Saturday, 3 March 2018

04-03-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 14-04-83 मधुबन



04-03-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 14-04-83 मधुबन


सम्पन्न आत्मा सदा स्वयं और सेवा से सन्तुष्ट
आज दूर देशवासी बच्चों से मिलने के लिए बच्चों के साकारी लोक में साकार का आधार ले बच्चों को और इस साकारी पुरानी दुनिया को भी देख रहे हैं। पुरानी दुनिया अर्थात् हलचल की दुनिया। बापदादा हलचल के दुनिया की रौनक देख बच्चों की अचल स्थिति को देख रहे थे। 

यह सब हलचल के नज़ारे साक्षी हो देखते हैं। खेल में यह नज़ारे और ही अपना अचल स्वीट होम और अपनी निर्विघ्न स्वीट राजधानी याद दिलाते हैं। स्मृति आती है कि हमारा घर, हमारा राज्य क्या था और अब भी क्या राज्य आने वाला है और घर जाने वाले हैं। आज बापदादा यह दृश्य देख रूहरिहान कर रहे थे। यह सब हलचल की दुनिया में रह, यह दृश्य देखना कब तक? ब्रह्मा बाप को, बच्चों का यह थोड़ा बहुत सहन करने का दृश्य देख दिल में आता कि अभी से सभी को वतन में बुला लेवें। यह बात पसन्द है? उड़ सकेंगे? कोई रस्सियाँ आदि तो नहीं बांधी हुई हैं? किसी भी प्रकार के लगाव से पंख कमज़ोर तो नहीं हैं? लगाव से पंख कहाँ चिपके हुए तो नहीं हैं? अभी ऐसी तैयारी की हुई है? बापदादा तो सेकण्ड में उड़ेंगे और आप तैयारी करते-करते रह जाओ तो! तैयार तो हो ना! पहले तो दो बातें अपने से पूछनी पड़ें -
1-
एक तो सम्पूर्ण स्वतंत्र आत्मा हैं? अपने पुरूषार्थ की रफतार से अपने आप से सन्तुष्ट हैं? अपनी सन्तुष्टता के साथ-साथ स्वयं की श्रेष्ठ स्थिति का सर्व सम्पर्क वाली आत्माओं से सन्तुष्टता का रेसपान्ड मिलता है?
2-
दूसरी बात सेवा में स्वयं से सन्तुष्ट हैं? यथार्थ शक्तिशाली विधि का रिटर्न सिद्धि प्राप्त हो रही है? अपने राज्य की वैरायटी प्रकार की आत्माओं को जैसे राज्य अधिकारी रॉयल फैमली के अधिकारी, रॉयल प्रजा के अधिकारी और साधारण प्रजा के अधिकारी, सर्व प्रकार की आत्माओं को संख्या प्रमाण तैयार किया है? करावनहार बाप है लेकिन निमित्त करनहार बच्चों को ही बनाते हैं क्योंकि कर्म का फल प्रालब्ध मिलती है। निमित्त कर्म बच्चों को ही करना है। सम्बन्ध में ब्रह्मा बाप के साथ-साथ बच्चों को आना है। बाप तो न्यारा और प्यारा ही रहेगा। तो ऐसी चेकिंग करके फिर बताओ कि तैयार हो? कार्य को आधा में तो नहीं छोड़ना है ना! और बिना सम्पन्नता के आत्मा कर्मातीत हो बाप के साथ जा नहीं सकती है। समान वाले ही साथ जायेंगे। जाना तो साथ है या पीछे-पीछे आना है! शिव की बरात में तो नहीं आना है ना! अभी बताओ तैयार हो? या सोच रहे हो कि छू मंत्र का कुछ खेल हो जाए। शिव मंत्र ही छू मंत्र है। वह तो मिला हुआ है ना! ब्रह्मा बाप को बहुत ओना था कि बच्चों को तकलीफ हुई हो। तकलीफ हुई वा मनोरंजन हुआ? (आज बहुत वर्षा होने के कारण टेन्ट आदि सब गिर गये) टेन्ट हिला वा दिल भी हिली? दिल तो मजबूत है ना। क्या होगा, कैसे जायेंगे, यह हलचल तो नहीं है? कुछ तो नई चीज भी देखो ना! आबू की मानसून आप लोग तो कभी देखते नहीं हो। यह भी थोड़ा सा अनुभव हो रहा है। पहाड़ों की बारिश भी देखनी चाहिए ना। यह भी एक रमणीक दृश्य देखा। जल्दी भागने का संकल्प तो नहीं आता है ना। यह भी अच्छा है जो लास्ट दिन में तूफान आया है। कोई नई न्यूज़ तो जाकर सुनायेंगे ना कि क्या क्या देखा। सुनाने के समाचार में रमणीकता तो आयेगी ना! वैसे तो सब अचल हैं। अभी तो बहुत कुछ होना है। यह तो कुछ नहीं है। यह भी तत्वों के परिवर्तन की निशानियाँ हैं। इसको देख जैसे तत्वों की रफ्तार तेज जा रही है, ऐसे स्व-परिवर्तन की रफ्तार भी तीव्र हो। अच्छा।
ऐसे सदा स्व-परिवर्तन में तीव्रगति से चलने वाले, स्व की सम्पूर्णता से सेवा के कार्य की सम्पन्नता करने वाले, सदा साक्षीपन की स्थिति में स्थित रह हलचल के पार्ट को भी रमणीक पार्ट समझ अचल हो देखने वाले, ऐसे सदा शक्तिशाली श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

