Sunday, 25 February 2018

26-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन




26-02-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


''मीठे बच्चे - इस पुरानी दुनिया में और कोई भी आश न रख भविष्य ऊंच पद पाने के लिए सिर्फ नष्टोमोहा बनो, बाप को याद करो और पवित्र रहो''
प्रश्न:
बाप कौन सा सीधा सरल रास्ता बताते हैं, किस बात से बाप का तैलुक नहीं?

उत्तर:
बाप बच्चों को शान्तिधाम, सुखधाम चलने का सीधा-सादा रास्ता बताते - बच्चे सिर्फ बाप को याद करो और पवित्र रहो। बाकी तुम्हारे सामने कोई विपदा आती, दु:ख वा बीमारी आती, देवाला मारते.. यह सब तुम्हारे अपने ही कर्मो का हिसाब है, इनसे बाप का कोई तैलुक नहीं। बाप युक्तियां बताते हैं, कर्मबन्धन से छूटना हरेक बच्चे का काम है।
प्रश्न:
कोई-कोई बच्चे किस एक कारण से सर्विस लायक नहीं बनते?
उत्तर:
Description: http://bkdrluhar.com/jpg/download.jpgफैमिलियरिटी का हल्का नशा है, माया का अन्दर कीड़ा लगा है - इस कारण सर्विस लायक नहीं बन सकते।
गीत:-
लौट गया गम का जमाना...  
ओम् शान्ति।
खुशी और गम। अभी तो है रावणराज्य। मनुष्य तो जानते नहीं कि रावण राज्य किसको कहा जाता है। बाप आकर बच्चों को समझाते हैं कि गम कब होता है और खुशी कब होती है। इस रावण राज्य में गम भी है तो खुशी भी है। अभी-अभी खुशी, अभी-अभी गम। बच्चा जन्मा तो खुशी, मर गया तो गम। सन्यासी भी कहते हैं - यहाँ का सुख काग विष्टा के समान है। तो जरूर कहेंगे यह गम की दुनिया है। परन्तु उन्हों को यह पता ही नहीं कि सदा सुख, जहाँ गम का नाम निशान भी न हो, वह होता ही है सतयुग में। यह तुम बच्चे अभी जानते हो कि बरोबर अभी रात है। रात दु:ख की होती है, इसको रावण की रात कहा जाता है। रावण के आने से भक्ति आरम्भ होती है। विकार आरम्भ हो जाते हैं। अभी तुम बच्चे समझते हो कि हम सदा खुशी में रहने का अभी पुरुषार्थ कर रहे हैं। बाप समझा रहे हैं कि बच्चे भविष्य ऊंच पद पाने का पुरुषार्थ करो और कोई भी आश नहीं रखनी है। बच्चों को तो यह पता ही नहीं है कि बेहद के बाप से क्या मिलता है। बाप ही आकर बताते हैं। दुनिया यह नहीं जानती कि परमात्मा से क्या मिलता है। समझते हैं दु:ख-सुख वही देता है। बाप कहते हैं मैं तो सदा सुख देने आता हूँ। तुम सिर्फ श्रीमत पर चलो। मैं तो तुमको शान्तिधाम और सुखधाम का रास्ता बताने आया हूँ। उस रास्ते पर चलना तो तुम्हारा काम है और क्या झंझट सामने आता है? झंझटों में तो सारी दुनिया है। बाप कहते हैं मैं तो सीधा-सादा रास्ता बताता हूँ। वह तो बहुत सहज है। बाकी जो विपदायें झंझट आते हैं, दु:ख आता है, बीमारी आदि होती है, देवाला मारते हैं.. यह सब है तुम्हारे कर्मो का हिसाब। सो हर एक को भोगना ही है, इनसे हमारा कोई तैलुक नहीं है। इस समय भी कोई ऐसा पाप करते हैं तो दु:ख भोगना पड़ता है। मैं तो तुमको