Saturday, 19 May 2018

Brahma Kumaris Murli 20 May 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 20 May 2018


20/05/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति अव्यक्त-बापदादारिवाइज: 01-12-83 मधुबन

BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


सुख, शान्ति और पवित्रता के तीन अधिकार
आज बापदादा अति स्नेही और सिकीलधे बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चा अति स्नेह से मिलन मनाने अपने घर में पहुँच गये हैं। इसी भूमि को कहा जाता है अपना घर, दाता का दर। यह महिमा इसी स्वीट होम की है। स्वीट होम में स्वीट बच्चों से स्वीटेस्ट बाप मिलन मना रहे हैं। 
Brahma Kumaris Murli 20 May 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 20 May 2018 (HINDI)

बापदादा हर बच्चे के मस्तक पर आज विशेष अधिकार की तीन लकीरें देख रहे हैं। हर एक के मस्तक पर तीन लकीरें तो लगी हुई हैं, क्योंकि बच्चे तो सभी हैं। बच्चे होने के नाते अधिकारी तो सभी हैं, लेकिन नम्बरवार हैं। किसी बच्चे की तकदीर, सुख के अधिकार की लकीर बहुत स्पष्ट और गहरी है। कितनी भी परिस्थितियां आवें, दु:ख के लहर की उत्पत्ति दिलाने वाली लहर हो लेकिन दु:ख शब्द की अविद्या वाले हों। दु:ख की परिस्थिति को अपने सुख के सागर से प्राप्त हुए अधिकार द्वारा दु:ख की परिस्थितियों में भी वाह मीठा ड्रामा, वाह हरेक पार्टधारी का पार्ट” – इस नॉलेज की रोशनी द्वारा, अधिकार की खुशी द्वारा दु:ख को सुख में परिवर्तन कर देता। अधिकार से दु:ख के अंधकार को परिवर्तन कर, मास्टर सुखदाता बन स्वयं तो सुख के झूले में झूलते ही हैं लेकिन औरों को भी सुख के वायब्रेशन देने के निमित्त बनते हैं। ऐसे सुख के अधिकार की लकीर स्पष्ट और गहरी है, जिसको कोई मिटा न सके। मिटाने वाले बदल जाएं लेकिन वह नहीं। मास्टर सुख दाता से सुख की अंचली ले लें। ऐसे लकीर वाले भी देखे। इसको कहा जाता है नम्बरवन तकदीरवान। सुनाया था वन की निशानी है विन

दूसरी लकीर शान्ति। आप सब शान्ति को स्वधर्म मानते हो ना! यह सभी को बताते हो ना। धर्म के लिए क्या गाया हुआ है? “धरत परिये धर्म न छोड़िये।सिर जावे लेकिन धर्म न जाये। तो सुख-शान्ति के वर्से के अधिकारी कभी शान्ति को छोड़ नहीं सकते। ऐसे अशान्त को शान्त बनाने वाले सदा शान्ति की किरणें स्वयं द्वारा औरों को देने वाले, कुछ भी हो जाए लेकिन शान्ति का धर्म, शान्ति का अधिकार छोड़ नहीं सकते। इसको कहते दूसरे अधिकार की लकीर में नम्बरवन। तीसरी है प्युरिटी के अधिकार की लकीर। पवित्र आत्मायें तो सभी बच्चे हैं। फिर भी नम्बरवन अधिकार के तकदीरवान बच्चा कौन है! जिसकी चलन से, चेहरे से प्युरिटी की पर्सनैलिटी और रॉयल्टी अनुभव हो। लौकिक जीवन में लौकिकता वाली पर्सनैलिटी रॉयल्टी दिखाई देती है, लेकिन अधिकार के तकदीरवान बच्चों में प्युरिटी की अलौकिक पर्सनैलिटी और रॉयल्टी दिखाई देगी। इसको कहा जाता है नम्बरवन पवित्रता के तकदीर की लकीर।

आज सर्व बच्चों के इस अधिकार की लकीरों को देख रहे थे। आप सब भी अपनी तीनों लकीरों को देख रहे हो ना। चेक करो तीनों अधिकार प्राप्त कर लिया है। पूरा अधिकार लिया है वा परसेन्टेज में लिया है? अगर संगम पर भी परसेन्टेज में रहे तो सारा कल्प परसेन्टेज में ही रह जायेंगे। पूज्य पद में भी परसेन्टेज होगी, फुल पूजा नहीं होगी और प्रालब्ध में भी परसेन्टेज रह जायेगी। अच्छा!

