Sunday, 13 May 2018

Brahma Kumaris Murli 14 May 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 14 May 2018


14/05/2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website.


"मीठे बच्चे - सच्ची शान्ति की अनुभूति करने के लिए इस शरीर से डिटैच हो जाओ, जब चाहो शरीर रूपी बाजा बजाओ और जब चाहो इससे न्यारे हो जाओ"
प्रश्नः-
प्यार के सागर शिवबाबा के प्यार की कमाल कौन सी है?
उत्तर:-
प्यार का सागर शिवबाबा बच्चों को प्यार से शिक्षा देकर आप समान अति मीठा, अति प्यारा बना देते हैं। उनके प्यार की कमाल है जो तुम पूज्य लक्ष्मी-नारायण समान बन जाते हो जिनके दीदार के लिए मनुष्यों की आज भी भीड़ लगती है। बाप आये ही हैं बच्चों को मनुष्य से देवता, पुजारी से पूज्य बनाने।
गीत:-
तू प्यार का सागर है....  
Brahma Kumaris Murli 14 May 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 14 May 2018 (HINDI) 

ओम् शान्ति।
इस समय तुम बच्चों को ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है अर्थात् आत्मा की ऑख खुली हुई है। त्रिनेत्री कहा जाता है ना, इसको तीजरी की कथा भी कहते हैं। वास्तव में है एक ही नाम राजयोग' राजाई प्राप्त करने के लिए। राजाई प्राप्त कराने वाले से और राजाई से योग - इसका ही अक्षर है मनमनाभव, मध्याजीभव। मुझे याद करो, अपने स्वरूप को याद करो। बाप ने कोई संस्कृत में गीता नहीं सुनाई है। बच्चे जानते हैं बाप क्या समझाते हैं और शास्त्रों में क्या है। बाप प्यार का सागर तो जरूर है तब तो प्यारे ते प्यारी वस्तु को याद किया जाता है ना। बाप भी जानते हैं बच्चों को जाकर सदा सुखी बनाता हूँ। यह दादा तो बड़ा सुखी था, इनको कोई दु:ख नहीं था। परन्तु यह नहीं जानते थे कि बाप क्या आकर सुख देते हैं। अभी तुम अनुभवी बनते जाते हो। बाप आकर सदा सुखी, सदा शान्त बनाते हैं। सुख होता ही है सम्पत्ति से। बाप आकर वर्सा देते हैं। कोई धनवान भी होते हैं बच्चों को वर्सा देते हैं, सुखी बनाते हैं। परन्तु शान्ति तो दे न सके। शान्ति तो सब चाहते हैं। सन्यासी भी कहते हैं मन की शान्ति चाहिए क्योंकि मन-बुद्धि है आत्मा के अन्दर। तो कहते हैं मन की शान्ति कैसे हो। बाबा ने समझाया है पूछो आत्मा को अशान्त किसने किया है? वो लोग तो कह देते हैं आत्मा दु:ख-सुख से न्यारी, अभोक्ता, असोचता है। यह नहीं जानते मन-बुद्धि आत्मा के आरगन्स हैं। बाप समझाते हैं अशान्त माया करती है। आत्मा का स्वधर्म है ही शान्त। बाकी यह आरगन्स हैं। परन्तु शान्ति में कहाँ तक बैठे रहेंगे। सन्यासियों का तो है ही हठयोग, अन्दर खड्डे में चले जाते हैं। यहाँ तो सहज रीति बाप बैठ नॉलेज देते हैं। कर्मयोग है ना। यूँ तो शान्ति रात को भी मिलती है। अच्छा, हम आत्मा इन आरगन्स से काम लेते वा नहीं लेते - यह तो हमारे हाथ में है, मैं बाजा नहीं बजाता हूँ। अपने को डिटैच समझो, इसमें ऑख मूँदने की भी दरकार नहीं। आत्मा इन ऑखों से देखती रहती है। आत्मा को ऑखें मिली हैं देखने के लिए। बाकी जबान से काम नहीं लेता हूँ। ऐसे ही बैठ जाता हूँ। परन्तु सिर्फ बैठ जाने से कोई भी फ़ायदा नहीं। फ़ायदा है ही बाप को याद करने से। जब तक सर्वशक्तिमान से योग नहीं तो कोई फ़ायदा हो नहीं सकता। योग को ही अग्नि कहा जाता है। इनको युद्ध का मैदान भी कहा जाता है। माया पर जीत पाने का मैदान है। योग से तुम्हारी आयु भी बढ़ती है। विकर्म भी विनाश होते हैं। बड़ी खुशी होती है। बाबा को याद करते-करते बाबा के पास चले जायेंगे। है तो सब ड्रामा, परन्तु बाप हर एक बात समझाते हैं। बाप को याद करते रहो, साथ-साथ सर्विस भी करनी है क्योंकि तुम हठयोगी तो नहीं हो। आरगन्स मिले हैं काम करने के लिए।

