Tuesday, 1 May 2018

Brahma Kumaris Murli 02 May 2018 (HINDI) Madhuban BK Murli Today


Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – 02 May 2018


02-05-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

BK Murli is available to 'read' and to 'listen' Daily Murli in Hindi and English.'' Om Shanti. Shiv baba ke madhur Mahavakya. Brahma Kumaris BaapDada ki murli. Bk Murli Audio recorded by service team of sisters of bkdrluhar.com website. 




"मीठे बच्चे - पहले अपने ऊपर रहम करो, फिर आपका फ़र्ज है अपने परिवार को स्वर्ग में चलने का सही रास्ता बताना, इसलिए उन्हें भी लायक बनाने का पूरा पुरुषार्थ करो"
प्रश्नः-
तुम किस रेस के आधार से शिवालय के मालिक बन जायेंगे?
उत्तर:-
फालो फादर-मदर। सिर्फ एक जन्म पवित्रता की प्रतिज्ञा करो। नर्क से दिल हटा दो। शिवबाबा तुम्हारे लिए शिवालय स्थापन कर रहे हैं, जहाँ तुम चैतन्य में राज्य करेंगे। धन्धाधोरी करते बाप और स्वर्ग को याद करने से राजाई का तिलक मिल जायेगा अर्थात् शिवालय के मालिक बन जायेंगे।
गीत:-
तुम्हीं हो माता पिता.....  

Brahma Kumaris Murli 02 May 2018 (HINDI)
Brahma Kumaris Murli 02 May 2018 (HINDI) 

ओम् शान्ति।
कुछ-न-कुछ कहना पड़ता है। ओम् शान्ति या शिवाए नम:। परमात्माए नम: कहते हैं ना। ओम् शान्ति हम कहते हैं। यह है अपना और बाप का परिचय देना। वह महिमा भक्त लोग करते हैं - त्वमेव माताश्च पिता.. तुम तो बच्चे हो। जिसकी महिमा भक्त लोग भक्ति मार्ग में करते हैं, आज वह बाप आपके सम्मुख बैठा हुआ है। जरूर सम्मुख था, अब फिर सम्मुख बैठे हुए हैं। यह बातें अभी तुम बच्चे ही जानते हो। भक्त नहीं जानते हैं। तुम बच्चे जानते हो एक ही बाप है, जिसकी महिमा हो रही है। वह बाप तुम बच्चों को कितना सुख दे रहे हैं! जो तुम फिर 21 जन्मों के लिए कभी दु:खी नहीं होने वाले हो। ऐसे बाप के सम्मुख तुम बैठे हो। तुम जानते हो यह हमारा बेहद का बाप है। जो हमको स्वर्ग के सुख देने लिए सर्विस कर रहे हैं। बाप हमेशा बच्चों को रचकर उन्हों की सेवा कर लायक बनाते हैं। बाप जैसेकि बच्चों का गुलाम बन जाता है। लौकिक बाप भी बच्चों की पालना करने में कितनी मेहनत करते हैं। रात-दिन यह चिन्तन रहता है कि बच्चों की सेवा कर बच्चों को लायक बनायें। वो हैं हद की रचना के गुलाम। यह है फिर बेहद का बाप। यह भी कहते हैं - बच्चे, पूरा फालो करो और पूरा वर्सा लेकर स्वर्ग के मालिक बनो। बच्चों पर हमेशा रहम करना होता है। जो सेन्सीबुल बाप होगा वह कहेगा - बच्चों को भी क्यों न साथ-साथ यह सच्ची कमाई भी करायें। लौकिक बच्चों की स्थूल पालना तो आधाकल्प से करते हैं। बच्चों की पालना कर बड़ा बनाया, लायक बनाया। बच्चों के लिए विल किया बस, शरीर छोड़ा, जाकर दूसरा जन्म लेंगे। वह हुआ हद का बाप, यह है फिर बेहद का बाप। वह हद का ब्रह्मा है। रचना रच फिर उनका गुलाम बनते हैं। बहुत मेहनत करनी पड़ती है। कहाँ बच्चे कुसंग में खराब न हो जायें। नाम बदनाम न करें। परन्तु वह हो गया अल्पकाल का सुख। उन्हें यह पता नहीं - बच्चा सपूत निकलेगा या कपूत? कई ऐसे कपूत निकलते हैं जो एकदम खाना खराब कर देते हैं। बाप की मिलकियत को एकदम उड़ाकर चट कर देते हैं, इसलिए बड़ी सम्भाल करनी पड़ती है। बेहद के बाप को कितना फुरना रहता है! कहते हैं तुम भी वर्सा लो और अपनी रचना को भी वर्सा दो। परन्तु फिर भी कपूत बच्चे होते हैं तो बाप का कहना नहीं मानते हैं। बाप कहते हैं पढ़ाई करो, तो पढ़ते नहीं। पवित्र नहीं बनते। कोई मुश्किल कोटों में कोई, कोई में भी कोई आज्ञाकारी निकलते हैं। यहाँ तो श्रीमत मिलती है।

