Saturday, 17 March 2018

18-03-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज: 11-05-83 मधुबन


18-03-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति अव्यक्त-बापदादारिवाइज: 11-05-83 मधुबन


"हे युवकों विश्व परिवर्तन के कार्य में निमित्त बनो"
आज बापदादा हंस आसनधारी होलीहंसों की सभा देख रहे हैं। हर एक श्रेष्ठ आत्मा होलीहंस सदा एक बाप दूसरा न कोई, इसी लगन में मगन आत्मायें - यही स्थिति हंस आसन है। ऐसे होलीहंसों को देख बापदादा भी हर्षित होते हैं। 

हर होलीहंस ज्ञानी तू आत्मा, योगी तू आत्मा, विश्व कल्याणकारी है। हर एक के दिल में दिलाराम बाप की याद समाई हुई है। हर एक अपने वर्तमान और भविष्य को बनाने में लगन से लगे हुए हैं। ऐसा श्रेष्ठ संगठन सारे कल्प में सिवाए संगमयुग के कभी नहीं देख सकते। एक ही परिवार, एक ही लगन, एक ही लक्ष्य, ऐसा फिर कभी देखेंगे? बापदादा को भी बच्चों पर नाज़ है। इतना बड़ा परिवार वा संगठन और हरेक श्रेष्ठ बाप के बच्चे बनने कारण बाप के वर्से के अधिकारी हैं। तो इतने सब अधिकारी बच्चों को देख बाप को भी खुशी है। यह एक एक बच्चा कुल का दीपक है। विश्व परिवर्तन करने के निमित्त आत्मा है। हर एक चमकता हुआ सितारा विश्व को रोशनी देने वाला है। हर एक के भाग्य की अविनाशी लकीर मस्तक पर दिखाई दे रही है। ऐसा श्रेष्ठ संगठन विश्व में एक मत, एक राज्य, एक धर्म की स्थापना करने के दृढ़ संकल्पधारी है। बापदादा युवा-वर्ग को देख रहे थे। चाहे कुमार हैं, चाहे कुमारी हैं लेकिन हरेक के मन में उमंग-उत्साह है कि हम सभी अपने विश्व को वा देश को वा सुख शान्ति के लिए भटकती हुई आत्माओं अर्थात् अपने भाई बहनों को सुख और शान्ति का अधिकार अवश्य दिलायेंगे। अपने विश्व को फिर से सुख शान्तिमय संसार बनायेंगे। यही दृढ़ संकल्प है ना। इतना बड़ा संगठन क्या नहीं कर सकता है! एक तो श्रेष्ठ आत्मायें, पवित्र आत्मायें हो तो पवित्रता की शक्ति है, दूसरा - मास्टर सर्वशक्तिवान होने के कारण सर्वशक्तियाँ साथ हैं। संगठन की शक्ति है, साथ-साथ त्रिकालदर्शी होने के कारण जानते हो कि अनेक बार हम विश्व परिवर्तक बने हैं इसलिए कल्प-कल्प के विजयी होने के कारण अब भी विश्व परिवर्तन के कार्य में विजय निश्चित है। होंगे या नहीं होंगे, यह क्वेश्चन ही नहीं है। निश्चयबुद्धि विजयी - ऐसे अनुभव करते हो ना कि सुख का संसार अभी आया कि आया। विश्व के मालिकों को विश्व का राज्य निश्चित ही प्राप्त हुआ पड़ा है। युवा वर्ग क्या करेगा? अपने देश के वा विश्व के राज्य नेताओं को यह खुशखबरी सुनाओ, जिस बात के आप स्वप्न देख रहे हो कि ऐसा होना चाहिए, वह