Friday, 18 May 2018

Brahma Kumaris Murli 19 May 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 19 May 2018


19/05/2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website


"मीठे बच्चे - प्योरिटी बिगर मनुष्य कोई काम का नहीं इसलिए तुम्हें पवित्र बन दूसरों को पवित्र बनाने में मदद करना है"
प्रश्नः-
किस निश्चय के बिगर खाना आबाद होने के बजाए बरबाद हो जाता है?
उत्तर:-
अगर निश्चय नहीं है कि मोस्ट बिलवेड बाप हमें पढ़ा रहे हैं, हम आये हैं ज्ञान और योग सीखकर वर्सा लेने तो खाना बरबाद हो जाता है। संशय उठा माना तकदीर को लकीर लगी, इसलिए निश्चय में ही विजय है। बाप माताओं को आगे रखते हैं इसमें ईर्ष्या करने की बात नहीं, इसमें भी बच्चों को संशय वा देह-अभिमान नहीं आना चाहिए।
गीत:-
कौन आया मेरे मन के द्वारे....  
Brahma Kumaris Murli 19 May 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 19 May 2018 (HINDI)

ओम् शान्ति।
यह बच्चे कहते हैं। बाबा समझाते हैं मैं साकार नहीं हूँ, आकार में देवता भी नहीं हूँ। मैं परम आत्मा हूँ। यह भी आत्मा कहती है। सिर्फ अक्षर एड हो जाता है परम-आत्मा यानी परमात्मा। उसकी ही महिमा है, जिस परमात्मा को सभी भक्त याद करते हैं, इसको मनुष्य सृष्टि कहा जाता है। अभी है रावण राज्य, आसुरी सम्प्रदाय, एक दो को दु:ख देने वाली सम्प्रदाय। यह कौन समझाते हैं? जिसको यह ऑख नहीं जान सकती। आत्मा अपनी बुद्धि से पहचानती है, जब बाप पहचान देते हैं। तुम हमारे बच्चे हो, जैसे तुम आत्मा हो, मैं भी आत्मा हूँ। परन्तु मैं बाप होने कारण मुझे परमपिता परमात्मा कहा जाता है, इसलिए भगवानुवाच कहा जाता है। ऐसे नहीं ब्रह्मा भगवानुवाच कहेंगे। ब्रह्मा देवता नम:, विष्णु देवता नम: कहा जाता है। एक ही बाप खुद कहते हैं - हे बच्चे, शिव भगवानुवाच, मैं तुम सबका भगवान हूँ। सब मुझे याद करते हैं। मैं ही सब बच्चों को सदा सुखी, सदा शान्त बनाता हूँ। सिर्फ कहने मात्र तो नहीं। जैसे मनुष्य-मनुष्य को प्राइज़ देते हैं - फलाना पीस स्थापन करने वाला लीडर। यहाँ मनुष्य की बात नहीं। सब मनुष्यों को प्राइज़ देने वाला वह बाप है। तुम श्रीमत पर प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी स्थापन कर रहे हो। तुम जो मददगार बनते हो उनको प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी का वर्सा मिलता है - कल्प पहले मुआफिक। अब तो परमपिता परमात्मा का एक्यूरेट चित्र नहीं निकाल सकते। ब्रह्मा का फिर भी सूक्ष्म रूप है। यह परमात्मा जो स्टार है उनका फोटो कैसे निकले। परमपिता परमात्मा एक ही है और है स्टार मुआफिक। फोटो निकाल न सकें। फिर आत्मा, जिसमें मन बुद्धि है, वह उनको जानती है। यह हैं ही नई बातें इसलिए समझाते हैं तुम अपने को आत्मा समझो। यह शरीर तो बाद में मिलता है। तुम आत्मा अविनाशी, इमार्टल हो। शरीर मार्टल है। शरीर युवा, वृद्ध होता है। आत्मा का चित्र तो निकल न सके, साक्षात्कार हो सकता है। साक्षात्कार का भी फोटो नहीं निकल सकता। बाकी समझाया जा सकता है। मनुष्य का, देवताओं का