आज मैजारिटी नये सो पुराने बच्चे आये हैं। नये बच्चे कहो वा कल्प-कल्प के अधिकारी बच्चे कहो, अपना अधिकार लेने के लिए फिर से अपने स्थान पर पहुँच गये। सबसे ज्यादा खुशी किसको है! हर एक समझेंगे मेरे को है। ऐसे समझते हो वा किसको कम किसको ज्यादा है! अधिकारी बच्चों को विशेष मिलन का अधिकार देने के लिए बापदादा को भी आना ही पड़ता है।

बाप को बच्चों से स्नेह ज्यादा है वा बच्चों को बाप से स्नेह ज्यादा है? अटूट स्नेह किसका है? बापदादा तो बच्चों को अपने से आगे रखते। पहले बच्चे। अगर बच्चे याद वा प्यार नहीं करते तो बाप रेसपान्ड किनको देते इसलिए आगे बच्चे पीछे बाप। सदैव बच्चों को आगे चलाना होता, बाप पीछे चलता है इसलिए बाप-दादा भी ऐसे बच्चों को देख-देख हर्षित होते हैं। ऐसे बच्चे भी हैं जो अटूट स्नेह प्यार में समाए हुए हैं। ऐसे बच्चों की भी माला है। चाहे देश में, चाहे विदेश में दोनों तरफ ऐसे बच्चे हैं जिन्हों को सिवाए बाप और सेवा के और कोई बात याद नहीं।

जगदीश भाई से:- आपने ऐसे बच्चे देखे ना! अच्छा चक्कर लगाया ना। साकार बाप का दिया हुआ विशेष वरदान साकार में लाया। सफलता का जन्म-सिद्ध अधिकार अनुभव किया न। सर्व सफलता में विशेष सफलता की निशानी कौन सी है? श्रेष्ठ सफलता है कि बापदादा दिखाई दे। आप में बाप दिखाई दे, यह है श्रेष्ठ सफलता। यही प्रत्यक्षता का साधन है। जो भी चक्कर पर निकले विशेष बाप समान अनुभूति कराना, यही सफलता की निशानी है। और आगे चलकर भी ज्यादा से ज्यादा यही आवाज चारों ओर फैलता जायेगा। हिम्मते बच्चे मददे बाप ही है। करावनहार करा लेता है। अच्छा

ऐसे सदा सम्पूर्ण तकदीरवान, सम्पन्न अधिकार को पाने वाले अधिकारी, सदा बाप और आप के कम्बाइन्ड रूप में रहने वाले, स्नेह के सागर में सदा समाये हुए लकी और लवली बच्चों को, भाग्य विधाता, वरदाता का यादप्यार और नमस्ते।

(जगदीश भाई ने विदेश यात्रा का समाचार बापदादा को बताया और नाम सहित सभी भाई-बहनों की याद दी)

सभी के स्नेह का समाचार बापदादा के पास पहुँचता ही रहता है और अभी भी पहुँचा। बापदादा सर्व विदेश के चारों ओर रहने वाले बच्चों को विशेष एक बात की मुबारक भी देते हैं। किस बात की? संस्कार, भाषा, रहन-सहन सबका परिवर्तन करने में मैजारिटी बहुत तीव्र पुरुषार्थी निकले हैं। जैसे कोई नई दुनिया में आ जाए। ऐसे नई रीति रसम, नया सम्बन्ध फिर भी अपने को सदा कल्प पहले वाले पुराने अधिकारी आत्माएं समझते चल रहे हैं इसलिए स्वयं को परिवर्तन करने की विशेषता पर विशेष मुबारक। बापदादा को कितना प्यार से याद करते, वह बापदादा के पास सदा ही पहुँचता है। स्वयं को भूल बाप को ही सदा हर बात में याद करते, यह परिवर्तन विशेष है। और इसी प्यार के आधार पर चल रहे हैं। यही प्यार ही पालना कर रहा है। सूक्ष्म प्यार की पालना ही आगे बढ़ा रही है। अच्छा!