चाहिए की चाह हम पूर्ण कर दिखायेंगे। देश से सिर्फ एक महँगाई नहीं लेकिन डबल मँहगाई मिटाकर दिखायेंगे, क्योंकि महँगाई का आधार है चरित्र की मँहगाई। जब चरित्र की महँगाई वा चरित्र के दु:ख अशान्ति की गरीबी मिट जायेगी तब स्वत: ही सर्व आत्मायें धनवान तो क्या लेकिन राज्य अधिकारी बन जायेंगी। यही शुभ उम्मीदें विश्व की निमित्त आत्माओं को पूर्ण कर दिखाओ। अपने देश को श्रेष्ठ बनाकर दिखायेंगे, ऐसा माला-माल बनायेंगे जो न कोई अप्राप्ति हो और न अप्राप्ति के कारण सर्व समस्याये हों। यही दृढ़ संकल्प सभी को सिर्फ सुनाओ नहीं लेकिन परिवर्तन का सैम्पुल बनकर दिखाओ क्योंकि सब तरफ से विश्वास दिलाने के नारे सबने बहुत सुने हैं। इतने सुने हैं जो सुनकर विश्वास ही निकल गया है। ऐसे कहने वाले बहुत देख-देख सत्य को भी धोखा समझ रहे हैं इसलिए सिर्फ कहना नहीं है, मुख बोले नहीं। लेकिन आपके जीवन की श्रेष्ठता बोले। आप एक-एक होलीहंस की पवित्रता की झलक चलन से दिखाई दे। आप सबकी श्रेष्ठ स्मृति की समर्थी ना उम्मींद आत्माओं में उम्मीदों की समर्थी पैदा करे। समझा - युवा वर्ग को क्या करना है।
जो आज के नेतायें युवा वर्ग से विनाशकारी कर्तव्यों के कारण घबराते हैं। तो आप सभी विश्व कल्याणकारी उन्हों को यह सिद्ध करके दिखाओ कि इसी देश के हम युवा वर्ग अपने भारत देश को विश्व में सर्वश्रेष्ठ स्वर्ग का स्थान बनाए विश्व को दिखायेंगे कि भारत ही प्राचीन अविनाशी, सर्व सम्पन्न, सर्वश्रेष्ठ देश है। भारत विश्व के लिए आध्यात्मिक रोशनी देने का लाइट हाउस है क्योंकि इस श्रेष्ठ कर्तव्य के कराने वाला कौन है, उसकी पहचान कर लें फिर तो कोई क्वेश्चन उठने की बात ही नहीं। अपने जीवन से, कर्तव्य से, बाप का परिचय कराओ। इतनी हिम्मत है ना। कुमारियाँ क्या समझती हैं? जब दुर्गा की पूजा करते हैं तो अपने को भाग्यवान समझते हैं। यहाँ कितनी दुर्गायें हैं! एक-एक शिव शक्ति कमाल कर दिखाने वाली है ना। वो ही हो ना जिन शक्तियों की घर-घर में पूजा कर रहे हैं। तो हे शिव शक्तियाँ! अपने भक्तों को फल तो दो। वो बेचारे फल चढ़ाते-चढ़ाते थक गये हैं। इतने जो फल चढ़ाये हैं उसका रिटर्न भक्ति का फल तो उन्हों को देंगी ना। भक्तों पर तरस नहीं आता। पाण्डवों की भी पूजा हो रही है। आजकल एक महावीर हनुमान की बहुत पूजा होती है और दूसरा विघ्न-विनाशक गणेश की पूजा हो रही है। सब शक्ति की इच्छा से ही भक्ति कर रहे हैं। ऐसे भक्त आत्माओं को सर्व शक्तियों का फल दो। सदा के लिए विघ्नों से पार करने का सहज रास्ता बताओ। सभी पुकार से छुड़ाए प्राप्ति स्वरूप बनाओ - ऐसी सेवा युवा वर्ग करके दिखाओ। समझा। अच्छा!