तुम मात-पिता... यह एक की ही महिमा है। परन्तु मनुष्य न जानने कारण कृष्ण के आगे, लक्ष्मी-नारायण के आगे कहेंगे तुम मात-पिता.... यह भी अन्धश्रद्धा है। अब लक्ष्मी-नारायण प्रालब्ध भोगते हैं। उनको अपने बच्चे हैं। हम उनको कैसे कहते हैं तुम मात-पिता... वास्तव में यह महिमा एक की ही है। गीत में सुना कि ऊंचे ते ऊंचा है शिवबाबा। सबका सद्गति दाता... सबको शान्तिधाम, सुखधाम में ले जाने वाला। तो ऐसे बाप की श्रीमत पर जरूर चलना चाहिए। समझते भी हैं मात-पिता से ही 21 जन्मों के लिए सुख घनेरे मिलते हैं। परन्तु ऐसी श्रीमत पर कोई मुश्किल चलता है। बहुत ऊंचा वर्सा मिलता है। बाप कहते हैं मैं तुम बच्चों के लिए हथेली पर बहिश्त लाया हूँ। जब श्रीमत पर चलो तब लायक बनो। कदम-कदम पर मत लेनी है। मत पर नहीं चलते तो ऊंच पद पा न सके। स्वर्ग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। यह किसको पता ही नहीं। आगे हम भी कहते थे फलाना स्वर्गवासी हुआ अथवा सन्यासी कोई मरेंगे तो कहेंगे ज्योति ज्योत समाया। परन्तु जाता कोई नहीं है। जीवन्मुक्ति वा मुक्ति दाता एक ही बाप है, वह न आये तब तक कोई जा न सके। वह है निराकारी दुनिया। निराकारी बाप और निराकारी आत्मायें वहाँ रहती हैं, जिसको परमधाम भी कहा जाता है। साइन्स घमण्डी समझते हैं यहाँ ही जन्मते और मरते हैं। जैसे मच्छर। सृष्टि के चक्र का किसको भी पता ही नहीं। सर्वव्यापी के ज्ञान से कोई कुछ भी समझ न सके। अब तुमको बाप मिला है। कहते हैं - बच्चे, अब वापिस चलो। मैं कल्प पहले मुआफिक सबको ले जाने आया हूँ। तुम्हारी आत्मा में बहुत खाद पड़ी है। सबकी आत्मा तथा शरीर आइरन एजेड हो गये हैं। उनको फिर से सतोप्रधान बनना है। तुम बच्चों की आत्मा सतोप्रधान थी तब गोल्डन एजेड वर्ल्ड थी। पवित्र आत्मा का पवित्र सोने जैसा शरीर था। उसको सच्चा जेवर कहा जाता था। अब तो क्या हो गया है। एक परसेन्ट भी सच्चा सोना नहीं रहा है। खाद पड़ी हुई है। अब बाप कहते हैं सिर्फ मुझ बाप को याद करो तो सच्चा सोना बनते जायेंगे। आत्मा उड़ने लग जायेगी। अभी पंख टूटे हुए हैं। जैसा पुरुषार्थ करेंगे वैसा पद पायेंगे। कितनी ऊंची पढ़ाई है। भगवानुवाच - मैं तुमको राजयोग सिखलाता हूँ, जिससे तुम राजाओं का राजा बनेंगे। विकारी पुजारी राजाओं के भी पूज्य बनेंगे। गाया भी है आपेही पूज्य, आपेही पुजारी। तुम जानते हो हम सो पूज्य देवी-देवता थे फिर हम सो पूज्य चन्द्रवंशी बने। हम सो पूज्य और पुजारी बनते हैं। बाप आकर पुजारी से पूज्य बना रहे हैं। अब ज्ञान जिन्दाबाद हो रहा है। ब्रह्मा सो ब्रह्माकुमार कुमारियों की रात अब पूरी होती है। रात कब से आरम्भ होती है - यह शास्त्रवादी नहीं जानते हैं। ब्रह्मा का दिन सतयुग त्रेता... द्वापर के आदि से रात शुरू होती है। यह सब बातें तुम बच्चों की बुद्धि में हैं। अब 84 जन्म पूरे कर हम फिर से राज्य-भाग्य भोगेंगे। सतयुग में यह ज्ञान नहीं रहेगा। वहाँ है प्रालब्ध। वहाँ भी तुम अपने बाप से वर्सा लेते हो। परन्तु वह इस समय की प्रालब्ध है जो 21 जन्म चलती है। भारत पर ही सारा खेल है। सतयुग में जो देवी-देवताओं का राज्य था वह अभी आसुरी बना है। प्रजा का प्रजा पर राज्य है। बाप कहते हैं - बच्चे, हियर नो ईविल, सी नो ईविल... बन्दर का एक चित्र दिखाते हैं। इस समय मनुष्य बन्दर मिसल बन पड़े हैं इसलिए बन्दर की शक्ल दिखाते हैं। बात इस समय की है। इसको कहा जाता है - रौरव नर्क। बिच्छू टिण्डन मिसल एक दो को काटते रहते हैं। बच्चे बाप का भी खून कर देते हैं। माया ने सबको डर्टी बना दिया है। भारत हेविन था, अब हेल है। 84 जन्म भी भारतवासियों के हैं।