सभी को जिन्होंने भी यादप्यार दिया है, उन्हों को प्यार के सागर बाप का सदा प्यार की झोली भर-भरकर यादप्यार। भारतवासी बच्चे भी कम नहीं है, भारत का भाग्य तो विदेश वाले गा-गाकर खुश होते हैं। भारत वाले जगे तब विदेश को जगाया। जागने वाले तो भारत के हैं। अगर विदेश में भी यह सब नहीं होते तो इतने विदेश के सेन्टर भी कैसे होते। इसी के निमित्त चारों ओर, सब तरफ फैले हुए हैं। सेन्टर खोलते भी कितने में हैं। पैदा हुए थोड़ा सा बड़े हुए, सेन्टर खोला। वह भी अपने पांव पर खड़े होकर, किसी पर आधार नहीं। निमंत्रण मिले, यह आधार नहीं। स्थूल, सूक्ष्म दोनों लगाकर हिम्मत रख सेन्टर खोल देते हैं। बाकी उन्हों की पालना करना, यह तो आप लोगों की जिम्मेवारी है। हिम्मत में पीछे नहीं हैं। मदद देना, यह बाप के साथ-साथ आपका भी कार्य है।

ज्ञान की गहराई को सुनकर खुश हो गये। योग और प्यार के आधार पर चले रहे हैं, लेकिन अभी ज्ञान की गहराई को जाना, यह और भी इन्हों को सेवा के निमित्त बनायेगी। माइन्ड तैयार हो जाए उसके लिए ज्ञान की गहराई चाहिए। ज्ञान और बाप यह दोनों की महसूसता दिलाना, यह रिजल्ट अच्छी है। कोई भी जाता है तो कितने खुश होते हैं, जैसे कोई आकाश से सितारा नीचे आ जाए, ऐसी अनुभूति करते हैं। अच्छा।

दादी जी और जानकी दादी से:- दोनों में तीसरी मूर्त (दीदी) समाई हुई है। बाप समान हैं ही। बनना है, नहीं। हैं ही। ऐसे अनुभव होता है! जैसे बाप ब्रह्मा का आधार ले सेवा करते हैं वैसे आप भी बाप के माध्यम हो। वर्तमान समय बाप माध्यम द्वारा करावनहार अपना कार्य करा रहे हैं। विशेष माध्यम हो। ब्रह्मा के आकार द्वारा और आपके साकार द्वारा कार्य करा रहे हैं। बहुत-बहुत पदम से भी ज्यादा बापदादा हर सेकण्ड याद और प्यार करते हैं। श्रृंगार हो। विशेष बाप का और मधुबन का श्रृंगार हो। बापदादा हर समय देख-देख हर्षित होते हैं। अच्छा।