सदा अपने श्रेष्ठ जीवन द्वारा अनेकों की जीवन बनाने वाले, सर्व भारतवासियों की श्रेष्ठ, सुखी संसार की शुभ कामना पूर्ण करने वाले, घर-घर में श्रेष्ठ चरित्र का दीपक जगाने वाले, सदा अप्राप्त आत्माओं को प्राप्ति कराने वाले - ऐसे दृढ़ संकल्पधारी निश्चित विजयी श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
कुमारों में सदा बापदादा की उम्मीदें हैं। कुमार विश्व को बदल सकते हैं। अगर सभी कुमार एक दृढ़ संकल्प वाले बन आगे बढ़ते चलें तो बहुत कमाल कर सकते हैं। कमाल करने वाले कुमार हो ना। देखना, बापदादा के पास आटोमेटिक फोटो निकल जाता है। दृढ़ संकल्प वाले कुमार हो ना! कुमारों में शारीरिक शक्ति भी बहुत है इसलिए डबल कार्य कर सकते हो। स्थापना के कार्य में बहुत अच्छे सहयोगी बन सकते हो। कुमारों की बुद्धि में एक ही बात सदा रहती है ना कि मेरा बाबा और मेरी सेवा और कोई बात नहीं। जिनकी बुद्धि में सदा बाबा और सेवा है वह सहज ही मायाजीत बन जाते हैं। सिर्फ कुमारों को एक बात अटेन्शन में रखनी है - सदा अपने को बिजी रखो, खाली नहीं। शरीर और बुद्धि दोनों से बिजी रहो। बिजी मैन बनो, बिजनेसमैन नहीं। जैसे कर्म की दिनचर्या सेट करते हो ऐसे बुद्धि की भी दिनचर्या सेट करो। अभी यह सोचना है, यह करना है, दिनचर्या सेट होगी तो उसी प्रमाण बिजी हो जायेंगे। बिजी रहने वाले को किसी भी रूप से माया वार नहीं कर सकती। बुद्धि को बिजी करने के साधन सदा अपनाओ - जैसे शरीर को बिजी करने के साधन हैं, ऐसे बुद्धि से सदा याद में, नशे में बिजी रहो। ऐसी दिनचर्या बनाने आती है? सदाकाल के लिए नियम बना दो। जैसे और नियम बने हैं, यह भी एक नियम बनाओ, बस करना ही है, इसी दृढ़ निश्चय से जो कमाल करने चाहो वह कर सकते हो। कुमार हैं बापदादा के कर्तव्य के सितारे। सेवा के निमित्त तो कुमार बनते हैं ना। भागदौड़ भी कुमार करते हैं। जो भी सेवायें होती हैं उसमें कुमारों का विशेष पार्ट होता है - तो विशेष पार्ट लेने वाली विशेष आत्मायें हैं, यह नशा रखो, इसी खुशी में रहो। तो देखेंगे कुमार ग्रुप क्या करके दिखाते हैं। कुछ करके दिखाना, सिर्फ कहकर नहीं। सेवा के उमंग उत्साह वाले हैं, निश्चय बुद्धि हैं। अचल हैं, हिलने वाले नहीं हैं। ऐसे ही अचल आत्मायें औरों को भी अचल बनाकर दिखाओ।
महादानी बनकर दान करते चलो। जब स्वयं का भण्डारा भरपूर है तो बहुतों को दान देना चाहिए। सेवा को सदा आगे बढ़ाते चलो। ऐसे नहीं आज चांस मिला तो कर लिया, या जब चांस मिलेगा तब कर लेंगे। नहीं। जिसके पास खजाना होता है वह कहीं से भी गरीबों को ढूँढकर भी ढिंढोरा पिटवाकर भी दान जरूर करता है क्योंकि उसे मालूम है दान करने का पुण्य मिलता है। वह दान तो विनाशी है और स्वार्थ का भी हो सकता है। आप सब तो अविनाशी खज़ानों के महादानी हो। तो सेवा को बढ़ाओ। रेस करो, महादानी बनो। निश्चय से करो, ऐसे नहीं सोचो धरनी ऐसी है। अब समय बदल गया, समय के साथ धरनी भी बदल रही है। पहले के धरनी की जो रिजल्ट थी, वह अभी नहीं। समय वायुमण्डल को बदल रहा है। आत्माओं की इच्छा भी बदल रही है, सब आवश्यकता अनुभव कर रहे हैं। अभी समय है, समय के प्रमाण सदा के महादानी बनो। वाचा नहीं तो मंसा, मंसा नहीं तो कर्मणा। कर्म द्वारा किसी आत्मा को परिवर्तन करना, यह है कर्मणा। सम्पर्क द्वारा भी किसी आत्मा को परिवर्तन कर सकते हो। ऐसे सेवाधारी बनो। रोज़ रिजल्ट निकालो मंसा, वाचा, कर्मणा क्या सेवा की, कितनों की सेवा की। किस उमंग-उत्साह से सेवा की। यह रोज़ की रिजल्ट स्वयं ही निकालो। स्वयं और सेवा दोनों की रफ्तार में आगे बढ़ो। अब कोई नवीनता करो। सेन्टर खोला, गीता पाठशाला खोली, मेला किया.. यह तो पुरानी बातें हो गई, नया कुछ निकालो। लक्ष्य रखो, अपने में और सेवा में कोई न कोई नवीनता जरूर लानी है। नहीं तो कभी थक जायेंगे, कभी बोर हो जायेंगे। नवीनता होगी तो सदा उमंग उत्साह में रहेंगे। अच्छा!