फोटो निकल सकता है, परमात्मा का नहीं इसलिए मूँझते हैं। समझ नहीं सकते। अब बाप समझाते हैं - सारा कल्प जिस्मानी अभिमान में रहते हो। अब देही-अभिमानी बनो। सतयुग में तुम्हारा दैवी शरीर था फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र शरीर में आये। अब हे आत्मा, तुमको चेन्ज करना है। तुम आत्माओं से बात कर रहा हूँ। तुम इन कानों से सुनते हो। और कोई मनुष्य ऐसे नहीं कहेंगे। तुम यहाँ आये हो परमपिता परमात्मा शिव के पास। परन्तु वह है निराकार। जरूर वह निराकार ही साकार में आये हैं तब तो तुम आये हो ना। तुम से पूछा जाता है - किसके पास आये हो? तुम कहेंगे शिवबाबा के पास। यह (दादा) बीच में दलाल है क्योंकि प्रापर्टी ग्रैन्ड फादर (दादे) की है। बीच में बाप न हो तो दादा कह कैसे सकते। दादे का वर्सा कैसे मिले। बाप हो तब तो दादे का वर्सा ले सकें। यहाँ सिवाए निश्चय के कोई आ नहीं सकता। सिवाए निश्चय के आने का मतलब सिद्ध हो न सके। आते हैं शिवबाबा से मिलने। ब्रह्मा द्वारा बाबा के पास जन्म लेने बिगर हम उनके कैसे बन सकते हैं। यह तो समझने की बात है ना। परन्तु माया बेसमझ बना देती है, फिर बाप आकर समझदार बनाते हैं। तुम बाप को भूले हो इसलिए निधन के आरफन बने हो। आदि-मध्य-अन्त दु:ख पाते आते हो। आधाकल्प से लेकर जब से तुम विकारी बने हो तब से तुम दु:खी होते-होते अब महा-दु:खी हो पड़े हो। जो देवतायें सदा सुखी थे, इस समय महा-दु:खी हैं। कहाँ स्वर्ग का राज्य भाग्य, कहाँ यह! यही तो तुम समझते हो शिवबाबा हमारा सच्चा-सच्चा बाप है, जिससे सचखण्ड का वर्सा मिलता है। यह समझकर यहाँ आते हो। नहीं तो आने की दरकार नहीं। बाहर में जाकर तुम भाषण करते हो कि बाप से आकर पढ़ो तो स्वर्ग के मालिक देवी-देवता बनेंगे। कोई देवी-देवता धर्म का होगा तो सैपलिंग लग जायेगी। बाकी कॉलेज वा युनिवर्सिटी यह एक ही है, जहाँ रोज़ पढ़ना है। बाप को घड़ी-घड़ी याद करना है और पवित्र बनना है। रक्षाबंधन भी गाया हुआ है। बहन, भाईयों को राखी बाँधती है। माता शक्ति है ना। अब उन्हों का मर्तबा जरूर ऊंच करना है। भाइयों को भी कहते हैं तुम इन माताओं का रिगॉर्ड रखो, इनके मददगार बनो। सितम से भी बचाना है। पूरी रीति न समझने के कारण, उल्टी-सुल्टी बात सुनाने से फिर बिचारी अबलायें बाँध हो जाती हैं। तो जो उल्टे कर्म करते हैं, बाप से वर्सा लेने में विघ्न डालते हैं उन पर बड़ा पाप का बोझा चढ़ जाता है। यहाँ तुम आये हो जीवन बनाने लिए। इस ज्ञान मार्ग में विघ्न भी पड़ते हैं क्योंकि इसमें पवित्रता की बात है। क्राइस्ट को भी क्रास पर चढ़ाया। वह भी पवित्रता की बात थी। आत्मा पवित्र आती है, पवित्र बनाने की कोशिश करती है। फिर पोप पादरी लोग गुरू बन जाते हैं। वास्तव में गुरू पवित्र होने चाहिए। परन्तु आजकल शादियाँ आदि भी करा लेते हैं। प्योरिटी बिगर मनुष्य कोई काम का नहीं है। यहाँ प्योरिटी है मुख्य। इस पर ही विघ्न पड़ते हैं। जैसे अमली (शराबी) को अमल बिगर आराम नहीं आता वैसे विष बिगर रह नहीं सकते। बाप समझाते हैं मैं तुमको पतित से पावन राजाओं का राजा बनाता हूँ।