रास्ता बताने आया हूँ। मेरा फरमान है मुझ बाप को याद करो क्योंकि वापस जाना है। बाकी लड़ाई-झगड़े में तो सारी आयु गँवाई। मैं तो सीधा रास्ता बताता हूँ कि मुझे याद करो और पवित्र रहो। कैसे रहो, यह भी युक्तियां बताते हैं। बाकी माथा मारना पुरुषार्थ करना तो तुम्हारा काम है। यह सब कर्मबन्धन तुम बच्चों का है। बाप कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रह पवित्र रहना है। बाप जानते हैं स्त्री का पति में, बच्चों में मोह बहुत रहता है, उनसे छुटकारा पाना, नष्टोमोहा बनना... यह तो बच्चों का काम है।
बाप तो सिर्फ दो बातें कहते हैं - अगर पूरा वर्सा लेना है तो एक पवित्र जरूर बनना है और दूसरा योग में रहना है। कोई बात में तुमसे अगर कोई लड़ते हैं तो यह हुआ तुम्हारा कर्मो का हिसाब-किताब। बाकी तुम पवित्र रहो उसके लिए गवर्मेन्ट भी रोक नहीं सकती। बाप तो रास्ता बताते हैं कि तुमको घरबार नहीं छोड़ना है। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र रहना है और योग में रहना है। मनुष्य समझते हैं पवित्र रहना बड़ा मुश्किल है क्योंकि ऐसी शिक्षा किसी ने कभी नहीं दी है। भल कितने भी ब्रह्मचारी रहते हैं परन्तु यहाँ तो कायदा है गृहस्थ व्यवहार में रहकर पवित्र रहना है। कुमारी तो पवित्र ही है, उसके लिए तो बहुत सहज है, पवित्र ही रहो। गृहस्थ में न जाओ। इसमें सिर्फ हिम्मत चाहिए। तुम कह सकती हो कि हम भारत को स्वर्ग बनाने के लिए पवित्र रहना चाहते हैं, इसमें भारत का ही कल्याण है। पवित्रता का वर्सा हमको मिल जायेगा। यह है वर्सा लेने की बात। सतयुग में थी ही पवित्र दुनिया। संगम पर जो पवित्र बनते हैं वही पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। इसमें सारी दुनिया का तो प्रश्न नहीं है कि सब कैसे पवित्र बनेंगे। अभी सबकी कयामत का समय है। अब सभी को हिसाब-किताब चुक्तू कर वापिस जाना है। सब तो आकर ज्ञान लेंगे नहीं। जो सहज राजयोग सीखेंगे वह वर्सा पायेंगे। सारी दुनिया तो क्या सारा भारत भी यह ज्ञान सुन धारण नहीं कर सकता है। बाकी कोई झगड़ा है वह तो तुम बच्चों को मिटाना है योगबल से। मार उन्हें खानी पड़ती है जिन्हों का कुछ ममत्व है, नष्टोमोहा नहीं बने हैं, वह ताकत नहीं है। बाबा के पास समाचार आया कि एक गोपिका ने बहुत आंसू बहाये। परन्तु रोने से क्या होगा? बाप ने युक्तियां तो बहुत बताई है। पति को बोलो हम पवित्र रहने चाहती हैं और बाकी सब सर्विस करने के लिए तैयार हैं। युक्ति से अपने को छुड़ा सकती हैं। परन्तु पहले अपनी दिल का ममत्व टूटना चाहिए। माताओं का पति और बच्चों में बहुत मोह होता है। फिर कहती है कोई छुड़ावे। परन्तु इसमें चिल्लाने वा रोने की कोई दरकार नहीं। यह समझ की बात है। समझो कोई अच्छे आदमी की स्त्री है, बच्चे भी फर्स्टक्लास हैं, बाबा तो कहेंगे गृहस्थ व्यवहार में रहकर पवित्र रहकर