बात नहीं ठहरती। सबको उल्टा रास्ता बताकर डुबो देते हैं। पतित कौन बनाते हैं? रावण की मत पर चलने वाले इसलिए बाप कहते हैं इन सबको भूलो। मामेकम् याद करो। आप मरे मर गई दुनिया। प्रैक्टिकल में भी पुरानी दुनिया खत्म होनी ही है। कब्रिस्तान बनना ही है, फिर परिस्तान बनना है। बाम्ब्स गिरने हैं। सारा कब्रिस्तान बन जायेगा। फिर नया बनेगा। हिरोशिमा अब कितना नया बन गया है। तो अब सारा भारत खास, दुनिया आम कब्रिस्तान होनी है। समझो सब मरे पड़े हैं। अब परिस्तान वैकुण्ठ के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए।

बच्चे समझते हैं अब बापदादा आये हैं। शिवबाबा ब्रह्मा के रथ में आकर रथी बनते हैं। ऐसे नहीं, कृष्ण कोई अर्जुन का रथी बना है। नहीं। परमपिता परमात्मा इस रथ पर बैठ सुनाते हैं। बाबा तो बहुत बिजी रहते हैं। कहते हैं कि मैं आया हूँ पतित दुनिया को पावन बनाने। तो मुझे कितने रूप धारण करने होते हैं। बहुतों की ज्योति जगाता हूँ। मेरे साथ योग लगाओ, यह पेट्रोल डालो तो बैटरी जग जायेगी। दीवा बुझ जाता है तो घड़ी-घड़ी घृत डालते हैं। बाबा कहते हैं अब पूरा योग लगाओ। यह तो जानते हो बाप इस ब्रह्मा के तन से हमको पढ़ाने आया है। भगवानुवाच, भगवान क्या कहते हैं? बच्चे, मुझे याद करो। मौत तुम्हारे सिर पर खड़ा है। छोटे-बड़े सबका मौत है। यह है मृत्युलोक। मैं अमरनाथ आया हूँ अमरकथा सुनाने। तुम पार्वतियाँ अथवा सीतायें हो। सब रावण की जेल में हो। शोक वाटिका में पड़ी हो। बाप आकर अशोक वाटिका में ले जाते हैं। वहाँ कोई शोक रहता नहीं। अभी तुम बच्चों को राँग-राइट सोचने की बुद्धि मिली है। राइट क्या है, राँग क्या है, पुण्य कैसे होता है, पाप कैसे होता है - यह सब तुम जानते हो। योग टूटा तो माया पाप करा देगी क्योंकि इस समय माया तमोप्रधान है इसलिए कदम-कदम पर सावधानी चाहिए। श्रीमत पर चलने में कोई नुकसान नहीं। मनुष्य भगवान को पहचानते नहीं। बाप कहते हैं मैं आया हूँ तुमको शिक्षा देने। तुम मेरे बच्चे प्राणों से प्यारे हो। जानता हूँ तुम बच्चे बहुत दु:खी बने हो। अब तुमको सुख की दुनिया में ले चलने आया हूँ। सगे और सौतेले का राज़ भी समझाया है। सगे पर बाप का ध्यान रहता है। सगे राजाई का वर्सा लेंगे। लगे प्रजा का वर्सा लेंगे। इतनी सारी डीटी किंगडम स्थापन हो रही है। तुम राजाई पाने लिए पुरुषार्थ कर रहे हो। पहली-पहली बात है पवित्रता की। विकार का विकल्प आया तो कर्मेन्द्रियों से नहीं करना चाहिए। क्रोध आया तो मुख से गुस्सा नहीं करना चाहिए। अगर तुम्हारे में भूत होगा तो लक्ष्मी को कैसे वरेंगे। जिनमें 5 विकार हैं उनको बन्दर कहा जाता है। बाबा ने बन्दर के बदले अपनी नलिनी बच्ची का फोटो डाला है। टॉक नो ईविल, सी नो ईविल... का चित्र है। उस बच्ची को लौकिक बाप ने सेन्टर खोलकर दिया है। जो कुछ पूँजी थी सब बेचकर बच्ची नलिनी को दे दिया। जैसे बाप ने सब माताओं को दे दिया वैसे इसने (काकू भाई ने) अपनी बच्ची को दे दिया। समझा यह भी कन्या है। क्यों न इनसे शुभ कार्य कराऊं। बच्ची ने कहा मैं शादी नहीं करूंगी। वह पैसा इस कार्य में लगा दो। मैं पतित दुनिया को पावन बनाने की सर्विस करूंगी। भल बच्चे भी हैं, लेकिन वारिस बच्ची को बना दिया है। उनका कितना ऊंच पद हो जायेगा! बहुत ऊंचा पद पायेंगे। बहुतों की आशीर्वादें उनके सिर पर आयेंगी क्योंकि गाडॅली हॉस्पिटल अथवा गाडॅली कॉलेज खोला है। इस समय मनुष्यों की चलन ही ऐसी है जो सब पाप में लगा देते हैं। पाप करते और कराते रहते हैं। पाप आत्मा बन पड़े हैं। अब बाबा कहते हैं - बच्चे, मेहनत करो। पापों का बोझा बहुत है। निरन्तर याद करने का पुरुषार्थ करो। अन्त में वह अवस्था रहे। सन्यासी भी ऐसे बैठे-बैठे चले जाते हैं। हम जाकर ब्रह्म में लीन होते हैं। बस, ऐसा कह शरीर छोड़ देते हैं। ऐसे भी होते हैं फिर उस समय सन्नाटा छा जाता है। यह बाबा अपने अनुभव की बात सुनाते हैं। अनुभव भी होता है।