धर्म नेताओं की सेवा का प्लैन

धर्म नेताओं के लिए विशेष वह रूप चाहिए क्योंकि धर्म की बातों में तो वे भी होशियार हैं। प्यार से सुनते भी हैं लेकिन अपने में प्रैक्टिकल की कमी महसूस करते हैं। यह साक्षात्कार करें जो आज सुनाया, वह प्रैक्टिकल अनुभव करें कि हमारे सामने यह कोई साधारण रूप नहीं है तब वह झुकेंगे। अनुभव के पीछे झुक जाते हैं। वाणी से नहीं। वह तो कहेंगे आप भी बहुत अच्छा कार्य करते हो, आपको भी आशीर्वाद मिलती रहे। यह कहकर खुश कर देंगे, लेकिन समझें यह कोई विशेष हैं। जिसमें जो कमजोरी होती है उनके आधार पर उसको तीर लगाना यह है विजय पाना। शास्त्रों में भी गायन है देवताओं ने विजय प्राप्त की तब, जब उन्हें कमज़ोरी का पता पड़ा यह भी आध्यात्मिक की बात है। तो धर्म नेतायें भी आयेंगे जरूर लेकिन ऐसी कोई नवीनता देखेंगे तब। अभी सिर्फ कहते हैं कि ज्ञान अच्छा है। आप भी ठीक हैं, हम भी ठीक हैं लेकिन उन्हीं के मुख से जब यह निकले कि यह एक ही रास्ता है। अनेक रास्ते हैं उसमें आपका भी एक रास्ता है, यह बदल जाये। जब यह टच हो कि यहाँ से ही मुक्ति और जीवन मुक्ति मिल सकती है तब झुकें। तो अभी कोई नवीनता होनी चाहिए।

प्रवृत्ति में बहुत लग गये हो, लेकिन जैसे औरों को सुनाते हो प्रवृत्ति में भी रहना है और प्रवृत्ति में रहते निवृत्त भी रहना है। तो यही पाठ अपने को रोज पढ़ाओ। प्रवृत्ति तो बढ़नी ही है लेकिन उसमें रहते निवृत्त रहना यह आवश्यकता है। इसमें थोड़ा अटेन्शन और अन्डर लाइन करना पड़े। हरेक अपनी-अपनी सेवा में बिजी हो गये हो लेकिन बेहद विश्व का नशा चाहिए। यह सब सम्भालते हुए बुद्धि बिजी बेहद सेवा के लिए फ्री होनी चाहिए। तन-मन-धन, बुद्धि सब रचना में ज्यादा लगी रहती है। जैसे साकार बाप को देखा, कारोबार चलाते भी सदा अपने को फ्री रखा। कभी भी बिजी होने की रूपरेखा चेहरे पर नहीं आई। चाहे ज़िम्मेवारी ब्राह्मण परिवार की रही लेकिन बुद्धि में क्या था? बेहद! शक्ति देनी है, पालना करनी है। आत्माओं को जगाना है, यही धुन रही। तो अभी वह होना चाहिए। उसकी कमी है। अनन्य बच्चों को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना है। हरेक बाप समान लाइट हाउस हो। जहाँ जावे उनको लाइट मिले, शक्ति मिले, उमंग-उत्साह मिले, जो काम साधारण आत्मायें करती वह नहीं करना है। साकार बाप का बोल, संकल्प, दृष्टि, वृत्ति न्यारी रहीं ना। साधारण नहीं। तो ऐसी स्टेज बनाओ। इसके लिए सेवा रूकी हुई है। खर्चा ज्यादा, मेहनत ज्यादा निकलते कितने हैं!