दिखाओ, इस अन्तिम जन्म के लिए। तो पति को समझाकर वश करना पड़े। नहीं तो जवाब देना पड़े। परन्तु जब नष्टोमोहा बन सके तब। कोई चाहे तो एक सेकेण्ड में नष्टोमोहा हो जाए, नहीं तो जीवन भर भी न हो सके। बहुतों को छोड़ने बाद भी ममत्व नहीं मिटता फिर रग जाती रहती है, तो वह अवस्था नहीं रहती, इसलिए बाप कहते हैं पहले नष्टोमोहा हो जाओ। बाकी सिर्फ कर्म कूटते रहेंगे तो बाप क्या करेंगे? सबके लिए रास्ता एक ही है पवित्र जरूर बनना है। अगर पवित्र नहीं रहने देते तो अपने पांव पर खड़ी हो कोई न कोई सर्विस में लग जाओ। यहाँ तो साफ दिल चाहिए। ऐसे नहीं, घर छोड़कर आये फिर ब्राह्मण कुल में रह कोई न कोई से फैमिलियरिटी में फँसी रहे। ऐसे भी बहुत हैं जिनको फैमिलियरिटी का हल्का नशा रहता है। उन्हों की अवस्था नहीं चढ़ती। सर्विस लायक नहीं बनते क्योंकि अन्दर कीड़ा लगा हुआ है। माया छोड़ती नहीं है। लिखते हैं बाबा बहुत माया के तूफान लगते हैं। तो जरूर हल्का नशा आता होगा। यहाँ कमल फूल समान रहना है। मुरझाने की बात नहीं। सबको अपना-अपना कर्मबन्धन है, तो दवाई भी अपनी-अपनी है। कोई कमाई लिए पूछते हैं तो बाबा उनका पोतामेल देख राय देते हैं। कई हैं जिनका धन्धा ऐसा है कि पाप करने बिगर शरीर निर्वाह चल नहीं सकता। आजकल समय ही ऐसा हो गया है। कोई पास बहुत पैसे हैं तो पाप करने की दरकार नहीं है। बाबा कहते हैं शान्त में बैठ योग की कमाई करो परन्तु काम करने से पहले राय लेनी होती है। ऐसे नहीं काम करने के बाद बोले इस बात में फंस गया हूँ - क्या करुँ? बाबा समझाते रहते हैं, अगर धन बहुत है तो शान्त में बैठ बाबा से वर्सा लो, धन्धेधोरी का झंझट छोड़ो। कदम-कदम पर श्रीमत पर चलना जरूरी है। आपस में बहुत मीठा रहना है। नहीं तो बापदादा का नाम बदनाम करेंगे। बापदादा वा सतगुरू की निंदा कराने वाला ऊंच ठौर नहीं पायेगा। अपने हाथ में लॉ नहीं उठाना चाहिए। नहीं तो सब कहेंगे ईश्वरीय कुल के भी ऐसे बच्चे होते हैं क्या? बाप कहते हैं किसको दु:ख मत दो। सवेरे उठ बाबा को याद करो। बाबा आप कितने मीठे हो, आप हमको राजाओं का राजा स्वर्ग का मालिक बनाते हो। हम आपकी श्रीमत पर जरूर चलेंगे। हम आसुरी मत पर नहीं चलेंगे। बाप को याद नहीं करते हैं तो बाप समझ जाते हैं इनके अजुन पुराने आसुरी संस्कार हैं। यह क्या स्वर्ग का राज्य भाग्य लेंगे। अपनी चलन तो देखो। नहीं तो तुम बच्चों जैसा तकदीरवान दुनिया भर में कोई नहीं। बाप तो कहेंगे - सगे बच्चे बनो। ऐसी चलन दिखाओ जो बाप भी खुश हो। बाप को बच्चों का बहुत ख्याल रहता है कि कैसे बच्चों को दु:ख से छुड़ाए ऊंच पद प्राप्त करायें।
