Monday, 28 May 2018

Brahma Kumaris Murli 29 May 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 29 May 2018


29/05/2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


"मीठे बच्चे - 20 नाखूनों का जोर दे पुरुषार्थ करो और बाप से पूरा वर्सा लो, धारणा कर दूसरों को कराओ"
प्रश्नः-
तुम बच्चों को किस बात का कदर हो तो बहुतों के कल्याण के निमित्त बन सकते हो?
उत्तर:-
बाप ने जो इतने सुन्दर-सुन्दर मैडल्स (बैज) बनवाये हैं... इनका तुम बच्चों को बहुत कदर होना चाहिए। यह बैज ही तुम्हारी सच्ची गीता है, इस पर तुम सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ किसी को भी समझा सकते हो। तुम्हारे पास यह निशानी सदैव होनी चाहिए। बाबा ने बहुत ख्यालात से यह चीजें बनवाई हैं, इनकी बहुत महिमा निकलेगी।
गीत:-
माता ओ माता...  
Brahma Kumaris Murli 29 May 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 29 May 2018 (HINDI) 

ओम् शान्ति।
अभी बच्चों ने गीत सुना, क्योंकि सम्मुख बैठे हैं। यह भी जानते हो हम सबकी माता है जगत अम्बा। परन्तु सारा जगत तो पहचान नहीं सकते हैं। भारत में ही जगत अम्बा का चित्र है और उसकी महिमा भी यहाँ है। विलायत आदि तरफ फिर शिव की जास्ती महिमा है क्योंकि वह सबका फादर है। यहाँ फिर जगत अम्बा है। अब जगत अम्बा को भी जन्म किसने दिया? जरूर कहेंगे जगत अम्बा को भी रचने वाला बेहद का बाप है। पीछे माता आई है। माता की कितनी महिमा है। हो तो तुम सब मातायें। वन्दे मातरम् कहते हैं। कन्यायें फिर माता बनती हैं। तो यह महिमा है जगत अम्बा की, तुम बच्चों को जगत अम्बा की बायोग्राफी का पूरा पता है। तुम जगत अम्बा के मन्दिर में जायेंगे तो कहेंगे यह सब चैतन्य में बैठी हैं। विशेष बुधवार के दिन मम्मा की महिमा की जाती है, शिवबाबा का दिन है सोमवार। उसे सोमनाथ भी कहते हैं। सोमवार के दिन शिव पर लोटी भी चढ़ाते हैं। लोटी तो शिव पर रोज़ चढ़नी चाहिए। खास सोमवार को क्यों? कोई-कोई दिन मुकरर हैं। तो उसका भी तुम अर्थ समझते हो। रूद्र नाम, सोमनाथ नाम, श्रीनाथ नाम क्यों रखा है? तुम बच्चे जानते हो - बबूल के काँटें होते हैं, काँटों को फूल बनाने वाला वह बाप ही है। अभी तुम अर्थ समझते हो। महिमा सारी भारत में ही है। यहाँ ही आते हैं। क्राइस्ट की कृष्ण के साथ भेंट करते हैं। क्राइस्ट का छोटा रूप बना कर निकालते हैं। ताज भी उनको देते हैं। परन्तु उनको ताज तो मिला नहीं है। हरेक अपने धर्म की बड़ाई करते हैं। हिन्दू धर्म वाले ही अपने धर्म की बड़ाई नहीं करते हैं क्योंकि अपने धर्म को ही नहीं जानते इसलिए बाप कहते हैं इरिलीजस हैं। धर्म में ताकत है। अभी हम हिन्दू धर्म के नहीं कहलाते हैं। बाबा से अब हम कितनी शक्ति लेते हैं। तो यह मम्मा की महिमा है। बाप न होता तो शिव शक्तियाँ कैसे होती। वन्दे मातरम् के लायक कहाँ बनती। भगवान कहते हैं वन्दे मातरम्।

