Thursday, 29 March 2018

30-03-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


30-03-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे लाडले बच्चे - तुम्हारी है रूहानी याद की यात्रा, तुम्हें शरीर को कोई तकलीफ नहीं देनी है, चलते-फिरते, उठते-बैठते बुद्धि से बाप को याद करो"
प्रश्नः-
सदा खुशी किन बच्चों को रहती है? स्थाई खुशी न रहने का कारण क्या है?

उत्तर:-
जो पुरानी दुनिया, पुराने शरीर से ममत्व तोड़ बाप और वर्से को याद करते हैं उन्हें ही स्थाई खुशी रहती है। जिनकी याद की यात्रा में माया के तूफान आते, अवस्था ठण्डी हो जाती उनकी खुशी स्थाई नहीं रहती। 2- जब तक भविष्य राजाई इन आंखों से नहीं देखते हैं, तब तक खुशी कायम नहीं रह सकती।
गीत:-
हमें उन राहों पर चलना है...  
ओम् शान्ति।
यह बाप कहते हैं बच्चों प्रति, यह तो समझने की बात है। इतने बच्चे सिवाए प्रजापिता ब्रह्मा के और किसके होते नहीं। कृष्ण को कभी प्रजापिता नहीं कहा जाता। नाम गाया हुआ है ना प्रजापिता ब्रह्मा, जो होकर गये हैं वह इस समय प्रेजन्ट है। तो प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान ब्रह्माकुमार कुमारियां ढेर हैं। यह है प्रजापिता ब्रह्मा की औलाद। तो जरूर प्रजापिता ब्रह्मा का भी कोई बाप होगा ना। बच्चे जानते हैं हमारा दादा परमपिता परमात्मा शिव है। वह अब नई दुनिया रच रहे हैं अर्थात् पुरानी दुनिया को नई बना रहे हैं। इस पुरानी दुनिया में यह तन भी पुराने हैं। नई दुनिया में सतोप्रधान नये तन होते हैं। वह कैसे होते हैं, देखो, इन लक्ष्मी-नारायण को। यह है नई दुनिया के नये तन। इन्हों की महिमा भारतवासी जानते हैं। यह स्वर्ग नई दुनिया, नये विश्व के मालिक हैं। नई दुनिया जो थी वह अब पुरानी है। 84 जन्म लेने पड़ते हैं ना। इनका भी पूरा हिसाब है। कौन पूरे 84 जन्म लेते हैं? सब तो नहीं लेते। 84 जन्म सिर्फ वही लेते हैं जिनका आदि से अन्त तक पार्ट है। जो पहले इस सृष्टि पर थे। हर एक बात लाडले बच्चों को धारण करनी है। यहाँ कोई मनुष्य, मनुष्य को नहीं समझाते यह तो निराकार परमपिता परमात्मा मनुष्य तन में बैठ समझाते हैं। बलिहारी उनकी है। वह नहीं समझाते तो हम कुछ भी नहीं जानते। हम तो बिल्कुल तुच्छ बुद्धि थे। अभी रचयिता और रचना के आदि मध्य अन्त को जाना है। हू इज हू...इस बेहद ड्रामा में सबसे मुख्य पार्टधारी कौन-कौन हैं। यह अविनाशी बना बनाया ड्रामा है। गाते भी हैं बनी बनाई बन रही.. गायन भक्ति मार्ग में करते हैं। परन्तु यह अभी समझाया जाता है कि यह ड्रामा का खेल कैसे बना हुआ है।

बाप बैठ समझाते हैं लाडले बच्चे यह तो तुम जान गये हो कि तुमको यात्रा पर चलना है। मनुष्य यात्रा पर बहुत कष्ट सहन करके जाते हैं। अभी तो एरोप्लेन ट्रेन आदि बहुत सहज निकली हैं। आगे तो मनुष्य पैदल यात्रा पर जाते थे। चलते-चलते तूफान लगते थे। मनुष्य बेहाल हो जाते थे। फिर कोई वापिस लौट आते थे। तो आधाकल्प, द्वापर से लेकर जिस्मानी यात्रा चलती है। भक्ति मार्ग में मनुष्य यात्रा पर क्यों जाते हैं? भगवान को ढूढँने। भगवान