पार्टियों के साथ अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:-

1)
सदा साक्षीपन की स्थिति में स्थित रहते हुए ड्रामा के हर दृश्य को देखते हो? साक्षीपन की स्थिति सदा ड्रामा के अन्दर हीरो पार्ट बजाने में सहयोगी होती है। अगर साक्षीपन नहीं तो हीरो पार्ट बजा नहीं सकते। हीरो पार्टधारी से साधारण पार्टधारी बन जाते हैं। साक्षीपन की स्टेज सदा ही डबल हीरो बनाती है। एक हीरे समान बनाती है और दूसरा हीरो पार्टधारी बनाती है। साक्षीपन अर्थात् देह से न्यारे, आत्मा मालिकपन की स्टेज पर स्थित रहे। देह से भी साक्षी, मालिक। इस देह से कर्म कराने वाली, करने वाली नहीं। ऐसी साक्षी स्थिति सदा रहती है? साक्षी स्थिति सहज पुरूषार्थ का अनुभव कराती है? क्योंकि साक्षी स्थिति में किसी भी प्रकार का विघ्न या मुश्किलात नहीं सकती। यह है मूल अभ्यास। यही साक्षी स्थिति का पहला और लास्ट पाठ है क्योंकि लास्ट में जब चारों ओर की हलचल होगी, तो उस समय साक्षी स्थिति से ही विजयी बनेंगे। तो यही पाठ पक्का करो। अच्छा -
2)
सदा अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें समझते हो? संगमयुग श्रेष्ठ युग है, परिवर्तन युग है, आत्मा और परमात्मा के मिलन मेले का युग है। ऐसे संगमयुग की विशेषताओं को सोचो तो कितनी हैं! इन्हीं विशेषताओं की स्मृति में रह समर्थ बनो। जैसी स्मृति वैसा स्वरूप स्वत: बन जाता है। तो सदा ज्ञान का मनन करते रहो। मनन करने से शक्ति भरती है। अगर मनन नहीं करते, सिर्फ सुनते सुनाते तो शक्ति स्वरूप नहीं लेकिन सुनाने वाले स्पीकर बनेंगे। आप बच्चों के मनन का चित्र भक्ति में भी दिखाया है। कैसे मनन करो, वह चित्र याद है! विष्णु का चित्र नहीं देखा है? आराम से लेटे हुए हैं और मनन कर रहे हैं, सिमरण कर रहे हैं। सिमरण कर मनन कर हर्षित हो रहे हैं। तो यह किसका चित्र है? शैया देखो कैसी है! सांप को शैया बना दिया अर्थात् विकार अधीन हो गये। उसके ऊपर सोया है। नीचे वाली चीज़ अधीन होती है, ऊपर मालिक होते हैं। मायाजीत बन गये तो निश्चिंत। माया से हार खाने की, युद्ध करने की कोई चिन्ता नहीं। तो निश्चिन्त और मनन करके हर्षित हो रहे हैं। ऐसे अपने को देखो मायाजीत बने हैं! कोई भी विकार वार करे। रोज़ नई-नई प्वाइंट स्मृति में रख मनन करो तो बड़ा मज़ा आयेगा, मौज में रहेंगे क्योंकि बाप का दिया हुआ खजाना मनन करने से अपना अनुभव होता है। जैसे भोजन पहले अलग होता है, खाने वाला अलग होता है। लेकिन जब हज़म कर लेते तो वही भोजन खून बन शक्ति के रूप में अपना बन जाता है। ऐसे ज्ञान भी मनन करने से अपना बन जाता, अपना खज़ाना है - यह महसूसता आयेगी।
3)
सभी अपने को सदा श्रेष्ठ आत्मा समझते हो? श्रेष्ठ आत्मा अर्थात् हर संकल्प, बोल और कर्म सदा श्रेष्ठ हो क्योंकि साधारण जीवन से निकल श्रेष्ठ जीवन में गये। कलियुग से निकल संगमयुग पर गये। जब युग बदल गया, जीवन बदल गई, तो जीवन बदला अर्थात् सब कुछ बदल गया। ऐसा परिवर्तन अपने जीवन में देखते हो? कोई भी कर्म, चलन साधारण लोगों के मुआफिक हो। वे हैं लौकिक और आप अलौकिक। तो अलौकिक जीवन वाले लौकिक आत्माओं से न्यारे होंगे। संकल्प को भी चेक करो कि साधारण है वा अलौकिक है? साधारण है तो साधारण को चेक करके चेन्ज कर लो। जैसे कोई चीज़ सामने आती है तो चेक करते हो यह खाने योग्य है, लेने योग्य है, अगर नहीं होती तो नहीं लेते, छोड़ देते हो ना! ऐसे कर्म करने के पहले कर्म को चेक करो। साधारण कर्म करते-करते साधारण जीवन बन जायेगी फिर तो जैसे दुनिया वाले वैसे आप लोग भी उसमें मिक्स हो जायेंगे। न्यारे नहीं लगेंगे। अगर न्यारापन नहीं तो बाप का प्यारा भी नहीं। अगर कभी-कभी समझते हो कि हमको बाप का प्यार अनुभव नहीं हो रहा है तो समझो कहाँ न्यारेपन में कमी है, कहाँ लगाव है। न्यारे नहीं बने हो तब बाप का प्यार अनुभव नहीं होता। चाहे अपनी देह से, चाहे सम्बन्ध से, चाहे किसी वस्तु से...