तो तुम बच्चे जब यहाँ आते हो तो ख्याल रहता है, कोई को संशय तो नहीं उठता? नहीं तो बहुत अबलाओं पर बंधन आ जायेगा फिर बड़ी सज़ा खायेंगे क्योंकि बाप धर्मराज भी है। हम बाप निराकार को कहते हैं। भल आजकल तो मेयर को भी बापू जी कहते हैं, गांधी जी को भी बापू कहते थे। परन्तु यह तो सब आत्माओं का रीयल बाप है। यह कोई फालतू बड़ाई नहीं है। बाप माना बाप। हम आत्माओं को राजयोग सिखाते हैं। बाप आते हैं - इसमें संशय नहीं आना चाहिए। संशय लाती है माया रावण। संशय को भूत कहा जाता है। निश्चय को भूत नहीं कहा जाता है। निश्चय से विजय पाते हो। संशय भूत से विनाश को पाते हो। "बाबा ऐसे क्यों करते हैं, बाबा माताओं की महिमा क्यों करते हैं" - यह संकल्प आना भी संशय हुआ ना। बाप कहते हैं यह तो प्रवृत्ति मार्ग है, परन्तु उसमें भी माता गुरू कहा जाता है। वन्दे मातरम्। माता गुरू बिगर किसका कल्याण हो नहीं सकता। गोपों का भी कल्याण होता है। वह फिर औरों की सर्विस करते हैं। मित्र-सम्बन्धियों आदि को ले आते हैं। चलो, ब्रह्माकुमारियों के पास आपको ले चलें। ब्रह्माकुमार तुम भी हो। प्रजापिता ब्रह्मा मशहूर है, जब सृष्टि रची होगी तो जरूर भगवान आया होगा। प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे बने होंगे। ब्रह्मा को किसने पैदा किया? परमपिता परमात्मा शिव ने। नहीं तो मनुष्य सृष्टि कैसे रचें? मनुष्य कहते भी हैं हमको खुदा ने पैदा किया तो जरूर खुदा को फिर जिस्म में आना पड़े। जिस्म का नाम क्या? सन्यास लेने कारण, उनका बनने कारण नाम पड़ता है ब्रह्मा। देखो, सृष्टि कैसे रची जाती है? यह बड़ी वन्डरफुल बाते हैं। गीता आदि में यह बातें कुछ भी नहीं है। यह नॉलेज है सद्गति की। बाप ही सद्गति दाता है। वह रचता ही इस सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को जानते हैं। भल सारी दुनिया में ढूँढ़ो, कोई है जो रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानते हों - सिवाए ब्रह्माकुमार ब्रह्माकुमारियों के? सो भी ज्ञानी तू आत्मा बच्चे जान सकते हैं।