तुम जानते हो आत्मायें पहले सतोप्रधान रहती हैं। फिर सतो रजो तमो में आती हैं। अभी शुरू से लेकर सब तमोप्रधान हैं। कोई-कोई अच्छी आत्मा होगी तो नाम बाला रहता है। परन्तु पिछाड़ी वालों में ताकत कम रहती है। पहले आत्मा में ताकत जास्ती रहती है। तो बेहद का बाप है प्यार का सागर। कितना खींचता है। देखो, यह लक्ष्मी-नारायण कितने खींचते हैं। उन्हों को किसने इतना मीठा बनाया? कोई नहीं जानते। जो खुद पूज्य थे, वही पुजारी बने हैं। तुम्हारे मम्मा-बाबा वह भी नहीं जानते थे। अभी जानने से जाग उठते हैं। ओहो! हम सो देवता हैं। भगवान बैठ जगाते हैं। माया पर जीत पाने की युक्ति बतलाते हैं। बाकी और कोई हथियार आदि नहीं हैं। मनुष्य यह भी नहीं जानते हैं कि माया किसको कहा जाता है। बिल्कुल ही बेसमझ हैं। ऐसे पत्थरबुद्धि बनें तब तो बाप आकर पारसबुद्धि बनायें। लक्ष्मी-नारायण मोस्ट बिलवेड हैं। इस समय सब हैं तमोप्रधान। परमात्मा को न जानने के कारण ठिक्कर-भित्तर को याद करते रहते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी नहीं जानते हैं। वह हैं सूक्ष्मवतन वासी। लक्ष्मी-नारायण आदि को दैवी गुण वाले मनुष्य कहेंगे। कृष्ण दैवीगुण वाला था, सतयुग आदि में। कृष्ण को बहुत प्यार करते हैं, झुलाते हैं। अगर कृष्ण पीछे द्वापर में आया तो राम को झुलाना चाहिए। परन्तु राम को कभी ऐसे झुलाते नहीं हैं। तुम जानते हो आत्मा एक शरीर छोड़ यह भागी दूसरे शरीर में। देरी नहीं लगती है। सबसे तीखी दौड़ी पहनने वाली आत्मा है। सेकेण्ड भी नहीं लगता है, इससे तीखा रूहानी रॉकेट कोई होता नहीं। बाकी वे सब हैं जिस्मानी चीज़ें।