कहीं बैठा तो नहीं है। भगवान के जड़ चित्र पूजे जाते हैं। जो होकर जाते हैं उनके जड़ चित्र बनाते हैं। चैतन्य में तो भगवान मिल न सके। शिवलिंग आदि यह सब जड़ चित्र हैं। जड़ चित्रों को देखने के लिए यात्रा करते हैं। यह एक भक्ति मार्ग की रसम है। जानते हैं परन्तु कोई की भी बायोग्राफी को नहीं जानते कि यह कौन हैं, कब आये थे? शिव जयन्ती मनाई जाती है, परन्तु उनको भी जानते नहीं। आजकल तो इस उत्सव को भी उड़ा दिया है क्योंकि इनका नाम रूप आदि प्राय:लोप होना ही है। अभी तुम जानते हो ऊंचे ते ऊंच ज्ञान का सागर, सुख का सागर है। सागर से अभी हमको ज्ञान मिल रहा है। वही बेहद का बाप अभी प्रैक्टिकल में है। अमरनाथ भी शिवबाबा है ना। दिखाते हैं बर्फ का लिंग बन जाता है। मनुष्यों को ठगने के लिए गपोड़े तो बहुत लगाये हैं। तो उस जिस्मानी यात्रा पर तकलीफ बहुत होती है। यह है रूहानी यात्रा, इसमें शरीर की कोई तकलीफ नहीं है। तुम बच्चे समझते हो हम बेहद के बाप के बच्चे हैं। भक्ति मार्ग में जन्म-जन्मान्तर याद करते आये हैं। अब स्मृति आई है। बाप कहते हैं तुम 63 जन्म ढूढँते-ढूँढते उतरते गये। पहले एकदम कड़ी नौधा भक्ति करते हैं। फिर भी दुनिया को तमोप्रधान तो जरूर होना है। झाड वृद्धि को पाता है जरूर। एक भी मनुष्य वापिस मेरे पास आ नहीं सकते। नाटक में सबको अपना पार्ट बजाना है। सतो रजो तमो में आना है। नम्बरवन का ही मिसाल लो। नम्बरवन लक्ष्मी-नारायण सतोप्रधान थे, अब तमोप्रधान हैं। जिसमें ही फिर शिवबाबा ने प्रवेश किया है क्योंकि इनको ही फिर नम्बरवन बनना है। फिर पलस में मॉ को रखते हैं। माताओं को लिफ्ट देनी होती है। पहले लक्ष्मी फिर नारायण, माताओं का नाम ऊंचा किया जाता है। माता सदैव पतिव्रता होती है। पुरुष कभी पत्नीव्रता नहीं होते हैं। वन्दे मातरम् कहा जाता है। इस समय तुम बाप के बने हो। तो तुम हो जाते हो ब्रह्माकुमार कुमारी। माता गुरू बिगर कभी किसका उद्धार होता नहीं। गुरू तो बहुत ढेर के ढेर हैं। फिर भी कलियुग घोर अन्धियारा हो गया है। कितने गुरू गोसाई हैं। कहाँ-कहाँ हरिद्वार आदि में उन्हों के मन्दिर बने हुए हैं। नहीं तो वास्तव में मन्दिर उनको कहा जाता है जिसमें देवतायें होते हैं। सन्यासी लोगों का कभी मन्दिर नहीं होता है। मन्दिरों में तो देवतायें ही रहते हैं क्योंकि उन्हों की आत्मा और शरीर दोनों पवित्र हैं। इन महात्माओं की भल आत्मा पवित्र है, परन्तु शरीर पवित्र मिल नहीं सकता क्योंकि तत्व भी तमोप्रधान हैं। अभी तुम देवता बन रहे हो। बनाने वाला है परमपिता परमात्मा। यह है सतोप्रधान सन्यास। वह है रजोप्रधान सन्यास। यह बाप के सिवाए कोई सिखला न सके। तो बाबा ने समझाया है कि वह है जिस्मानी यात्रा, यह है रूहानी यात्रा। इसमें कर्मेन्द्रियों का कोई काम नहीं, कुछ भी तकलीफ की बात नहीं है। बहुत सहज है। वह जिस्मानी यात्रा अनेक प्रकार की है। यह रूहानी यात्रा एक ही है। यह है राजाई के लिए यात्रा। यह लक्ष्मी-नारायण का चित्र सामने खड़ा है, दुनिया थोड़ेही जानती है कि इन्हों ने यह राजयोग की यात्रा कर यह