माताओं से:- माताओं के लिए विशेष बापदादा सहज मार्ग की सौगात लाये हैं। सहज मार्ग की सौगात सभी को मिली है। सहज प्राप्ति जो होती है यही सौगात है। तो खास बापदादा सहज मार्ग की गिफ्ट लाये हैं - यही नशा रहे। सबसे सहज "मेरा बाबा" कहो बस। मेरा बाबा कहने से अनुभव करने से सर्व प्राप्तियाँ हो जायेंगी। माताओं को विशेष खुशी होनी चाहिए कि हमारे लिए खास बाप आये हैं। और जो भी आये उन्होंने पुरुषों को आगे किया। धर्म पितायें धर्म स्थापन करके चले गये। माताओं को किसी ने भी नामीग्रामी नहीं बनाया। और बाप ने "पहले माता" का सिलसिला स्थापन किया। तो मातायें सिकीलधी हो गई ना। कितने सिक से बाप ने ढूंढा और अपना बना लिया। आप लोगों ने तो बिना एड्रेस ढूंढा इसलिए ढूंढना नहीं हुआ। बाप ने देखो कैसे कोने-कोने से ढूंढकर निकाल लिया। अनेक वृक्षों की डालियाँ अब एक वृक्ष की हो गई। एक ही चन्दन का वृक्ष हो गया। लोग कहते हैं - दो चार मातायें भी एक साथ इकट्ठी नहीं रह सकतीं और अभी मातायें सारे विश्व में एकता स्थापन करने के निमित्त हैं। वह कहते, रह नहीं सकतीं और बाप कहते मातायें ही रह सकती हैं। ऐसी माताओं का विशेष मर्तबा है। खूब खुशी में नाचो गाओ, वाह! हमारा श्रेष्ठ भाग्य! कभी भी दु:ख की लहर न आये। सभी ने दु:खधाम को छोड़ दिया है ना। बस हम संगमयुगी हैं, सदा सुखधाम शान्तिधाम तरफ आगे बढ़ते रहना। माताओं को देखकर बापदादा को नाज होता है, ना-उम्मींदवार उम्मींदवार बन गई। विश्व कल्याणकारी बन गई। अभी विश्व आपकी तरफ देख रहा है, कि हमारा कल्याण करने वाली मातायें कहाँ हैं, तो अब जगत की मातायें बन जगत का कल्याण करो। सिर्फ लौकिक परिवार की जिम्मेवारी निभाने वाली नहीं लेकिन विश्व के सर्व आत्माओं के सेवा की जिम्मेवारी निभाने वाली। चाहे निमित्त कहाँ भी रहते हो लेकिन स्मृति में विश्व सेवा रहे। जैसा लक्ष्य होगा वैसे लक्षण स्वत: आ जाते हैं। लक्ष्य होगा बेहद का तो लक्षण भी बेहद के आयेंगे। नहीं तो हद में ही फँसे रहेंगे। सदा बाप की हूँ, बेहद की हूँ, इसी स्मृति में सर्व आत्माओं के प्रति शुभ संकल्प द्वारा सेवा करते चलो। दोनों साथ-साथ हों। मुख द्वारा किसको भल समझाओ लेकिन जब तक शुभ भावना का बल उस आत्मा को नहीं देंगे तो फल नहीं निकलेगा। मंसा वाचा दोनों इकट्ठी सेवा हों। सिर्फ सन्देश देने तक नहीं। नहीं तो सिर्फ हाँ-हाँ करके चले जाते हैं। मंसा सेवा साथ-साथ हो तो तीर लग जाए। माताओं को सेवा के मैदान पर आना चाहिए। एक-एक माता