बाबा समझाते हैं दिन को भल गोरखधन्धा करो परन्तु ब्रह्म-महूर्त में उठ बाबा से मीठी-मीठी बातें करनी चाहिए। बाबा आपने तो कमाल किया है! 21 जन्मों के लिए स्वर्ग की बादशाही तो आप देते हो! हम तो आप पर बलिहार जाऊं। तो बलिहार जाना है, सिर्फ कहना नहीं है। जितना समय याद में रहेंगे उसका असर सारा दिन चलेगा। बहुत बी.के. हैं जो सुबह को उठते नहीं हैं, तो धारणा भी नहीं होती है। सवेरे जागने की आदत पड़ जाए फिर देखो कैसे सर्विसएबुल बन जाते हैं। जिसको सर्विस का शौक है वह कहाँ भी सर्विस करेगा। गाली तो मिलेगी। सौ में से एक निकलेगा। इसमें लज्जा नहीं होनी चाहिए। सर्विस तो जहाँ तहाँ है, सिर्फ करने वाला हो। बाबा युक्तियां तो बताते रहते हैं। नशा होना चाहिए। और सभी नशों में है नुकसान, बिगर नशे नर को नारायण बनाने के। यह नशा बाप चढ़ाते हैं। बाकी कोई के पास ज्ञान का नशा है नहीं। पतित दुनिया और पावन दुनिया का भी किसको पता नहीं है। पतित दुनिया में जरूर पतित होंगे तब जो पावन देवताओं को पूजते हैं। सतयुग, त्रेता में तो पावन महाराजा, महारानी होकर गये हैं। रावण की राजधानी शुरू होती है द्वापर से।
बच्चे जानते हैं कि शिवबाबा हमको अच्छे कर्म सिखलाते हैं और फिर पद का भी साक्षात्कार कराते हैं। यह है प्रत्यक्षफल का साक्षात्कार। तो जबकि बाप स्वयं आये हैं सिखलाने के लिए तो सीखने की कितनी उत्कण्ठा होनी चाहिए। कर्मबन्धन है सिर्फ ऐसे कहना, इसको भी कमजोरी कहा जाता है। कर्मबन्धन से छूटने की युक्तियां भी बाबा बतलाते रहते हैं। परन्तु ऐसी राय पक्के को ही दे सकते हैं, न कि कच्चे को। कई बांधेलियां भी पुरुषार्थ कर ज्ञान योगबल से पति को वश कर उनको ले आती हैं, मार भी बहुत खाती हैं। कहा जाता है ना धरत परिये धर्म ना छोड़िये। तो यह भी प्रतिज्ञा की जाती है और उस पर कायम रहना चाहिए। अमल करना चाहिए। माया बड़ी प्रबल है उन पर विजय पानी है, पूरा पुरुषार्थ करना है। ऐसे नहीं कि स्वर्ग में क्या भी पद पायें। नहीं, पुरुषार्थ ऊंच बनने का करना चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) अपने हाथ में लॉ नहीं उठाना है। आपस में बहुत-बहुत मीठा रहना है। किसी को भी दु:ख नहीं देना है। ब्रह्म मुहूर्त में उठ बाप से मीठी-मीठी बातें करनी है।
2) सेकेण्ड में नष्टोमोहा बनना है। पवित्र रहने की युक्ति निकालनी है। हिम्मत रखनी है। ज्ञान-योगबल से हिसाब-किताब चुक्तू करने हैं।
वरदान:
परमार्थ के आधार पर व्यवहार को सहज बनाने वाले भाग्यवान आत्मा भव
आधाकल्प व्यवहार में, भक्ति में, धर्म के क्षेत्र में सबमें मेहनत की और अभी मेहनत से छूट गये। अभी व्यवहार भी परमार्थ के आधार पर सहज हो गया। निमित्त मात्र कर रहे हो। निमित्त मात्र करने वाले को सदा सहज अनुभव होगा। व्यवहार नहीं है लेकिन खेल है। माया का तूफान नहीं लेकिन ड्रामा अनुसार आगे बढ़ने का तोहफा है। तो मेहनत छूट गई ना। ऐसे मेहनत से अपने को बचाने वाली श्रेष्ठ भाग्यवान आत्मा हूँ -इसी स्मृति में रहो।
स्लोगन:
जीवन में मधुरता का गुण धारण करना ही महानता है।
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