पद पाया है। तुम बच्चे जानते हो इन्हों ने यह प्रालब्ध कैसे पाई। कोई ऊपर से नई आत्मायें तो नहीं आई, जिनको भगवान ने राजाई दे दी। नहीं। इन्हों को पुराने से नया बनाया हुआ है जिसको रिज्युवनेट वा काया कल्पतरू कहा जाता है। तो बाप बैठ समझाते हैं इन्होंने रूहानी यात्रा की थी। राजयोग बल की यात्रा से यह बने। बाप राजयोग और ज्ञान सिखाने आते हैं तो अब तुम्हारी यात्रा चल रही है। तुम बैठे हुए अथवा चलते फिरते उठते बैठते यात्रा पर हो। तुम सिर्फ बुद्धि से बाप को याद करते हो। याद से ही दौड़ी पहनते हो और तुम्हारे विकर्म विनाश होते हैं। जितना जल्दी विकर्म विनाश होंगे उतना जल्दी बाप के गले का हार बनेंगे। तुम अब वह 4 धाम आदि नहीं करते हो। वह सब भक्तिमार्ग के जिस्मानी तीर्थों पर जाए वहाँ से फिर लौट आकर घर में विकर्मी बनते हैं। जितना समय यात्रा पर रहते हैं, उतना समय निर्विकारी रहते हैं। आजकल तो हरिद्वार में जाकर देखो पण्डे लोग बड़े गन्दे रहते हैं। लोग यात्रा पर जाते हैं तो पवित्र रहते हैं और वहाँ के रहवासी पण्डे लोग अपवित्र रहते हैं। तुम्हारी यात्रा कितनी स्वच्छ है। कुछ भी धक्का आदि नहीं खाना है। बाबा कहते हैं लाडले बच्चे उठते बैठते चलते फिरते सिर्फ मुझे याद करो। यह आत्माओं से बात कर रहे हैं। आत्मा इन आरगन्स द्वारा सुनती है। आत्मा मुख से बोलती है, आंखों से देखती है। आत्मायें इन आंखों से दिखाई नहीं पड़ती, न परमात्मा दिखाई पड़ता। दोनों को दिव्य दृष्टि बिगर देखा नहीं जा सकता है। समझा जाता है तब कहते हैं हमारे में आत्मा है। हमारी आत्मा दु:खी है। हमारी आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा जाकर लेती है। आत्मा बोलती है ना। परमात्मा भी आत्मा से बात करते हैं - हे लाडले बच्चे, आत्मायें अब तुमको मेरे पास आना है। मैं तुमको यात्रा सिखलाता हूँ। तुम पवित्र बनने सिवाए मेरे पास आ नहीं सकते हो। आत्मा पवित्र है। पहले-पहले आत्मा सतोप्रधान है फिर सतो रजो तमो गुणी होती है। शरीर भी सतो रजो तमो होता है। सतोप्रधान को गोरा, तमोप्रधान को सांवरा कहा जाता है। कितनी समझ की बात है। तुम जानते हो आत्मा और परमात्मा अलग रहे बहुकाल....अब आकर फिर मिले हैं। मनुष्य, मनुष्य के साथ मिलेंगे। आत्मा, आत्माओं के साथ मिलेगी। परमात्मा भी वहाँ मिलेंगे। आत्मा और परमात्मा दोनों का साक्षात्कार दिव्य दृष्टि से होता है क्योंकि वह अति सूक्ष्म है, स्टार है। अब कोई भी साइन्स घमण्डी नहीं जो कह सके आत्मा की प्रवेशता कैसे होती है। इन बातों का उनको बिल्कुल पता नहीं है। मोस्ट बिलवेड बाप है। भक्ति मार्ग में आधाकल्प भक्त भगवान को याद करते हैं। ऐसे नहीं कि सब भगवान हैं। सब भगवान हों तो भक्त आराधना, वन्दना, साधना क्यों करते, किसलिए करते? सभी मुक्ति जीवनमुक्ति चाहते हैं क्योंकि यहाँ दु:खी हैं, चाहते हैं शान्ति हो। परन्तु बिचारों को यह पता नहीं है कि शान्तिधाम किसको कहा जाता है, मुक्ति कहाँ होती है। यह भी नहीं जानते। कहने मात्र सिर्फ कह देते हैं कि पार निर्वाण गया। जानते कोई भी नहीं हैं।