बाप कहते हैं मैं कितनी समझानी देता हूँ। कहते हैं - आई एम मोस्ट ओबिडियन्ट फादर। फादर सर्वेन्ट, टीचर सर्वेन्ट, गुरू सर्वेन्ट। अब मैं आया हूँ। पण्डे लोग भी यात्री के सर्वेन्ट होते हैं - रास्ता बताने वाले। अब मैं तुम बच्चों को स्वर्ग ले चलने लिए गाइड बना हूँ। लिबरेट करता हूँ। हिस्ट्री रिपीट जरूर होगी। ग्रन्थ में भी कहते हैं कि है भी सत, होसी भी सत... एकोअंकार... यह परमात्मा की महिमा है। एक तरफ कहते हैं अजोनी, दूसरे तरफ कहते हैं सर्वव्यापी है। जिधर देखता हूँ तू ही तू है। यहाँ हम आये हैं मौज करने। ऐसे बहुत ही कहते हैं। अब बाप कहते हैं - बच्चे, यह सब बातें तुम्हें डुबोने वाली हैं। सर्वव्यापी का ज्ञान डुबो देता है। बाप कितना समझाते हैं। कोई तो झट निश्चय करते हैं कि बाप से वर्सा लेना है। इन जैसा स्वीट फादर मिल नहीं सकता। स्वर्ग की स्थापना करने वाला बाप है। जब बाप मिले तब ही हम स्वर्ग के मालिक बनें। ऐसे बाप को झट अपना बनाना चाहिए। मुझे तो बच्चे चाहिए जो कल्प पहले बने थे, वो ही आकर सपूत या कपूत बनेंगे कल्प पहले मुआफिक। स्त्री की, बच्चों की जवाबदारी क्रियेटर बाप के ऊपर है। उनका फ़र्ज है बच्चों को भी स्वर्ग का मालिक बनाये। पहले तो अपने पर रहम करो। ऐसे नहीं कि बाबा कृपा करेंगे तो सब लक्ष्मी-नारायण बन जायेंगे। यह बड़ा इम्तहान है। 8 को ही स्कालरशिप मिलती है। फिर 108 हैं, लॉटरी होती है ना। बाप कहते हैं - देह सहित देह के सम्बन्ध जो कुछ हैं भूल जाओ। अपने को अशरीरी समझो और आत्मा निश्चय करो। ऐसे नहीं तुम परमात्मा हो। वह फिर आत्मा सो परमात्मा कह देते हैं। समझते हैं आत्मा जाकर परमात्मा में लीन होगी। जब तक लीन न हो तब तक उनको परमात्मा नहीं कहेंगे। परन्तु परमात्मा में लीन होते नहीं। यह ड्रामा अनादि बना हुआ है। 5-6 सौ करोड़ एक्टर्स हैं। उन सबको अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है जो बजाना है। हरेक आत्मा में इमार्टल पार्ट भरा हुआ है। बाप बिगर कोई समझा न सके। बाप आकर तुम बच्चों को आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान दे त्रिकालदर्शी बनाते हैं। चित्रों में देवताओं को तीसरा नेत्र दिखाते हैं। वास्तव में तीसरा नेत्र न है देवताओं को, न शूद्रों को। तुम ब्राह्मणों को ही ज्ञान का तीसरा नेत्र है, जिससे तुम सबके आक्यूपेशन को जानते हो। सच खण्ड और झूठ खण्ड की हालत को भी तुम जानते हो। तुम्हारे में भी नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार हैं। यह है पाठशाला। इसमें अन्धश्रद्धा की कोई बात नहीं है। अपना धन्धाधोरी सब करते रहो। सिर्फ अपने बाप को और स्वर्ग को याद करो तो तुम्हारे ऊपर राजाई का तिलक आ जायेगा। आत्मा ही याद करती है। संस्कार आत्मा में है। आत्मा से ही बात करते हैं। मैं तुम्हारा बाप हूँ। कल्प पहले भी तुमने वर्सा लिया था। सूर्यवंशी राज्य किया था। फिर चन्द्रवंशी में गये। कलायें कमती होती जाती है। फिर वैश्य, शूद्र बने। अब स्मृति आई है कि नाटक पूरा हुआ है। मामेकम् याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। श्रीमत पर न चले, देह अभिमान आया तो लगी चोट। फिर ब्रहस्पति की दशा बदलकर राहू का ग्रहण बैठ जाता है। फारकती दी तो रौरव नर्कवासी बन जाते हैं।