तू प्यार का सागर है। यह एक की महिमा गाई जाती है। जरूर कुछ किया है ना, तब तो महिमा गाते हैं ना। अब तुम बच्चे जानते हो - शिवबाबा बहुत प्यार का सागर है। कमाल है बाबा के प्यार की, शिक्षा देकर ऐसा लक्ष्मी-नारायण बना देते हैं, वह भी कितने प्यारे हैं, उनका दीदार करने के लिए कितने मनुष्य जाते हैं। श्रीनाथ द्वारे में दीदार के लिए सोटें (डण्डे) लगते रहते हैं। कितनी भीड़ हो जाती है। बाबा कहते हैं तुम बच्चों को भी इतना मीठा, इतना प्यारा बनाता हूँ! तुम सो देवी-देवता थे। हम सो, सो हम कहते हैं ना। वास्तव में है सो हम, हम सो। सो हम बाबा के बच्चे थे, सो हम देवी-देवता थे फिर सो हम क्षत्रिय बने। बाकी आत्मा सो परमात्मा, परमात्मा सो आत्मा ऐसी बात नहीं है। सो हम आत्मा पूज्य देवी-देवता थे, फिर 84 जन्म लेते हैं। सो हम देवता थे, फिर दो कला कम हो गई, क्षत्रिय बने, फिर वैश्य बने और दो कला कम हुई, इसको कहा जाता है स्वदर्शन। एक सेकेण्ड लगता है इस चक्र को फिराने में। अभी फिर सो हम ईश्वर की सन्तान बने हैं - यह नशा चढ़ना चाहिए इसलिए गाया जाता है अतीन्द्रिय सुख पूछना हो तो गोपी वल्लभ के गोप-गोपियों से पूछो। अभी हम सो फिर से आकर बाबा के बने हैं। हम सो फिर देवता बनेंगे। हम सो कल रात में थे, आज दिन में हैं। गाया भी जाता है - ज्ञान अन्जन सतगुरू दिया, अज्ञान अन्धेर विनाश......। हम बिल्कुल तमोप्रधान थे, अब बाप हमको क्या बनाते हैं, कितनी शौक से पालना करते हैं। बाबा को गाली भी बहुत खानी पड़ती है। परन्तु समझते हैं यह भी ड्रामा है। नथिंग न्यु। युद्ध के मैदान में मेहनत तो जरूर करनी है। ऐसे नहीं बिगर मेहनत कोई राजाई मिल जायेगी। स्टूडेण्ट ऐसे थोड़ेही कहेंगे कि मास्टर जी आशीर्वाद करो। अच्छा नम्बर पाने के लिए तो पुरुषार्थ करना है। यह गॉडली कॉलेज है। भगवानुवाच - मैं तुम बच्चों को राजाओं का राजा बनाता हूँ, इसका अर्थ भी कोई समझ नहीं सकते। तो बेहद का बाप बच्चों को विश्व का मालिक बनाते हैं। कैपिटल (राजधानी) यही जमुना का कण्ठा देहली है। कैपिटल बहुतों के हाथ में आई है। अब तो ठिक्कर-भित्तर की देहली है। फिर तो बनेगी सोने की। बाकी ऐसे नहीं, सोने की द्वारिका नीचे गई फिर निकल आई। लंका कोई और नहीं, इस समय यह सारी दुनिया लंका है। रावण का राज्य चल रहा है। सब सजनियाँ शोक वाटिका में बैठी हुई हैं। वहाँ होती है अशोक वाटिका। यहाँ तो कदम-कदम पर शोक दु:ख है। बाबा आकर बहुत मीठा बनाते हैं। कहते हैं मीठे-मीठे बच्चों कभी किसको दु:ख नहीं देना है। सुख-शान्ति का दाता एक ही बाप है। वह आकर सुख-शान्ति का वर्सा देते हैं, तो श्रीमत पर चलना पड़े। धन्धाधोरी से जितना समय मिले बाप को याद करो। पवित्रता का बल चाहिए, जिससे निरोगी काया पायेंगे। भारत के प्राचीन योग की बहुत महिमा है। जब समय आता है तब बाप खुद ही आकर नॉलेज देते हैं। मनुष्य तो दे नहीं सकते हैं। ऐसे बहुत सन्यासी बाहर में जाते हैं, कहते हैं भारत का प्रचीन योग सिखाने आये हैं। परन्तु वह कोई राजयोग नहीं सिखाते। यह भी ड्रामा में नूँध है। भारत का प्राचीन राजयोग है। बाप कहते हैं मैं आता ही हूँ कल्प के संगमयुगे। उन्होंने संगमयुग अक्षर निकाल युगे-युगे कह दिया है। बाप समझाते हैं सतयुग-त्रेता का संगम होता है, दो कला कम होती है। कलियुग में तो बिल्कुल ही कलायें खत्म हो जाती हैं। तुम इन वर्णों में आते हो - देवता वर्ण, क्षत्रिय वर्ण.....। तुम बच्चे यथार्थ रीति समझते हो कि यह सारा खेल है। भारत पर ही हार और जीत का खेल है। माया हराती है और बाप आकर जीत पहनाते हैं। यह कोई नहीं समझाते हैं कि माया ने अशान्त किया है। अब बाबा कहते हैं तुमने शान्ति का हार गँवाया है। अब फिर वही शान्ति का हार मैं तुम्हें पहनाता हूँ, जिससे तुम एवर शान्त बन जाते हो। यह स्वदर्शन चक्र भी अन्दर फिरना चाहिए। बाहर में शंख बजायेंगे तो राजा-रानी बन जायेंगे। और कुछ करना नहीं है। अति सहज है। बाप की पहचान मिली, बाबा हमारा स्वर्ग का रचयिता है। बरोबर हम स्वर्ग के मालिक थे। अब फिर से बाबा आया है स्वर्ग का मालिक बनाने। बस, बाबा अभी तो आपके हैं, दूसरा न कोई। गीता में कृष्ण का नाम डालने से कह देते हैं - मेरा तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई... समझते हैं कृष्ण ही भगवान है। सब एक ही एक हैं। भगवान को न जानने के कारण नास्तिक बन गये हैं। अभी तुम बाप को जानने के कारण आस्तिक बन गये हो। वह है विनाश काले विपरीत बुद्धि। विपरीत बुद्धि माना परमात्मा से प्रीत नहीं है। बाप है प्यार का सागर, शान्ति का सागर, सुख का सागर - उनकी बहुत महिमा है। ऐसे नहीं, यह ब्रह्मा, विष्णु, शंकर सब एक ही भगवान हैं। नारायण भी भगवान है, राम भी भगवान है। एक तरफ परमात्मा को नाम-रूप से न्यारा भी कहते हैं और फिर भित्तर-ठिक्कर में भी कह देते हैं। अभी तुम बाप को जानकर बाप से पूरा वर्सा लेने का पुरुषार्थ कर रहे हो।