स्थूल वस्तु भी योग को तोड़ने के निमित्त बन जाती है। सम्बन्ध में लगाव नहीं होगा लेकिन खाने की वस्तु में, पहनने की वस्तु में लगाव होगा, कोई छोटी चीज़ भी नुकसान बहुत बड़ा कर देती है। तो सदा न्यारापन अर्थात् अलौकिक जीवन। जैसे वह बोलते, चलते, गृहस्थी में रहते ऐसे आप भी रहो तो अन्तर क्या हुआ! तो अपने आपको देखो कि परिवर्तन कितना किया है! चाहे लौकिक सम्बन्ध में बहू हो, सासू हो, लेकिन आत्मा को देखो। बहू नहीं है लेकिन आत्मा है। आत्मा देखने से या तो खुशी होगी या रहम आयेगा। यह आत्मा बेचारी परवश है, अज्ञान में है, अंजान में है। मैं ज्ञानवान आत्मा हूँ तो उस अंजान आत्मा पर रहम कर अपनी शुभ भावना से बदलकर दिखाऊंगी। अपनी वृत्ति, दृष्टि चेन्ज चाहिए। नहीं तो परिवार में प्रभाव नहीं पड़ता। तो वृत्ति और दृष्टि बदलना ही अलौकिक जीवन है। जो काम अज्ञानी करते वह आप नहीं कर सकते हो। संग का रंग आपको लग जाए। अपने को देखो मैं ज्ञानी आत्मा हूँ, मेरा प्रभाव अज्ञानी पर पड़ता है, अगर नहीं पड़ता तो शुभ भावना नहीं है। बोलने से प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन सूक्ष्म भावना जो होगी उसका फल मिलेगा। अच्छा।
4)
हर कदम में सर्वशक्तिवान बाप का साथ है, ऐसा अनुभव करते हो? जहाँ सर्वशक्तिवान बाप है वहाँ सर्व प्राप्तियाँ स्वत: होंगी। जैसे बीज है तो झाड़ समाया हुआ है। ऐसे सर्वशक्तिवान बाप का साथ है तो सदा मालामाल, सदा तृप्त, सदा सम्पन्न होंगे। कभी किसी बात में कमज़ोर नहीं होंगे। कभी कोई कम्पलेट नहीं करेंगे। सदा कम्पलीट। क्या करें, कैसे करें... यह कम्पलेन्ट नहीं। साथ हैं तो सदा विजयी हैं। किनारा कर देते तो बहुत लम्बी लाइन है। एक क्यों क्यू बना देती है। तो कभी क्यों की क्यू लगे। भक्तों की प्रजा की क्यू भले लगे लेकिन क्यों की क्यू नहीं लगानी है। ऐसे सदा साथ रहने वाले चलेंगे भी साथ। सदा साथ हैं, साथ रहेंगे और साथ चलेंगे यही पक्का वायदा है ना। बहुतकाल की कमी अन्त में धोखा दे देगी। अगर कोई भी कमी की रस्सी रह जायेगी तो उड़ नहीं सकेंगे। तो सब रस्सियों को चेक करो। बस बुलावा आये, समय की सीटी बजे और चल पड़ें। हिम्मते बच्चे मददे बाप। जहाँ बाप की मदद है वहाँ कोई मुश्किल कार्य नहीं। हुआ ही पड़ा है।
5)
सदा अपने को मास्टर सर्वशक्तिवान अनुभव करते हो? इस स्वरूप की स्मृति में रहने से हर परिस्थिति ऐसे अनुभव होगी जैसे परिस्थिति नहीं लेकिन एक साइडसीन है। परिस्थिति समझने से घबरा जाते लेकिन साइडसीन अर्थात् रास्ते के नज़ारे हैं तो सहज ही पार कर लेते क्योंकि नज़ारों को देख खुशी होती है, घबराते नहीं। तो विघ्न, विघ्न नहीं हैं लेकिन विघ्न आगे बढ़ने का साधन है। परीक्षा क्लास आगे बढ़ाती है। तो यह विघ्न, परिस्थिति, परीक्षा आगे बढ़ाने के लिए आते हैं, ऐसे समझते हो ना! कभी कोई बात सोचते - यह क्या हुआ, क्यों हुआ? तो सोचने में भी टाइम जाता है। सोचना अर्थात् रूकना। मास्टर सर्वशक्तिवान कभी रूकते नहीं। सदा अपने जीवन में उड़ती कला का अनुभव करते हैं।
6)
वरदाता बाप द्वारा सर्व वरदान प्राप्त हुए? बाप द्वारा सबसे मुख्य वरदान कौन सा मिला? एक तो सदा योगी भव और दूसरा पवित्र भव। तो यह दोनों विशेष वरदान सदा जीवन में अनुभव करते हो? योगी जीवन बना ली या योग लगाने वाले योगी हो? योग लगाने वाले योगी दो चार घण्टा योग लगायेंगे फिर खत्म। लेकिन योगी जीवन अर्थात् निरन्तर। तो निरन्तर योगी जीवन है। ऐसे ही पवित्र भव का वरदान मिला है। पवित्र भव के वरदान से पूज्य आत्मा बन गये। योगी भव के वरदान से सदा शक्ति स्वरूप बन गये। तो शक्ति स्वरूप और पवित्र पूज्य स्वरूप दोनों ही बन गये हो ना। सदा पवित्र रहते हो? कभी-कभी तो नहीं। क्योंकि एक दिन भी कोई अपवित्र बना तो अपवित्र की लिस्ट में जायेगा। तो पवित्रता की लिस्ट में हो? कभी क्रोध तो नहीं आता? क्रोध या मोह का आना इसको पवित्रता कहेंगे? मोह अपवित्रता नहीं है क्या? अगर नष्टोमोहा नहीं बनेंगे तो स्मृति स्वरूप भी नहीं बन सकेंगे। कोई भी विकार आने नहीं देना। जब किसी भी विकार को आने नहीं देंगे तब कहेंगे पवित्र और योगी भव!