अभी समय के प्रमाण एडवान्स पार्टी भी जोर कर रही है तो साकार वालों को तो और ज्यादा तेज होना चाहिए। होना सब अचानक है, डेट नहीं बताई जायेगी। पेपर जरूर आने हैं। आप लोगों को थॉट्स को चेक करने वाले भी आयेंगे। पेपर लेने आयेंगे। जितनी प्रत्यक्षता होगी उतना यह सब पेपर्स आयेंगे। इस योग और उस योग, इस ज्ञान और उस ज्ञान में क्या अन्तर है वह लाइफ की प्रैक्टिकल की चेकिंग करेंगे। वाणी की नहीं। उसके लिए पहले से ही इतनी तैयारी चाहिए। 84 में कुछ न कुछ तो होगा ही। पेपर आयेंगे। आवाज फैलाने की तैयारी का यही साधन है। जैसे शुरू-शुरू में अभ्यास करते थे, चल रहे हैं लेकिन स्थिति ऐसी हो जो दूसरे समझें कि यह कोई लाइट जा रही है। उनको शरीर दिखाई न देवे। जब पहले-पहले मित्र-सम्बन्धियों के पास गये तो क्या पेपर था, वह शरीर को देखें, लाइट देखें। बेटी न देखें लेकिन देवी देखें। यह पेपर दिया ना। अगर सम्बन्ध के रूप से देखा, बेटी-बेटी कहा तो फेल। तो ऐसा अभ्यास चाहिए। समय तो बहुत खराब आ रहा है लेकिन आपकी ऐसी स्थिति हो जो दूसरों को सदैव लाइट का रूप दिखाई दे, इसमें ही सेफ्टी है। अन्दर आवें और लाइट का किला देखें। अपने ईश्वरीय सेवा में लगने वाली सम्पत्ति भी ऐसी ही क्यों जावें, उन्हें अलमारी नहीं दिखाई दे लेकिन लाइट का किला देखें। इतना अभ्यास चाहिए। शक्ति रूप की झलक बढ़ानी चाहिए। साधारण नहीं दिखाई दे, यह लक्ष्य रहे। वार तो कई प्रकार के होंगे भटकती हुई आत्माओं के वार होंगे, बुरी दृष्टि वालों के वार होंगे, कैलेमिटीज के वार होंगे, बीमारियों का वार होगा लेकिन इस सबसे बचने का साधन है अनन्य बनना अर्थात् जो अन्य न कर सकें वह करना। सिर्फ यह याद रखो कि मैं अनन्य हूँ तो भी प्यारे और न्यारे रहेंगे। अच्छा!

84 के कान्फ्रेन्स की सफलता के लिए:-

जितना हो सके साइलेन्स का वातावरण रहे, ईश्वरीय ज्ञान है, ईश्वर का स्थान है, यह अनुभव करके जायें। टोटल ऐसा वातावरण हो, अनुभूति कराने का लक्ष्य रहे। प्वाइंट्स की चटाबेटी में न जाकर, बोलते-बोलते अनुभव कराते जाओ। लक्ष्य रखो सभी के मुख से कहलाना है कि यह ईश्वरीय रास्ता है। ईश्वर आ गया है। बहुत अच्छा है, यह तो कहते हैं लेकिन ईश्वर पढ़ा रहा है, यह कहें। ज्ञान अच्छा है लेकिन ज्ञानदाता कौन है, उसको अनुभव करें। अभी यह फाउन्डेशन डालो। जब बीज ऊपर आ जाए तब समाप्ति हो। बीज ऊपर नहीं आया तो वृक्ष परिवर्तन कैसे हो। जब इस स्थान पर अपनी रुचि से आ रहे हैं तो स्थान की जो विशेषता है वह देखें, उसका अनुभव करें। आप उनकी व्यु (न्गै) को देखकर अपनी (न्गै) व्यु चेन्ज नहीं करो लेकिन आपकी व्यु को देखकर वह अपनी व्यु चेन्ज करें ऐसा प्लेन बनाओ। जब लक्ष्य रहता कि भाषण करना है तो प्वाइंटस तरफ अटेन्शन जाता लेकिन बाप को प्रत्यक्ष करने का लक्ष्य हो तो बाप ही दिखाई देगा। जैसा लक्ष्य होगा वैसी रिजल्ट निकलेगी। अच्छा।

वरदान:-  
पास्ट, प्रेजन्ट और फ्युचर को जान मायाजीत बनने वाले मास्टर त्रिकालदर्शी भव
जो बच्चे तीनों कालों को जानते हैं वे कभी भी माया से हार नहीं खा सकते क्योंकि वर्तमान क्या है और भविष्य में क्या होने वाला है, दोनों ही त्रिकालदर्शी आत्मा की बुद्धि में स्पष्ट रहता है। क्या हूँ और क्या बनने वाला हूँ, वर्तमान और भविष्य दोनों का उन्हें नशा रहता है। उसी नशे की खुशी में उड़ते रहते हैं इसलिए उनके पांव धरनी से ऊंचे होते हैं। वह देह, देह के संबंध, देह के पुराने पदार्थो की आकर्षण में नहीं आते।
स्लोगन:- 
जिनके पास सरलता का गुण है उनके लिए संगठन में चलना बहुत सहज है।

                                         All Murli Hindi & English