तुम्हें सिद्ध करना है कि परमपिता परमात्मा बाप है, न कि वह सर्वव्यापी है। आखरीन सभी समझ जायेंगे कि यह ज्ञान इन्हों को परमपिता परमात्मा ही ब्रह्मा द्वारा देते हैं इसलिए इनका नाम है ही ब्रह्मा ज्ञान। ब्रह्म ज्ञान नहीं। जरूर बाप से ही मिला होगा। वह है ज्ञान सागर, उनकी महिमा है। ज्ञान का कलष फिर माताओं को दिया है। बाप आकर इन माताओं को ऊंच बनाते हैं। पुरुष भी ऊंच बनते हैं परन्तु इसमें ईर्ष्या नहीं होनी चाहिए। ऐसे नहीं माताओं का नाम क्यों डालें..। बाप आकर माताओं का मान बढ़ाते हैं। बाप बच्चों को ब्रह्मा द्वारा ज्ञान देते हैं जिसका नाम रखा है ब्रह्मा ज्ञान। ज्ञान शिवबाबा का है। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को ज्ञान सागर नहीं कहेंगे। ब्रह्मा खुद भी कहते हैं ज्ञान सागर मैं नहीं हूँ। बहुत जन्मों के अन्त का जन्म है, बाबा का बना हूँ तब बाबा ने नाम रखा है, एडाप्टेड जो होते हैं उनका नाम बदला जाता है। कितनी अच्छी रीति बाप समझाते हैं। बड़ी राजधानी स्थापन होती है। लिखा हुआ भी है - रुद्र ज्ञान यज्ञ से विनाश ज्वाला निकली। रुद्र माना शिव। कृष्ण तो प्रिन्स था। वह कैसे यज्ञ रचेगा। और गीता का भगवान कृष्ण है नहीं। उसने स्वर्ग की रचना नहीं रची। वह तो रचयिता ही रचेगा। यह बातें समझेंगे भी वह जो अपने कुल के होंगे। देवी-देवता धर्म वालों की ही सैपलिंग लगेगी। तुम समझते जायेंगे कहाँ तक उठाते हैं - सूर्यवंशी में जायेंगे वा चन्द्रवंशी में जायेंगे वा प्रजा में? सब समझते हैं - मौत पर कोई भरोसा नहीं है। आजकल तो बैठे-बैठे झट मौत हो जाता है। स्वर्ग में अकाले मृत्यु होती नहीं। मनुष्य सुख के लिए मेहनत करते हैं। हम अपने को सुखी रखें, साहूकार बनें। कोई को 5 रूपया मिलेगा तो कोशिश करेंगे 6-7 मिलें। बाप कहते हैं मैं तो तुमको सम्पत्तिवान बना देता हूँ। सन्यासी तो कहते सुख काग विष्टा समान है। वह क्या जानें। बाप समझाते हैं हठयोगी किसको भी जीवन्मुक्ति दे न सके। जीवन्मुक्ति परमपिता परमात्मा ही देते हैं - इन माताओं द्वारा। जरूर पुरुष भी होंगे। फिर औरों को आप समान बनाने का पुरुषार्थ करना है। जितना पुरुषार्थ करेंगे उतना पद पायेंगे। मैजारिटी माताओं की है। नाम भी गऊपाल, कन्हैया गाया हुआ है। बैल पर थोड़ेही नाम है। इसमें देह-अभिमान नहीं आना चाहिए। देह-अभिमान आने से माया उड़ा लेती है। बच्चे आते हैं निश्चय से कि हम जाते हैं मोस्ट बिलवेड बाप के पास। यह आत्मा ने मुख से कहा - जाता हूँ परमपिता परमात्मा के पास राजयोग और ज्ञान सीख वर्सा लेने लिए। नहीं तो यहाँ आने की जरूरत नहीं। इस ख्याल से नहीं आयेंगे तो संशय ही उठाकर ले जायेंगे, माना अपना खाना बरबाद करेंगे। फिर लकीर लग जाती है, इसलिए कहा जाता - निश्चय बुद्धि विजयन्ति, संशयबुद्धि विनश्यन्ति। पहले ही लिखा लेना चाहिए किसके पास जाते हो? परमपिता परमात्मा पास। बस, वही समझाते हैं। बाप समझाते हैं भक्ति मार्ग में कृष्ण का दीदार करते हैं, कितनी नौधा भक्ति करते हैं, जब एकदम गले में कुल्हाड़ी लगाने आते हैं, कहते हैं अगर साक्षात्कार न हुआ तो हम मर जायेंगे, तब मुश्किल से दीदार होता है। यह भी साक्षात्कार मैं कराता हूँ। यहाँ तो बच्चों को मुझे साक्षात्कार कराना ही है। एम आब्जेक्ट है, साक्षात्कार हो जाता है लेकिन इसमें खुश नहीं होना है। जब तक पुरुषार्थ नहीं करेंगे तो यह प्रालब्ध कैसे पा सकते? इसलिए पुरुषार्थ फर्स्ट। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्रीमत पर चल बाप के साथ मददगार बन सारे विश्व पर प्योरिटी, पीस स्थापन कर पीस-प्राइज़ लेनी है।
2) माताओं-बहनों को सितम से बचाना है। माताओं का मर्तबा बढ़ाना है। रिगॉर्ड रखना है।
वरदान:-
देह-अभिमान के त्याग द्वारा सदा स्वमान में स्थित रहने वाले सम्मानधारी भव
जो बच्चे इस एक जन्म में देह-अभिमान का त्याग कर स्वमान में स्थित रहते हैं, उन्हें इस त्याग के रिटर्न में भाग्यविधाता बाप द्वारा सारे कल्प के लिए सम्मानधारी बनने का भाग्य प्राप्त हो जाता है। आधाकल्प प्रजा द्वारा सम्मान प्राप्त होता है, आधाकल्प भक्तों द्वारा सम्मान प्राप्त करते हो और इस समय संगम पर तो स्वयं भगवान अपने स्वमानधारी बच्चों को सम्मान देते हैं। स्वमान और सम्मान दोनों का आपस में बहुत गहरा संबंध है।
स्लोगन:-
हर कदम में बाप की, ब्राह्मण परिवार की दुआयें लेते रहो तो सदा आगे बढ़ते रहेंगे।

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