एक-एक सेवाकेन्द्र सम्भाले। अगर फुर्सत नहीं है तो आपस में दो तीन का ग्रुप बनाओ। ऐसे नहीं घर का बन्धन है, बच्चे हैं। जिनकी मातायें सोशलवर्कर होती हैं उनके भी तो बच्चे होते हैं ना। वह भी सीख जाते हैं। तो अब अपने आपको हैन्डस बनाओ और सेवा को बढ़ाओ। कोई न कोई को निकालकर उनको स्थान दे आगे बढ़ते जाओ। अभी शक्तियाँ मैदान पर आओ। जो पालना ली है उसका रिटर्न दो। जितना सेवा बढ़ायेंगे उतना स्वयं को भी उसका फल मिलेगा, वर्तमान भी शक्तिशाली होगा और भविष्य तो बनता ही है। जितनी सेवा करेंगे उतना निर्विघ्न रहेंगे और खुशी भी रहेगी। अच्छा!
कुमारियों से:- कुमारियाँ अपने श्रेष्ठ भाग्य को अच्छी तरह से जानती हैं ना? कभी अपने श्रेष्ठ भाग्य को भूलती तो नहीं! सदा भाग्य को स्मृति में रखते हुए आगे बढ़ती चलो। संगमयुग में विशेष लिफ्ट की गिफ्ट कुमारियों को मिलती है क्योंकि कुमारी जीवन फिकर से फारिग जीवन है। घर चलाने का, नौकरी टोकरी का कोई फिकर नहीं। कुमारी अर्थात् स्वतंत्र। स्वतंत्रता सभी को प्रिय लगती है। अज्ञान में भी सबका लक्ष्य यही रहता कि हम स्वतंत्र रहें इसलिए स्वतंत्र आत्मा हूँ, यह स्वतंत्रता का वरदान आप सबको प्राप्त है। स्वतंत्रता के वरदानी और सबको भी यही वरदान देंगी ना। कोई के भी चक्र में फँसने वाली नहीं। जब चक्र से निकल चुकी, स्वतंत्र हैं तो सेवा करेंगी ना। निमित्त मात्र यह पढ़ाई जो रही है वह करते भी सदा सेवा की स्मृति रहे। पढ़ाई पढ़ते समय भी यह लक्ष्य रहे कि कौनसी ऐसी आत्मा है जिसे बाप का बनायें। पढ़ाई पढ़ते-पढ़ते परखते रहो कि कौन सी आत्मायें योग्य हैं। तो वहाँ भी सेवा हो जायेगी। कुमारियों को भाषण करना अवश्य सीखना चाहिए। सभी पढ़ाई पढ़ते भी तैयार होती जाओ। पढ़ाई पूरी होते ही सेवा में लग जाना। अच्छा।
वरदान:
दिल के स्नेह और संबंध के आधार पर समीपता का अनुभव करने वाले निरन्तर योगी भव
ब्राह्मण आत्माओं में कोई दिल के स्नेह, सम्बन्ध से याद करते हैं और कोई दिमाग अर्थात् नॉलेज के आधार पर संबंध को अनुभव करने का बार-बार प्रयत्न करते हैं। जहाँ दिल का स्नेह और संबंध अति प्यारा अर्थात् समीप है वहाँ याद भूलना मुश्किल है। जैसे शरीर के अन्दर नस-नस में ब्लड समाया हुआ है ऐसे आत्मा में निश-पल अर्थात् हर पल याद समाई हुई है, इसको कहते हैं दिल के स्नेह सम्पन्न निरन्तर याद।
स्लोगन:
नि:स्वार्थ और निर्विकल्प स्थिति से सेवा करो तब सफलता मिलेगी।
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