बापदादा सभी बच्चों से उम्मीदें रखते हैं, हर बच्चे को दृढ़ संकल्प करना है, व्यर्थ नहीं सोचेंगे, व्यर्थ नहीं करेंगे, व्यर्थ की बीमारी को सदा के लिए खत्म करेंगे। यही एक दृढ़ संकल्प सदा के लिए सफलता मूर्त बना देगा। सदा सावधान रहना है अर्थात् व्यर्थ को खत्म करना है। अच्छा - ओम् शान्ति।

वरदान:
दिव्य बुद्धि द्वारा दिव्य सिद्धियों को प्राप्त करने वाले सिद्धि स्वरूप भव
जैसा समय उस विधि से दिव्य बुद्धि को यूज़ करो तो सर्व सिद्धियां आपकी हथेली पर हैं। सिद्धि कोई बड़ी चीज़ नहीं है सिर्फ दिव्य बुद्धि की सफाई है। जैसे आजकल के जादूगर हाथ की सफाई दिखाते हैं, यह दिव्य बुद्धि की सफाई सर्व सिद्धियों को हथेली में कर देती है। आप ब्राह्मण आत्माओं ने सब दिव्य सिद्धियां प्राप्त की हैं इसलिए आपकी मूर्तियों द्वारा आज तक भी भक्त सिद्धि प्राप्त करने के लिए जाते हैं।
स्लोगन:
जिनके पास सर्वशक्तिमान् बाप की सर्वशक्तियाँ हैं उनकी हार कभी हो नहीं सकती।
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