बाप कहते हैं ऊंच पद पाना है तो रेस करो। अभी ऊंच पद पायेंगे तो कल्प-कल्प पाते रहेंगे। सिर्फ एक जन्म के लिए पवित्रता की प्रतिज्ञा करो तो 21 जन्म स्वर्ग के मालिक बनेंगे। अब नर्क से दिल को हटा दो। शिवबाबा तुम्हारे लिये शिवालय स्थापन कर रहे हैं, जहाँ तुम चैतन्य देवतायें राज्य करेंगे। तो क्या शिवालय का मालिक बनने चाहते हो? फालो मदर-फादर। जो कुछ है सब तुम बच्चों के लिए है। राजा भी तुम बनेंगे। तुम ही थे। अब रंक बने हो। और धर्म वालों की बात नहीं। देवी-देवता धर्म वाले ही और धर्मों में कनवर्ट हो गये हैं इसलिए हिन्दुओं की संख्या कम हो गई है। नहीं तो भारत की संख्या सबसे जास्ती होनी चाहिए। तुमको भगवान पढ़ा रहे हैं! कितना ध्यान देना चाहिए! यह बड़ी वन्डरफुल पढ़ाई है। बूढ़े, बच्चे, जवान सब पढ़ते हैं। बीमार भी पढ़ सकते हैं। अगर बाप और वर्से को याद न किया तो माया थप्पड़ मार देगी। ब्लड से लिख देना चाहिए - मैं रात-दिन बाबा को याद करूंगा। शिवबाबा का हाथ पूरा पकडूँगा। जो बाबा कहेगा सो करुँगा। शिवबाबा कहते हैं बच्चों की सम्भाल करो। जो बचे, उनसे दो मुट्ठी शिवबाबा की सर्विस में लगा दो फिर उनका एवज़ा तुमको इतना मिलेगा जितना साहूकार का लाख देने से बनेगा। प्रत्यक्षफल मिल जाता है। अच्छा!

मात-पिता बापदादा का मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) देह तथा देह के सर्व सम्बन्ध भूल अशरीरी आत्मा बनने का अभ्यास करना है। बाप से श्रीमत लेकर कदम-कदम उस पर चलना है।
2) पढ़ाई पर पूरा-पूरा ध्यान देना है। दृढ़ संकल्प करना है कि "रात-दिन एक बाबा की ही याद में रहूँगा और बाबा जो कहेंगे वह अवश्य करूंगा"। हियर नो ईविल, सी नो ईविल...
वरदान:-
कोई भी ड्युटी बजाते हुए स्वयं को सेवाधारी समझ सेवा करने वाले डबल फल के अधिकारी भव
कोई भी कार्य करते, दफ्तर में जाते या बिजनेस करते - सदा स्मृति रहे कि सेवा के लिए यह ड्युटी बजा रहे हैं। सेवा के निमित्त यह कर रहा हूँ - तो सेवा आपके पास स्वत: आयेगी और जितनी सेवा करेंगे उतनी खुशी बढ़ती जायेगी। भविष्य तो जमा होगा ही लेकिन प्रत्यक्ष-फल खुशी मिलेगी। तो डबल फल के अधिकारी बन जायेंगे। याद और सेवा में बुद्धि बिजी होगी तो सदा ही फल खाते रहेंगे।
स्लोगन:-
जो सदा खुशहाल रहते हैं वह स्वंय को और सर्व को प्रिय लगते हैं।

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