सन्यासी माताओं की निन्दा करते हैं परन्तु उनका निवृति मार्ग भी ड्रामा में नूँधा हुआ है। बाप आकर समझाते हैं बरोबर यह भी अच्छा धर्म है। धर्म सब पहले अच्छे होते हैं। जो भी नई आत्मायें आती हैं वह अच्छी होती हैं। अपना प्रभाव निकालती हैं। जैसे अरविन्द घोस था, कितनी महिमा निकली! उन द्वारा छोटा मठ स्थापन हुआ। बाबा ने समझाया है कि नई आत्मायें आती हैं, आकर अपना मठ-पंथ स्थापन करती हैं। जैसे आर्य समाजी हैं। अब दयानन्द को कितना समय हुआ। पिछाड़ी की छोटी-छोटी टाल टालियाँ हैं। जैसे मच्छर जन्मते और मरते हैं। शो तो करते हैं ना। जैसे चिदाकाशी है, बहुत-बहुत करके 100 वर्ष हुआ होगा। कितना चल गया है! महिमा कितनी है क्योंकि हिन्दू धर्म वाले अपने धर्म को न जानने कारण और-और धर्मों में घुस जाते हैं। अब तुम जान गये हो, बना बनाया ड्रामा है जो फिर रिपीट होता है। कैसे-कैसे धर्म स्थापन होते हैं। आखरीन सृष्टि को पुराना जरूर बनना है। बाप कहते हैं नया बनाने वाला सिर्फ मैं हूँ। इस समय सब जड़ जड़ीभूत अवस्था में है। भक्ति मार्ग का अब अन्त होता है। ज्ञान का है आदि। सतयुग में यह ज्ञान नहीं चलता है। ज्ञान एक ही बार बाबा देते हैं। फिर 21 जन्म ज्ञान की दरकार नहीं रहती। बाप से वर्सा मिल जाता है। फिर सतयुग-त्रेता में पढ़ाई होती नहीं। अविनाशी बाप द्वारा अविनाशी पढ़ाई होती है, 21 जन्म फिर उनका फल मिलता है। मनुष्य जो पढ़ते हैं वह एक जन्म के अल्पकाल सुख के लिए। फिर पढ़ना नहीं होता है। हरेक अपने सुख की प्रालब्ध बनाते हैं। लौकिक सम्बन्ध में तो सिर्फ बाप और दादे से ही बच्चों को वर्सा मिलता है। यहाँ बाबा कहते हैं मेल-फीमेल दोनों ही मेरे से वर्सा ले सकते हैं - अपने पुरुषार्थ अनुसार। नम्बरवार तो हैं ना। (बापदादा आज सभा में अपने बगीचे से भिन्न-भिन्न फूलों की टोकरी भरकर ले आये हैं)

अब देखो यह फूल है मम्मा, सितार भी सरस्वती को ही देते हैं ना। बाबा के लिए फिर यह गुलाब का फूल ठीक है। तुम भी हरेक अपने को समझ सकते हो कि हम कितनी सुगन्ध वाले हैं। बागवान है शिवबाबा। हम उनके माली ठहरे। बागवान एक ही बाबा है। तुम जानते हो हमको बाबा फूल बना रहे हैं। बलिहारी जगत अम्बा की वा जगतपिता की नहीं। बलिहारी तो शिवबाबा की है। वह अगर नहीं होता तो इनकी महिमा कैसे होती। शिवबाबा की याद से ही इतना ऊंच मर्तबा मिलता है। वह है ऊंचे ते ऊंच भगवान। रहते भी हैं परमधाम में। अच्छा, कहते हैं लक्ष्मी भगवती, नारायण भगवान। वह भला कहाँ के रहने वाले हैं। यहाँ मनुष्य सृष्टि के रहने वाले हैं। उन्हों को ऐसा ऊंचा किसने बनाया? तुम अब बन रहे हो ना। सृष्टि का रचयिता तो बरोबर बाप ही है। भगवान भगवती सरनेम हो जाता है। जैसे बैरिस्टर से पैदा हुए तो वह बैरिस्टर का सरनेम चलेगा। लक्ष्मी-नारायण तो हैं महाराजा-महारानी। पहले प्रिन्स-प्रिन्सेज तो बनना ही है। तो मनुष्य सृष्टि में ऊंचे ते ऊंच लक्ष्मी-नारायण ठहरे। श्री श्री 108 जगतगुरू यह महिमा है शिवबाबा की। 108 की माला बनती है। वह माला ऊंच ते ऊंच है। वह फिर विष्णु की माला गाई जाती है। रूद्र माला भी है। फिर रूद्र माला ही विष्णु की माला बनती है। गाया भी जाता है रूद्र माला और भक्त माला। उनका भी अर्थ कोई नहीं जानते हैं। भक्त माला का भी पुस्तक है। रूद्र माला की तो गीता है। तो बाप हरेक बात अच्छी रीति बैठकर समझाते हैं। चित्र भी बाबा ने बनवाये हैं समझाने लिए। बाबा ने लॉकेट (बैज) भी बनवाये हैं। एक तरफ त्रिमूर्ति दूसरे तरफ कृष्ण। यह चित्र तो बहुत अच्छा है। इन पर तुम बहुत सर्विस कर सकते हो। गवर्मेन्ट से इनाम मिलता है। बाबा ने तुम्हारे लिए मेहनत कर लॉकेट (बैज) बनाया है। फर्स्टक्लास चीज है। लॉकेट दिखा कर बोलो - आओ, हम सारे सृष्टि का राज़ इससे आपको बतावें। हम तुमको त्रिकालदर्शी, त्रिलोकीनाथ विश्व का मालिक बना सकते हैं। बुद्धि में आता है ना। इसमें नॉलेज बहुत अच्छी है। इनसे हम तुमको विश्व के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान देते हैं। सतयुग में कौन राज्य करते हैं, त्रेता में कौन करते हैं? हम तुमको स्वदर्शन चक्रधारी बना देता हूँ। जिससे तुम फिर चक्रवर्ती राजा बनेंगे। अभी बाबा फिर आकर ज्ञान का तीसरा दिव्य नेत्र देते हैं। बरोबर हम मूलवतन में बाबा के पास थे। यह बातें और कोई की बुद्धि में नहीं रह सकती। तुमको जो सिखाया जाता है, सो नया। भल वह गीता है परन्तु हम उसको भी उठाते नहीं। नहीं तो कहते हैं गीता से तुम अपने मतलब की बातें उठाते हो।