बाप कहते हैं तुम बच्चे हो सृष्टि के पापात्माओं को पुण्यात्मा बनाने वाली सच्ची ज्ञान गंगायें। गंगा के किनारे पर देवताओं का मन्दिर दिखाया है। नाम रख दिया है गंगा। अब पानी की नदी तो पतित-पावन हो नहीं सकती। न देवतायें पतित-पावन हैं। पतित-पावन तो ब्राह्मण हैं। उन्होंने गंगा पर देवता का चित्र रख दिया है। देवतायें तो पतित को पावन बनाते नहीं। मनुष्यों को यह ज्ञान नहीं जो कोई से पूछ सकें। कहाँ वह पानी की नदी, कहाँ यह देवतायें। इस समय तुम ज्ञान गंगाओं से ज्ञान स्नान करते हो तो देवता बन जाते हो। तुम्हारी सर्विस है मनुष्य को देवता बनाना। यहाँ आत्मा पवित्र बन जाती है। आत्माओं को इन्जेक्शन चाहिए।

बाप आकर ज्ञान-योग का इन्जेक्शन देते हैं। पाँच हज़ार वर्ष पहले भी बाप ने यह ज्ञान योग सिखाया था जिसको भक्ति मार्ग वाले प्राचीन गीता का ज्ञान और योग कहते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अन्दर कोई भी विकल्प आये तो भी कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नहीं करना है। राजाई पाने के लिए पवित्रता की प्रतिज्ञा जरूर करनी है।
2) जीते जी मरकर अपने को छोटा बच्चा समझना है। एक बाप से ही सुनना और सीखना है बाकी सब कुछ भूल जाना है।
वरदान:-
असोच बन, बाप की शक्ति मदद के रूप में अनुभव करने वाले चिंतामुक्त भव
कई बच्चे सोचते हैं - सेवा कैसे बढ़ेगी, अच्छे-अच्छे जिज्ञासु पता नहीं कब आयेंगे, कब तक सेवा की भाग-दौड़ करनी पड़ेगी। लेकिन सोचने से सेवा नहीं बढ़ती। असोच बन बुद्धि को फ्री रखो तो बाप की शक्ति मदद के रूप में अनुभव करेंगे और सेवा की वृद्धि स्वत: होगी। बाबा करावनहार है और करने के निमित्त मैं आत्मा हूँ - इसको कहते हैं असोच अर्थात् एक की याद। उन्हें कोई चिंता हो नहीं सकती। जहाँ शुभचिंतन है वहाँ कोई चिंता नहीं।
स्लोगन:-
अपनी उपराम स्थिति द्वारा सर्व बातों से किनारा कर लो तो एक बाप के सहारे का अनुभव होगा।

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