अब तुम बच्चे यात्रा पर हो। बाप कहते हैं बच्चे सम्भल-सम्भल कर चलना है। तूफान तो बहुत आयेंगे। तुम याद करने की कोशिश करेंगे, माया बुद्धियोग तोड़ देगी। फिर वह अवस्था ठण्डी हो जाती है। खुशी का पारा हट जाता है। नहीं तो खुशी का पारा स्थाई रहना चाहिए। इन आंखों से वह राजाई देखते हैं तो खुशी कायम रहती है। यहाँ तुम बुद्धियोग से जानते हो कि राजाई मिलती है। राजाई के लिए हम पढ़ रहे हैं। इन आंखों से नहीं देखते हो इसलिए माया घड़ी-घड़ी भुला देती है। बाबा कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान रहो। पुरानी दुनिया, पुराने शरीर सबसे ममत्व तोड़ते जाओ। एक बाप को याद करो। पहले तुमको बाप के पास जाना है फिर नई दुनिया में आना है। बाप और वर्से को याद करो फिर जब हम यहाँ आयेंगे तो वह होगी प्रालब्ध। उसको याद नहीं करेंगे। अभी हम पुरुषार्थ करते हैं भविष्य प्रालब्ध पाने के लिए। यहाँ मनुष्य पुरुषार्थ करते हैं यहाँ की आजीविका के लिए। हम भविष्य की आजीविका के लिए पुरुषार्थ करते हैं। गृहस्थ व्यवहार में रहते फिर यह कोर्स भी उठाना है। नॉलेज को धारण करना है, फिर तुमको पुरुषार्थ नहीं करना होगा। वहाँ तुम पुरुषार्थ नहीं करते प्रालब्ध भोगते हो। तुम जानते हो हम भविष्य बनाते हैं वहाँ प्रालब्ध भोगेंगे। वहाँ याद नहीं रहती कि हम प्रालब्ध भोगते हैं। फिर तो पुरुषार्थ भी याद पड़े। पुरुषार्थ और प्रालब्ध दोनों ही भूल जाते हैं। प्रालब्ध भोगते रहते हैं, पास्ट का पता नहीं रहता। अभी तुम पास्ट, प्रेजन्ट, फ्युचर को जानते हो और कोई मनुष्य नहीं जो पास्ट, प्रेजन्ट फ्युचर को जानते हो। इसको कहा जाता है त्रिकालदर्शी।

बाबा ने रूहानी यात्रा और जिस्मानी यात्रा का कान्ट्रास्ट भी अच्छी रीति समझाया है। जिस्मानी यात्रा जन्म-जन्मान्तर करते आये, यह रूहानी यात्रा है एक जन्म की। स्वर्ग में जायेंगे फिर लौटकर इस मृत्युलोक में आना नहीं है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे स्वदर्शन चक्रधारी बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सतोप्रधान सन्यास से आत्मा और शरीर दोनों को पवित्र बनाना है। पुरानी दुनिया और पुराने शरीर से ममत्व तोड़ देना है।
2) त्रिकालदर्शी बन पास्ट, प्रेजन्ट, फ्युचर को बुद्धि में रख पुरुषार्थ करना है। नॉलेज को धारण कर स्थाई खुशी में रहना है।
वरदान:-
अपने चेहरे रूपी दर्पण द्वारा मन की शक्तियों का साक्षात्कार कराने वाले योगी तू आत्मा भव |
जो मन में होता है उसकी झलक मस्तक पर जरूर आती है। ऐसे नहीं समझना कि मन में तो हमारे बहुत कुछ है। लेकिन मन की शक्ति का दर्पण चेहरा अर्थात् मुखड़ा है। कितना भी आप कहो हमारा योग तो बहुत अच्छा है, हम सदा खुशी में नाचते हैं लेकिन चेहरा उदास देख कोई नहीं मानेगा। "पा लिया" इस खुशी की चमक चेहरे से दिखाई दे। खुश्क चेहरा नहीं दिखाई दे, खुशी का चेहरा दिखाई दे, तब कहेंगे योगी तू आत्मा।
स्लोगन:-
जब सरल स्वभाव, सरल बोल, सरलता सम्पन्न कर्म हों तब बाप का नाम बाला कर सकेंगे।
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