बाबा जानते हैं कोई-कोई बच्चे अच्छे सर्विसएबुल हैं। सेना में तो बहुत हैं ना। पाण्डव सेना में भी यह हैं। बाप कहते हैं फलाना बच्चा बहुत अच्छा है। धारणा कर औरों को कराने वाला है। बीस नाखूनों का जोर देकर भी बाप से वर्सा लेना है। नहीं तो बहुत पछतायेंगे। तुम बच्चों के लिए तो खास ट्रिब्युनल बैठेगी। साक्षात्कार करायेंगे। देखो, तुमको कितना समझाते थे। भक्ति मार्ग में जन्म-जन्मान्तर गाते आये हो - तुम पर बलिहार जाऊं, तुमको ही याद करेंगे। उनका भी अर्थ तुम अब समझते हो। ऐसे भी कहते थे कि सब कुछ ईश्वर ही देता है। फिर ईश्वर बच्चा देकर लेता है तो ईश्वर को गाली देने लग जाते हैं - तुम ऐसे हो, यह हो, कह देते हैं। दु:ख भी तुम देने वाले हो। सुख देने वाले को दु:ख देने वाला कह देते हैं। तो बेहद का बाप समझाते हैं तुम कितने बेसमझ बन गये हो। बाबा कितना अच्छी रीति समझाते हैं। लॉकेट में बड़ी अच्छी नॉलेज है। सभी वेदों-शास्त्रों का इसमें सार है। परन्तु बच्चों को इतना महत्व लॉकेट का नहीं है। इतनी दूरादेश, विशालबुद्धि नहीं हैं। लॉकेट में त्रिमूर्ति है और नीचे में लिखा है - गॉड फादरली बर्थराइट। कहते भी हैं गॉड फादर परमपिता, फादर जरूर कहेंगे। फादर का अर्थ है ही हम उनके बच्चे हैं। भक्त भगवान के बच्चे हैं। ऐसे नहीं कि भक्त भगवान हैं। भगवान को ही भक्ति मार्ग में ले आते हैं। फिर भक्ति मार्ग वालों को भक्ति का फल कौन देगा? परन्तु सिवाए समझाने कोई समझ न सके। लिटरेचर से भी कोई मुश्किल समझ सकते हैं। तुम लॉकेट से भी समझा सकते हो। यह है ऊंच ते ऊंच गॉड फादर। हम तुमको गॉड फादर के जीवन का रहस्य बता सकते हैं। जो सभी का गॉड फादर है वह क्या कर्त्तव्य करते हैं जिस कारण उनको फादर कहा जाता है। गॉड फादर कहा जाता है और फिर एडम-ईव, आदम-बीबी, ब्रह्मा-सरस्वती को कहेंगे। गॉड फादर उन्हों द्वारा रचना रचते हैं। वह गॉड फादर है सभी आत्माओं का बाप। यह है प्रजापिता। हम आत्मायें हैं उनके अविनाशी बच्चे। फिर चक्र में आते हैं तो यह है प्रजापिता ब्रह्मा। उनको ग्रेट ग्रेट ग्रैण्ड फादर कहा जाता है। शिव को ग्रेट ग्रेट ग्रैण्ड फादर नहीं कहेंगे। शिव को सिर्फ फादर कहेंगे। वह है सब आत्माओं का बाप। मनुष्य सृष्टि का सिजरा बनेगा तो पहले-पहले ब्रह्मा सरस्वती, फिर उनसे और वृद्धि होती जाती है। ऊंच ते ऊंच परमपिता परमात्मा। उनसे देवी-देवता धर्म की स्थापना होती है। फिर नम्बरवार और धर्मों की स्थापना होती है। ब्रह्मा को हमेशा बूढ़ा दिखायेंगे। ग्रेट ग्रेट ग्रैण्ड फादर है ना। तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा ने ब्रह्मा द्वारा हमें अपना बनाया है। अभी हम उनसे बेहद का वर्सा लेते हैं। दलाल