यह मकान आदि सब शिवबाबा बना रहे हैं बच्चों के लिए क्योंकि यहाँ आप बच्चों को पढ़ना है। मुसाफिरी पूरी करके घर के जब नजदीक पहुँचते हैं तो समझते हैं, अभी हम घर में आकर पहुँचे हैं। तुम बच्चों को बहुत खुशी होगी। साक्षात्कार से बाबा बहलायेंगे क्योंकि हंगामा हो जाता है। तो ऐसे समय बाप के साथ रहना चाहते हैं फिर साक्षात्कार होना बहुत सहज होगा। योग में बैठे-बैठे तुम बहुत-बहुत साक्षात्कार करते रहेंगे। खुशी में तुम डान्स करते हो। बाकी सब शरीर छोड़ चले जायेंगे। खूने नाहेक खेल है। तुम्हारे साथ कोई की युद्ध नहीं है। फिर साक्षी हो देखेंगे परन्तु हिम्मत भी चाहिए। कमजोर तो ठहर न सके। जितना दुनिया में जास्ती दु:ख होगा उतना बाबा तुमको बहलाने के लिए सुख देगा। बैठे-बैठे बहुत साक्षात्कार होते रहेंगे। इतने बच्चे हैं, शिवबाबा का भण्डारा तो जरूर भरपूर होगा। बच्चों से ही सब कुछ होता है। कोई के पास 7 बच्चे होंगे उसमें भी कोई गरीब, कोई साहूकार होंगे। बच्चे तो ठहरे ना। यह तो बड़ा बाप है। बेहद का घर है। यह मात-पिता है फिर तुम बच्चों को सम्भालने के लिए जगदम्बा को निमित्त रखा है। कुमारी मम्मा में ज्ञान-योग की ताकत भरी हुई है। बाबा भी योग में रहते हैं। मुरली चलती है। ऐसे तो नहीं समझते हो शिवबाबा ही मुरली चलाते हैं। इनकी सोल भुट्टू है क्या! भल समझो यह भुट्टू है। शिवबाबा ही मुरली चलाते हैं तो उनको याद करना अच्छा है। सदैव समझो - इनमें शिवबाबा आकर हमको पढ़ाते हैं। बाप कहते हैं मुझे याद करने से सदा सलामत रहेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) हम सो, सो हम की स्मृति से स्वदर्शन चक्र फिराते रूहानी नशे में रहना है। बाप समान अति मीठा, अति प्यारा बनना है।
2) सदा सलामत रहने के लिए एक बाप को ही याद करना है। सिर्फ शान्ति में नहीं बैठना है। सर्वशक्तिवान बाप को याद कर शक्ति भी लेनी है।
वरदान:-
अपनी शुभ और शक्तिशाली भावनाओं द्वारा विश्व परिवर्तन करने वाले विश्व कल्याणकारी भव!
आप बच्चों के मन में सदा यही शुभ भावना है कि सर्व का कल्याण हो। हर आत्मा अनेक जन्म सुखी हो जाए, प्राप्तियों से सम्पन्न हो जाए। आपकी इस शुभ और शक्तिशाली भावना का फल विश्व की आत्माओं को परिवर्तन कर रहा है, आगे चल प्रकृति सहित परिवर्तन हो जायेगा क्योंकि आप संगमयुगी श्रेष्ठ आत्माओं को ड्रामानुसार प्रत्यक्षफल प्राप्त होने का वरदान है इसलिए जो भी आत्मायें आपके संबंध-सम्पर्क में आती हैं वह उसी समय शान्ति वा स्नेह के फल की अनुभूति करती हैं।
स्लोगन:-
त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित रहकर निर्णय करो तो हर कर्म में सफलता प्राप्त होगी।

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