को अपनी दलाली भी मेहनत से मिलती है। गाते भी हैं सतगुरू मिला दलाल के रूप में। सन्यासी के लिए तुम ऐसे कह न सको। वह तो इन बातों को जानते ही नहीं। यह बाप बैठ समझाते हैं। बच्चों की बुद्धि में बैठ जाना चाहिए। तुम समझा सकते हो हम इतने ब्रह्माकुमार कुमारियाँ हैं। प्रजापिता ब्रह्मा का नाम मशहूर है। बाबा ने कार्ड भी बहुत अच्छे छपाये थे। उसमें सारी नॉलेज आ जाती है। बड़े ख्यालात से यह चीजें बनाई जाती हैं, परन्तु इतना कदर नहीं है। मिलेट्री वालों को मैडल्स मिलते हैं फिर यहाँ पहनते हैं ना। तुम्हारे पास तो एक ही मैडल है। उन्हों के पास तो भिन्न-भिन्न मैडल्स में निशानियाँ होती हैं। यहाँ तुम्हारी एक ही निशानी है। कार्ड दिखाकर फिर वहाँ ही बैठ समझाना चाहिए। वह भी समय आयेगा तुम्हारे इन मैडल्स की, कार्ड की बहुत महिमा निकलेगी। बाबा तो बहुत अच्छी रीति समझाते रहते हैं। कोई-कोई बच्चे पूछते हैं - बाबा, योग कैसे लगायें? लक्ष्य तो दिया हुआ है। वर्सा दादे से तुमको लेना है। लौकिक घर में तो सब वर्सा नहीं लेंगे। यहाँ तो सब हकदार हो। पहले देखो झाड़ के झाड़ आये, फिर उनसे कोई की टाँग कट गई, कोई की बाँह कट गई। बाकी ब्राह्मण बनने वाले अपना वर्सा ले रहे हैं। ऐसे नहीं कि झाड़ स्वर्ग में नहीं आयेगा। आयेंगे सब परन्तु जो अच्छी रीति पढ़ते हैं वह विजय माला में आयेंगे, बाकी प्रजा में। हाँ, प्रजा में भी जो साहूकार बनना चाहें तो उसके लिए युक्ति मिल सकती है। प्रजा में भी बहुत साहूकार बन सकते हैं। राजाओं से भी साहूकारों के पास मिलकियत बहुत रहती है। द्वापर से जब राजाओं को भी तंगी होती है तो फिर साहूकारों से कर्जा लेते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाबा हमको वर्सा देने आये हैं तो 20 नाखूनों का जोर देकर भी बाप से पूरा वर्सा जरूर लेना है।
2) शिवबाबा की याद से खुशबूदार फूल बनना और बनाना है। विशालबुद्धि और दूरादेशी बन लॉकेट पर अच्छी रीति सर्विस करनी है।
वरदान:-
करावनहार की स्मृति द्वारा सदा बेफिक्र बादशाह बनने वाले निश्चयबुद्धि निश्चिंत भव
ब्राह्मण जीवन अर्थात् बेफिक्र बादशाह। जैसे ब्रह्मा बाप बेफिक्र बादशाह बने तो यही गीत गाते रहे - पाना था सो पा लिया, काम क्या बाकी रहा...सेवा का काम भी जो बाकी रहा हुआ है वह भी करावनहार करा रहे हैं और कराते रहेंगे। सदा स्मृति रहे बाप करावनहार बन हमारे द्वारा करा रहे हैं तो बेफिक्र हो जायेंगे। निश्चय है यह कार्य होना ही है, हुआ ही पड़ा है इसलिए निश्चयबुद्धि, निश्चिंत, बेफिकर रहो।
स्लोगन:-
अपनी सर्व कमजोरियों से किनारा करना है तो बेहद की वैराग्य वृत्ति को धारण करो।

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